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दुःख का कारण


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

परमात्मा ज्ञानस्वरूप, आनंदस्वरूप और सुखस्वरूप है। वह प्रकृति से परे है। यदि मन प्रकृति की चीजों में मन भटकता है तो बुद्धि में राग-द्वेष उत्पन्न होता है और मन शांत होता है तो बुद्धि स्थिर हो जाती है तथा भगवत्शांति प्रकट हो जाती है। बाहर चाहे दुःख का कैसा भी निमित्त हो, भीतर शांति बनी रहती है।

एक तो दुःख के निमित्त से दुःख होता है। दूसरा मैं दुःखी हूँ- ऐसा सोचने से दुःख होता है। तीसरा दुःखाकार वृत्ति से दुःख होता है।

कभी दुःख का निमित्त होते हुए भी यदि दुःखाकार वृत्ति नहीं बनती तो दुःख नहीं होता। जैसे बच्चा चलते-चलते गिर पड़ा, उसको ठोकर लगी तो दुःख का निमित्त तो बना लेकिन उसकी दुःखाकार वृत्ति नहीं बनी तो वह हँसते-हँसते उठ खड़ा होता है। अथवा तो चतुर माँ उसकी वृत्ति दुःखाकार बनने से पहले ही सुखाकार बना देती है तो वह दुःखी नहीं होता।

लेकिन दुःख निवृत्ति ही जीवन का उद्देश्य नहीं है। जीवन का उद्देश्य है – परमानंद की प्राप्ति। दुःख होते हुए भी जिसे दुःख स्पर्श नहीं कर सकता, वह आत्मा मैं हूँ – ऐसा ज्ञान जरूरी है। अन्यथा कोई दुःख नहीं है तो बिस्तर पर पड़े-पड़े व्यक्ति करवट लेता रहता है कि कोई दुःख नहीं है। लेकिन यह परमानंद की प्राप्ति नहीं है। इससे तो आलस्य पैदा होगा और व्यक्ति बीमार होकर दुःख व पराधीनता की खाई में गिर जायेगा। दुःख का निमित्त न होते हुए भी दुःख बना लेगा।

अपने दुःख का कारण किसी को मत मानो। जो लोग अपने दुःख का कारण दूसरों को मानते हैं, उनके चित्त में द्वेष बना रहता है और वे जलते रहते हैं, तपते रहते हैं। जो अपने दुःख का कारण किसी और को मानेगा उसका दुःख बढ़ता जायेगा, घटेगा नहीं। अपने दुःख का कारण अपना अज्ञान है, अपनी नासमझी है, अपने कर्म हैं।

अपने दुःख का कारण अपनी बेवकूफी मानकर उसे मिटाना चाहिए। जो दूसरों को अपने दुःख का कारण मानते हैं उनकी बेवकूफी बढ़ती है, उनका दुःख बढ़ता है।

काहु न कोउ सुख दुःख कर दाता।

निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।

कोई किसी के सुख-दुःख का कारण नहीं है, अपने ही कर्म और विचार से मनुष्य सुख-दुःख पाता है।

जो तुम्हारा शत्रु है, वह किसी का मित्र भी तो है। हमारे ही पुण्यकर्म सामने वाले के अंतःकरण में हमारे लिए सद्भाव पैदा कर देते हैं और हमारे ही पापकर्म सामने वाले के हृदय में दुर्भावना पैदा कर देते हैं। किसी से न राग करें न द्वेष। राग आदमी को पराधीन कर देता है और द्वेष आदमी को हिंसक बना देता है। द्वेष का त्याग करना है तो अपने स्वभाव में क्षमाशीलता लायें। अगर क्षमाशीलता आयेगी तो हिंसा अहिंसा में बदल जायेगी, क्रोध शांति में बदल जायेगी, घृणा प्रेम में बदल जायेगी।

करना है तो क्षमा करो, द्वेष न करो। जानना है तो इसने क्या किया ? उसने क्या किया ? इस जानकारी में समय नष्ट मत करो वरन् परमेश्वर को जानो। मानना है तो अपने को शरीर मत मानो, न ही शरीर के सम्बन्धों को सच्चा मानो वरन् अपने को भगवान का मानो तो बेड़ा पार हो जाय….

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2002, पृष्ठ संख्या 2 अंक 120

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कबीरा निंदक न मिलो….


अज्ञान-अंधकार मिटाने के लिए जो अपने-आपको खर्च करते हुए प्रकाश देता है, संसार की आँधियाँ उस प्रकाश को बुझाने के लिए दौड़ पड़ती हैं। टीका, टिप्पणी, निंदा, गलत चर्चाएँ और अन्यायी व्यवहार की आँधी चारों ओर से उस पर टूट पड़ते हैं। स्वामी विवेकानंद, भगिनी निवेदिता आदि को भी ऐसे निंदकों का सामना करना पड़ा था। महात्मा गाँधी जी की सेवा में कुछ महिलाएँ थीं तो गाँधी जी को भी निंदकों ने अपना शिकार बनाया था।

असामाजिक तत्त्व अपने विभिन्न षड्यन्त्रों द्वारा संतों और महापुरुषों के भक्तों व सेवकों को भी गुमराह करने की कुचेष्टा करते हैं। समझदार साधक यह भक्त तो उनके षड्यंत्र-जाल में नहीं फँसते। महापुरुषों के दिव्य जीवन के प्रतिपल से परिचित उनके अनुयायी कभी भटकते नहीं, पथ से विचलित नहीं होते अपितु सश्रद्ध होकर उनके दैवी कार्यों में अत्यधिक सक्रीय व गतिशील होकर सहभागी हो  जाते हैं। परंतु जिन्होंने साधना के पथ पर अभी-अभी कदम रखे है, ऐसे नवपथिकों को गुमराह कर पथच्युत करने में दुष्टजन आंशिक रूप से अवश्य सफलता प्राप्त कर लेते हैं और इसके साथ ही आरम्भ हो जाता है – नैतिक पतन का दौर, जो संत-विरोधियों की शांति व पुण्यों को समूल नष्ट कर देता है, कालांतर में उनका सर्वनाश हो जाता है। कहा भी गया हैः

संत सतावे तीनों जावे, तेज बल और वंश।

ऐड़ा-ऐड़ा कई गया, रावण कौरव केरो कंस।।

अतः संतों के निंदकों से सावधान करते हुए संत कबीर जी कहते हैं-

कबीरा निंदक न मिलो, पापी मिले हजार।

एक निंदक के माथे पर, लाख पापिन को भार।।

जिनका जीवन किसी संत या महापुरुष के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सान्निध्य में है, उनके जीवन में निश्चिंतता, निर्विकारिता, निर्भयता, प्रसन्नता, सरलता, समता व दयालुता के दैवी गुण साधारण मानवों की अपेक्षा अधिक होते हैं और वे ईश्वरीय शांति पाते हैं, सद्गति पाते हैं। जिनका जीवन महापुरुषों का, धर्म का सामीप्य व मार्गदर्शन पाने से कतराता है, वे प्रायः अशांत, उद्विग्न, खिन्न व दुःखी देखे जाते है व भटकते रहते हैं। इनमें से कई लोग आसुरी वृत्तियों से युक्त होकर संतों के निंदक बनकर अपना सर्वनाश कर लेते हैं। इसीलिए संत तुलसीदास जी ने लिखा है-

हरि गुरु निंदा सुनहिं जे काना, होहिं पाप गौ घात समाना।

हरि गुरु निंदक दादुर1 होई जन्म सहस्र पाव तन सोई।।

  1. दादुर = मेंढक

नानक जी ने भी कहा हैः

संत का निंदक महा हतिआरा। संत का निंदकु परमेसुरि मारा।

संत के दोखी की पुजै न आसा। संत का दोखी उठि चलै निरासा।।

भारतवर्ष का इससे बढ़कर और क्या दुर्भाग्य हो सकता है कि यहाँ के निवासी अपनी ही संस्कृति के रक्षक व जीवनादर्श, ईश्वररत आत्मारामी संतों व महापुरुषों की निंदा में, उनके दैवी कार्यों में विरोध उत्पन्न करने के दुष्कर्मों में संलग्न होते जा रहे हैं। यदि यही स्थिति बनी रही तो वह दिन दूर नहीं, जब हम अपने ही हाथों से अपनी पावन परम्परा, रीति रिवाजों व आचारों को लूटते हुए देखते रह जायेंगे। क्योंकि संत संस्कृति के रक्षक, उच्चादर्शों के पोषक, रोग-शोक, अहंकार, अशांति के शामक होते हैं और जिस देश में ऐसे संतों का अभाव या अनादर होता है, इतिहास साक्षी है कि या तो वह राष्ट्र स्वयं ही मिट जाता है अथवा उसकी संस्कृति ही तहस-नहस होकर छिन्न-भिन्न हो जाती है और वहाँ के लोग बाहर से स्वाधीन होते हुए भी वास्तव में अशांति, अकाल मृत्यु, अकारण तलाक, विद्रोह और खिन्नता में खप जाते हैं।

हमारे ही देश के कुछ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में हमारे ही संतों और संस्कृति के खिलाफ अनर्गल बातें लिखी होती हैं। विदेशियों द्वारा दिये जाने वाले चंद पैसों की लालच में अपनी ही संस्कृति पर कुठाराघात करने वालों के लिए क्या कहा जाय ?

वे हिन्दू धर्म के साथ साधु-संतों और देवी देवताओं के विषय में ऐसी बातें लिखते हैं कि हिंदुओं की ही श्रद्धा टूट जाये। क्योंकि विदेशी जानते हैं कि हिन्दुओं को अगर हिन्दुओं को गुलाम बनाना है तो पहले इनकी अपने ही धर्म से श्रद्धा तोड़नी पड़ेगी, क्योंकि धर्म इनका हौसला बुलंद करता है। इनकी श्रद्धा धर्म से हटने पर ही हम इन पर राज कर सकेंगे।

सदैव सज्जनों व संतों की निंदा, विरोध, छिद्रान्वेषण व भ्रामक कुप्रचार में संलग्न लेखक व पत्र-पत्रिकाएँ समझदारों की नजरों से तो गिरते ही हैं, साथ ही साथ लोगों को भ्रमित व पथभ्रष्ट करने के पाप के भागीदार भी बनते हैं। इस प्रकार के पाप का उन्हें अभी भय नहीं है, फिर भी भक्तों की बददुआएँ, समझदारों की लानत उन पर पड़ती है और देर-सवेर कुदरत का कोप उनपर होता ही है।

बड़े धनभागी हैं वे सत्शिष्य जो द्वेषपूर्ण भ्रामक प्रचार की तुच्छता समझ लेते है और उन अखबारों व पत्रिकाओं की होली जला देते हैं। उनसे माफी मँगवा लेते हैं अथवा उनके लिए चूड़ियाँ ले जाते हैं और उनकी बेशर्मी का उन्हें एहसास कराते हैं। उन्हीं के कार्यालय के सामने उनके अखबारों को जलाते हैं और उनके ब्लैकमेलिंग करने के मनसूबे सफल नहीं होने देते।

कुछ दिन पहले चंडीगढ़ में योग वेदान्त सेवा समिति के भाइयों ने जमीन खरीदी। एक फुट भी सरकार से जमीन नहीं ली गयी है, सारी जमीन समिति के भाइयों ने खरीदी है। उन पर लांछन लगाकर अख़बार वाले कौनसा मनोरथ पूरा करना चाहते हैं ?

बीसों एकड़ तो क्या, अगर कोई 20 गज भी सरकार की जमीन ली है – ऐसा अख़बार वाले साबित कर दिखायें तो उन्हें लाखों रूपये इनाम दिये जायेंगे। बेबुनियादी बातें लिख देना, कहानी रच देना, बात कुछ की कुछ तोड़-मोड़ कर द्वेषपूर्ण लेख लिख देना इससे अख़बार वालो की कीमत बढ़ती नहीं, घटती है।

धनभागी हैं वे सत्शिष्य जो तितिक्षाओं को सहने के बाद भी अपने सदगुरु के ज्ञान और भारतीय संस्कृति के दिव्य प्रकाश को दूर-दूर तक फैलाकर मानव-मन पर व्याप्त अंधकार को नष्ट करते रहते हैं। ऐसे सत्शिष्यों को शास्त्रों में पृथ्वी पर के देव कहा जाता है। – सम्पादक

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2002, पृष्ठ संख्या 10-11, अंक 118

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अधर्मी का धर्म


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्तवोत्तिष्ठ परंतप।।

‘हे अर्जुन ! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती है। हे परंतप ! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा।’ (गीताः 2.3)

धर्म के नाम पर जब कायरता फैल जाती है, तब अधर्म का प्रभाव बढ़ जाता है। इससे ईश्वरीय विधान का उल्लंघन होता है और मनुष्य की, समाज की  ज्यादा हानि होती है। जो मनुष्य ईश्वरीय विधान के अनुकूल आचरण करता है वह आगे बढ़ता है। उसका अंतरात्मा शांति पाता है, सुख पाता है और आत्मसामर्थ्य बढ़ाता है। जो ईश्वरीय विधान का उल्लंघन करता है, वह गिरता है।

आजकल यही हो रहा है। बाहर कुछ भी करके धन कमा लिया, रुपये इकट्ठे कर लिये। फिर मंदिर, मस्जिद, चर्च में जाकर दान-दक्षिणा रख दी तो ‘सेठजी-सेठजी, साहब जी- साहब जी….’ करके वाह-वाह होने लगी। ऐसी वाहवाही से क्या होगा ? ऐसी आशीषों से क्या फायदा ? इससे धर्म की पुष्टि होगी ? नहीं। इससे तो अधर्म पुष्ट होता है। अधर्म की पुष्टि से समाज में सुख-शांति बढ़ेगी क्या ? ना, ना…. अधर्म से सुख-शांति का नाश होता है।

हम चाहे कहीं भी जायें, मंदिर में जायें या मस्जिद में जायें…. किसी को अन्न-वस्त्र दें या दान-दक्षिणा दें…. परंतु यह देखना चाहिए कि हमारा आचरण धर्म के अनुकूल है कि नहीं ? जो दान-दक्षिणा देते हैं वह धन कहीं गरीबों का शोषण करके तो इकट्ठा नहीं किया है न ? यह सावधानी भी रखनी चाहिए।

जब धर्म की हानि होती है, लोग निःस्वार्थता छोड़कर स्वार्थपरायण हो जाते हैं, निरहंकारिता छोड़कर अहंकारी हो जाते हैं, हृदय की विशालता छोड़कर संकीर्ण हो जाते हैं तब परेशानियाँ झेलते हैं।

निःस्वार्थ होना, निरहंकारी होना, हृदय को विशाल रखना, ‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय’ सत्कर्म करना धर्म है। इसमें ईश्वरीय विधान का आदर है। परंतु मैं और मेरा… पुत्र और परिवार… ऐसा छोटा दायरा बनाकर संकीर्णता से, स्वार्थ से जीते हैं तो ईश्वरीय विधान का उल्लंघन होता है, हम धर्म से च्युत होते हैं। इसलिए चिंता, शोक, भय, बीमारी, परेशानी आदि सताते रहते हैं।

दुर्योधन स्वार्थपरायण होकर अधर्म का आचरण कर रहा था। जब द्रौपदी के बालों को पकड़कर दुःशासन उसे खींचता-घसीटता भरी सभा में ले आया, तब सारी सभा देख रही थी कि द्रौपदी के साथ अन्याय हो रहा है फिर भी सब चुप बैठे थे। दुर्योधन ने भीम को भरी सभा में अपनी बायीं जंघा दिखायी थी। उस समय कर्ण ने द्रौपदी को ‘वेश्या’ कहकर उसका अपमान भी किया था, यह भी सभा के लोगों ने देखा-सुना था।

परंतु जब युद्ध के मैदान में लड़ते समय कर्ण के रथ का पहिया कीचड़ में फँस गया, तब कर्ण रथ से नीचे उतरकर पहिया निकालने लगा। यह देखकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहाः “यही मौका है।”

श्रीकृष्ण की बात मानकर जब अर्जुन धनुष पर बाण चढ़ाकर निशाना साधने लगा, तब कर्ण ने हैः

“यह धर्मयुद्ध नहीं है। रुको, मैं निःशस्त्र हूँ और तुम मुझ पर वार कर रहे हो ? यह धर्म नहीं है।”

कर्ण जब धर्म की दुहाई देने लगा तब श्रीकृष्ण ने कहाः “अब तू धर्म की दुहाई देता है तो उस समय कहाँ था ? तेरा धर्म कहाँ गया था ? जब द्रौपदी के बाल पकड़कर घसीटते हुए उसे भरी सभा में लाया गया था और तू उसका अपमान कर रहा था ?”

कभी-कभी राक्षसी वृत्ति के लोग, अधर्मी लोग भी धर्म की दुहाई देकर आपत्तिकाल में अपना बचाव करना चाहते हैं। यह धर्म के अनुकूल नहीं है।

जो आपत्तिकाल में भी धर्म का त्याग नहीं करता, वह अवश्य उन्नति करता है और जो अपनी जीवन-यात्रा में धर्म-अधर्म का ख्याल नहीं रखता, वह मारा जाता है, कुचला जाता है। उसे बहुत कष्ट सहना पड़ता है।

अपने बेटे की दुष्टता को धृतराष्ट्र जानते थे, परंतु बेटे में मोह था। इससे ‘मैं और मेरे पुत्र’ का संकीर्ण दायरा बनाकर उसी में चिपके थे। दुर्योधन की महत्त्वकांक्षाओं को और पाप-चेष्टाओं को जानते थे, फिर भी मोहवश उसे नहीं रोक पा रहे थे। तभी लाक्षागृह और द्यूत क्रीड़ा जैसी घटनाएँ घटीं।

गांधारी को धर्म का ज्ञान था। वह यह भी जानती थी कि उसका पुत्र पाप का पुतला है। फिर भी उसने मोहवश ईश्वरीय विधान का उल्लंघन किया तो उसे दुःख झेलना पड़ा।

महाभारत का युद्ध चल रहा था। उस समय गांधारी को पता चला कि उसका पुत्र मुसीबत में है। उसने दुर्योधन से कहाः

“बेटे ! तुझ पर इतनी मुसीबतें आती हैं तो मैं अपने सतीत्व का आशीर्वाद तुझे दूँगी। कल सुबह तू एकदम नग्न होकर मेरे सामने आ जाना। मैं अपनी आँखों की पट्टी खोलूँगी। तेरे शरीर पर मेरी नज़र पडेगी तो तेरा शरीर वज्र जैसा हो जायेगा। फिर कोई भी तुझे मार नहीं सकेगा।”

गांधारी धर्म के मार्ग पर चलती थी, परंतु वह भी मोहवश धर्म छोड़कर अधर्म की पीठ ठोकने लगी थी।

कभी-कभी धार्मिक व्यक्ति भी अधर्म की पीठ ठोंकने लग जाता है, तब अधर्म पुष्ट होता जाता है और धर्म की हानि होती है। परंतु वह ज्यादा समय टिकता नहीं है। उसका नाश अवश्य होता है।

गांधारी की यह बात पांडवों तक पहुँच गयी। पांडव चिंतित होकर बैठ गये कि यदि दुर्योधन की काया वज्र जैसी हो गयी तो उस पापी का नाश करना असंभव है। अगर पापी का नाश नहीं होगा तो वह पापी औरों को सताता रहेगा….. पाप और पापी बढ़ते रहेंगे।

इतने में श्रीकृष्ण वहाँ आ पहुँचे। सभी को चिंतित देखकर श्रीकृष्ण ने पूछाः “क्या बात है ? तुम लोग इतने चिंतित क्यों हो ?”

पांडवों ने बतायाः “उस पापी दुर्योधन को गांधारी मदद कर रही है और अपने सतीत्व के आशीर्वाद से दुर्योधन को वज्रकाय बनाने वाली है। फिर क्या होगा ? यही सोचकर हम चिंतित हैं।”

यह सुनकर श्रीकृष्ण मुस्कराने लगे। तब युधिष्ठिर ने कहाः “हम चिंता-चिंता में मरे जा रहे हैं और आप इस अवसर पर हँस रहे हैं ?”

श्रीकृष्ण तो सब कुछ जानते थे। अपने मुक्तस्वरूप को जानने वाले श्रीकृष्ण के पास हँसी और प्रसन्नता नहीं रहेगी तो कहाँ रहेगी ? श्रीकृष्ण इसलिए हँसे कि ‘गांधारी भी मोहवश पापी दुर्योधन का पक्ष ले रही है…. धर्म अब अधर्म की पीठ ठोंकने लगा है।’

गांधारी के कहे अनुसार दुर्योधन सुबह के अँधेरे में अपना शरीर वज्र का बनाने के लिए नग्न दशा में गांधारी के पास जा रहा था। तभी बीच रास्ते में श्रीकृष्ण प्रकट हो गये और बोलेः

“अरे, दुर्योधन ! इस दशा में कहाँ जा रहे हो ? हस्तिनापुर का सर्वेसर्वा, इतना बड़ा युवान पुत्र माँ के सामने ऐसे जा सकता है ? बिल्कुल नग्न ?”

दुर्योधन शर्म के मारे नीचे बैठ गया और उसने श्रीकृष्ण को सारी बात बता दी।

श्रीकृष्णः “तुम्हें वज्रकाय बनना है, यह तो ठीक है। परंतु कम से कम अपने कटिप्रदेश को तो ढँक लो। कटिवस्त्र नहीं है तो लो, यह फूलमाला की चदरिया बाँध लो।”

दुर्योधन को श्रीकृष्ण की बात जँच गयी। उसने फूलमाला की चदरिया अपनी कमर में बाँध ली और गांधारी के पास पहुँच गया।

गांधारी की बाहर की आँख पर तो पट्टी बँधी ही हुई थी, परंतु भीतर की विवेकरूपी आँख पर भी पट्टी बँधी थी। दुर्योधन को आया हुआ जानकर उसने दुर्योधन को वज्रकाय बनाने के लिए वर्षों से बँधी हुई पट्टी खोली और संकल्प करके देखा तो वह चौंक पड़ीः

“अरे, यह क्या ! तुझे कहा था न कि दिगंबर होकर आना। यह फूलमाला की चदरिया तुझे किसने पहनायी ? …उस वनमाली ने ही पहनायी होगी। तेरे शरीर का हिस्सा तो वज्र जैसा हो गया परंतु जो हिस्सा माला से ढँका है, वह कच्चा रह गया। उसे तू सँभालना।”

जब भीम और दुर्योधन का गदायुद्ध हो रहा था, तब दुर्योधन को जरा भी चोट नहीं लग रही थी तो मरने की तो बात ही क्या ? इससे भीम परेशान हो रहा था। तब श्रीकृष्ण ने इशारा किया कि ‘कटिप्रदेश पर गदा ठोक। भीम ने जब वहाँ पर गदा से मारा तब वह मरा।

अगर धार्मिक व्यक्ति अधर्म की पीठ ठोंकता है, तब अधर्म कुछ समय के लिए भले ही फलता-फूलता दिखे परंतु अंत में विजय तो धर्म की ही होती है।

घटित घटना है।

एक गाँव के बाहर एक पेड़ का ठूँठ था। खुजली मिटाने के लिए एक गाय ने उससे जोर-से रगड़ मारी। ठूँठ में एक फाँस गाय के पेट में घुसा और उस निमित्त से गाय मर गयी।

तीन साल से सूखे ठूँठ को बारिश में हरा-भरा देखकर गाँव के लोगों ने महात्मा से पूछाः

“कसाई के यहाँ कुशलता और धार्मिक के यहाँ मुसीबतें…. ऐसा क्यों ? सूखा ठूँठ गाय को मारने के बाद फला-फूला, उसकी जड़े सजीव हुईं, डालियाँ हरी हुईं, पत्ते लगे और वह तेजी से विकसित हो रहा है !”

महात्मा मुस्कराये और बोलेः “थोड़ा धैर्य रखो।”

वृक्ष तो बढ़ता ही जा रहा था। कुछ समय के बाद आँधी-तूफान आया, वृक्ष धराशायी हो गया। तब महात्मा ने बतायाः

“अन्याय, शोषण, अधर्म से कोई फलता-फूलता है तो धराशायी होने के लिए ही।”

इसीलिए धार्मिक लोगों को अधर्म का आश्रय नहीं लेना चाहिए। उन्हें अधर्म के भोग-विलास, ऐश-आराम के लिए लालायित नहीं होना चाहिए। ईश्वरीय विधान का आदर करना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2002, पृष्ठ संख्या 6-8, अंक 118

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