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मन एक कल्पवृक्ष


मन के साथ यदि मित्रता की जाये, विवेक से उसे उच्च लक्ष्य की ओर मोड़ा जाये तो वह बड़ा लाभ दे सकता है और यदि उसकी अधीनता स्वीकार करके, उसके कहे में आकर बह गये तो वह वह मन बड़ी हानि भी पहुँचा सकता है। इसीलिए शास्त्रों ने कहा हैः

मनः एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः।

ʹमन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है।ʹ

यदि मन अनात्म देह में, अनात्म भोगों में, अनात्म जगत में आकर स्थित होता है तो वह मनुष्य का शत्रु हो जाता है और वही मन अगर आत्मा-परमात्मा की ओर आकर्षित होता है, परमात्म-संबंधी बातों का श्रवण, मनन और निदिध्यासन करता है तो वह मन मित्र का काम करता है और सूक्ष्मता को पाकर परम सूक्ष्म परमात्मतत्त्व का साक्षात्कार भी कर लेता है।

मन जितना-जितना सूक्ष्म होता जायेगा, उतनी-उतनी विश्रांति अच्छी लगेगी और जितनी-जितनी विश्रांति लेंगे, उतना-उतना मन सूक्ष्म होगा।

मनुष्य का मन जितना स्थूल होगा, उसे जगत उतना सच्चा लगेगा, भोगों के प्रति आकर्षण होगा और वह तुच्छ होता जायेगा। जितना-जितना उसे जगत स्वप्न जैसा लगेगा, भोगों से उपरामता होगी और उसका मन सूक्ष्म होता जायेगा एवं विश्रांति लेता जायेगा, उतना-उतना वह व्यक्ति महान होता जायेगा।

चित्त की विश्रांति क्यों नहीं होती ? ध्यान क्यों नहीं लगता ?

हम बदलने वाले संसार को, बदलने वाली परिस्थितियों को हृदय में इतनी जगह दे बैठे हैं कि चित्त की विश्रांति नहीं हो पाती है। अगर अपने स्वरूप को पाने की इच्छा उत्पन्न हो जाये और तत्संबंधी प्रयास करें तो विश्रांति पाना आसान हो जाये। तेरह निमेष तक परब्रह्म परमात्मा में विश्रांति पाने से जगतदान करने का फल प्राप्त होता है। सत्रह निमेष तक उस सच्चिदानंद परमात्मा में डूबने से अश्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता है और यदि कोई आधा घण्टा तक उस परमात्मस्वरूप में विश्रांति पा ले तो वह यक्ष, गंधर्व, किन्नरों और देवताओं से भी पूजे जाने योग्य हो जाता है।

यदि कोई प्रारंभिक जिज्ञासु है, ईश्वर की ओर चल रहा है, उसके सामने दो-चार कर्त्तव्य एक साथ आ जाते हैं और वह व्यावहारिक कर्त्तव्यों को मूल्य देता है, स्थूल जगत को सत्य मानकर जीनेवालों की बातों को मूल्य देता है तो बेचारा उलझ जाता है और उसका समय उसी में नष्ट हो जाता है। अगर वह विवेकशील है तो कर्त्तव्य उसे व्यवहार में तो खींचेंगे जैसे, पत्नी के प्रति कर्त्तव्य, पति के प्रति कर्त्तव्य, समाज के प्रति कर्त्तव्य और देह के प्रति कर्त्तव्य… फिर भी वह इन कर्त्तव्यों में उलझेगा नहीं और उसका अपना जो वास्तविक कर्त्तव्य है – अपने आत्मस्वरूप को जानने का,  उसी को महत्त्व देगा।

व्यक्ति की जैसी मति और जैसा उसका संग होगा वैसे ही कर्त्तव्यों को वह मूल्य देगा। अगर उसकी मति श्रेष्ठ है, उसका संग ऊँचा है तो वह ऊँचे कर्त्तव्यों को मूल्य देगा। यदि उसकी मति मध्यम है तो वह मध्यम कर्त्तव्यों को मूल्य देगा और यदि उसकी मति हल्की है तथा उसका संग भी हल्का है तो फिर वह निम्न कर्त्तव्यों को मूल्य देगा।

स्वामी रामतीर्थ कहा करते थेः “कर्ज लेकर, उधार लेकर बेटे बेटियों की शादी की खुशी मनाना-हाय रे तेरा फर्ज ! … घूस लेकर, रिश्वत लेकर भी ठाठ-बाट करना – हाय रे तेरा फर्ज !…. छल-कपट करके भी देह-वस्त्र-घर को सजाना-हाय रे तेरा फर्ज !…. हे मानव ! क्या तेरा यही फर्ज है ? जिंदगी भर चिन्ताओं की गठरियाँ उठाते रहना, अन्तःकरण को मलिन करते रहना-क्या यही तेरा फर्ज है ? नहीं, तेरा मुख्य फर्ज है आत्मसिंहासन पर आने का, अपने आत्मराज्य में आने का, अपने असंग स्वभाव में नहीं आयेगा और प्रकृति के स्वभाव में बहता रहेगा तो फिर कौन से शरीर में तू अपना वास्तविक फर्ज निभायेगा ?”

जब मानव का विवेक सजाग हो उठता है तब उसे ये विचार सहज ही आने लगते हैं किः ʹमैं कब तक सामान्यजों की नाईं राग-द्वेष, अस्मिता और अभिनिवेश में आकर अपना जीवन बरबाद करता रहूँगा ? एक दिन…. दो दिन… सप्ताह… मास… वर्ष…. ऐसा करते-करते समय बीतता चला जा रहा है और जो करने जैसा कार्य है – आत्मस्वरूप में विश्रांति पाने का – उसकी मुझे सुधि तक नहीं है ! मैं कब तक ऐसी माया में फँसा रहूँगा ?…ʹ इस प्रकार का जगा हुआ विवेक मनुष्य को सहज ही में परमात्मप्राप्ति के लक्ष्य की ओर प्रेरित करने लगता है, संसार के भोगों से वैराग्य बढ़ाने लगता है और वह पहुँच जाता है किसी संत-महापुरुष के सान्निध्य में।

भोगी पुरुष की अधिक सेवा करने से बुद्धि मंद हो जाती है, नीच प्रकृति के व्यक्तियों की सेवा करने से लाभ नहीं, वरन् हानि ज्यादा होती है जबकि उच्च प्रकृति के व्यक्तियों की सेवा करने और उनके सान्निध्य़ से परम लाभ होता है। इसीलिए तुलसीदास जी ने कहा हैः

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।

तुलसी संगत साध की, हरे कोटि अपराध।

साधु कौन है ? साध्यते परम कार्यं येन सः साधुः।

जिसने अपना परम कार्य साध लिया है, उसे ʹसाधुʹ कहते हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह प्रयत्नपूर्वक साधु पुरुषों की संगति करे एवं उनके मार्गदर्शन के अनुसार साधना करके लक्ष्य-प्राप्ति के पथ पर अग्रसर होता रहे।

तुलसीदास जी ने कहा हैः

यह तन करू फल विषय न भाई।

इस शरीर का फल यह नहीं है कि विषय-भोग मिलें। इस मानवशरीर का फल तो है अपने स्वामी को, परम प्यारे को, परम हितैषी परमात्मा को जानना। गीता में भगवान ने कहा भी हैः

सुहृदं सर्वभूतानां….. ʹमैं प्राणिमात्र का सुहृद हूँ।ʹ वास्तव में केवल वही परमात्मा सबका सुहृद है। संसार के जो लोग बाहर से सुहृद दिखते हैं वे तो चार छः दिन के या केवल शमशान तक के सुहृद हैं, जबकि वह परम सुहृद परमात्मा तो सदियों से हमारे साथ था, है और रहेगा। हम उस परम सुहृद से जुड़ जायें तो हमारा बेड़ा पार हो जाये।

यह हम जानते हैं फिर भी उससे जुड़ नहीं पाते। क्यों ? क्योंकि हम मन-इन्द्रियों से जुड़ जाते हैं, जगत को सच्चा मानकर उससे जुड़ जाते हैं और उसी में इतने उलझे जाते हैं कि उस परम सुहृद से, उस अपने आत्मस्वरूप से जुड़ने का समय ही नहीं मिलता। हालाँकि हम सभी यह जानते हैं कि जगत के ये संबंध सदैव रहने वाले नहीं हैं फिर भी हम उसी के पीछे लगे रहते हैं।

भोले बाबा ने बड़ी सुंदर बात कही हैः

मानव ! तुझे नहीं याद क्या, तू ब्रह्म का ही अंश है ?

कुलगोत्र तेरा ब्रह्म है, सदब्रह्म का तू वंश है।।

संसार तेरा घर नहीं, दो चार दिन रहना यहाँ।

कर याद अपने राज्य की, स्वराज्य निष्कंटक जहाँ।।

जो बदलती हुई चीजों को ʹमेराʹ मान लेता है और साधन को ʹमैंʹ मान लेता है तथा वास्तविक साध्य का जिसको पता नहीं है, जिसके लिए साधन मिला है उस उद्देश्य का जिसको पता नहीं है – वह संसारी है। आँख देखने का साधन है, कान सुनने का साधन है, मन सोचने का साधन है, बुद्धि निर्णय करने का साधन है। इन साधनों का उपयोग करके  हम चाहें तो अपने परम लक्ष्य परमात्मतत्त्व को पा सकते हैं लेकिन इन साधनों को ही ʹमैंʹ मानने की गलती कर बैठते हैं इसीलिए बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं।

यह जरूरी नहीं कि हर जन्म में ये ही साधन और ऐसी ही बुद्धि मिले। यदि पशु-योनि मिलती है तो बुद्धि बहुत घट जाती है, मन की योग्यताएँ कम हो जाती हैं, शरीर की योग्यताएँ भी बदल जाती हैं। अरे, मनुष्य जन्म में ही बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में मन-बुद्धि-इन्द्रियों की क्षमता में अंतर आ जाता है, इतर योनियों की तो बात ही क्या ? बचपन का मन बेवकूफी से भरा हुआ होता है, जवानी का मन विषय-विकारों से भरा हुआ होता है और बुढ़ापे का मन फरियाद से भरा हुआ होता है। लेकिन बचपन, जवानी और बुढ़ापा तो देह की अवस्थाएँ हैं, आपकी नहीं। आप न बालक हो न जवान हो  न बूढ़े हो। वास्तव में जो आप हो उसमें न फरियाद है, न  विकार है और न ही बेवकूफी है। आप तो सबमें व्याप्त, सदा एकरस आत्मा हो। अपने उस वास्तविक स्वरूप को जान लो तो हो जाये बेड़ा पार…

इसके लिए श्रवण, मनन और निदिध्यासन का सहयोग लो। जिसका अंतःकरण अत्यंत शुद्ध है वह तो श्रवणमात्र से ज्ञान पा सकता है। जिसके कुछ कल्मष शेष हैं वह पहले जप-ध्यानादि करके अंतःकरण को शुद्ध करे, यत्नपूर्वक श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन करे, तब उसे बोध होगा जो उससे भी ज्यादा बहिर्मुख है उसका मन तो जप-ध्यानादि में भी शीघ्र नहीं लगेगा। अतः वह पहले निष्काम सेवा के द्वारा अंतःकरण को शुद्ध करे। ज्यों-ज्यों अंतःकरण शुद्ध होता जायेगा, त्यों-त्यों जप ध्यान में मन लगता जायेगा। फिर वह सत्शास्त्र एवं सदगुरु के वचनों का श्रवण करे, मनन एवं निदिध्यासन करे तो ज्ञान को पा लेगा।

साधक को चाहिए कि वह सजातीय वृत्तियों का आदर करे और विजातीय वृत्तियों का त्याग कर दे। सजातीय वृत्ति क्या है ? जो आत्मज्ञान के मार्ग पर हैं उनसे आत्मज्ञान संबंधी शास्त्रों का श्रवण, मनन एवं आत्मवेत्ता महापुरुषों के सान्निध्य में रहने का भाव ʹसजातीय वृत्तिʹ है।

आत्मज्ञान के पथिक को संसारी सुख के प्रसंगों से तो बचना ही चाहिए, संसारी सुख में जो उलझे हुए हैं ऐसे संसारियों से भी बचना चाहिए।

इस प्रकार सावधानी, सतर्कता, विवेक एवं वैराग्य को अपनाकर आप भी उसी तत्त्व को पा सकते हो, जिसमें भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, ब्रह्माजी, भगवान शिव एवं अन्य अनेकों नामी अनामी महापुरुष रमण कर रहे हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2000, पृष्ठ संख्या 19-22, अंक 86

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जीवन की सहजता


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

जो सहज जीवन जीता है, उसका जीवन खूब सरल एवं आनन्द से परिपूर्ण होता है। मूर्ख एवं अहंकारी लोग जीवन को जटिल बना देते हैं। उनका जीवन अपने तथा औरों के लिए समस्या बन जाता है।

तीन प्रकार के लोग होते हैं- एक वे होते हैं जो ʹयह करूँ…. यह न करूँ…. यह छोड़ूँ…. यह पकड़ूँ…..ʹ ऐसी मान्यता रखते हैं। दूसरे प्रकार के वे लोग होते हैं जो कुछ भी करके अपने को बड़ा दिखाना चाहते हैं। ऐसे लोगों का जीवन उलझा हुआ होता है अथवा अधमतापूर्वक नष्ट होता है। तीसरे प्रकार के वे लोग होते हैं जो अपना व्यवहार इस ढंग से करते हैं कि जहाँ हैं, जैसे हैं, ठीक हैं। व्यवहार में अनाग्रहपूर्ण बुद्धि रखकर जीवन के रहस्य को, जीवन के छुपे खजाने को प्राप्त करने में अपना जीवन बिताते हैं, उनका जीवन सार्थक है।

जिसे कुछ बनने की, कुछ करने की इच्छा होती है वे तो किसी-न-किसी प्रकार के आग्रह से घिरे ही रहते हैं। कोई अपने को तपस्वी मानता हो। उसके पास यदि आप जाओ तो वह आपको कहेगा कि ʹबीड़ी सिगरेट छोड़ दो, मांस-मछली-अण्डे छोड़ दो…।ʹ आपने यह सब छोड़ा हा है तो कहेगा कि ʹलहसुन, प्याज छोड़ दो।ʹ आप ये छोड़कर आगे बढ़ना चाहोगे तो कहेगा कि ʹतीन बार भोजन करते हो तो दो बार ही करो।ʹ आप दो बार खाने लगोगे तो कहेगा कि ʹअब एक वक्त का भोजन बंद कर दो।ʹ एक बार खाते होगे तो कहेगा कि ʹनमक बंद कर दोʹ। आप वह भी बन्द कर दोगे तो कहेगा कि ʹअनाज छोड़ दो। अब फलाहार करने लगो।ʹ छोड़ो….. छोड़ो…. छोड़ते जाओ… छोड़ते जाओ…. फिर कहेगा कि ʹफल खाते हो, तपस्वी हो तो अब संसार में क्या रहना ? पत्नी और बच्चों को भी छोड़ दो।ʹ मान लो, वह भी छूट गया तो कहेगा कि ʹसब छूट गया, अब वस्त्रों को भी छोड़ दो। कौपीन पहनो।ʹ

जीवन जीने का यह एक मार्ग हैः त्याग….त्याग….त्याग…

जिन्होंने सब छोड़ दिया है, जो केवल कौपीन पहनते हैं, फलाहार अथवा भिक्षा पाते हैं एवं ईश्वर का चिंतन करते हैं उनके जीवन में यदि सत्संग नहीं है तो कोई दिव्य संगीत नहीं होता। जीवन में जो दबा हुआ होता है, वह कभी-कभार समय पाकर प्रगट हो जाता है कि ʹतू मुझे नहीं जानता, मैं कबसे घर-बार छोड़कर यहाँ बैठा हूँ ? संसारी लोग क्या जानें कि भजन क्या होता है ? तपस्या क्या होती है ? मैं लहसुन नहीं खाता, प्याज नहीं खाता…. मैंने बार-बच्चों को छोड़ दिया, पत्नी को छोड़ दिया…. मैं कोई जैसा-तैसा साधु थोड़े ही हूँ ? मेरे आगे तू क्या डींग मारता है?ʹ

अच्छा है, ठीक है कि छोड़ पाये हो, लेकिन छोड़कर आने की याद चित्त में अभी तक बनी हुई है। यह उचित नहीं है। अपने अहंकार को सजाने के लिए जो कुछ करते हो वह अनुचित है। आपके पास चीज-वस्तुएँ, रूपये पैसे होना कोई खराब बात नहीं है लेकिन दूसरों का शोषण करके, दूसरों को सताकर एकत्रित की गयी अथवा जिनका सदुपयोग न किया जा सका हो ऐसी चीजों, रुपयों पैसों का होना न होना बराबर ही है।

कुछ वर्ष पहले किसी व्यक्ति ने मुझे बताया किः “चार गधे लेकर जो आदमी यहाँ रोड पर काम करता था, उसके पास अब 25-30 लाख रूपये हैं लेकिन उसकी पत्नी हमारी कॉलोनी में 10-10 पैसे में नींबू बेचती है।”

बाह्य पदार्थ पाकर तो हम खूब ऊँचे दिखते हैं लेकिन समझ नहीं होती तो भीतर से हम खूब नीचे रह जाते हैं। अंदर या बाहर से न ऊँचे दिखने की कोशिश करो, न अपने को नीचा मानने की भूल करो। दिखना-मानना, यह सब सापेक्ष है। अपने को ऊँचा तब मानोगे, जब दूसरे को नीचा मानोगे। अपने को नीचा तब मानोगे जब दूसरे को ऊँचा मानोगे। लव-कुश आपके आगे बहुत अच्छे लगेंगे, बड़े समर्थ लगेंगे लेकिन श्रीराम के आगे उतने बड़े व समर्थ नहीं लगेंगे। तहसीलदार किसी  क्लर्क के आगे बड़ा दिखेगा लेकिन कलेक्टर के पास जाये तो छोटा दिखेगा। कलेक्टर मंत्री के आगे छोटा लगेगा। वह मुख्यमंत्री भी प्रधानमंत्री के आगे छोटा लगेगा।

बड़ों के आगे आप छोटे हो जाते हो और छोटों के आगे आप बड़े बन जाते हो। मूर्ख के आगे आप विद्वान लगते हो परन्तु अपने से अधिक विद्वान के आगे आप मूर्ख लगते हो। यह सापेक्ष दृष्टि है और सापेक्ष दृष्टि में हमेशा भय, घृणा, लज्जा आदि बने ही रहते हैं।

एक सुनी हुई घटना है, एक फौजी था। उसी पदोन्नति होते-होते वह कमाण्डर बन गया। जब वह परेड लेने जात अथवा कहीं घूमने जाता, तब दूसरे फौजी उसे सलाम करते। उनके सलाम करने पर कमाण्डर के मुख से स्वाभाविक ही निकल जाता किः “ऐसे ही तो करते हो !”

उसके निकट के दो अंगरक्षक बार-बार यह सुनते। वे आपस में कहते किः “जब भी कमाण्डर को कोई सलाम करता है तो उनके मुख से स्वाभाविक ही निकल जाता है कि ʹऐसे ही तो करते हो !ʹ इसका क्या कारण है ?” आखिर एक दिन उन्होंने अपने कमाण्डर से पूछ ही लियाः “साहब ! पिछले काफी समय से हम आपके साथ रह रहे हैं। जब कोई आपको सलाम करता है तब आप उसके ऊपर नाराज हो जाते हैं एवं कहते हैं किः ʹऐसे ही तो करते हो !ʹ इसका कारण क्या है ?”

कमाण्डर ने कहाः “इसका एक ही कारण है। मैं भी पहले सिपाही था। सलाम कर-करके बड़े पद पर पहुँचा हूँ। मैं जब सिपाही था, तब कोई साहब आता तो मुझे जबरदस्ती सलाम करनी पड़ती थी। ʹवे कब यहाँ से जायें ?ʹ इस भाव से, बिना प्रेम के उन्हें सलाम करता था। अब सभी मुझे सलाम करते हैं तो मुझे लगता है कि ये सब भी मुझे आदर नहीं देते, मुझे सलाम नहीं मारते, वरन् इस पद को सलाम करते हैं। वह भी करना पड़ता है, इसलिए करते हैं। इसीलिए मेरे मुँह से ʹऐसे ही तो करते होʹ – यह स्वाभाविक निकल जाता है।”

जीवन में जो भी प्रेम बिना का होगा, वह लेने वाला को भी बोझा लगेगा और देनेवाले को भी आनंद नहीं आयेगा। जो कुछ होगा, उसमें अहंकार की दुर्गंध आयेगी। लेकिन जिसके जीवन में हृदय की विशालता होगी, शुद्ध प्रेम होगा, उसका जीवन खिल उठेगा, सहज आनंदस्वभाव से परितृप्त हो उठेगा। फिर ʹयह करना है… यह छोड़ना है… यह पाना है….ʹ आदि नहीं बचेगा। जो भी करना होगा, वह सहज स्वाभाविक होता जायेगा। ऐसा जीवन जीने वाला ही अपने सहज स्वरूप को पा लेता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 1999, पृष्ठ संख्या 2,3 अंक 83

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क्या गुरु बनाना आवश्यक है ?


ब्रह्मलीन ब्रह्मनिष्ठ स्वामी श्री अखण्डानंद सरस्वतीजी महाराज से किसी ने पूछाः “क्या मनुष्य को आत्मिक सुख व शांति के लिए गुरु बनाना आवश्यक है ?”

उन्होंने उत्तर देते हुए कहाः “भाई साहब ! जब आपको कोई जरूरत मालूम नहीं पड़ती है, तब  आप क्यों इस चक्कर में पड़ते हैं ? हाँ, जब आपके भीतर से आवाज आये कि ʹगुरु बनाने की जरूरत है…ʹ तब बना लेना। देखो कि आपको संतोष कहाँ है। यदि गुरु न बनाने का संतोष आपके मन में होता, तो यह प्रश्न ही नहीं उठता कि गुरु बनाना आवश्यक है कि नहीं।

गुरु बनाना कोई बहुत आसान बात नहीं है कि जिस किसी ने कोई मंत्र बता दिया, जप बता दिया और आप उस रास्ते पर चल पड़े। जब सत्संग करेंगे तब समझेंगे कि गुरु क्या होता है, शिष्य क्या होता है और दोनों का सम्बन्ध क्या होता है। यह बात समझनी पड़ेगी।

आखिर पति-पत्नी का ब्याह ही तो होता है ना ? कहाँ वे एक साथ पैदा होते हैं, कहाँ-कहाँ से आते हैं, मिलते हैं, साथ रहते हैं फिर भी पति-पत्नी का इतना गम्भीर सम्बन्ध हो जाता है कि एक-दूसरे के लिए मरते हैं। गुरु-शिष्य का सम्बन्ध भी इससे कुछ हल्का नहीं है। यह तो उससे भी गम्भीर है, बहुत गम्भीर है। जैसे पति-पत्नी के सम्बन्ध का निर्वाह करना कठिन होता है, वैसे ही गुरु शिष्य के सम्बन्ध का निर्वाह करना भी कठिन होता है।

….तो, जब तक गुरु की  आवश्यकता स्वयं को नहीं मालूम पड़ती, तब तक दूसरे के बताने से क्या होगा ? …..और वैसे देखो तो आवश्यता का प्रमाण यही है कि आप पूछ रहे हैं- “गुरु बनाने की आवश्यकता है क्या ?ʹ कहीं-न-कहीं चित्त में खटका होगा, कहीं-न-कहीं संस्कार भी होगा ही। …तो, जब तक आपको कुछ पूछने की, कुछ जानने की जरूरत है, कुछ होने की, कुछ बनने की जरूरत है, जब तक आपके मन में किसी वस्तु के स्वरूप के सम्बन्ध में प्रश्न है तब तक आपको किसी जानकार से से उसके बारे में सच्चा ज्ञान और सच्चा अनुभव प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।”

प्रश्नः “संत भगवदस्वरूप हैं और संत में ही गुरु भगवान निवास करते हैं, यह बात कृप्या समझाएँ।”

उत्तरः “देखो भाई ! संत तो बहुत से होते हैं – हजार, दो हजार, दस हजार, लाख। सन्मात्र भगवान किसमें प्रकट नहीं हैं ? अर्थात् सबमें हैं। परंतु संत और गुरु में फर्क यह होता है कि जैसे गण्डकी नदी में, उसके उदगम के पास बहुत से गोल-गोल पत्थर  मिलते हैं, वे सब शालिग्राम हैं। जब हम अपने लिए शालिग्राम ढूँढने के लिए जाते हैं, तब कई शालिग्राम हमारे पाँव के नीचे आते हैं और कइयों को उठाकर हम हाथ में लेकर फिर छोड़ भी देते हैं। …तो जैसे, गण्डकी की शिलाएँ सब शालिग्राम होने पर भी हम अपनी पूजा  के लिए एक शालिग्राम चुनकर लाते हैं। इसी प्रकार हजारों लाखों, अनगिनत संतों के होने पर भी उनमें से हम अपनी पूजा के लिए, अपनी उपासना के लिए, अपने ज्ञान-ध्यान के लिए किसी एक संत की चुन लें तो इन्हीं संत का नाम ʹगुरुʹ होता है।

पुरुष सब हैं, पर कन्या का ब्याह एक से ही होता है न ? अब जो यह एक गुरु के साथ सम्बन्ध की बात है, वहाँ भगवान गुरु के द्वारा मिलते हैं।

एक सज्जन थे। वे एक पण्डित जी के पास जाकर उनको बहुत परेशान करते थे किः ʹहमको दीक्षा दे दो…. हमको भगवान का दर्शन करा दो….ʹ पण्डितजी रोज-रोज सुनते-सुनते थक गये और चिढ़कर उन्होंने भगवान का एक नाम बता दिया और कहा कि यह नाम लिया करो। अब वे सज्जन रोज आकर पूछने लगे कि “हम ध्यान कैसे करें ? भगवान कैसे होते हैं ?”

अब पण्डितजी और चिढ़ गये एवं बोलेः “भगवान बकरे जैसे होते हैं।” अब वे सज्जन जाकर बकरे भगवान का ध्यान करने लगे। उनके ध्यान से, उनकी निष्ठा से और गुरुआज्ञा-पालन से भगवान उनके पास आये और बोलेः “लो भाई, जिसका तुम ध्यान करते हो, वह मैं शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी-पीताम्बरधारी तुम्हारे सामने खड़ा हूँ।”

इस पर वे सज्जन बोलेः “हमारे गुरुजी ने तो बताया था कि भगवान बकरे की शक्ल के होते हैं और तुम तो वैसे हो नहीं। हम तुमको भगवान कैसे मानें ?”

अब तो भगवान भी दुविधा में पड़ गये। फिर बोलेः “अच्छी बात है… लो, हम बकरा बन जाते हैं। तुम उसी को देखो और उसी का ध्यान करो।”

अब भगवान उसके सामने ही बकरा बन गये और उससे बात करने लगे। फिर वे सज्जन बोलेः “देखो, मुझे तुम बहुरूपिया मालूम पड़ते हो। कभी आदमी की तरह तो कभी बकरे की तरह। हम कैसे पहचानें कि तुम भगवान हो कि नहीं ? इसलिए हमारे गुरुजी के पास चलो। जब वे पास कर देंगे कि तुम ही भगवान हो तब हम मानेंगे कि हाँ, तुम भगवान हो।”

भगवान बोलेः “ठीक है….. चलो।”

फिर वे सज्जन बोलेः “ऐसे नहीं…. ऐसे चलोगे और रास्ते में कहीं धोखा देकर भाग गये तो ? मैं गुरु जी के सामने झूठा पडूँगा। इसलिए ऐसे नहीं….. मैं तुम्हें कान पकड़कर ले चलूँगा।”

भगवान बोलेः “ठीक है।” अब वे सज्जन गुरु जी के पास बकरा भगवान को उनका कान पकड़कर ले गये और बोलेः “गुरु जी ! देखिये, यह भगवान है कि नहीं ?” गुरु जी तो हक्के बक्के हो गये कि हमने तो चिढ़कर बताया था और ये सच मान बैठे !

अब वे सज्जन बकरे भगवान से बोलेः “अब बोलो, चुप क्यों हो ? वहाँ तो बड़ा सुन्दर रूप दिखाया था, बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे और अब यहाँ चुप हो ? अब बोलो कि भगवान मैं भगवान हूँ और दिखाओ भगवान बनकर।”

फिर भगवान ने उनको भगवान बनकर दर्शन दिया।

….तो ये गुरु लोग जो होते हैं, वे किसी को शिव के रूप में भगवान देते हैं, किसी को नारायण के रूप में भगवान देते हैं। सिर्फ उपदेश करने वाले का नाम ʹगुरुʹ नहीं होता है। गुरु तो वे हैं, जो तुमको गुरु बना दें और तुम लोगों को भगवान का दर्शन करा सकें। गुरु की महिमा अदभुत है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 1999, पृष्ठ संख्या 24,25,26 अंक 83

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