Yearly Archives: 1999

बिना दवा स्मरणशक्ति का विकास


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

परब्रह्म परमात्मा में सोलह कलाएँ होती हैं। सृष्टि में प्रत्येक वस्तु तथा जीव उन सोलह कलाओं में से कुछ कलाओं के साथ जीवित अथवा स्थित रहते हैं। अलग-अलग वस्तुओं तथा जीवों में ईश्वर की अलग-अलग कलाएँ विकसित होती हैं। उन कलाओं में एक विशेष कला है – स्मृतिकला।

स्मृतिकला तीन प्रकार की होती हैः तात्कालिक स्मृति, अल्पकालिक स्मृति तथा दीर्घकालिक स्मृति।

कई जीवों में अल्पकालिक अथवा तात्कालिक स्मृतिकला ही विकसित होती है परन्तु मनुष्य में स्मृतिकला के तीनों प्रकार विकसित होते हैं। अतः मनुष्य को प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा जाता है।

मनोवैज्ञानिक विश्लेषणानुसार, ʹकुछ याद रखनाʹ एक प्रकार की जटिल मानसिक प्रक्रिया है। स्मरणशक्ति अर्थात् सुनी, देखी एवं अनुभव की हुई बातों का वर्गीकरण करके मस्तिष्क में उन्हें संगृहीत करना तथा भविष्य में जब भी उनकी आवश्यकता पड़े उन्हें फिर से जान लेना।

स्मृति के लिए दिमाग का जो हिस्सा कार्य करता है उसमें एसीटाइलकोलीन, डोयामीन तथा प्रोटीन्स के माध्यम से एक रासायनिक क्रिया होती है। एक प्रयोग के द्वारा यह भी सिद्ध हुआ है कि मानव-मस्तिष्क की कोशिकाएँ आपस में जितनी सघनता से गुंथित होती हैं उतनी ही उसकी स्मृति का विकास होता है।

मानसिक विशेषज्ञों के अनुसार, प्रायः सभी प्रकार के मानसिक रोग स्मृति से जुड़े होते हैं, जैसे कि चिन्ता, मानसिक रोग स्मृति से जुड़े होते हैं, जैसे कि चिन्ता, मानसिक अशांति आदि। ऐसे ढंग के व्यक्तियों में कोई भी कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व इतनी घबराहट बढ़ जाती है कि वे समय पर जरूरत की चीजों को अच्छी तरह से याद नहीं रख सकते।

विद्यार्थियों में यह समस्या अधिक पायी जाती है। परीक्षाकाल निकट आने पर अथवा परीक्षा-पत्र को देखकर घबरा जाने से अऩेक विद्यार्थी याद किये हुए पाठ भी भूल जाते हैं। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि स्मरणशक्ति पर मानसिक रोगों का सीधा प्रभाव पड़ता है।

हमारे प्राचीन ऋषियों ने स्मरणशक्ति को बढ़ाने के लिए प्राणायाम, ध्यान, धारणा आदि अनेक यौगिक प्रयोगों का आविष्कार किया है। उऩ्होंने तो ध्यान के द्वारा एक ही स्थान पर बैठे-बैठे अनेक ग्रहों एवं लोकों की खोज कर डाली।

महर्षि वाल्मीकि ने ध्यान के द्वारा अपनी बौद्धिक शक्तियों का इतना विकास किया कि श्रीरामावतार से पूर्व ही उन्होंने श्रीराम की जीवनी को ʹरामायणʹ के रूप में लिपिबद्ध कर दिया।

इसी प्रकार महर्षि वेदव्यासजी श्रीमद् भागवत महापुराण में आज से हजारों वर्ष पूर्व ही कलियुगी मनुष्यों के लक्षण बता दिये थे।

हमें मानना पड़ेगा कि हमारा ऋषिविज्ञान इतना विकसित था कि उसके सामने आजे के विज्ञान की कोई गणना ही नहीं की जा सकती।

महर्षि वाल्मीकि तथा वेदव्यासजी द्वारा रचित ये दो ग्रंथ-रामायण तथा महाभारत, उनकी चमत्कारिक तथा विकसित स्मरणशक्ति के उदाहरण स्वरूप हैं।

स्मरणशक्ति को बढ़ाने वाला भ्रामरी प्राणायाम हमारे ऋषियों की एक विलक्षण खोज है। भ्रामरी प्राणायाम द्वारा मस्तिष्क की कोशिकाओं में स्पंदन होता है जिसके फलस्वरूप एसीटाइलकोलीन, डोयामीन तथा प्रोटीन के बीच होने वाली रासायनिक क्रिया को उत्तेजना मिलती है तथा स्मरणशक्ति का चमत्कारिक विकास होता है।

कैसे करें भ्रामरी प्राणायाम ?

यह प्राणायाम करने के लिए सर्वप्रथम पाचनशक्ति मजबूत करने की आवश्यकता होती है। पाचनतंत्र में ग्रहण किये गये खाद्य पदार्थों को पचाने तथा उन्हें निष्कासित करने की पूर्ण क्षमता होनी चाहिए।

जिसका पाचनतंत्र कमजोर हो, उसे सर्वप्रथम ʹप्रातः पानी प्रयोगʹ तथा पाद-पश्चिमोत्तानासन के द्वारा अपने पाचनतंत्र को सुदृढ़ बनाना चाहिए। यह प्राणायाम करने वाले के लिए उपयुक्त पोषक तथा सात्त्विक आहार लेना भी अति आवश्यक है क्योंकि शुद्ध तथा पोषक तत्त्व न मिलने के कारण मस्तिष्क की कार्यक्षमता मन्द पड़ जाती है। अतः प्राणायाम करने वाले व्यक्ति के दैनिक भोजन में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, विटामिन तथा खनिज तत्त्वों की उपयुक्त मात्रा उसकी शारीरिक क्षमता के अनुसार होनी चाहिए।

इस प्रकार शुद्ध, सात्त्विक तथा पौष्टिक आहार लेते हुए प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालीन तीनों संध्याओं के समय खाली पेट भ्रामरी प्राणायाम करने से स्मरणशक्ति का चमत्कारिक विकास होता है।

विधिः प्रातः काल शोच-स्नानादि से निवृत्त होकर कम्बल अथवा ऊन के बने हुए किसी स्वच्छ आसन पर पद्मासन, सिद्धासन अथवा सुखासन में बैठ जायें और आँखें बन्द कर लें।

ध्यान रहे कि कमर व गर्दन एक सीध में रहें। अब दोनों हाथों की तर्जनी (अँगूठे के पासवाली) उँगलियों से अपने दोनों कानों के छिद्रों को बन्द कर लें। इसके बाद खूब गहरा श्वास लेकर कुछ समय तक रोके रखें तथा मुख बन्द करके श्वास छोड़ते हुए भौंरे की तरह ʹૐ…..ʹ का लम्बा गुंजन करें।

इस प्रक्रिया में यह ध्यान अवश्य रखें कि श्वास लेने तथा छोड़ने की क्रिया नथुनों के द्वारा ही होनी चाहिए। मुख के द्वारा श्वास लेना अथवा छोड़ना निषिद्ध है।

श्वास छोड़ते समय होंठ बन्द रखें तथा ऊपर व नीचे के दाँतों के बीच में कुछ फासला रखें। श्वास अन्दर भरने तथा रोकने की क्रिया में ज्यादा जबरदस्ती न करें। यथासम्भव श्वास अंदर खींचे तथा रोकें। अभ्यास के द्वारा धीरे-धीरे आपकी श्वास लेने तथा रोकने की शक्ति स्वतः ही बढ़ती जायेगी।

प्रत्येक श्वास छोड़ते समय ʹૐʹ का गुंजन करें। इस गुंजन द्वारा मस्तिष्क की कोशिकाओं में हो रहे स्पन्दन (कम्पन) पर अपने मन को एकाग्र रखें।

प्रारम्भ में इस प्राणायाम का अभ्यास दस-दस मिनट सुबह-दोपहर अथवा शाम जिस संध्या में समय मिलता हो, नियमित रूप से करें। एक माह बाद प्रतिदिन एक-एक मिनट बढ़ाते हुए तीस मिनट तक यह प्राणायाम कर सकते हैं। किन्तु शारीरिक रूप से कमजोर तथा अस्वस्थ लोगों को प्राणायाम की संख्या का निर्धारण अपनी क्षमता के अनुसार करना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 1999, पृष्ठ संख्या 9-11, अंक 78

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ

 

निंदा से कोढ़ नाश ! – पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू


मृत्यु के भय से तो मृत्यु तो बढ़िया है और बदनामी के भय से बदनामी अच्छी है। ʹबदʹ होना बुरा नहीं है।

इक्ष्वाकु कुल के राजा को कोढ़ की बीमारी हो गयी। दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गयी। सारे हकीम और वैद्य अपना-अपना इलाज आजमाकर थक चुके थे। आखिर वह राजा गुरु वशिष्ठजी के श्रीचरणों में पहुँचा और बोलाः

“गुरुदेव ! आज आपके निकट मैं स्वार्थ की बात लेकर आया हूँ। प्रभु ! शांति के लिए नहीं, वरन् शरीर का रोग मिटाने के लिए आया हूँ। इस कोढ़ के इलाज में कोई भी औषधि काम नहीं कर रही है। इसने मुझे धन-वैभव एवं सारी सुविधाओं के बीच रहते हुए भी अत्यंत दुःखी कर दिया है। गुरुदेव इसका क्या कारण है ?”

वशिष्ठजी महाराज ने तनिक अपने स्वस्वरूप में गोता लगाया और समझ गये कि इसके पूर्वकाल का दुष्कृत्य अभी फल देने के लिए तत्पर हुआ है।

कभी पूर्वकाल का सुकृत फल देने को तत्पर होता है। पूर्वकाल का सात्त्विक सुकृत जब फल देने को तत्पर होता है तब संतों के यहाँ जाने की रूचि होती है। राजस सुकृत फल देता है तो भोग-वैभव मिलता है और तामस सुकृत फल देता है तो ऐशो आराम की ओर, शराब कबाब की ओर ले जाता है।

जरूरी नहीं कि पाप का फल ही दुःख होता है। कभी-कभी पुण्य का फल भी दुःख होता है। पुण्य का फल दुःख ? हाँ…. कुछ ऐसे पुण्य किये हैं कि जिसका फल दुःख हो रहा है। दुःख क्यों हो रहा है ? क्योंकि आपकी समय शक्ति संसार के इन खिलौनों में बरबाद न हो जाये। अतः प्रकृति इन खिलौनों की, सांसारिक विषयरूपी खिलौनों की प्राप्ति में विक्षेप डालकर आपकों संत और परमात्मा की शरण पहुँचाना चाहती है, इसीलिए दुःख देती है।

कुछ लोग विवेक से संसार-वैभव का आकर्षण छोड़कर संतों की शरण में पहुँच जाते हैं तो कुछ लोगों को सुकृत के बल से उस सुख-वैभव में विक्षेप डालकर उसकी नश्वरता का बोध करवाकर संतों की शरण में पहुँचा देती है प्रकृति।

वशिष्ठजी महाराज बोलेः “हे राजन ! तुम्हारा पूर्वकृत दुष्कृत्य ही अभी कोढ़ के रूप में प्रगट हुआ है।”

राजाः “गुरुदेव ! मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ।” तब वशिष्ठजी ने कहाः ठीक है मैं तुम्हें दिखा देता हूँ।” वशिष्ठजी ने राजा की आँखों पर संकल्प करके हाथ रख दिया, फिर पूछाः “राजन ! क्या दिख रहा है ?”

राजाः “गुरुजी ! दो पहाड़ दिख रहे हैं। उनमें से एक पहाड़ तो सुवर्णकाय है और दूसरा काला कलूट एवं गंदगी के ढेर जैसा दिख रहा है।”

वशिष्ठजीः “राजन ! ठीक दिख रहा है। पहला जो चमक रहा है, वह तुम्हारे शुभ सुकृत हैं और दूसरा जो दिख रहा है गंदगी के ढेर जैसा, यह तुम्हारा पाप है। राज्य और यश तुम्हारे सुकृत का फल है लेकिन अनिद्रा और कोढ़ की बीमारी ये तुम्हारे पूर्वजन्मों के दुष्कृत्यों के फल हैं।”

राजाः “गुरुदेव ! इसका उपाय क्या है ?” वशिष्ठजीः “इस गंदगी के ढेर को तुम खा सकते हो क्या ?”

राजाः “गुरुदेव ! यह तो संभव नहीं है।” वशिष्ठजीः “तो जब तक यह ढेर रहेगा, तब तक तुम्हारा यह दुःख भी बना रहेगा।”

राजाः “इस ढेर को खत्म करने का कोई दूसरा उपाय बताइये, गुरुदेव !”

वशिष्ठजीः “तुम ऐसा किया करो कि अपनी भाभी के महल के प्रांगण में अपना खाट बिछवाओ और रोज शाम को ऐसे ढंग से वहाँ जाकर रहो ताकि  लोगों के मन में ऐसा हो कि ʹभाभी के साथ राजा का नाजायज संबंध है।ʹ लोगों को तुम दोनों का रिश्ता गलत प्रतीत हो। तुम गलत नहीं हो और गलती करोगे भी नही किन्तु लोगों को ʹतुम गलत होʹ ऐसी प्रतीति कराओ।”

राजाः “गुरुदेव ! मेरी भाभी ! वे तो माँ के समान हैं !! मैं वहाँ इस ढंग से जाकर बिस्तर लगाऊँ कि लोग मुझे गलत समझें !! गुरुदेव ! इससे तो मरना श्रेष्ठ है।”

वशिष्ठजीः “बेटा ! बद होना बुरा है किन्तु बदनाम होना बुरा नहीं है। तुम्हारे इस दुष्कृत्य को नष्ट करने का सबसे सुगम उपाय मुझे यही लगता है।”

आखिर हाँ-ना करते-करते राजा सहमत हुआ और उसने गुरुआज्ञा को शिरोधार्य किया।

सैनिक को जब अपने सेनापति का कोई आदेश मिलता है तो अपनी जान की परवाह किये बिना ही वह उस आदेश का पालन करता है। जो चार पैसे कमाता है, वह सैनिक भी आदेश मानकर अपनी जान दे देता है तो जिसको परमात्मतत्त्व पाना है, वह अपने गुरु का आदेश मानकर उऩ्हें अपना अहं दे दे तो इसमें उसका घाटा क्या है ?

तू मुझे तेरा उर-आँगन दे दे, मैं अमृत की वर्षा कर दूँ।

तू मुझे तेरा अहं दे दे, मैं परमात्मा का रस भर दूँ।।

राजा को तीन दिन हो गये अपनी भाभी के प्रांगण में बिस्तर बिछाए हुए, उसका तीन हिस्सा कोढ़ गायब हो गया और एक दो घण्टे की नींद भी आने लगी। राजा प्रसन्न होकर पहुँचा अपने गुरुदेव के श्रीचरणों में एवं प्रणाम करता हुआ बोलाः “गुरुदेव ! बिना औषधि के ही तीन हिस्सा कोढ़ गायब हो गया ! थोड़ी-थोड़ी नींद भी आने लगी है।”

गुरुदेव ने पुनः संकल्प करके राजा की आँखों पर हाथ रखा तो राजा क्या देखता है कि गंदगी का ढेर जो काला पहाड़ था वह तीन हिस्सा गायब हो चुका है।

फिर गुरुदेव बोलेः “चार दिन और यही प्रयोग करो।”

राजा ने चार दिन पुनः वही प्रयोग किया तो पूरा कोढ़ मिट गया, केवल एक नन्हीं सी फुँसी बच गयी। तब राजा ने कहाः “गुरुदेव ! पूरा कोढ़ मिट गया है और अब तो नींद भी बढ़िया आती है लेकिन एक छोटी सी फुँसी बच गयी है और इसमें जरा सी खुजलाहट होती रहती है।”

तब गुरुदेव ने कहाः “राजन् ! अगर मैं भी थोड़ी निंदा कर दूँ तो यह मिट जायेगी। लेकिन मैं जानता हूँ कि तुम निर्दोष हो। अतः निंदा करके मैं अपने सिर पर पाप क्यों चढ़ाऊँ ? इसे अब तुम ही भोग लो।”

निर्दोष व्यक्ति की जब बदनामी होती है तब भगत लोग, सीधे-सादे लोग घबरा जाते हैं। “बापू ! हमने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा फिर भी पड़ोसी लोग हमारे साथ ऐसा-ऐसा दुर्व्यवहार करते हैं….”

अरे भाई ! तुम्हारे चेहरे पर खुशी या  प्रसन्नता देखकर कोई ऐसा वैसा सोचता या बदनामी करता है तो तुम घबराओ मत। ऐसे अवसर पर इक्ष्वाकु कुल के राजा की इस कथा को याद कर लिया करो। कभी-कभी तुम्हारा धन-वैभव एवं यश देखकर अथवा किसी संत महापुरुष का तुम पर प्रेम है-यह देखकर कोई जलता है। तुम तो उसे जलाने का प्रयत्न नहीं करते हो, अतः इसमें तुम्हारा दोष नहीं है।

जब बिजली चमकती है तब बिजली का कोई इरादा नहीं होता कि हम गधी को परेशान करें। बिजली को तो पता तक नहीं होता कि गधी परेशान हो रही है लेकिन जब बिजली चमकती है तो गधी दुलत्ती मारती है। हालाँकि बिजली को वह दुलत्ती लगती भी नहीं है। इसी प्रकार जब तुम्हारे जीवन में चमक आये और किसी की बुद्धि दुलत्ती मारने लगे अर्थात् निंदा करने लगे तो तुम चिंता क्यों करते हो ? तुम तो टिके रहो अपनी गरिमा में, अपनी महिमा में।

स्वामी रामतीर्थ कहते थेः “अपने सिद्धान्तों के लिए अपने प्राण न्योछावर करने की अपेक्षा जीवित रहकर अपने सिद्धान्तों के विरोधियों से टक्कर लेना श्रेष्ठ है।”

एकांत में बैठकर समाधि करने से जो फायदा होता है, वही फायदा, वही आनंद और वही सामर्थ्य, संसार में ईश्वर को साक्षी रखकर दैवी कार्य करते-करते व्यक्ति पा सकता है। योगी को गिरि-गुफा में बैठकर निर्विकल्प समाधि से, ध्यान करने से जो उपलब्धियाँ होती हैं वे ही उपलब्धियाँ उऩ्हें भी मिल जाती हैं जो संसार में सुख बाँटने की दृष्टि से काम करते हैं और कभी-कभार संतों के चरणों में बैठकर अपनी बुद्धि को बुद्धिदाता का ज्ञान पाने में लगा देते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 1999, पृष्ठ संख्या 23-25, अंक 78

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ

 

वास्तविक कल्याण का मार्ग


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

2 मई, 1999-नारद जयंती पर विशेष

एक दिन राजा उग्रसेन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहाः “जनार्दन ! सब लोग नारदजी के गुणों की प्रशंसा करते हैं। अतः तुम मुझसे उनके गुणों का वर्णन करो।”

सच ही है, जो अपनी प्रशंसा स्वयं नहीं करता, सर्वत्र नारायण के नाम-कीर्तन व गुणगान में ही अनुरक्त रहता है, उसकी प्रशंसा सभी लोकों में विस्तरित हो जाती है तथा भगवान स्वयं उसका गुणगान करते हैं।

वास्तव में गुणहीन पुरुष ही अधिकतर अपनी तारीफ के पुल बाँधा करते हैं। वे अपने में गुणों की कमी देख दूसरे गुणवान पुरुषों के दोष बताकर उन पर आक्षेप किया करते हैं। उनका यह कृत्य निंदनीय साबित होता है। किन्तु जो दूसरों की निंदा व अपनी प्रशंसा नहीं करता, ऐसा सर्वगुण-संपन्न विद्वान ही यश का भागी होता है।

फूलों की पवित्र एवं मनोहर सुगंध बिना बोले ही महककर अनुभव में आ जाती है तथा सूर्य भी बिना कुछ कहे ही आकाश में सबके समक्ष  प्रकाशित हो जाता है। इसी प्रकार विद्वान पुरुष गुफा में छिपा रहे, आत्मप्रशंसा न करे तो भी उसकी प्रसिद्धि सर्वत्र हो जाती है जबकि मूर्ख मनुष्य अपनी तारीफ की पुलें बाँधता रहता है, फिर भी संसार में उसकी ख्याति नहीं होती। नारदजी मनुष्य, देव, दानव सबको सम्मान रूप से प्रिय हैं। संपूर्ण गुणों से सुशोभित, कार्यकुशल, समय का मूल्य समझने वाले और आत्मतत्त्व के ज्ञाता नारदजी के गुणों की चर्चा भगवान श्री कृष्ण करते हैं-

एक समय गालव मुनि ने कल्याण प्राप्ति की इच्छा से अपने आश्रम पर पधारे हुए ज्ञानानंद से परिपूर्ण व मन को सदा अपने वश में रखने वाले देवर्षि नारद से पूछाः

“भगवन ! आप उत्तम गुणों से युक्त और ज्ञानी हैं। लोकतत्त्व के ज्ञान से शून्य और चिरकाल से निवारण सर्वगुणसम्पन्न आप जैसे ज्ञानी महात्मा ही कर सकते हैं।

शास्त्रों में बहुत से कर्तव्य-कर्म बताये गये हैं। उनमें से जिसके अनुष्ठान से ज्ञान में मेरी प्रवृत्ति हो सकती है, उसका मैं निश्चय नहीं कर पाता हूँ। इसलिए मैं आपकी शरण में आया हूँ। आप कृपा करके मुझे श्रेय (कल्याण) के वास्तविक मार्ग का उपदेश कीजिये।”

नारदजी कहते हैं- “तात ! जो अच्छी तरह कल्याण करने वाला और संशय से रहित हो, उसे ही ʹश्रेयʹ कहते हैं। पापकर्म से दूर रहना, पुण्यकर्मों का निरन्तर अनुष्ठान करना, सत्पुरुषों के साथ रहकर सदाचार का ठीक-ठाक पालन करना, सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति कोमल एवं व्यवहार में सरल होना, मीठी वाणी बोलना, देवताओं, पितरों और अतिथियों को उनका भाग देना तथा भरण-पोषण करने योग्य व्यक्तियों का त्याग न करना-यह श्रेय का निश्चित साधन है।

सत्य बोलना ही श्रेयस्कर है। मैं तो उसे ही सत्य कहता हूँ, जिससे प्राणियों का अत्यंत हित होता हो।

अकेले रहकर धर्म का पालन, धर्माचरण पूर्वक वेद वेदान्तों का स्वाध्याय तथा उनके सिद्धान्तों को जानने की इच्छा कल्याण का अमोघ साधन है।

जिसे कल्याण-प्राप्ति की इच्छा हो उस मनुष्य को शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध-इन विषयों को अधिक सेवन नहीं करना चाहिए।

रात में घूमना, दिन में सोना, आलस्य, चुगली, गर्व, अधिक परिश्रम करना अथवा परिश्रम से बिल्कुल दूर रहना-ये सब बातें श्रेय चाहने वाले के लिए त्याज्य है।

दूसरों की निंदा करके अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। साधारण मनुष्यों की अपेक्षा अपने में जो विशेषता है, वह उत्तम गुणों द्वारा ही प्रकट होना चाहिए।

मनुष्य को सदा धर्म में लगे रहने वाले साधु-महात्माओं तथा स्वधर्मपरायण उदार पुरुषों के समीप निवास करने का प्रयास करना चाहिए।

किसी कर्म का आरंभ न करने वाला और जो कुछ मिल जाये उसी से संतुष्ट रहने वाला पुरुष भी पुण्यात्माओं के साथ रहने से पुण्य का और पापियों के संसर्ग में रहने से पाप का भागी होता है।

जैसे जल और अग्नि के संसर्ग से क्रमशः शांत और उष्ण स्पर्श का अनुभव होता है, उसी प्रकार पुण्यात्माओं और पापियों के संग से पुण्य एवं पाप दोनों का संयोग हो जाता है।

जो पुरुष अपनी रसना का विषय समझकर स्वादु-अस्वादु का विचार रखते हुए भोजन करते हैं उन्हें कर्मपाश में बँधे हुए समझना चाहिए। रसास्वादन की ओर दृष्टि न रखकर जीवन-निर्वाह के लिए भोजन करना ही श्रेय है।”

निन्दक और पाखण्डियों के संग से दूर रहने का उपदेश देते हुए देवर्षि नारदजी ʹमोक्षधर्म पर्वʹ में कहते हैं-

आकाशस्थ ध्रुवं यत्र दोष ब्रुयुर्विपश्चिताम्।

आत्मपूजाभिः कामो वै को वसेत्तत्रः पण्डितः।।43।।

यत्र संलोडिता लुब्धैः प्रावशो धर्मसेतवः।

प्रदीप्तमिव चैलान्तं कस्तं देशं न संत्यजेत्।।44।।

“जहाँ के लोग बिना किसी आधार के ही विद्वानों पर दोषारोपण करते हों, उस देश में आत्मसम्मान की इच्छा रखने वाला कौन मनुष्य निवास करेगा ?”

जहाँ लालची मनुष्यों ने प्रायः धर्म की मर्यादाएँ तोड़ डाली हों, जलते हुए कपड़े की भाँति उस देश को कौन नहीं त्याग देगा ?”

पापकर्म से जीविकोपार्जन करने वाले लोगों के संग से दूर रहने का उपदेश देते हुए कहते हैं किः

कर्मणा यत्र पापेन वर्तन्ते जीवितेप्सवः।

त्यवधावेत्ततस्तूर्ण ससर्पाच्छरणादिवं।।47।।

“जहाँ जीवन की रक्षा के लिए लोग पापकर्म से जीविका चलाते हों, सर्पयुक्त घर के समान उस स्थान से तुरंत दूर हट जाना चाहिए।”

अन्त में, पापकर्म से दूर रहने की प्रेरणा देते हुए नारदजी साधकों को सावधान करते हैं किः

येन खटवां समारूढ कर्मणानुशयी भवेत्।

आदि तस्तन्न कर्त्तव्यमिच्छता कुभवमात्मेनः।।48।।

“अपनी उन्नति की इच्छा रखने वाले साधक को चाहिए कि जिस पापकर्म के संस्कारों से युक्त हुआ मनुष्य खाट पर पड़कर दुःख भोगता है, उस कर्म को पहले से ही न करें।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1999, पृष्ठ संख्या 5,6 अंक 77

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ