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परम सुहृद् परमात्मा


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

आप कभी यह न सोचें किः अरे, भगवान ने दुनिया ऐसी क्यों बनायी ?

दुनिया आपके किसी शत्रु ने नहीं बनायी, किसी बेवकूफ ने नहीं बनायी, किसी शोषक ने नहीं बनायी, किसी पराधीन ने नहीं बनायी और किसी अज्ञानी ने भी नहीं बनायी वरन् आपके परम सुहृद् ने बनायी है, परम हितैषी ने बनायी है, परम ज्ञानी ने बनायी है और परम समर्थ ने बनायी है।

दुनिया को दोष मत दो, अपनी दोषवृत्ति को निकालने का प्रयास करो।

कइयों का प्रश्न होता हैः “बाबा जी ! भगवान सर्व समर्थ हैं, सब जानते हैं फिर ऐसा अँधेर क्यों हो रहा है ? लोग एक दूसरे का गला दबोच रहे हैं, एक दूसरे को शोषित कर रहे हैं, चोरी कर रहे हैं। कोई पड़ोस की लड़की या लड़के को बुरी नजर से देखे और उसी समय भगवान उसको अंधा बना दें तो कोई बुरी नजर से नहीं देखेगा। कोई चोरी करे और उसी समय हाथ को लकवा (पेरालिसिस) मार जाय तो कोई चोरी नहीं करेगा। कोई झूठ बोले और उसकी जीभ वहीं कट जाय तो कोई झूठ नहीं बोलेगा… इतने सारे जज, इतने सारे वकील, इतने सारे सिपाही…. फिर भी दुनिया में इतनी गड़बड़ी ? जब भगवान सर्वसमर्थ हैं और हर दिल में बैठे हैं तो ऐसा क्यों नहीं करते ?

यह सवाल ही बिना सिर-पैर का है। व्यर्थ का है। जैसे लोग बोलते हैं कि ‘भगवान का भजन क्यों करें ?’ यह व्यर्थ का सवाल है। ‘भजन क्यों न करें ?’ यह असली सवाल है।

अल्पमति, स्वार्थी मति और रजोगुणी मति में ही ऐसे स्वर्थ के सवाल उठते हैं। फिर भी उसका जवाब सुन लो। यदि आपका बेटा आपके घर में ही चोरी करे तो क्या तुम चाहोगे कि उसके हाथ को लकवा मार जाय ? आपका बेटा किसी पड़ोस की लड़की पर बुरी नज़र डाले तो क्या आप चाहोगे कि वह अंधा हो जाय ? आपका बेटा झूठ बोले तो क्या आप चाहोगे कि उसकी जीभ कट जाय ? नहीं, क्योंकि वह आपका बेटा है। आपका बेटा तो सिर्फ 15-20 साल से है फिर भी आप सोचते हो किः ‘अभी बच्चा है, अक्ल का कच्चा है, आज नहीं तो कल सुधरेगा, बदलेगा। चलो, कोई बात नहीं।’ आखिर माता-पिता और हितैषी के हृदय में भी ऐसा होता है किः ‘चलो, दुबारा गलती न करेगा। मौका दे दो ताकि सुधर जाय।

आप अपने कुटुम्बी के सुधरने के लिए इतना इंतजार करते हो और सुधरने का  संकल्प होते हुए भी वह बिगड़ता है फिर भी आप उसे क्षमा करते जाते हो। जब 15-20 साल के सम्बन्ध के प्रति भी तुम इतनी करुणा से भरे होते हो तो सदियों से आपका जिस परमपिता से पुत्र के नाते सम्बंध है उसको कितनी करुणा होगी ! उसका कितना धैर्य होगा ! वह परमपिता भी ऐसे ही सोचता हैः ‘चलो, इस मनुष्य-जीवन में नहीं सुधरा तो दूसरे चोले में, तीसरे चोले में सुधरेगा…।’

उस परम पिता के पास कोई कमी नहीं है। चौरासी-चौरासी लाख वस्त्र हैं। अलग-अलग वस्त्रों में, रूपों में लाते-लाते देर-सवेर वह तुम्हें परब्रह्म-परमात्म-स्वरूप का, अपने आत्म-स्वरूप का अनुभव कराना चाहता है।

वह प्राणिमात्र का परम सुहृद है। उसके बिना एक सैकेण्ड का सौवाँ हिस्सा तो क्या, माइक्रो सैकेण्ड के लाखवें हिस्सा जितना समय भी हम जीवित नहीं रह सकते। जैसे पानी के बिना तरंग नहीं होती, ऐसे ही परमेश्वर के बिना आप हम नहीं हो सकते।

वह परमेश्वर जीवमात्र का परम सुहृद् है, परम हितैषी है। हम मानते हैं कि हमारी माँ हमारी हितैषी है लेकिन उसका सामर्थ्य नपा-तुला है। बालक की आवश्यकता का पता बालक को उतना नहीं होता है जितना उसकी माँ को पता होता है। अपनी आवश्यकता पूरी करने का जितना सामर्थ्य बालक के पास है, उससे ज्यादा माँ के पास है। बालक अपना हित उतना नहीं जानता, जितना उसकी माँ जानती है क्योंकि बालक तो अज्ञानता में अपने मैले में हाथ घुमाता है, साँप को भी पकड़ने दौड़ता है किन्तु माँ जानती है कि साँप-बिच्छू को, अग्नि को छूने से क्या होता है। बच्चे की अपेक्षा माँ में बच्चे का हित करने का ज्ञान ज्यादा है परन्तु माँ की बुद्धि, माँ का सामर्थ्य और माँ की योग्यता से भगवान का ज्ञान, भगवान का सामर्थ्य अनंत गुना ज्यादा है।

ऐसी कोई माँ नहीं कि बच्चे का अहित चाहे। हित चाहते हुए भी कभी अज्ञानता से वह बच्चे को गलत खुराक दे सकती है। बच्चे को वायुप्रकोप हो और माँ ने कोई ऐसी चीज खिला दी जो वायु प्रकोप को बढ़ाये, पित्तप्रकोप है और माँ ने ऐसी गरम चीज खिला दी जो पित्त प्रकोप को और बढ़ाये – ऐसा हो सकता है क्योंकि माँ की समझ नपी-तुली होती है किन्तु भगवान में पूर्ण समझ है।

माँ तो हमारे स्थूल शरीर की रखवाली करती है परन्तु भगवान हमारी रखवाली करते हैं। हमें सफलता मिलती है और हमारी वाहवाही होती है तो भगवान सोचते हैं कि बेचारा कहीं मोह-माया में न फँस जाये ! अतः हमें सत्संग में ले जाते हैं। अगर में सत्संगी नहीं हैं तो फिर हमें मुसीबत में ले जाते हैं ताकि संसार से वैराग्य आये।

यदि हम सुख-सुविधा से भर गये हैं तो वे परम हितैषी हमें विघ्न-बाधा और निंदा देकर हमको संसार से तारते हैं और अगर हमें मुसीबत व कष्ट मिले हैं तथा हम उनसे हताश-निराश हो गये हैं तो वे परम सुहृद सफलता दिलाकर हममें हिम्मत भरते हैं। दुःख और विघ्न हटाने की सूझबूझ देते हैं तथा शस्त्र देकर ज्ञान भी देते है। भगवन्मय मूर्तियों की तरफ ऋषियों को प्रेरित करके, मूर्तिपूजा आदि करवाकर हमारी भावना जगाते हैं। भावना शुद्ध कराकर अमूर्त आत्मा की तरफ ले जाने वाले सद्गुरुओं के पास जाने की प्रेरणा देते हैं और सद्गुरुओं के द्वारा वे परमात्मा ऐसी-ऐसी दिव्य अनुभूतियों से सम्पन्न दिव्य बातें बोलते हैं कि हमारा उद्धार हो जाता है और सद्गुरुओं को पता भी नहीं कि कौन-सी बात से, किसका कितना कल्याण हो गया ! किन्तु वह गुरुओं का गुरु, परम गुरु, परम सुहृद् जानता है कि किस बात से किसका कितना कल्याण होता है।

सदगुरु लोग उन दिव्य बातों का खजाना कहाँ से लाते हैं ? भगवान से ही तो लाते हैं। भगवान से अलग होकर गुरु, गुरु नहीं रह सकते ईश्वर से अलग होकर गुरु का अस्तित्व नहीं हो सकता। वास्तव में ईश्वर ही गुरु के अंतःकरण में ये सारी व्यवस्था करते हैं और ईश्वर ही शिष्य के हृदय में सत्प्रेरणा देकर सदगुरु की तरफ ले जाते हैं। कितने करुणा-वरुणालय हैं  प्रभु !

उन्हीं परमेश्वर ने किसी के हृदय में मण्डप बनाने की प्रेरणा दी, किसी के अंतःकरण में चीजें जुटाने की प्रेरणा दी, किसी के अंतःकरण में आने की प्रेरणा दी और मेरे अंतःकरण में सत्संग करने की प्रेरणा दी। आयोजक-संयोजक तो वह परमात्मा ही है।

क्या आप सब अपनी अक्ल-होशियारी से इधर बैठे हो ? क्या मैं मेरी अक्ल होशियारी से ये सब बनाकर बैठा हूँ ? अक्ल होशियारी की गहराई में भी उसकी प्रेरणा है। हम अपनी स्वतंत्र अक्ल-होशियारी कहाँ से लायेंगे ? समस्त ज्ञान का भण्डार वह परम सुहृद परमात्मा है तो हम ज्ञान अपना कहाँ से लायेंगे, बाबा ?

पिता से अलग होकर बेटा कारखाना, मकान, दुकान आदि ले सकता है परन्तु वह परमेश्वर सर्वत्र है, उससे अलग होकर हम कहाँ और क्या बना सकते हैं ? जैसे, पानी से अलग होकर तरंग अपना अलग अस्तित्व बना सकती। तरंग पानी से रूठ जाय तो पानी से अलग होकर तरंग बचेगी क्या ? सोने से अलग होकर गहना बनेगा कैसे ? शक्कर के खिलौने शक्कर से अलग कैसे रहेंगे ? ऐसे ही आप-हम ईश्वर से अलग नहीं रह सकते और ईश्वर आपसे-हमसे अलग नहीं हो सकता – यह उसकी विवशता है।

भगवान की बड़े-में-बड़ी कमजोरी है कि वे आपको नहीं छोड़ सकते। चाहे आप कैसे भी हों – कितने भी पापी-तापी हो जायें, फिर भी ईश्वर आपको छोड़ नहीं सकते क्योंकि वे व्यापक हैं। यही उनकी महानता भी है। ‘कमजोरी’ तो विनोद का शब्द है। वह परम सुहृद है, अपना है, प्यारा है इसीलिए जरा छेड़खानी कर देते हैं।

उस परम सुहृद परमात्मा की महिमा का क्या बयान करें, कितना करें ? इसीलिए तो श्रुति भगवती कहती है-

यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह।

आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान। न बिभेति कदाचनेति।

‘जहाँ से मन के सहित वाणी उसे न पाकर लौट आती है उस ब्रह्मानंद को जानने वाला पुरुष कभी भय को प्राप्त नहीं होता।’ (तैत्तीरयोपनिषद्- 4.1)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2002, पृष्ठ संख्या 12-14, अंक 113

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पंचसकारी साधना


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

आप संसारी वस्तुएँ पाने की इच्छा करें तो इच्छामात्र से संसार की चीजें आपको नहीं मिल सकतीं। उनकी प्राप्ति के लिए आपका प्रारब्ध और पुरुषार्थ चाहिए। किन्तु आप ईश्वर को पाना चाहते हैं तो केवल ईश्वर को पाने की तीव्र इच्छा रखें। इससे अंतर्यामी ईश्वर आपके भाव को समझ जाता है कि आप उनसे मिलना चाहते हो।

जैसे-चींटी गरुड़ से मिलने की इच्छा रखे और गरुड़ को भी पता चल जाये तो चींटी अपनी चाल से गरुड़ की ओर चलेगी लेकिन गरुड़ चींटी से मिलने के लिए अपनी गति से भागेगा। ऐसे ही जीवात्मा अपनी गति से ईश्वर को पाने का प्रयत्न करेगा तो ईश्वर भी अपनी उदारता से उसे उपयुक्त वातावरण दे देगा, जल्दी साधना के जहाज में बिठा देगा। यही कारण है कि आप अभी यहाँ बैठे हैं।

आपकी केवल तीव्र इच्छा थी ईश्वर के रास्ते जाने की… मंडप बनाने वालों ने मंडप बनाया, माईक लगाने वालों ने माईक लगाया, सजावट करने वालों ने सजावट की, कथा करने  वालों ने कथा की, आपकी तो केवल इच्छा थी कि सत्संग मिल जाय और आपको सब कुछ तैयार मिल रहा है….

परन्तु शादी की इच्छामात्र से सब तैयार नहीं मिलेगा…. सब तैयार करना पड़ेगा और बारातियों के आगे नाक रगड़ने पड़ेगी। उसके बाद भी कोई राज़ी तो कोई नाराज तथा शादी के बाद भी लांछन सहने के लिए तैयार रहना पड़ेगा और कभी कुछ तो कभी कुछ, खटपट चलती ही रहेगी… कभी साला बीमार तो कभी साली बीमार, कभी साले का साला बीमार तो वहाँ भी सलामी भरने जाना पड़ेगा। यहाँ तो ईश्वरप्राप्ति की इच्छामात्र से सब तैयार मिल रहा है !

ईश्वर को पाने की इच्छामात्र से हृदय में पवित्र भाव आने लगते हैं तथा संसार के भोग पाने की इच्छामात्र से हृदय में खटपट चालू हो जाती है। ईश्वर प्राप्ति के लिए चलते हो और जब ईश्वर मिलता है तब पूरे-का-पूरा मिलता है किन्तु संसार आज तक किसी को पूरे-का-पूरा नहीं मिला। संसार का एक छोटा सा टुकड़ा भारत है, वह भी किसी को पूरे का पूरा नहीं मिला। उसमें भी लगभग एक अरब लोग हैं।

संसार मिलेगा भी तो आंशिक ही मिलेगा और कब छूट जाय इसका कोई पता नहीं लेकिन परमात्मा मिलेगा तो पूरे-का-पूरा मिलेगा और उसे छीनने की ताकत किसी में नहीं है !

परमात्मा मिलता कैसे है ? साधना से…. पंचसकारी साधना से जन्म-मरण का, भवरोग का मूल दूर हो जाता है। ईश्वरत्व का अनुभव करने में, अंतर्यामी राम का दीदार करने में यह पंचसकारी साधना सहयोग करती है। कोई किसी भी जाति, संप्रदाय अथवा मजहब का क्यों न हो, सबके जीवन में यह साधना चार चाँद लगा देती है।

इस साधना के पाँच अंग हैं तथा पाँचों अंगों के नाम ‘स’ कार से आरम्भ होते हैं, इसलिए इसे पंचसकारी संज्ञा दी गयी है।

सहिष्णुताः अपने जीवन में सहिष्णुता (सहनशीलता) लायें। जरा-जरा सी बात में डरें नहीं, जरा-जरा सी बात में उद्विग्न न हों, जरा-जरा सी बात में बहक न जायें, जरा-जरा सी बात में सिकुड़ न जायें। थोड़ी सहनशक्ति रखें। तटस्थ रहें। विचार करें कि यह भी बीत जायेगा।

यह विश्व जो है दीखता, आभास अपना जान रे।

आभास कुछ देता नहीं, सब विश्व मिथ्या मान रे।।

होता वहाँ ही दुःख है, कुछ मानना होता जहाँ।

कुछ मानकर हो न दुःखी, कुछ भी नहीं तेरा यहाँ।।

चाहे कितना भी कठिन वक्त हो चाहे कितना भी बढ़िया वक्त हो – दोनों बीतने वाले हैं और आपका चैतन्य रहने वाला है। ये परिस्थितियाँ आपके साथ नहीं रहेंगी किन्तु आपका परमेश्वर तो मौत के बाद भी आपके साथ रहेगा। इस प्रकार की समझ बनाये रखें।

पिछले जन्म के प्रमाणपत्र आपके साथ नहीं हैं, पिछले जन्म के दोस्त आपके साथ नहीं हैं, पिछले जन्म के माता-पिता भी आपके साथ नहीं हैं और इस जन्म के भी बचपन के मित्र अभी नहीं हैं, बचपन की तोतली भाषा अभी नहीं है लेकिन बचपन में जो दिलबर आपके दिल की धड़कन चला रहा था, वह अभी भी है और बाद में भी रहेगा। इसीलिए सिख धर्म के आदिगुरु नानकदेव ने कहाः

आद सत् जुगाद सत् है भी सत् नानक होसे भी सत्।।

आप सत्य का, ईश्वर का आश्रय लीजिए और परिस्थितियों के प्रभाव से बचिये। जो लोग परिस्थितियों को सत्य मानते हैं वे इनसे घबराकर कभी आत्महत्या की बात भी बोल देते हैं – यह बहुत बड़ा अपराध है। अन्वेषणकर्त्ताओं के आँकड़े बताते हैं कि विश्व में हर रोज 12000 मनुष्य आत्महत्या का संकल्प करते हैं, प्रयास करते हैं तथा उनमें से कुछ सफल हो जाते हैं। 9 में से 8 मनुष्य आत्महत्या करते-करते चिल्ला पड़ते हैं और बच जाते हैं, नौवां सफल हो जाता है। सफल तो क्या होता है, आत्महत्या करके प्रेत हो जाता है। आत्महत्या जैसा घोर पातक दूसरा नहीं है।

एक मनोविज्ञान के प्रोफेसर कुछ विद्यार्थियों को ऊँची छत पर ले गये और उनसे कहाः “नीचे झाँकों।’ फिर पूछाः “नीचे झाँकने से डर क्यों लगता है ?”

अंत में प्रोफेसर ने कहाः “ऊँची छत से नीचे झाँकते हैं तो डर लगता है। इसका एक मनोवैज्ञानिक कारण यह है कि प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में कभी-न-कभी एकाध बार मर जाने का सोच लेता है। मर जाने का जो विचार है वही उसे ऊँची छत पर से नीचे देखने पर डराता है कि कहीं मर न जाऊँ।”

किसी भी परिस्थिति में मरने का विचार नहीं करना चाहिए तथा अपने चित्त को दुःखी होने से बचाना चाहिए। अगर जीवन में सहिष्णुता का गुण होगा तभी आप बच पायेंगे।

टी.वी. में विज्ञापन देखो तो जरा सह लो। पेप्सी देखी, लाये और पी ली आप बिखर जाओगे। उन दृश्यों को गुजर जाने दो। आप किस-किस  विज्ञापन का कौन-कौन सा माल खरीदोगे ? विज्ञापन देने वाले लाखों रुपये विज्ञापन में खर्च करते हैं उससे कई गुना आपसे नोचते हैं, इसीलिए जरा सावधान रहो।

इसी प्रकार दूसरे की उन्नति के तेज को भी सह लीजिये और अपने अपमान को भी सह लीजिए। पड़ोसी के सुख को भी पचा लीजिये और अपने दुःख को भी सह लीजिये। अपने दुःखों में परेशान मत होइये। आज वहाँ फूल खिला है तो कल यहाँ भी खिलेगा। आज
उस पेड़ ने फल दिये हैं तो कल इस पेड़ में भी फल लगेंगे। ऐसा करने से ईर्ष्या के दुर्गुण से भी बचने में मदद मिलेगी और सहिष्णुता का गुण हमारे चित्त को पावन करने में भी मदद करेगा।

सेवाः आपके जीवन में सेवा का सदगुण हो। ईश्वर की सृष्टि को सँवारने के भाव से आप पुत्र-पौत्र, पति-पत्नी आदि की सेवा कर लो। ‘पत्नी मुझे सुख दे।’ अगर इस भाव से सेवा की तो  पति पत्नी में झगड़ा रहेगा। ‘पति मुझे सुख दें।’ इस भाव से की तो स्वार्थ हो जायेगा और स्वार्थ लंबे समय तक शांति नहीं दे सकता। ‘पति की गति पति जानें मैं तो सेवा करके अपना फर्ज निभा लूँ….. पत्नी की गति पत्नी जाने मैं तो अपना उत्तरदियत्व निभा लूँ…..।’ ऐसे विचारों से सेवा कर लें।

पत्नी लाली-लिपस्टिक लगाये कोई जरूरी नहीं है, डिस्को करे कोई जरूरी नहीं है। जो लोग अपनी पत्नी को कठपुतली बनाकर, डिस्को करवाकर दूसरे के हवाले करते हैं और पत्नियाँ बदलते हैं वे नारी जाति का घोर अपमान करते हैं। वे नारी को भोग्या बना देते हैं। भारत की नारी भोग्या, कठपुतली नहीं है, वह तो भगवान की सुपुत्री है। नारी तो नारायणी है।

सम्मानदानः तीसरा सदगुण है सम्मानदान। छोटे-से-छोटा प्राणी और बड़े-से-बड़ा व्यक्ति भी सम्मान चाहता है। सम्मान देने में रुपया-पैसा नहीं लगता है और सम्मान देते समय आपका हृदय भी पवित्र होता है। अगर आप किसी से निर्दोष प्यार करते हैं तो खुशामद से हजारगुना ज्यादा प्रभाव उस पर पड़ता है। अतः स्वयं मान पाने की इच्छा न रखें वरन् औरों को सम्मान दें।

स्वार्थ-त्यागः चौथा सदगुण है स्वार्थ-त्याग। कर्म निःस्वार्थ होकर करें, स्वार्थ-भाव से नहीं। स्वार्थत्याग की भावना अन्य गुणों को भी विकसित करती है।

समताः पाँचवीं बात है कि आपमें समता का सदगुण आ जाय। चित्त सम रहेगा तो आपकी आत्मिक शक्ति बढ़ेगी, आपका योग सिद्ध होगा और आप आत्मज्ञान पाने में सफल हो जायेंगे।

यह ‘पंचसकारी साधना’ ज्ञानयोग की साधना है। इसका आश्रय लेने से आप भी ज्ञानयोग में स्थिति पा सकते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2002, पृष्ठ संख्या 11-13 अंक 113

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आत्म-साक्षात्कार का अधिकारी कौन ?


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के 18वें अध्याय के 53वें श्लोक में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-

अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।

विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूताय कल्पते।।

‘अहंकार, बल, घमण्ड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरंतर ध्यानयोग के परायण रहने वाला, ममतारहित और शांतियुक्त पुरुष सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में अभिन्नभाव से स्थित होने का पात्र होता है।’

आत्म-साक्षात्कार का अधिकारी होने के लिए साधक को उपरोक्त सदगुण अपने में लाने चाहिए और सदगुण लाने के लिए थोड़ा एकांत में जाना चाहिए।

अहंकार, दर्प आदि हमें परमात्मा से दूर कर देते हैं, आत्मशांति से दूर कर देते हैं। एकांत में अहंकार, काम-क्रोधादिक भी कम सताते हैं क्योंकि अहंकार आदि दूसरे के समान होते हैं। अकेलेपन में अहंकार आदि ज्यादा नहीं सताते।

हम जब अंतर्मुख होते हैं, मौन होते हैं, एकांत में होते हैं तब मानसिक शक्तियों का विकास होता है और आत्मशांति की झलकें आती हैं। जीवन में कामनाओं का त्याग, अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध तथा परिग्रह का त्याग और सरलता, सहजता, मौन, एकांतवास व आत्मविश्लेषण साधक को ऊपर उठाते हैं।

आत्म-साक्षात्कार का अधिकारी होने के लिए ये सदगुण अपने में जोड़ने होंगे और इन सदगुणों को जोड़ने के लिए जहाँ दुर्गुणों का बाजार लगा है, वहाँ से अपने को अलग ले जाना पड़ेगा, थोड़ा एकांत में ले जाना पड़ेगा।

एकांत में जाने के लिए कलियुग के लोगों के शरीर की ऐसी क्षमता नहीं है कि वे सब छोड़कर हिमालय चले जायें…. वातावरण ऐसा है, आंदोलन ऐसे हैं कि कुछ-न-कुछ विकार घेर लेते हैं, कोई-न-कोई कामना घेर लेती है और कामना के अनुसार नहीं होता है तो क्रोध घेर लेता है।

किसी में धन का बल, यश का बल या विद्या आदि का बल आ जाता है तो भी अहंकार हो जाता है। तुम्हारे पास बल तो है लेकिन वह बल यदि निर्बलों की रक्षा करने के काम नहीं आता तो किस काम का ? तुम्हारे पास संपत्तिरूपी धन हो, विद्या का धन हो, ज्ञान का धन हो, सेवा का धन हो किंतु वह धन यदि किसी के काम नहीं आता तो धन होते हुए भी तुम निर्धन हो। तुम्हारे पास भक्ति, योग तथा ज्ञान है और वह किसी के काम नहीं आता है तो वह नहीं के बराबर है। तुम्हारे जीवन में जो भी श्रेय है, जो भी अच्छा है, वह बाँटने के लिए है, रखने के लिए नहीं और मजे की बात यह है कि बाँटने से वह खर्च नहीं होता बल्कि बढ़ता है। जैसे कुएँ में से जितना पानी निकालो उतना पुनः भरता जाता है, ऐसे ही तुम परोपकार में जितना अपना श्रेय लगाते हो उतना ही श्रेय बढ़ता जाता है। संत श्री तुलसीदास जी कहते हैं-

राम नाम के कारणे सब धन दीन्हो खोय।

मूरख जाने घटि गयो दिन दिन दूनो होय।।

जैसे गंगा बहती जा रही है… गंगा ऐसा नहीं सोचती है कि मैं गाय को शीतल जल दूँ और शेर पीने के लिए आये तो उसको विष पिला दूँ। गंगा का तो अपना स्वभाव है कि जो भी आ जाय उसे शीतल जल देना…. कोई नहाता है तो नहा ले और कोई थूकता है तो थूक ले…. इससे गंगा को कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह तो कलकल-छलछल करती हुई बहती रहती है और उसमें शुद्ध, ताजा और बिल्लौरी काँच जैसा स्वच्छ जल आता रहता है।

सुनी है एक कहानीः एक बार नदी और तालाब के बीच बातचीत हुई। तालाब ने नदी से कहाः

“अरे पगली ! तू कहाँ भागी जा रही है ? तेरे पास इतना मधुर जल है, उसे सँभालकर रख। तू कुछ बन जा। समुद्र को पानी देती है तो वह तुरंत उसे खारा कर देता है। तू व्यर्थ ठोकरें खाती है, टक्करें झेलती है। तू चुपचाप अपना जल एकत्रित कर।”

नदी ने कहाः “यह नहीं हो सकता है। मेरा स्वभाव तो बहना है।”

कुछ दिन हुए। तालाब में पानी पड़ा रहा तो उसमें मच्छर होने लगे। मलेरिया फैलने लगा। पानी कम होने लगा तो मछलियाँ भी तड़प-तड़प कर मर गयीं। नगरपालिका ने पूरे नगर का कचरा उसमें डालकर तालाब भर दिया जबकि नदी का तो बहती ही रही और बारिश उसके जल की पूर्ति करती रही।

ऐसे ही कोई चाहे कैसा भी हो, तू बरसता जा। तू गंगा को लक्ष्य में रख। जो देता है वह पाता है। जो रखता है वह खोता है। अहंकार रखना चाहता है और प्रेम देना चाहता है।

उस विराट में, उन अनंत में अथाह शक्ति है, अथाह सामर्थ्य है। तुम्हारे पास जो कुछ भी है लाख, करोड़, अरब… वह तो कुछ भी नहीं है। उससे भी ज्यादा जिनके पास था वे लोग सब छोड़कर चले गये। तुम्हारे पास जो अक्ल है वह तो कुछ भी नहीं है। उससे भी बढ़िया अक्ल जिनके पास थी वे भी चले गये और वास्तव में देखा जाय तो जो कुछ भी तुम्हारे पास है वह तुम्हारा नहीं, अनंत का है।

यह तो अहंकार कहता है कि ‘मकान मेरा है, अक्ल मेरी है….’ अरे, भैया ! जरा-सा बुखार आ जाता है तो तेरी अक्ल की शक्ल बदल जाती है। अक्ल तेरी नहीं है, पैसे तेरे नहीं हैं, सौंदर्य तेरा नहीं है…..

रूप दिसी मगरूर न थी, ऐदो हुस्न ते नाज़ न कर….

‘अपने सौंदर्य को देखकर इतना गुमान न कर।’ यह तो एक दिन मिट्टी में मिल जायेगा। अपने धन पर भी इतना गुमान न कर क्योंकि या तो धन चला जायेगा यह धनवाला चला जायेगा।

अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।

परिग्रहम्…. परिग्रह मत करो। केवल धन का परिग्रह नहीं, जो कुछ सुना है उसको भी भूल जाओ।

किसी ने पूछाः “बापू जी ! कथा भी भूल जायें ?”

हाँ, हाँ, जगत भूलने की अटकल आये तो कथा के शब्द भी भूल जाओ।

उसने फिर पूछाः “स्वामी जी ! जब भूलना ही है तो सुने ही क्यों ?”

एक बार अमथा सेठ परिवार सहित यात्रा के लिए गये। साथ में रसोइया भी था। गंतव्य स्थान पर पहुँचकर उन्होंने रसोइये से कहाः

“देख, रोटी-सब्जी तो बनाना लेकिन चारों ओर सूखे बाँस का जंगल है। सँभलकर आग जलाना और सँभलकर आग बुझा देना।

सेठ दर्शनीय स्थल देखने हेतु परिवार सहित निकल गये परन्तु रसोइया हाथ-पर-हाथ धरकर बैठ गया। दोपहर हुई। सेठ आये तथा रसोइये से बोलेः “लाओ, खाना।”

रसोइयाः “खाना तो बनाया ही नहीं है।”

सेठः “क्यों नहीं बनाया ?”

रसोइयाः “सेठ जी ! आप ही तो कहकर गये थे कि आग जलाना, फिर सँभलकर बुझा देना। जब आग बुझानी ही है तो फिर जलानी ही क्यों ? इसलिए मैंने आग जलायी ही नहीं।”

जितना जलाना जरूरी है उतना बुझाना भी जरूरी है। ऐसे ही जितना भूलना जरूरी है उतना सुनना भी जरूरी है। सुने बिना तो तुम भूल भी नहीं सकोगे।

जगत को भूलने के लिए कथाएँ सुनो, कथाओं को भूलने के लिए सत्संग सुनो और सत्संग को भूलने के लिए तुम अपने-आपसे मिलो। तुम जब अपने-आप से मिलोगे तब सत्संग भी भूल जाओगे। तुम जो बोलोगे वह सत्संग हो जायेगा। तुम जो देखोगे, छुओगे वह प्रसाद हो जायेगा। तुम जहाँ रहोगे वह भूमि तीर्थ हो जायेगी। तुम इतने बढ़िया हो। तुम ऐसे महान हो।

तुम थोड़ा सा धन पाकर अपने को धनवान न मानो। तुम बिना धन के भी महान हो। बिना सत्ता के भी तुम महान हो। बिना परिवार के भी तुम महान हो। परिवार होने से तुम बड़े नहीं हो, धन होने से तुम बड़े नहीं हो, सत्ता होने से तुम बड़े नहीं हो….. तुम्हारे पास कुछ भी नहीं हो फिर भी तुम बहुत बड़े हो। तुम अपने बड़प्पन को नहीं जानते इसलिए छोटी-छोटी बातों में उलझ जाते हो, खिन्न हो जाते हो।

किसी के घर में चोरी हो जाये तो भी कुछ बच जाता है किन्तु यदि आग लग जाय या बाढ़ में घर ढह जाय तो सब कुछ नष्ट हो जाता है। ऐसे ही काम, लोभ, मोह आदि तुम्हारे पुण्यों की, तुम्हारी शांति की थोड़ी-थोड़ी चोरी करते हैं लेकिन जब क्रोध आता है तो तुम्हारे सारे पुण्यों को स्वाहा कर देता है। एक महीने का किया हुआ जप, तप, सेवा, स्मरण का पुण्य एक बार क्रोध का झटका आने से नष्ट हो जाता है।

कई लोग बीस-बीस साल से सतत जप करते हैं, सब प्रकार की विधिसहित साधना करते हैं फिर भी उनके जीवन में जो उन्नति दिखनी चाहिए, वह नहीं दिखती तो उसका एक ही कारण है कि वे क्रोध करके अपनी साधना नष्ट कर देते हैं।

कबीरदास जी ने कहा हैः

काम न क्रोध न लोभ कछु एकल भला अनीह।

साधक ऐसा चाहिए जैसे बन का सिंह।।

तुम अकेले रहने का अभ्यास करो। तुम किसी के नहीं हो तो कोई बात नहीं, कम-से-कम तुम अपने आपके तो हो जाओ। दिन में एकाध घंटा अपने-आप में बैठो। दूसरे मरने वालों के साथ तो जीवनभर बैठे हो। जो तुम्हारा साथ छोड़ देंगे उन साथियों के साथ तो तुमने पूरी जिंदगी गँवा दी, काफी उम्र तुमने दाँव पर लगा दी। अब एक घड़ी अपने-आपके साथ, अपने परमेश्वर के साथ बैठने हेतु तो दाँव पर  लगा कर देखो।

तुम अकेले एकांत में बैठने का अभ्यास करके तो देखो। भले ही तुम एक घड़ी आधी घड़ी आधी में पुनि आध तक ही बैठो। दृढ़ नियम-निष्ठा से बैठो अपने सोऽहं स्वभाव की स्मृति में…. अपने-आप में…..  निस्संग…..

साधु कहाँ बैठा है ?

साधु आत्मा में बैठा है। तुम आत्मा में बैठोगे तभी समझना कि साधु के साथ बैठे हो। नहीं तो साधु के आश्रम में बैठकर रोटी खाकर भी तुम लड़ाई कर सकते हो।

हठ से रोटी न खाने से क्रोध जाता नहीं है बल्कि क्रोध बढ़ता है, उद्वेग बढ़ता है, अशांति बढ़ती है। रोटी खाने से शांति नहीं मिलती, फल खाने से शांति नहीं मिलती लेकिन गम खाने से शांति मिलती है। गम तो खाना नहीं है बाकी का सब खाना है तो काम बनेगा नहीं। दूसरों को कोसना भी छोड़ो और अपने को कोसना भी छोड़ो।

ब्रह्मज्ञान की बात कोई सुना दे यह अलग बात है किन्तु ब्रह्मज्ञान का अधिकारी आदमी तब होता है, जब उसमें ये सदगुण आते हैं-

‘अहंकार, बल, घमण्ड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरंतर ध्यानयोग के परायण रहने वाला, ममतारहित और शांतियुक्त पुरुष सच्चिदानंदघन ब्रह्म में अभिन्न भाव से स्थित होने का पात्र होता है।’

जैसे तिनकों का गंगा बहाकर ले जाती है, ऐसे ही तुम्हें जीवन की परिस्थितियाँ बहाकर ले जायेंगी…. कभी यश बहाकर ले जायेगा, कभी अपयश बहाकर ले जायेगा, कभी क्रोध बहाकर ले जायेगा। कभी मोह बहाकर ले जायेगा, कभी लोभ बहाकर ले जायेगा। इन विकारों का चंगुल तब तक बना ही रहेगा, जब तक तुम गुरु के वचनों को सुनने के अधिकारी नहीं बनोगे और सुनने का अधिकारी वही है जो सुनकर फिर उन वचनों को आदरसहित जीवन में लाने की कोशिश करे।

एक संकल्प जब दूसरे संकल्प से विपरीत होता है तब दुःख होता है। संकल्प के अनुसार जब हमारा जीवन चलता है अथवा हम संकल्पों की दुनिया को समझते हैं तब दुःख नहीं होता। एक बात और है कि जब हम जगत को मिथ्या मान लेते हैं तब संकल्प के अनुसार घटे तो भी क्या और नहीं घटे तो भी क्या ? सब सपना है।

जब तुम नौकरी पर जाते हो तो सैर का मजा चला जाता है। कोई घूमने के लिए हवाई जहाज में पहली बार जाता है तो जाने के महीनेभर पहले से मन में उत्साह रहता है और घूमकर आता है तब भी छाती फुलाकर सबसे बात करता है। कहने के पीछे हवाई जहाज का सुख नहीं, अपना उत्साह होता है। हवाई जहाज की परिचारिकाओं को ऐसा नहीं होता कि ‘हम अमेरिका घूमकर आये।’

मजा या सज़ा, सुख या दुःख परिस्थितियों पर निर्भर नहीं है। अपने चित्त की कल्पना जिस समय जैसी होती है उस समय वैसा ही भासता है। इसलिए ऋषियों ने बाहर की वस्तुओं को बदलने की ज्यादा खटपट नहीं की।

चित्त की वृत्तियों को दृष्टाभाव से देखो और चित्त की वृत्तियों को ऐसे बदलो जिससे वे तुम पर राज्य न करें, तुम पर प्रभाव न डालें तो यह साधना हो गयी। तुम केवल वृत्तियों को देखते जाओ, फिर वृत्तियाँ तुम्हारे नियंत्रण में आ जायेंगी।

दूसरों को अपने बल से शोषित करने से अपने अहंकार का पोषण होता है, वह बल साधक का नहीं है। वह तो मूर्खों का बल है, वह शोषकों का बल है,  पामरों का बल है। ऐसे लोग जीवनभर जीतने का दाँव लगाते हैं और अंत में हारकर चले जाते हैं।

पामरों-भोगियों के बल से साधक का बल निराला होता है। साधक अहंकार के सर्जन का बल छोड़ देता है तभी वह ब्रह्मज्ञान का अधिकारी होती है। साधक को चाहिए कि बल छोड़ दे, दर्प छोड़ दे, काम छोड़ दे। काम का अर्थ केवल ‘सेक्स’ ही नहीं है। काम का अर्थ है कामनाएँ…. इस लोक से लेकर ब्रह्मलोक तक की चीजें अंत में बिछुड़ जायेंगी। अतः मिल भी गयीं तो क्या ? इस प्रकार का विवेक अंदर में वैराग्य प्राप्त कराता है। साधक के अंदर वैराग्य होने पर कामनाएँ ज्यादा पनपती नहीं हैं। जब कामनाएँ पनपती नहीं हैं तब चित्त के संकल्प कम हो जाते हैं और संकल्प कम होते ही आत्मशांति मिलती है।

चित्त और अहंकार दो चीजें नहीं हैं। जैसे बरफ और उसकी ठंड एक ही है, ऐसे ही चित्त और अहंकार एक ही चीज है, स्पंदन और अहंकार एक ही चीज है। अब आप स्पंदन में जो-जो आरोप करो…. धन का आरोप करो तो धन का अहंकार, सौंदर्य का आरोप करो तो सौंदर्य का अहंकार, विद्वता का आरोप करो तो विद्वता का अहंकार होगा। होता आरोप स्पंदन में ही है और अगर उस आरोप का अपवाद करने की कला आ जाय तो व्यक्ति को सत्य को उपलब्ध होने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। जीव को यदि संसार के आकर्षणों से विमोहित नहीं किया जाय, यदि संसार के आकर्षण के संस्कार न डालें जायें तो उसको आत्म-साक्षात्कार के लिए ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं पड़ेगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2002, पृष्ठ संख्या 2-6, अंक 113

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