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परमात्मा की कृपा और प्रसन्नता कैसे पायें ? – साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज


यह अभिमान न आना चाहिए कि ‘मैंने दूसरों का कोई उपकार किया है । ‘ ऐसा समझना चाहिए कि जो कुछ उन्हें दिया जाता है वह उनके लिए ही प्राप्त हुआ है । जैसे कोई डाकिया डाकघर से प्राप्त की गयी वस्तुएँ, पार्सल आदि लिखे पते पर लोगों को पहुँचाता है परंतु इसलिए उन पर कोई उपकार नहीं करता । हाँ, वह यह बात अनुभव करता है कि ‘मैं अपने कर्तव्य का पूरा पालन करके सरकार की प्रसन्नता प्राप्त कर सकूँगा ।’ इस प्रकार हम भी विश्वनियंता परमात्मा की प्रसन्नता के लिए आचरण करेंगे तो हम पर उसकी कृपा और प्रसन्नता होगी ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2020, पृष्ठ संख्या 17 अंक 333

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सेवा व भक्ति में लययोग नहीं चल सकता


अयोध्या में एक बार संतों की सभा हो रही थी । एक सज्जन हाथ में बड़ा पंखा लेकर संतों को झलने लगे । पंखा झलते समय उनके मन में विचार आया, ‘आज मेरे कैसे सौभाग्य का उदय हुआ है ! प्रभु ने कितनी कृपा की है मेरे ऊपर कि मुझे इतने संतों के मध्य खड़े होकर इनके दर्शन तथा सेवा का अवसर मिला है !’ इस विचार के आने से उनके शरीर में रोमांच हुआ । नेत्रों में आँसू आये और विह्वलता ऐसी बढ़ी कि पंखा हाथ से छूट गया । वे मूर्च्छित होकर गिर पड़े । कुछ साधुओं ने उन्हें उठाया । बाहर ले जाकर मुख पर जल के छींटे दिये । सावधान होने पर उन्होंने फिर पंखा लेना चाहा तो साधुओं ने रोकते हुए कहाः “तुम आराम करो । पंखा झलने का काम सावधान पुरुष का है । तुमने तो सत्संग में विघ्न ही डाला ।”

सेवा लीन होने के लिए नहीं है । लययोग के ध्यान में अपने को सुख मिलता है, प्रियतम (प्रभु) को सुख नहीं मिलता । अतः सेवा व भक्ति में लययोग नहीं चल सकता ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2020, पृष्ठ संख्या 16 अंक 332

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भगवान समस्याएँ क्यों देते हैं ? – पूज्य बापू जी


बच्चा जो अपने लिये चाहे वही माँ-बाप करते जायें तो बच्चे का कभी विकास नहीं हो सकता । लेकिन माता-पिता जानते हैं कि बच्चे को किस वक्त क्या चीज देने से उसका कल्याण होगा । ऐसे ही हमारे माता-पिता के भी मात-पिता परमात्मा हैं, वे सब जानते हैं कि आपको किस समय सुख की जरूरत है, किस समय दुःख की जरूरत है, किस समय अपमान की जरूरत है, किस समय बीमारी की जरूरत है, किस समय तन्दुरुस्ती की जरूरत है, वे सब जानते हैं इसलिए सुव्यवस्थित ढंग से देते रहते हैं । अगर वे नहीं जानते होते तो तुम जो चाहते वह होता रहता और तुम जो चाहते हो वह होता रहता न, तो अभी तुम यहाँ (ब्रह्मज्ञान के सत्संग) में नहीं होते । तुम जो चाहते वह होने लगता तो तुम अभी ब्रह्मविद्या सुन के अपनी 21 पीढ़ियों का उद्धार करने का पुण्य कमाने इस जगह पर पहुँच नहीं पाते ।

एक महात्मा थे । वे ईश्वर से कुछ नहीं माँगते थे तो उनकी वाणी में बड़ा प्रभाव था । उनका दर्शन करके लोग आनंदित हो जाते थे, चित्त प्रसन्न हो जाता था । लोग बढ़ने लग गये । महात्मा तो दयालु होते ही हैं, प्राणिमात्र के परम सुहृद होते हैं तो लोग आ के  अपना दुखड़ा रोये, कोई कुछ दुखड़ा रोये ।

महात्मा एक दिन समाधि में बैठे और भगवान को कहाः “देखो, मैंने आज तक तुम्हारे से कुछ नहीं माँगा और अपने लिए माँगूगा नहीं । मेरे पास जो भी व्यक्ति आते हैं उनकी जो समस्याएँ हैं, उन्हें हल कर दे बस ! इतना कर दे ।”

भगवान ने कहाः “महाराज ! छोड़ो इस बात को । मैं जो करता हूँ, ठीक है ।”

लेकिन महाराज भी ब्रह्मवेत्ता थे, उन्होंने कहाः “तुम जो करते हो वह ठीक है तो भी मैं जो कहता हूँ वह भी ठीक है, हस्ताक्षर कर दो ।”

“अब मैंने तो वचन दिया है कि ज्ञानियों से मैं परे नहीं हूँ । आप अगर आग्रह करते हो तो मैं हस्ताक्षर कर देता हूँ किंतु महाराज जी ! इसमें मजा नहीं है ।”

“ठीक है, देख लेंगे पर एक बार मेरे पास जो भी आते हैं उनकी सब समस्याएँ हल कर दो । करो हस्ताक्षर ।”

भगवान का हाथ पकड़ के उस बात पर हस्ताक्षर करा दिया । लोगों की तो रातों-रात समस्याएँ हल हो गयीं ।

शनीचर की  रात थी, समस्याएँ हल हो गयीं, रविवार को देखा तो कोई व्यक्ति ही नहीं कथा में ।

महाराज ! बाबा जी ने धीरज बाँधा, ‘चलो, लोगों ने समझा होगा की बाप जी गये हैं बाहर, चलो ।’

सोमवार को देखा, कोई व्यक्ति नहीं, मंगल को देखा, कोई व्यक्ति नहीं । बुधवार को भी देखा कि कोई व्यक्ति नहीं आया तो बाबा जी ने ध्यान किया और भगवान से पूछा ।

भगवान बोलेः “महाराज ! आप बोलते थे कि ‘उनकी समस्याएँ हल कर दो, उनकी सब इच्छाएँ पूरी कर दो ।’ अब उनको इच्छित पदार्थ मिल गये तो उन्हीं में फँस गये । कुछ थोड़ी बहुत गड़बड़ करके भी मैं इधर लाता था ताकि वे सत्य को पा लें । आपने मेरे से हस्ताक्षर करा दिया इसलिए वे तो अपने मौज-मजा (विषय-भोगों) में मरने को जा रहे हैं, नरक की तरफ जा रहे हैं ।”

बाबा ने कहाः “भगवान ! तुम्हारी बात ठीक थी ।”

कुछ अटक-सटक न होती तो हमारे जीवन का विकास नहीं होता । इसका मतलब यह नहीं कि हम चाहेंगे कि आपको समस्याएँ मिलें, हम यह नहीं चाहते । लेकिन परमात्मा जो करता है वह ठीक करता है । कभी कोई समस्या हल हुई…. कभी कोई आयी…. ऐसा करते-करते सब समस्याओं का जो मूल कारण है जन्म-मृत्यु, वह जन्म-मृत्यु की समस्या हल हो जाय न, तो बाकी समस्याओं का महत्त्व नहीं रहेगा । बार-बार जन्म लेना, फिर मरना… यह बड़े-में-बड़ी समस्या है । इस बड़ी समस्या को दूर करने के लिए भगवान छोटी समस्याएँ देते हैं ताकि वहाँ जाओ जहाँ इनकी पहुँच नहीं है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2020, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 332

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