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नीच मनुष्यों का संग न करें !


साँईं श्री लीलाशाह जी की अमृतवाणी

जैसे धुआँ सफेद मकान को भी काला कर देता है, वैसे ही कुसंगी मनुष्य अच्छे मनुष्य को भी बिगाड़ देता है। ‘सत्संग तारता है, कुसंग डुबोता है।’ यह सच ही है। भँवरी एक कीड़े को लाकर अपने घर में बंद कर देती है। थोड़े दिनों के पश्चात कीड़ा उसके सदृश हो जाता है।

इसी प्रकार दुष्टों का संग है। उनका संग करने से मन मलिन होता है। नीच मनुष्यों के के संग को विषवत् समझें।

अशुभ विचारों का उदय न होने दें

आप ज्ञान के अंकुश से अशुभ विचारों को अपने हृदयरूपी मंदिन में आने ही न दो। यदि किसी प्रकार आपके मन में अशुभ विचार ने आकर वास किया तो बस, अपनी कुशल न समझना। इसका परिणाम यह निकलेगा कि वह आपसे अयोग्य, शैतानी कार्य करवा के आपका अपने बल से सर्वनाश कर देगा।

आपकी शुद्ध बुद्धि ही अशुभ विचार को झुकायेगी। आरम्भ से ही (अशुभ विचार को) उदय न होने दो।

अपने भीतर (मन में) काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों को बिठाकर उसमें परमात्मा को कैसे बैठा सकोगे ! मन को मंदिर बनाओ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2017, पृष्ठ संख्या 25 अंक 297

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सत्संगति ही है भगवत्प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन


भगवान श्रीकृष्ण उद्धवजी से कहते हैं- “उद्धव! जो लोग बारह यमों (अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), असंगता, असंचय (आवश्यकता से अधिक धन आदि का संग्रह न करना), आस्तिकता, ब्रह्मचर्य, मौन, स्थिरता, क्षमा और अभय) और बारह नियमों (बाह्य पवित्रता (शुद्धि), आंतरिक पवित्रता (विवेक द्वारा), जप, तप, हवन, श्रद्धा, अतिथि-सेवा, भगवत्पूजा, तीर्थयात्रा, परोपकार की चेष्टा, संतोष और आचार्य-सेवा। विशेष पातंजल योग दर्शन में यम नियम 5-5 बताये गये हैं किंतु श्रीमद्भागवत में 12-12 बताये गये हैं।) को पालते हैं अथवा और बहुत से साधनों को करते हैं, उनको भी मेरे नगर अर्थात् परम धाम तक आने का मार्ग ही नहीं मिल पाता। लेकिन यदि वे सज्जनों का आश्रय लेकर संतों के द्वार जायें तो समझ लो कि वे सब मेरे ही धाम में आ गये। ऐसी परम्परा से मेरी प्राप्ति होती है।

सत्संगति अन्य साधनों जैसी नहीं है। वह अपने संग से अन्य संगों का विनाश करती है और मेरी प्राप्ति अवश्य ही कराती है। सत्संग करने वाले भक्त मेरी प्राप्ति के लिए अन्य किसी पर निर्भर नहीं रहते। जैसे भँवरी के सम्पर्क में आने से कीड़े की देह की स्थिति बदल जाती है, उसी प्रकार संतों की संगति करने से भक्त भी बदलकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाते है।

जैसे चंदन के पेड़ के इर्द-गिर्द जो निर्गंध और अनुपयोगी वृक्ष होते हैं वे भी चंदन की संगति से सुगंधित होकर मूल्यवान हो जाते हैं। वे अचेतन काष्ठ (लकड़ियाँ) भी देवताओं और ब्राह्मणों के मस्तक पर चंदन के रूप में विराजमान रहते हैं। उनकी आवश्यकता धनवानों को भी होती है। राजा भी उन्हें वंदनीय समझते हैं। उसी प्रकार सत्संगति करने से भक्त मेरे पद को प्राप्त करते हैं और अंत में मेरे लिए भी वे पूज्य (आदरणीय) बन जाते हैं। उनकी महिमा का क्या वर्णन किया जाय ? उद्धव ! मेरा स्थान तत्काल प्राप्त करने के लिए सचमुच, संतों की संगति के सिवा अन्य कोई उत्तम साधन नहीं है, यह सत्य समझना।

बिना किसी साधन का आश्रय लिए केवल सत्संग से मुझे प्राप्त करने वाले लोगों की संख्या अगणित है। उसके संबंध में तुम्हें बताऊँगा। वैसे देखा जाय तो केवल जड़, मूढ़ और राजसी-तामसी योनियों में जन्म लेने पर भी वे दृढ़ सत्संगति के कारण मुझे प्राप्त कर सके। दैत्य, दानव, निशाचर, पशु, पक्षी, गंधर्व, अप्सरा, सिद्ध, चारण, विद्याधर, नाग, विषैले सर्प, गुह्यक (गंधर्व का एक प्रकार) – ये सभी मेरे पद तक पहुँच गये। इस प्रकार जब पशु, पक्षी, सर्प – इन सबने मुझे प्राप्त कर लिया तो मनुष्य तो सहज ही उन सबमें श्रेष्ठ है। समाज में हेय (त्याज्य) समझे जाने वाले लोगों ने भी सत्संग कर मुझे प्राप्त कर लिया है। इतना ही नहीं, देवता एवं ब्राह्मण भी उनका वंदन करते हैं। ऐसे संतों की कीर्ति अतुलनीय है।

सत्संगति करने से निंदनीय भी वंदनीय हो जाते हैं। उद्धव ! तुम सचमुच निष्पाप हो इसलिए तुम सत्संगति करो। पहले से ही उत्कृष्ट दर्जे का, अति शुद्ध सुवर्ण हो। सुवर्ण को रत्नों का संग मिल जाय तो उसका मूल्य और भी बढ़ जाता है और वह राजमुकुट की शोभा बढ़ाता है। उसी प्रकार पुण्यवान पुरुष को सत्संगति प्राप्त होने पर उसे अनंत सुख प्राप्त होते हैं, देवाधिदेव उसका वंदन करते हैं और भगवान शंकर आदि भी उसे मिलने आते हैं। यम-धर्म (यम-नियम) उसके चरणों में आ जाते हैं और तीर्थ भी उसके चरणोदक की इच्छा करते हैं। भक्तिभाव से सत्संगति करने पर मनुष्य को इतना लाभ मिलता है।” (श्रीमद् एकनाथी भागवत, अध्याय 12 से)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2017, पृष्ठ 27, 28 अंक 296

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जीवन की सार्थकता


राजा विक्रमादित्य अत्यंत पराक्रमी, न्यायप्रिय, प्रजाहितैषी, ईमानदार एवं दयालु शासक थे। उनकी प्रजा उनके द्वारा किये गये कार्यों की सराहना करते नहीं थकती थी। एक बार वे अपने गुरु के दर्शन करने उनके आश्रम पहुँचे। आश्रम में उन्होंने गुरुजी से अपनी कई जिज्ञासाओं का समाधान पाया। जब गुरु जी वहाँ से चलने लगे तो राजा ने उनसे कहाः “गुरुदेव ! मुझे कोई ऐसा प्रेरक वाक्य बताइये जो महामंत्र बनकर न केवल मेरा बल्कि मेरे उत्तराधिकारियों का भी मार्गदर्शन करता रहे।”

गुरुजी ने उन्हें एक श्लोक लिखकर दियाः

प्रत्यर्ह प्रत्यवेक्षत नरच्चरितमात्मनः।

किन्नु म पशुभितुल्यं किन्नु सत्पुरुषैरिव।।

‘मेरे इस बहुमूल्य जीवन का जो दिन व्यतीत हो रहा है, वह पुनः लौटकर कभी नहीं आयेगा। अतः प्रतिदिन हमें यह चिंतन करना चाहिए कि आज का जो दिन व्यतीत हुआ वह पशुवत गुजरा अथवा सत्पुरुष की तरह ?’

इस श्लोक का राजा विक्रमादित्य पर इतना असर पड़ा कि उन्होंने इसे अपने सिंहासन पर अंकित करवा दिया। वे रोज रात को यह विचार करते कि ‘आज का मेरा दिन पशुवत गुजरा या सत्पुरुष की तरह ?’ और प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में उठकर ध्यानस्थ हो जाते, आत्मचिंतन करते फिर दिन में क्या-क्या सत्कार्य करने हैं उनका चिंतन करते।

एक दिन अति  व्यस्तता के कारण वे किसी की मदद अथवा परोपकार का कार्य नहीं कर पाये। रात को सोते समय दिन के कार्यों का स्मरण करने पर उन्हें याद आया कि उस दिन उनके द्वारा कोई धर्मकार्य नहीं हो पाया। वे बेचैन हो उठे। उन्होंने सोने की कोशिश की पर उन्हें नींद नहीं आयी।

आखिरकार वे उठकर बाहर निकल गये। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक गरीब आदमी ठंड से सिकुड़ता हुआ सर्दी से बचने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने उसे अपना दुशाला ओढ़ाया और वापस राजमहल आ गये। वह दिन निरर्थक नहीं रहा और ग्लानि दूर होकर उन्हें अच्छी, आत्मसंतुष्टिवाली नींद आ गयी।

शरीर की सार्थकता सेवा, धन की सार्थकता सात्तविक दान में, वाणी की भगवन्नाम-गुणगान में, मन की भगवच्चिंतन में और मनुष्य-जन्म की सार्थकता आत्मसाक्षात्कार में है।

धन्य हैं गुरु-उपदेश के सारग्राही, आज्ञापालक, कुशल शासक एवं सत्शिष्य राजा विक्रमादित्य ! और धन्य होंगे वे पवित्रात्मा जो उनके इस सुंदर सद्गुण एवं कुंजी को अपने जीवन में ला पायेंगे !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2017, पृष्ठ संख्या 7, अंक 296

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