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आत्मबल ही वास्तविक बल है


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

जो बलवान है, प्राणशक्ति से युक्त है उसके लिए पराये भी अपने हो जाते हैं जबकि दुर्बलों के लिए अपने भी पराये हो जाते हैं।

वीरभोग्या वसुन्धरा।

बल ही जीवन है। निर्बलता ही मौत है। समस्त बलों का उदगमस्थल है आत्मा। आत्मा के कारण ही सब प्रिय लगता है और सफलता, सौन्दर्य, माधुर्य, आनंद आदि भी आत्मा  आभा से ही निखरते हैं। इस असत्, जड़, दुःखरूप, परिवर्तनशील और क्लेशों से परिपूर्ण जगत में भी उन्हीं लोगों  रस, आनंद, माधुर्य आदि मिलता है, जिनके जीवन में जगमगाते हुए आत्मभाव का प्रकाश है।

जिन वस्तुओं से आपका अपनत्व है वे ही वस्तुएँ प्यारी लगती है। ʹअपना मकान… अपनी गाड़ी…. अपना बेटा…ʹ आदि क्यों प्यारे लगते हैं ? क्योंकि उनमें आपका अपनत्व है। दुनियाभर के प्रिय व्यंजन आपके समक्ष रख दिये जाते हैं, फिर भी यदि आपका स्वास्थ्य अच्छा नहीं है तो वे सारे व्यंजन आपको फीके लगेंगे, नीरस लगेंगे क्योंकि जिह्वा में अपना रस नहीं है। जिह्वा में जब अपनत्व , चैतन्य का रस होता है, तभी व्यंजन रसमय लगते हैं नहीं तो उन जड़ व्यंजनों में रस कहाँ ? इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों के साथ भी है।

जिन चीजों को भोगने योग्य मानकर तुम अपनी आभा, अपनी ऊर्जा, अपने आत्मचैतन्य की शक्ति बिखेर देते हो, उन्हीं चीजों के इन बाह्य आकर्षणों की अपेक्षा, उनमें जो आत्मसत्ता है उसका ख्याल रखकर अपनी आत्मसत्ता का विकास करो तो तुम्हारा बल बढ़ जायेगा।

एक समय था जब बालक माँ की गोद से पलभर भी दूर नहीं होना चाहता था। जब माँ जवान थी और बालक लाचार था, उसे माँ से पोषण मिलता था, तब वह बार-बार माँ की गोद में पहुँच जाता था। माँ की गोद में पाने के लिए चीखता-पुकारता था। लेकिन वही बालक बड़ा होकर माँ को बूढ़ी पाता है और अब माँ से उसका स्वार्थ नहीं सिद्ध होता तो वह माँ की और देखता तक नहीं। माँ के पास कुछ देर बैठने की उसे फुर्सत तक नहीं क्योंकि अब जिससे स्वार्थ सिद्ध होता है वह पत्नी अब मिल चुकी है। यह सारा संसार ही अपने स्वार्थ से एक-दूसरे के साथ जुड़ा है। तुलसीदासजी ने भी कहा हैः

सुर नर मुनि सबकी यह रीति।

स्वारथ लागहिं करहिं सब प्रीति।।

जितनी-जितनी तुम्हारी प्राणशक्ति उस आत्मदेव से संचालित होती है, जितने-जितने तुम प्राणवान हो, तेजवान हो, ओजवान हो उतने-उतने लोग तुम्हारे इर्द-गिर्द मंडराते हैं। बुढ़ापे में प्राणशक्ति क्षीण हो जाती है, ओज-तेज कम हो जाता है तो अपने भी पराये होने लगते हैं। नौकरी में से भी रिटायरमैंण्ट दे दिया जाता है।

जिसके कारण तुम्हारी कीमत है, उस आत्मसत्ता की जानोगे, उसे जितना अधिक अपना मानोगे और उसमें विश्रांति पाओगे उतने ही तुम महानता के शिखरों को छू सकोगे। नहीं तो थोड़ी-बहुत शक्ति लाकर उसे जगत की बाह्य चकाचौंध में ही खर्च कर दिया तो फिर बुढ़ापे में तुम्हारी खैर नहीं, मृत्यु के बाद तुम्हारी खैर नहीं…. न जाने प्रकृति फिर किस शरीर में पटक कर तुम्हें अनाथ कर दे ? इसलिए कृपा करके प्राणबल रहते ही उस सर्व-सौन्दर्य के सर्वसत्ता  के उदगम स्थान को जानकर उसके साथ एक हो जाओ। इसी में तुम्हारा भला है, कुटुम्ब का भला है, देश का भला है।

ʹमेग्नेटʹ से जुड़ी हुई प्लेट से लोहे के कण चिपके रहते हैं, लेकिन ज्यों ही मेग्नेट का आश्रय प्लेट ने छोड़ा तो लोहे के कण भी प्लेट को छोड़ देंगे। ऐसे ही मेग्नेटों का मेग्नेट तुम्हारा आत्मदेव है और यह जड़ शरीर जब तक उस मेगनेट के करीब है तब तक बाहर के व्यक्ति, बाहर की वस्तुएँ, बाहर का वातावरण आपके साथ सहयोग करता है। जैसे जैसे उस मेग्नेट से तुम्हारी प्राणशक्ति दूर होती जाती है वैसे-वैसे बाहर के व्यक्ति वस्तु वातावरणरूपी लोहे के कण भी तुमसे दूर होते जायेंगे।

धिक् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजो बलं बलम्।

विश्वामित्र को अनुभव हुआ कि क्षात्रबल को धिक्कार है। आत्मबल ही वास्तविक बल है। जवानी में क्षत्रियबल जरा दिखता है किन्तु बुढ़ापा आते ही बूढ़े राजा का राज्य छीन लिया जाता है। बुढ़ापा आते ही नौकर भी मुकरने लगते हैं और पड़ोसी भी आपकी जमीन जागीर पर निगाह डालने लगते हैं, आपके अपने कुटुम्बी भी आपका अधिकार छीनने की ताक में रहते हैं।

……… तो मानना पड़ेगा कि जीवनशक्ति जिस जीवनदाता से आती है उसी जीवनदाता को पाने में लगाना ही बुद्धिमत्ता है, अन्यथा अज्ञानता है।

शारीरिक स्वास्थ्य अर्थात् शारीरिक बल, मानसिक प्रसन्नता अर्थात् मनोबल एवं बौद्धिक योग्यता अर्थात् बौद्धिक बल ये जितने अधिक होंगे, जितनी आपकी प्राणशक्ति सूक्ष्म होगी और उस आत्मा के साथ आपकी तदाकारता होगी, उतने ही आप इस संसार  नंदनवन की नाई देख सकेंगे… आप उसी ब्रह्म परमात्मा के विषय में जानो, उसी का चिंतन करो एवं उसी में विश्रांति पाओ ताकि आपकी मति को ऐसा बल मिले कि आपकी मति ʹमतिʹ न बचे, ऋतंभरा प्रज्ञा हो जाये। ʹऋतʹ अर्थात् ʹसत्यʹ सत्य से पूर्ण आपकी प्रज्ञा हो जाये…

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 1997, पृष्ठ संख्या 11,12 अंक 57

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उदारात्मा जयदेव जी महाराज


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

श्रीमद् भगवद् गीता में आता हैः

दुःखेश्वनुद्विमग्नाः सुखेषु विगतस्पृहः।

वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरूच्यते।।

ʹदुःखों की प्राप्ति में जिसका मन उद्वेगरहित है और सुखों की प्राप्ति में जिसकी स्पृहा दूर हो गयी है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है।ʹ (गीताः 2.56)

सुख में आसक्ति नहीं, वाहवाही में आसक्ति नहीं और दुःख में उद्वेग नहीं हो तो हृदय रहेगा शांत। अगर शांत रहने का विचार पक्का रखो तो फिर आपको यदि कोई सतायेगा तो कुदरत उसको ठीक कर देगी।

ʹगीतगोविंदʹ के कर्त्ता थे जयदेव जी। उनके पिता जब चल बसे तब ब्याजखोर आदमी ने जयदेव जी से कहाः “तेरे पिता जी ने हमसे बहुत कर्ज लिया है।”

जयदेवजीः “पिता संपत्ति तो ज्यादा छोड़ नहीं गये हैं। एक छोटा सा घर है जिसमें रहकर भगवान का भजन करता हूँ। आमदनी तो है नहीं, कमाऊँगा तब दे दूँगा।”

पिता ने तो लिये थे कुछ गिने-गिनाये रूपये किन्तु ब्याजखोर ने बदमाशी करके, ब्याज चढ़ाकर उसका पूरा मकान ले लेने के कागजात बनवा लिये। फिर जयदेव जी से कहाः “अगर तुम अपने पिता का कर्जा नहीं चुका सकते तो अपना मकान हमारे हवाले कर दो और इन कागजों पर हस्ताक्षर कर दो।”

जयदेव जी ने हस्ताक्षर कर दिये। ब्याजखोर ने मकान पर कब्जा कर लिया और जयदेव जी से कहाः “अब तुम बाहर निकलो। यह मकान मेरा हो गया।”

जयदेवजीः “ठीक है भाई ! मैं निकल जाता हूँ। जैसी भगवान की मर्जी।”

जयदेव जी तो हरिनाम का जप करते-करते घर छोड़कर बाहर निकल गये। जयदेव जी जा रहे थे, उस समय वह ब्याजखोर भी साथ में था। इतने में उसके नौकर दौड़ते-दौड़ते आये और बोलेः “घर में आग लग गयी है।” यह सुनकर ब्याजखोर घबरा गया।

तब जयदेवजी बोलेः “चिन्ता मत करो।”

जयदेवजी भगवान का नाम लेते हुए उस घर में घुसे तो आग शांत हो गयी। जयदेव जी पुनः बाहर निकले तो आग पुनः लग गयी।

यह देखकर उस ब्याजखोर का मन बदल गया किः ʹअरे ! मैंने जयदेव को सताया है। इसके पिता ने तो गिने-गिनाये रूपये लिये थे लेकिन मैंने जुल्म करके इसका पूरा मकान हथिया लिया फिर भी यह शांत रहा। किन्तु विधाता से नहीं सहा गया इसीलिए घर में आग लगी है….।ʹ ब्याजखोर ने जयदेवजी के पैर पकड़े और प्रार्थना करके मकान वापस देते हुए कहाः “अब आप भजन-चिंतन करें। आपके जीवन का निर्वाह भी मैं करूँगा।”

जयदेव जी ने कहाः “तुम्हारे सहारे मेरा जन्म नहीं हुआ है। जिसने मुझे जन्म दिया है, वही मेरा निर्वाह करेगा।”

कुछ समय के बाद जयदेवजी जगन्नाथपुरी के लिए रवाना हुए। मार्ग में भूख लगने पर सत्तू भिगोकर खा लेते। मार्ग में एक ऐसा स्थल भी आया कि न पीने को पानी मिले न खाने को भोजन। नंगे पैर… ऊपर धूप… पास में एक भी पैसा नहीं…. ऐसी स्थिति में चलते-चलते जयदेव जी गिर कर बेहोश हो गये।

इतने में एक ग्वाला आया। उसने मुँह पर पानी छींटा तो बेहोशी दूर हो गयी। फिर उसने खाने को फल दिये, अमृत जैसा पानी पिलाया और बोलाः “आपको जगन्नाथपुरी जाना है न ? मुझे भी वहीं जाना है। चलो, मैं आपको छोड़ देता हूँ।”

ग्वाला के वेश में भगवान उसे जगन्नाथपुरी तक छोड़ने आये। जयदेव को हुआ किः “यह अनजान ग्वाला… रोज मुझे खाने का ला देता था, इसके साथ यात्रा बड़ी सुखद रही। जीव का तो ऐसा स्वभाव नहीं होता कि किसी अपरिचित के ऊपर इतनी दया करे। ये या तो महात्मा हैं या परमात्मा हैं।ʹ आखिर उनसे रहा न गया और पूछ बैठेः “हे ग्वाला ! सच-सच बताओ कि तुम कौन हो ?”

ग्वालाः “मुझे जो जैसा मान ले, मैं  वही हूँ।”

जयदेव जी को समझते देर न लगी किः ʹहो न हो, यही मेरे प्रभु हैं।ʹ ज्यों-ही जयदेव जी पैर पकड़ने को गये तो भगवान छटक गये और बोलेः “अभी कइयों को तीर्थ में पहुँचाना है, जयदेव !”

ऐसा कहकर प्रभु अन्तर्धान हो गये। फिर जयदेव कई वर्षों तक जगन्नाथपुरी में रहे। भिक्षा माँगकर खा लेते और भगवान का भजन करते।

जगन्नाथपुरी में ही सुशील नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसको एक कन्या थी। वह 15 साल की हो चुकी थी। एक रात्रि को उस ब्राह्मण दम्पत्ति को स्वप्न आया जिसमें भगवान जगन्नाथ ने दर्शन देते हुए कहाः “पेड़ के नीचे जो जयदेव बैठा है न, उसे अपनी कन्या का दान कर दो।”

दूसरे दिन सुबह ब्राह्मण दम्पत्ति पहुँचे अपनी कन्या को लेकर जयदेव जी के पास और कन्यादान स्वीकार करने का आग्रह करने लगे। तब जयदेव जी बोलेः “मैं अपना घर भी छोड़कर आया हूँ, कमाता भी नहीं हूँ। मैं एक गरीब ब्राह्मण…. मेरे पास कुछ भी नहीं है तो भला तुम्हारी कन्या का निर्वाह कैसे कर सकूँगा ?”

ब्राह्मणः “हे विप्र ! चाहे आपके पास कुछ भी न हो, भले एक पेड़ के नीचे बैठे हो लेकिन हमें तो भगवान ने स्वप्न में आज्ञा दी है इसलिए यह कन्या हम आपको ही अर्पण करेंगे।”

जयदेव जी के बहुत मना करने पर भी सुशील ब्राह्मण ने कन्यादान कर दिया। वह कन्या भी बड़ी सुशीला थी। उसने अपने पति की भगवद् भक्ति में कोई कमी न आने दी। बड़े प्रेम से भोजन बनाकर भगवान को भोग लगाती, पति को खिलाती, फिर स्वयं खाती। पति की सेवा करते-करते उसमें भी पातिव्रत्य का अनुपम बल आ गया।

घूमते-घामते जयदेव जी ने पुनः अपने गाँव वापस आये। कुछ समय के अंतराल से उन्हें पुनः जगन्नाथपुरी जाने  का मन हुआ। तब तक गीतगोविंद की रचना हो चुकी थी एवं उन्होंने काफी प्रसिद्धि पा ली थी। जब वे एक गाँव में पहुँचे तब गाँव वालों ने उन्हें पहचान लिया। सत्संग के बाद जब वे विदा होने लगे तो गाँववालों ने उन्हें स्वर्ण मुद्राएँ भेंट दीं।

जयदेवजी धन कमर में बाँधकर वहाँ से रवाना हुए। जंगल का रास्ता था। जिस गाँव से जयदेव जी सत्संग करके आ रहे थे, उस गाँव के चार आदमियों की नज़र जयदेव जी पर थी। बुरी नीयत थी उनकी। जरूरी नहीं कि सत्संग में सभी सज्जन ही आयें। उन चार आदमियों ने, जो वास्तव में डाकू ही थे, जयदेव जी का पीछा किया और जयदेवजी की रकम छीनकर, उनके हाथ पैर की उँगलियाँ तोड़कर उन्हें कुएँ में धकेल दिया ताकि जयदेवजी कहीं जा न सकें। डाकुओं को भय था कि यदि लोगों को पता चलेगा तो वे राजा से कहकर उन्हें पकड़वा देंगे और हमें मृत्युदंड मिल जायेगा।”

जयदेवजी फिर भी इतने शांत और मस्त थे कि कुएँ में पड़े-पड़े ही गाने लगेः “वाह प्रभु ! तेरी लीला अपरंपार है ! प्रभु ! तेरी माया अपरंपार है ! सुख आया और गया, दुःख आया है वह भी जायेगा, लेकिन तू तो सदा हमारे साथ है।” दुःख के प्रसंग में भी उन्होंने अपना सुखद भगवद् भाव बना लिया।

इतने में गौडेश्वर के राजा लक्ष्मणसेन वहाँ से गुजरे। उन्हें लगा कि ʹकुएँ में से मधुर आवाज आ रही है और यह आवाज जयदेवजी की लगती है।ʹ अंदर झाँककर देखा तो जयदेवजी ही कुएँ में बँधे पड़े हैं। राजा ने अपने सैनिकों को उतारा कुएँ में और जयदेवजी को निकलवाया। बाहर आने पर राजा ने पूछाः “जयदेवजी ! आपकी यह हालत किसने की ?”

जयदेवजीः “महाराज ! यह मत पूछो।”

राजाः “नहीं नहीं… बता दो, हम उनको ठीक कर देंगे। हम चारों और सिपाही भेजकर उऩ्हें पकड़वायेंगे। आपको दुःख देने वालों की खबर ले लेंगे।”

जयदेवजीः “खबर लेनी ही है तो अपनी खबर ले लें कि हम कौन हैं ? कहाँ से आये हैं ? अपना स्वरूप क्या है ? यह खबर लेने के लिए ही हमारा जन्म हुआ है। दूसरों की खबर कब तक लेंगे, राजन् ! भूल जाइये।”

राजा ने बहुत आग्रह किया फिर भी जयदेव जी अडिग रहे और उन्होंने नाम नहीं बताया। यह देखकर राजा की श्रद्धा और भी बढ़ गयी। उसने जयदेवजी को अपना गुरु बना लिया और उन्हें पंचरत्न सभा का अध्यक्ष बना दिया। कुछ समय बाद जयदेवजी की अध्यक्षता में एक ज्ञान सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें देश-देशान्तर से कई साधु-संन्यासी, विद्वान, पंडित आदि आये।

 

उन डाकूओं ने सोचा कि ʹएक जयदेव को लूटने से हमें इतना खजाना मिल गया तो इस सम्मेलन में तो कई साधू एकत्रित होंगे। उन साधुओं के बीच जाना हो तो साधु के कपड़े पहनना ठीक रहेगा।ʹ वे चार डाकू साधु के वेश में पहुँचे राजदरबार में।

उस सभा में साधुओं का तो सत्कार होता था। जहाँ साधुओं का सत्कार होता था वहाँ पहुँचने पर डाकू देखकर स्तब्ध रह गयेः “अरे ! जिसका धन छीनकर हाथ-पैर बाँधकर हमने कुएँ में फेंका था वही आज राजा से भी ऊँचे आसन पर बैठा है ! अब तो हमारी खैर नहीं। क्या करें ? वापस भी नहीं जा सकते और आगे जाना खतरे से खाली नहीं है….”

इतने में जयदेव जी की नजर उन साधुवेशधारी डाकुओं पर पड़ी। उनकी ओर निर्देश करते हुए वे राजा से बोलेः “राजन् ! ये हमारे चार मित्र हैं। इनका अच्छी तरह से स्वागत कीजिये।”

अब तो वे डाकू भाग भी नहीं सकते थे। उन्हें आगे ही आना पड़ा। वे चारों काँपने लगे।

इतने में जयदेवजी ने कहाः “राजन् ! आप मेरा सत्कार करके जो भेंट-पूजा देना चाहते हैं वह मैं तो नहीं लेना चाहता हूँ, मेरे बदले में इन्हीं को दे दीजिये।”

डाकुओं को हुआ कि ऐसा कहकर जयदेव जी हमारी पोल खोल देंगे और हमें शूली पर चढ़ना पड़ेगा।

किन्तु जयदेवजी के मन में उनके लिए सदभावना थी। राजा ने बड़े सत्कार से चाँदी के बर्तन, स्वर्ण-मुद्राएँ, वस्त्रादि प्रदान किये। जब वे विदा होने लगे तो राजा ने सैनिकों से कहाः “ये चार महात्मा जयदेव जी के पुराने मित्र हैं। इन्हें जरा गाँव के बाहर जंगल पार करवाकर उनके गाँव तक पहुँचा दो।”

सैनिक एवं वजीर आदि उन साधुवेशधारी डाकुओं को विदा करने गये। जंगल में वजीर ने पूछाः “जयदेवजी के पास इतने बड़े साधु आये, बड़े-बड़े संन्यासी आये फिर भी इतना सम्मान किसी का भी नहीं हुआ, जितना आपका हुआ। अतः आप सच बताइये कि जयदेव जी आपके क्या लगते हैं ?”

डाकू तो डाकू थे। उन्होंने सोचाः “अगर सच बता देंगे तो मुसीबत आयेगी।” हकीकत में सत्य बताने से मुसीबत नहीं आती है। थोड़ी बहुत आती हुई दिखती है तो पाप कटते हैं।

साधुवेशधारी उन डाकुओं ने कहाः “जयदेव तो हमारे गाँव के हैं। वे हमारे बचपन के साथी हैं। हम एक साथ हमारे नगर के राजा साहब के यहाँ जासूसी का काम करते थे, लेकिन उन्होंने तो राजा की संपत्ति हड़प कर ली। रानी पर उनकी बुरी नजर थी इसलिए राजा ने उनको मारकर कुएँ में डाल देने का आदेश हमें दिया था लेकिन ये हमारे पुराने मित्र थे। हमको दया आ गयी इसलिए हमने उनको मारा नहीं बल्कि हाथ-पैर की उँगलियाँ काटकर उन्हें जिंदा ही कुएँ में फएंक दिया और साबिती के रूप में उनकी काटी हुई उँगलियाँ राजा के पास ले गये।”

इतना ही कहना था और उस परमात्मा से सहा न गया, जहाँ वे चारों खड़े थे वहीं धरती फट गयी और चारों जमीन में बुरी तरह दब मरे।

उन लोगों ने झूठ कहा लेकिन सृष्टिकर्ता से सहन नहीं हुआ क्योंकि जो शांत है, परहितपरायण है, उसका थोड़ा भी अगर कोई बिगाड़ता है या धोखा करता है तो ईश्वर से सहन नहीं होता है।

चारों को नष्ट होते देखकर वजीर चकित हो गया। उनको दिया हुआ सामान वापस लाया और राजा के चरणों में रखते हुए पूरी घटना सुना दी।

तब राजा ने पैर पकड़े जयदेवजी के और बोलेः “जयदेव जी अब तो सच-सच बताइये ! आप तो कह रहे थे कि ʹये मेरे पुराने मित्र हैंʹ और वे आपके लिए ऐसा कह रहे थे। उनकी बात सुनकर सृष्टिकर्ता से सहन नहीं हुआ और धरती फट गयी। चारों उसमें दब मरे। आप सच बताइये कि वे कौन थे ?”

जयदेवजीः “महाराज ! आपने बहुत आग्रह करके पूछा था तब भी मैंने नहीं बताया था। मैंने सोचा था कि उनको पैसे की कमी है इसलिए डाका डालते हैं और मुझे भी लूटा है। अगर उनका धन मिल जायेगा तो उनका स्वभाव सुधर जायेगा ऐसा सोचकर मैंने आपसे उन्हें धन दिलवाया। लेकिन वे नहीं बदले, जिसके परिणामस्वरूप भगवान ने उन्हें बड़ी खतरनाक सजा दी।”

जो व्यक्ति उदारात्मा है, प्राणीमात्र का हितैषी है उससे कोई अन्याय करे, उसका अहित करे तो वह भले सहन कर ले किन्तु सृष्टिकर्ता देर-सबेर उसे अपराध का दंड देता ही है।

संत का निंदक महाहत्यारा।

संत का निंदक परमेश्वर मारा।।

संत के निंदक की पूजे न आस।

नानक ! संत का निंदक सदा निराश।।

आप निश्चिंत रहो, शांत रहो, आनंदित रहो तो आपका तो मंगल होगा लेकिन अगर आपका कोई अमंगल करेगा तो देर-सबेर कुदरत उसका स्वभाव बदल देगी, वह आपके अनुकूल हो जायेगा। अगर वह आपके अनुकूल नहीं होता तो फिर चौदह भुवनों में भी उसे शांति नहीं मिलेगी और जिसके पास शांति नहीं है, फिर उसके पास बचा ही क्या ? उसका तो सर्वनाश है। दिन का चैन नहीं, रात की नींद नहीं, हृदय में शांति नहीं तो फिर और जो कुछ भी है, उसकी कीमत भी क्या ?

पद्मपुराण में आता है किः ʹजिसके पास क्षमा है, उसने सब व्रत कर लिये। जिसके पास संयम है, उसने सब तीर्थों में स्नान कर लिया। जिसके पास दया है, उसने सब जप कर लिये। जिसके पास संतोष है, उसने सब धन कमा लिया।ʹ

जयदेव आध्यात्मिक धन के धनी थे। भागवत के श्रोता-वक्ता जानते हैं गीत-गोविंद के कर्त्ता जयदेवजी का नाम।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 1997, पृष्ठ संख्या 21,22,23,24 अंक 56

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परमात्मप्राप्ति के सात सचोट उपाय


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

कथा कीर्तन कलियुगे, भवसागर की नाव।

कह कबीर भव तरन को और नाहि उपाय।।

कलियुग में परमात्म-प्राप्ति के लिए वे साधन, वातावरण अथवा शरीर अभी आपके पास नहीं है जो अन्य युगो थे जिससे तप करके समाधि करके परमात्म-प्राप्ति की जा सके। इसका मतलब यह भी नहीं है कि कलियुग में परमात्मा को प्राप्त नहीं किया जा सकता। मनुष्य जन्म का उद्देश्य ही परमात्म-साक्षात्कार कर मुक्ति प्राप्त करना है। इस कलिकाल में भी परमात्म-प्राप्ति के कुछ सचोट उपाय हैं।

प्रथम उपायः परमात्म तत्त्व की कथा का श्रवण करें।

कथा कीर्तन जा घर भयो, संत भयो मेहमान।

वा घर प्रभु वासा कीन्हा, वो घर है वैकुण्ठ समान।।

एक पंडित जी कथा कर रहे थे। कथा के बीच में उन्होंने कहाः राम नाम भव सिंधु तरहि। राम नाम ऐसा है कि वह भवसिंधु से तार देता है।

एक ग्वालिन दूध बेचकर वहाँ से गुजर रही थी। उसके कान में कथा की यह बात आ गई कि ʹराम नाम भवसिंधु तार देता है।ʹ वह ग्वालिन दो घड़े सिर पर रखकर दूध बेचने जाती और लौटते समय उन खाली घड़ों में सामान भर लेती थी। उस दिन लौटते समय नदी के किनारे पर पहुँच कर वह सोचने लगीः “आज नाव वाला नहीं है और पंडित जी ने कहा था कि ʹराम नाम भवसिंधु तार देता है…. राम नाम से तो पत्थर भी तैरते हैं।ʹ दूध बेचने वाली उस ग्वालिन ने आगे सोचाः ʹपत्थर भी तैर सकते हैं, फिर मैं तो मनुष्य हूँ। पानी में पत्थर जितना भार तो मनुष्य का होता भी नहीं।ʹ

ʹजय श्रीरामʹ करके वह तो चल पड़ी नदी में। ऐसी चली ऐसी चली कि जाकर दूसरे किनारे लगी। उसने सोचाः ʹहाय राम ! रोज-रोज इतना पैसा मैं नाव वाले को देती थी ! अब वे पैसे पंडित जी की कथा में चढ़ाऊँगी।ʹ अब वह ग्वालिन नाव के बजाय रोज रामनाम के बल पर नदी पार करके दूध बेचने जाने लगी। नाव के पैसे बचने लगे। आने का पैसा और जाने का पैसा दोनों इकट्ठा करते-करते जब एक महीना बीत गया, तब वह पोटली भरकर पंडित जी के पास गई। पंडित ने कहाः “इतना सारा पैसा !ʹʹ ग्वालिन बोलीः “पंडितजी ! आपके वचन से मुझे लाभ हुआ है।”

पंडित जीः “कैसे वचन ?”

माई बोलीः “पंडित जी ! आपने कथा में कहा था कि राम नाम भवसिंधु तरहिं।

राम नाम से मनुष्य भव-सागर तर जाता है। आपके ये वचन मैंने सुने तब से मैं नाव में नहीं बैठती। रोज पानी पर चलकर नदी पार कर लेती हूँ। नदी में डूबती नहीं हूँ। पानी तो लोगों को दिखता है पर मेरे लिए तो मानो…. बस, क्या कहूँ… महाराज !” इतना कहकर माई गदगद हो गई।

पंडित ने सोचाः ʹअरे ! मेरी कथा से ग्वालिन का रोज आने-जाने का खर्च बच रहा है ! मुझे भी उस गाँव में जाना है।ʹ दो दिन बाद पंडितजी नदी किनारे पहुँच गये।

इतने में माई आयी और जय श्री राम कहकर चल पड़ी। माई को देखकर पंडित के आश्चर्य का ठिकाना न रहा ! उन्होंने अपने दो चार आदमियों को बुलाकर कहाः “देखो राम-नाम में शक्ति तो है। मैं भी राम-नाम लेकर तर तो जाऊँगा लेकिन यदि गड़बड़ हो तो मेरी कमर में तुम रस्सी बाँध दो, अगर डूबने लगूँ तो तुम मुझे खींच लेना।”

पंडित और मसालची दोनों बूझे नाहिं।

औरों को उजाला करे आप अंधेरे माहिं।।

वह माई पंडित के वचन पर श्रद्धा करके बिना नाव के नदी पार कर जाती थी लेकिन पंडित वर्षों से भागवत की कथा करता था पर भगवत्तत्त्व का, रामतत्त्व का ज्ञान नहीं था। उसमें संशय था।

ʹराम-रामʹ कहकर नदी में उतरते ही वह तो डूबने लगा। लोगों ने रस्सी खींचकर उसे बाहर निकाला।

संशय सबको खात है संशय सबका पीर।

संशय की जो फाकी करे वा ना फकीर।।

दूसरा उपायः परमात्मप्राप्ति के लिए दूसरी बात है सत्पुरुषों के सान्निध्य में रहें। जैसा संग वैसा रंग। संग का रंग अवश्य लगता है। यदि सज्जन व्यक्ति भी दुर्जन का अधिक संग करे तो उसे कुसंग का रंग अवश्य लग जायेगा। इसी प्रकार यदि दुर्जन से दुर्जन व्यक्ति भी महापुरुषों का सान्निध्य ले तो देर-सबेर वह भी महापुरुष हो जायेगा। वालिया लुटेरे ने नारदजी का संग किया और महर्षि वाल्मीकि बन गया।

तीसरा उपायः प्रेमपूर्वक नामजप-संकीर्तन करें। तुलसीदासजी कहते हैं-

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो वेद प्रकासा।।

यदि मंत्र किसी ब्रह्मवेत्ता सदगुरु द्वारा प्राप्त हो और नियमपूर्वक उसका जप किया जाय तो कितना भी दुष्ट अथवा भोगी व्यक्ति हो, उसका जीवन बदल जायेगा। दुष्ट की दुष्टता सज्जनता में बदल जायेगी। भोगी का भोग योग में बदल जायेगा।

चौथा उपायः प्रसन्न चित्त से सुख-दुःख को भगवान का विधान समझें। परिस्थितियों को आने जाने वाली समझकर बीतने दें। घबड़ाये नहीं या आकर्षित न होवें।

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं-

समदुःखसुखः क्षमी।

जिनको अपने आत्मा का प्रकाश नहीं है ऐसे मनुष्य सुख में भी स्वस्थ नहीं रहते और दुःख में भी स्वस्थ नहीं रहते। सुख आये तो उसे टिकाये रखना चाहते हैं और दुःख को दूर करना चाहते हैं। इसलिए सुख और दुःख दोनों में अस्वस्थ रहते हैं लेकिन जिनको आत्मा का प्रकाश मिला है वे सुख-दुःख में स्वस्थ रहते हैं। जो स्वस्थ है उसको दुःख भयभीत नहीं कर सकता। जो संपूर्ण स्वस्थ है, वह जहर को भी पचा लेता है। भीम को जहर दिया गया तो उसकी शक्ति और बढ़ गयी।

जो स्वस्थ है उनको संसार में जहर के कड़वे घूँट मिलें तो भी उऩकी योग्यता बढ़ती है और संसार का प्यार मिलें तो भी वे आनंद में रहते हैं। भक्तिमति मीरा को जहर का प्याला मिला फिर भी वे स्वस्थ रहीं तो जहर भी उनके लिए अमृत बन गया और वे ʹमेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई…ʹ कहकर कन्हैया के प्रेम में ही मस्त रही।

प्रसन्नचित्त से सुख-दुःख को भगवान का प्रसाद समझते हुए सम रहना योग है।

मुस्कुराकर गम का जहर, जिनको पीना आ गया।

यह हकीकत है कि जहाँ में उनको जीना आ गया।।

पाँचवाँ उपायः सबको भगवान का अंश मानकर सबके हित की भावना करें। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही हो जाता है इसलिए कभी शत्रु को भी बुरा नहीं सोचना चाहिए बल्कि प्रार्थना करनी चाहिए कि परमात्मा उसे सदबुद्धि दे, सन्मार्ग दिखायें। ऐसी भावना करने से शत्रु की शत्रुता भी मित्रता में बदल सकती है।

छठा उपायः ईश्वर को जानने की उत्कण्ठा जागृत करें। जहाँ चाह वहाँ राह। जिसके हृदय में ईश्वर के लिए चाह होगी, उस रसस्वरूप को जानने की जिज्ञासा होगी, उस आनन्दस्वरूप के आनंद के आस्वादन की तड़प होगी, प्यास होगी वह अवश्य ही परमात्म-प्रेरणा से संतों के द्वार तक पहुँच जायेगा और देर-सबेर परमात्म-साक्षात्कार कर जन्म–मरण से मुक्त हो जायेगा।

सदगुरु की सेवा किये, सबकी सेवा होये।

सदगुरु की पूजा किये, सबकी पूजा होय।।

सातवाँ उपायः एकान्त में प्रार्थना और ब्रह्माभ्यास करें। यदि इन सात बातों को जीवन में उतार लें तो अवश्य ही परमात्मा का अनुभव होगा।

यदि आप चाहो कि सब आपको प्यार करें तो आप दूसरों के काम आओ, दूसरे तुम्हें स्नेह करेंगे और भगवान के, गुरु के दैवी कार्य में भागीदार होंगे तो वह भजन हो जायेगा। कुछ पाने की आशा नहीं रखोगे तो मुक्ति मिल जायेगी। रूचिपूर्ति के चक्कर में न पड़कर रूचि की निवृत्ति करना चाहिए। इच्छाओं की पूर्ति में तो बँधन है, इसके लिए अनेक लोगों की गुलामी भी करनी पड़ती है। लेकिन इच्छाओं की निवृत्ति कर, ईश्वर में विश्रांति पाकर जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होने में आप स्वतंत्र हैं। अनुकूलता की लालच  न रखें तो दोनों आपके दास हो जायेंगे और आप सच्चे सुख के स्वामी बन जायेंगे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 1997, पृष्ठ संख्या 6,7,20 अंक 56

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