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दरिद्र कौन है ?


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

मैंने सुनी है एक कहानीः-

एक बाबा जी किसी के यहाँ भोजन करने हेतु गये । भोजन के बाद उसने आग्रह करके दक्षिणा के रूप में बाबा जी को चार पैसे दिये। बाबा जी ने सोचा कि ‘अब इस चार पैसे का क्या करना चाहिए ?’

उन्होंने किसी ब्राह्मण से पूछाः “इस चार पैसे का क्या सदुपयोग हो सकता है ?”

ब्राह्मण इज्जत आबरूवाला था। बोलाः “चार पैसे का सदुपयोग ? इससे होम-हवन तो न हो सकेगा। किसी दरिद्र को दे देना।”

बाबा जी ने एक दरिद्र के पास जाकर कहाः “मैं चार पैसे किसी दरिद्र को देना चाहता हूँ। दरिद्र कौन है ?”

उस जमाने में अपने को दरिद्र अथवा भिखमंगा कहलवाना कोई भी पसंद नहीं करता था। उस गरीब ने कहाः “हम दरिद्र नहीं हैं।”

विरक्त बाबा चौराहे पर खड़े हो गये और दल-बल सहित गुजरते राजा से बोलेः “ये ले लो।”

राजा ने सवारी से उतरकर बाबा जी को प्रणाम किया और बाबा ने राजा के हाथ में चार पैसे रखते हुए कहाः “इतने दिनों तक ढूँढा लेकिन कोई दरिद्र न मिला। आप धन के लिए जा रहे हैं तो मेरी तरफ से इतना ले लीजिये। ताकि मेरी चिंता मिटे।”

राजाः “मेरे पास तो इतना बड़ा राज्य है, विशाल सेना है, कई खजाने हैं तो मैं दरिद्र कैसे ?”

बाबा जीः ” जो हिंसा से, बलात्कार से झूठ-कपट और बेईमानी से किसी का धन हरता है, उससे बढ़कर दरिद्र दूसरा कौन हो सकता है ? दरिद्र वह नहीं है जिसके पास धन नहीं है। वरन् जैसे प्यासा आदमी पानी के लिए छटपटाता है, वैसे ही धन होते हुए भी जो और धन पाने के लिए छटपटाता है वह दरिद्र है।”

आद्यशंकराचार्य ने कहा हैः कोऽवा दरिद्रः विशालतृष्णः। ‘दरिद्र कौन है ? जिसकी तृष्णा विशाल है।’

जिसकी इच्छा-वासनाएँ ज्यादा हैं, जिसकी आवश्यकताएँ ज्यादा हैं वह दरिद्र है।

धन की कमी या अधिकता से कोई निर्धन या धनवान नहीं होता। संतोष की कमी वाला आदमी ही निर्धन है और संतोषी आदमी ही धनवान है। समझ की कमी से आदमी निर्धन होता है और सच्ची समझ होने पर आदमी धनवान होता है।

धन किसलिए है चाहता तू आप मालामाल है।

सिक्के सभी जिससे बने तू वह महा टकसाल है।।

चाह न कर चिंता न कर चिंता ही बड़ी दुष्ट है।

है श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ मगर चाह करके भ्रष्ट है।।

किसी ने कहा हैः

चाह चमारी चूहरी अति नीचन को नीच।

तू तो पूरण ब्रह्म था जो चाह न होती बीच।।

जब हृदय में चाह आ जाती है तब आदमी लघु हो जाता है। जिस समय तृष्णा हृदय पर कब्जा कर लेती है, उस समय आदमी तुच्छ हो जाता है और जिस समय अनजाने में भी तृष्णा नहीं रहती उस समय आदमी के चित्त में आनन्द, प्रेम और दिव्यता छलकती है।

वासना मिटाने का पुरुषार्थ ही वास्तविक पुरुषार्थ है। वासना मिटाने का अर्थ यह नहीं है कि जैसी इच्छा हुई वैसा कर लिया। इससे वासना मिटेगी नहीं वरन् गहरी उतर जायेगी। इसलिए ज्ञान का प्रकाश और विवेक का सहारा लेकर वासना को निवृत्त करने का यत्न करना चाहिए।

‘यह मिल गया, अब यह और मिल जाय….’ ऐसी चाह उचित नहीं। विवेक का उपयोग करें कि जो चाहते हैं उसकी आवश्यकता है कि इच्छा ? जो आवश्यकता होगी वह तो अपने-आप सहज में पूरी होती जायेगी। उसके लिए बेचैनी नहीं रहेगी और अगर व्यर्थ की इच्छा होगी तो पूर्ण होने के बाद भी अहंकार या आसक्ति बढ़ा देगी।

बिन जरूरी इच्छा अहंकार बढ़ा देती है। शरीर का गुजारा चलाने के लिए रोजी-रोटी, वस्त्र और मकान की आवश्यकता है। ‘इसके पास एक फ्लैट है तो मेरे पास दो हैं।’ इस प्रकार के भाव से एक फ्लैटवाले के आगे दो फ्लैटवाले का अहंकार खड़ा हो जायेगा। पड़ोसी की पत्नी लड़ाकू होगी तो लगेगा, ‘हम भाग्यशाली हैं कि अच्छी पत्नी मिली है।’

लेकिन भैया ! दो फ्लैट भी कब तक और अच्छी पत्नी भी कब तक ? पत्नी भी कभी बीमार पड़ेगी तो कभी मायके चली जायेगी। इसी प्रकार या तो धन चला जायेगा या धन को छोड़कर आप चले जायेंगे। जहाँ चाह रखी, वहीं नियति कुछ-न-कुछ मुसीबत जरूर खड़ी कर देगी। भोले बाबा ने कहा हैः

मानव तुझे नहीं याद क्या ? तू ब्रह्म का ही अंश है।

कुल गोत्र तेरा ब्रह्म है, सद्ब्रह्म तेरा वंश है।।

संसार तेरा घर नहीं, दो चार दिन रहना यहाँ।

कर याद अपने राज्य की, स्वराज्य की निष्कंटक जहाँ।।

अपनी असलियत को जान लो कि आप वास्तव में कौन हो ? आपका वास्तविक स्वरूप क्या है ? आप कितने महिमावान हो ? आप कितने धनवान हो ?

फिर चाहे आयकर वाले छापा मारें या कोई बम-धड़ाका करे लेकिन वे आपका बाल तक बाँका नहीं कर सकते, आप (आपका आत्मा) इतने महान हो।

अपनी महिमा को नहीं जानते इसीलिए आप परेशान रहते हो। सात्विक साधना और दिव्य स्वभाव के अपने आत्मप्रभाव को नहीं जानते इसीलिए आप परिस्थितियों के गुलाम हो जाते हो, यह जानते हुए भी कि परिस्थितियाँ सदा एक जैसी नहीं रहती हैं।

जो विश्वास अपने अंतर्यामी परमात्मा पर करना चाहिए वह विश्वास अगर अपनी तंदुरुस्ती पर किया तो जरूर बीमारी आ जायेगी। जो विश्वास अपने आत्मस्वरूप पर करना चाहिए वह अगर धन पर किया तो धन में गड़बड़ हो जायेगी। जो विश्वास अपने ईश्वर पर करना चाहिए वह विश्वास यदि अपने मित्रों सम्बन्धियों पर किया तो वे अवश्य धोखा दे देंगे। जो विश्वास अपने स्वरूप पर होना चाहिए वह विश्वास अगर व्यक्तियों, स्थूल परिस्थितियों तथा स्थूल पदार्थों पर किया तो अवश्य पछताना पड़ेगा।

यह दैवी सिद्धान्त है कि ज्यों-ज्यों आप अपनी आत्मा पर निर्भर होते हो, त्यों-त्यों जगत की चीजें आपकी सहायता हेतु, सेवा के लिए आकर्षित हो जाती है और ज्यों-ज्यों आप अपने अंतर्यामी से विमुख होने जाते हो, त्यों-त्यों वे चीजें आपसे दूर भागने लगती हैं। यदि आप सूर्य की तरफ आगे बढ़ते हो तो छाया आपके पीछे आती है और यदि सूर्य को पीठ देकर छाया को पकड़ने जाते हो तो छाया दूर-दूर भागती है।

अतः सदैव अपने अंतर्यामी ईश्वर पर भरोसा रखें। अपनी इच्छाएँ-वासनाएँ घटाते जायें और ईश्वर प्रीति बढ़ाते जायें क्योंकि इच्छा ही मनुष्य को सब होते हुए भी दरिद्र बना देती है। जिसके पास बाहर का पूरा साम्राज्य होते हुए भी अगर भीतर में वासना है तो वह सम्राट होते हुए भी कंगाल है और जिसके पास ठीक से रहने को झोंपड़ा नहीं है, ठीक से खाने को अन्न नहीं है, ठीक से पहनने को वस्त्र नहीं है फिर भी यदि उसके जीवन में कोई इच्छा-वासना नहीं है तो वह परम धनवान है। उसके जैसा सुखी त्रिलोकी में कोई नहीं….

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2002, पृष्ठ संख्या 4-6, अंक 114

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कर्मयोग की सिद्धता


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।

आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय।।

‘हे धनंजय ! जिसने कर्मयोग की विधि से समस्त कर्मों को परमात्मा में अर्पण कर दिया है और जिसने विवेक के द्वारा समस्त संशयों का नाश कर दिया है, ऐसे वश में किये हुए अन्तःकरण वाले पुरुष को कर्म नहीं बाँधते।’ (गीताः 4.41)

संसार में जो भी जन्म-मृत्यु हो रहे हैं, सुख-दुःख हो रहे हैं, वे सारे कर्मों के खेल हैं। कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके…. कर्मों के बन्धन से ही हम मनुष्य लोक में आते हैं। किन्तु यदि कर्म करने का सही ढंग आ जाय तो ये ही कर्म हमें सर्व बंधनों से छुड़ाकर मुक्ति के सिंहासन पर भी प्रतिष्ठित कर सकते हैं।

योगसंन्यस्तकर्माणं….. जिसने कर्मयोग की विधि से समस्त कर्मों को परमात्मा में अर्पण कर दिया है उसे कर्म बंधन में नहीं बाँधते। यही कर्मयोग है। अगर यह कर्मयोग की कला आ जाय तो किया गया कर्म, कर्मयोग बन जाता है और परमात्मा को समर्पित हो जाता है अन्यथा वही कर्म बंधन का कारण बन जाता है।

जैसे, तलवार चलाने की कला आती है तो तलवार दुश्मन का काम तमाम कर सकती है अगर कला नहीं आती है तो खुद का पैर भी काट सकती है। विद्युत का उपयोग करने की कला है तो विद्युत अंधकार दूर कर सकती है, तरह-तरह के साधनों को चला सकती है। लेकिन अगर उपयोग करने की कला नहीं है तो स्पर्श करने पर मौत भी ला सकती है।

ऐसे ही ये कर्म हैं जो अपने, पितरों के, कुटुंबियों के और समाज के भवबंधन को काटने में सहायक होते हैं परन्तु अगर कर्म करने की कला नहीं है तो अपनी, कुटुंब की और समाज की हानि भी करते हैं।

जिसने कर्म को कर्मयोग में परिणत कर दिया है वह कर्म करते हुए भी बंधायमान नहीं होता है।

वास्तव में कर्म प्रकृति में होते हैं। देह, मन तथा साधनों से कर्म होते हैं और कर्म करने की सत्ता परमात्मा की होती है। कर्म होते हैं साधनों से और साधन मिलते हैं संसार से। फिर भले शरीर साधन हो या मन साधन हो, चाहे रुपया साधन हो या शुद्ध भाव साधन हो। कर्म होते हैं साधनों से, साधन हैं प्रकृति के और प्रकृति है परमात्मा की।

‘परमात्मा की वस्तुएँ परमात्मा के ही संसार के काम आ गयीं, इसमें मैं कर्ता का किस बात का ?’ ऐसा विचार करके जो शास्त्रानुसार कर्म करता है उसके कर्म से कर्म कट जाते हैं और वह कर्मयोग में सफल होकर आत्म-साक्षात्कार कर लेता है।

‘कर्म योगी ऐसा मानता है कि यह शरीर पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा और अभी भी नहीं की ओर जा रहा है। ऐसे ही आदि और अंतवाली सब वस्तुएँ बदलने वाली हैं। संसार की इन वस्तुओं को संसार की सेवा में लगाना ही हमारा स्वभाव होना चाहिए, हमारा कर्तव्य होना चाहिए और हमारा आत्मा परमात्मा से अभिन्न है, अतः उस आत्मतत्व को जानने के लिए आत्मविचार करना चाहिए।

शरीर से जो भी कर्म करें, उन कर्मों को ईश्वरार्पित करते हुए परहित के लिए करें। कोई भी काम अपने व्यक्तिगत हित के लिए न करें। अगर व्यक्तिगत हित का विचार छोड़कर काम किया जाता है तो वह काम दिव्य हो जाता है, वही कार्य महान हो जाता है।

‘बापू जी ! हम अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए कर्म न करें तो हम जीयेंगे कैसे ?’

अगर आप व्यक्तिगत लाभ की इच्छा छोड़कर कर्म करते हो तो आपके योग क्षेम की जवाबदारी अनंत की है और जब वह आपका योगक्षेम वहन करेगा तो आपका जीवन दिव्य हो जायेगा।

‘महाराज ! जब अपने हित के लिए कर्म नहीं करना है तो कर्म करें ही क्यों ?’

कर्म किये बिना कोई रह नहीं सकता है। अपने हित का उद्देश्य होगा तो कर्म बाँधेगा। अपना हित छोड़कर परहित के लिए कर्म करेंगे तो कर्म आपके कर्मबंधन काट देंगे।

अपने हित के लिए जो कर्म किये जाते हैं उन कर्मों में फल की आसक्ति होती है। फलासक्ति, भोगासक्ति और कर्मासक्ति ये जीव को बाँधने वाली होती हैं। आसक्ति से किये हुए कर्म से कर्ता की योग्यता कुंठित होती है। अनासक्त होकर किये गये कर्म से दिव्यता निखरती है।

सेठ करोड़ीमल बड़े लोभी थे। उनकी पत्नी सत्संगी थी। उसने देखा की करोड़ों रुपये हो गये फिर भी इनका लोभ छूटा नहीं है। एक बार अपने पति को समझा-बुझाकर कथा में ले गयी।

कथाकार पंडित दान की महिमा का बड़े सुंदर ढंग से वर्णन करते थे। करोड़ीमल ने दान की महिमा सुनी और सुनते-सुनते डोलने लगे। पत्नी बड़ी खुश हो गयी कि ‘चलो, अब ये भक्त बन जायेंगे।’ कथा पूरी होने पर दोनों घर पहुँचे। पत्नी ने बातों-बातों में पूछ लिया कि ‘दान की महिमा सुनी ?’

सेठ बोलेः “बहुत बढ़िया कथा थी। अब मैं कल से ही दान लेना शुरु कर दूँगा।”

पत्नी बेचारी और दुःखी हो गयी कि कथा सुनकर, दान देकर कर्मबंधन काटने की जगह पर सेठ ने तो कर्मबंधन बढ़ाने की बात सोच ली ! और अधिक धन कमाने का लोभ बढ़ा लिया…….

किसी को धनवान देखकर अगर प्यार किया तो आपकी आसक्ति बढ़ जायेगी, किसी को सत्तावान देखकर प्यार करोगे तो आपका अंतःकरण भयभीत रहेगा, किसी की सुंदरता देखकर उससे प्यार करोगे तो कामविकार बढ़ जायेगा और कोई कभी-न-कभी आपके काम आयेगा इसलिए प्यार करोगे तो लोभ, कपट और दीनता बढ़ जायेगी। अतः आप किसी से कुछ लेने की इच्छा न रखें वरन् ‘मुझसे कोई परहित का कार्य हो जाय तो कितना अच्छा !’ ऐसी भावना रखें।

जो धनवान होता है उससे अगर हम मीठी-मीठी बातें करते हैं तो समझो, हमारे मन में धन का लालच है। अगर हम सत्ताधीश के आगे गिड़गिड़ाते हैं तो समझो, हमारे मन में आपका कोई करवाने का लालच है।

चाहे कोई धनवान हो या सत्तावान हो, आप उससे कुछ लेने की इच्छा न रखो वरन् उसके हित की भावना रखो। आप कुछ लेने के लिए, कुछ पाने के लिए कोई प्रवृत्ति न करो वरन् किसी का हित हो  इसलिए प्रवृत्ति करो। फिर देखो जीने का मजा…. आपके  प्रारब्ध में जो कुछ होगा वह तो खिंचा चला ही आयेगा। आप चाहो तो उसका उपयोग करो अथवा ठुकरा दो आपकी मर्जी।

मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है, फल भोगने में नहीं। कर्म करके फल पाने की इच्छा छोड़ते ही कर्म करने की आसक्ति छूट जायेगी। कर्म ऐसे करो कि कर्म करने से आपका मन उपराम हो जाय, विचार ऐसे करो कि विचारों का चलना बंद हो जाय, देखो ऐसा कि देखने की वासना मिट जाय, सुनो ऐसा कि संसार का सुनना खत्म हो जाय…. फिर जो सुनो वह ईश्वरसम्बन्धी ही हो, जो देखो वह ईश्वरमय ही दिखायी पड़े, जो बोलो वह ईश्वर के विषय में ही हो, जो विचार करो वह ईश्वरसम्बन्धी ही हो और जो करो वह ईश्वरमय ही हो। ऐसा करने से कर्मबंधन कट जायेंगे और आपका कर्मयोग सिद्ध हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2002,  पृष्ठ संख्या 2-4, अंक 114

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ईश्वरीय अंश कैसे विकसित करें ?


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

पशुता हर जीव में होती है, मानवता मनुष्य में होती है और ईश्वरत्व जड़-चेतन सभी में होता है। मनुष्य एक ऐसी जगह पर खड़ा है कि उसके एक तरफ पशुता है तो दूसरी तरफ ईश्वरत्व है और मनुष्यता उसे लानी पड़ती है। खुद मनुष्य-शरीर में होते हुए भी उसमें मनुष्यता हो, यह जरूरी नहीं है।

मनुष्य दो पैर वाले प्राणी के रूप में जन्मता है और उसमें मनुष्यता आती है व्रतों से, नियमों से, साधन-भजन से। मनुष्यता आती है तभी सद्गुरुओं का ज्ञान हजम होता है। सदगुरु का ज्ञान पशु को हजम नहीं होता।

मेरे आश्रम की गाय मुझे लात मार सकती है। मेरे आश्रम का बैल मुझे गिरा सकता है क्योंकि वह पशु है। उसको पता नहीं है कि ‘मैं आश्रम का चारा खाता हूँ…. बापू मेरी भलाई चाहते हैं….’

मैं एक बैल को प्यार करता था, स्नेह करता था। विनोद में उसके साथ थोड़ी कुश्ती भी करता था। एक उसने कुश्ती में ऐसा गिराया कि ‘फ्रैक्चर’ हो गया तो भी मैंने उसको लाठी नहीं मारी क्योंकि वह पशु है।

मनुष्य देह में पशुता भी छुपी है, मानवता भी छुपी है और देवत्व भी छुपा है तो क्या करना चाहिए ?

पशुता को क्षीण करना और मनुष्यता को निखारना चाहिए। फिर मनुष्यता को निखारते-निखारते ईश्वरत्व को निखारना चाहिए।

पशु और मनुष्य में यही फर्क है कि  पशु जैसा मन में आया वैसा करते हैं। फिर भले ही उसे डंडे खाने पड़ें, जूते मारे जायें अथवा मरना ही क्यों न पड़े ! पतंगे दीपक में जलकर मर जाते हैं, मछली काँटे में फँसकर मर जाती है, भ्रमर कमल में फँसकर मर जाता है, हिरण सुर-ताल-लय में सुधबुध खोकर अपनी जान गँवा देता है, हाथी घास की हथिनी के पीछे फँस जाता है और सारी जिंदगी महावत की गुलामी करता है। ऐसे ही मनुष्य भी शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श के पीछे जीवन पूरा कर देते हैं तो उन्हें क्या करना चाहिए ?

मनुष्य को चाहिए की शास्त्र और धर्म के अनुसार अपनी मनुष्यता विकसित करते-करते ईश्वरत्व को विकसित करे। ऐसा नहीं कि भ्रम में फँस जाये कि ‘मैं ब्रह्म हूँ… मैं आत्मा हूँ…’ और मनमानी करने लग जाये तथा स्वयं पशुता में गिर जाय ! पशुता में गिर जायेगा तो ब्रह्म क्या रहेगा ? मनुष्यता से गिर जायेगा तो ईश्वरत्व में कैसे पहुँचेगा ?

मनुष्य-शरीर में संयम का पालन नहीं किया तो ईश्वरत्व को कैसे पायेगा ? संयम नियम का पालन करने से सच्चाई आती है कि सच्चाई से सत्य को जानने की जिज्ञासा होती है जिससे श्रद्धा दृढ़ होती है, बुद्धि में सत्व आता है, जो सत्य स्वरूप ईश्वर में स्थिति कराता है। जो सच्चाई का आश्रय नहीं लेता है उसको सत्य की जिज्ञासा उत्पन्न नहीं होती है। कोई सत्य का उपदेश सुनकर कह दे कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’ तो इससे काम नहीं चलता है।

सत्य की तीव्र जिज्ञासा के बिना आदमी वफादारी से गुरु की शरण नहीं जाता है। जब कभी मौका मिलेगा तब इंद्रियलोलुप व्यक्ति गद्दारी कर लेगा और जो अपने साथ गद्दारी करता है, वह गुरु के साथ भी गद्दारी कर सकता है।

अतः अपने जीवन में कड़क नियम रखो, सजगता रखो, कड़क निगरानी रखो। जैसे, आपके पास अगर हीरे-जवाहरात हैं तो आप उनकी ऐसी निगरानी रखते हैं कि कोई उन्हें चुरा न ले जाये। ऐसे ही हीरे-जवाहरातों से भी ज्यादा कीमती आपका जीवन है। अतः काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, घृणा आदि विकार आपके कीमती जीवन को कहीं चुरा न लें इसकी पहरेदारी आप अवश्य रखें। अपने मन को विकारों में गिरने के लिए कभी भी ढील न दें। पूज्यपाद लीलाशाह बापू की ‘मन को सीख’ पुस्तक बार-बार पढ़ें ताकि मन को नियंत्रण में रखा जा सके।

मन को नियंत्रण में रखें तथा बुद्धि को परमात्मा में लगायें तभी ईश्वरत्व में स्थिति हो सकती है। ईश्वरत्व में स्थिति के लिए अपनी बुद्धि को जगत के नश्वर पदार्थों से हटाकर अमर आत्मा में लगाना चाहिए। आत्मविषयिणी बुद्धि करनी चाहिए। आत्मा के विषय में ही बार-बार सुनें, उसी का मनन करें तथा खानपान और आचार-विचार में संयम रखें।

पुण्यपुंज होने से सत्संग की प्राप्ति होती है और सात्विक विवेक जगता है तभी परमात्मा को पाने की प्यास जगती है। जिसका आचरण ऊँचा है और पुण्य अधिक हैं उसे ही आत्मा- परमात्मा को जानने पाने की इच्छा होती है। दूसरों को तो सिर खपा-खपाकर उठाना पड़ता है। एक दो व्यक्ति नहीं, लाखों-लाखों व्यक्ति महापुरुषों के प्रयत्न से थोड़े ऊपर उठते हैं परन्तु जिनका स्वयं का प्रयत्न है, उनको महापुरुष मिलते हैं तो वे जल्दी ऊपर उठ जाते हैं। इसको आत्मविषयिणी बुद्धि बोलते हैं।

आत्मविषयिणी बुद्धि बनाना सबसे ऊँची बात है। ईश्वरीय अंश जगाना सबसे ऊँची बात है।

ईश्वरीय अंश जगता कैसे है पशुता कैसे मिटती है ?

मनुष्य की पशुता अपने-आप नहीं छूटती। जब वह अपने मन को सद्गुरु की आज्ञा में चलायेगा तब पशुता आसानी से छूटेगी। बच्चा बेवकूफी कब छोड़ता है ? जब शिक्षक के कहे अनुसार चलता है, तब उसकी बेवकूफी छूटती है और वह विद्वान बनता है। ऐसे ही शिष्य सद्गुरु की आज्ञा में चलता है, तब पशुता और मानवता को बाधित करके ईश्वरीय अंश जगा पाता है। इसीलिए कहा गया हैः

गुरुकृपा ही केवलं शिष्यस्य परम मंगलम्।

गुरु की कृपा क्या अपने-आप आती है कि कुछ करना पड़ता है ?

अपने-आप क्या आयेगा ? जो होता है वह करने से ही होता है। साधक को चाहिए कि वह गुरु की आज्ञा के अनुसार साधन-भजन, जप-ध्यान, सेवा-सुमिरन आदि करे। गुरु की आज्ञा के अनुसार अपने को ढाले, इससे उसकी पशुता मिटेगी और ईश्वरीय अंश विकसित होगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2002, पृष्ठ संख्या 8,9 अंक 114

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