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क्या आश्चर्य है !


महाभारत के युद्ध में अपने 100 पुत्रों और सारी सेना का संहार हो जाने से धृतराष्ट्र बड़े दुःखी हुए। उनके शोक को शांत करने के लिए धर्मात्मा विदुर जी ने मधुर, सांत्वनापूर्ण वाणी में धर्म का उपदेश दिया।

तब राजा धृतराष्ट्र ने कहाः ”विदुरजी ! धर्म के इस गूढ़ रहस्य का ज्ञान बुद्धि से ही हो सकता है। अतः तुम मेरे आगे विस्तारपूर्वक इस बुद्धिमार्ग को कहो।”

विदुरजी कहने लगेः “राजन ! भगवान स्वयंभू को नमस्कार करके मैं इस संसाररूप गहन वन के उस स्वरूप का वर्णन करता हूँ, जिसका निरूपण महर्षियों ने किया है। एक ब्राह्मण किसी विशाल वन में जा रहा था। वह एक दुर्गम स्थान में जा पहुँचा। उसे सिंह, व्याघ्र, हाथी, रीछ आदि भयंकर जंतुओं से भरा देखकर उसका हृदय बहुत ही घबरा उठा, उसे रोमांच हो आया और मन में बड़ी उथल पुथल होने लगी। उस वन में इधर-उधर दौड़कर उसने बहुत ढूँढा कि कहीं कोई सुरक्षित स्थान मिल जाये परंतु वह न तो वन से निकलकर दूर ही जा सका और न उन जंगली जीवों से त्राण ही पा सका। इतने में ही उसने देखा कि वह भीषण वन सब ओर जाल से घिरा हुआ है। एक अत्यंत भयानक स्त्री ने उसे अपनी भुजाओं से घेर लिया है तथा पर्वत के समान ऊँचे पाँच सिरवाले नाग भी उसे सब ओर से घेरे हुए हैं। उस वन के बीच में झाड़-झंखाड़ों से भरा हुआ एक गहरा कुआँ था। वह ब्राह्मण इधर उधर भटकता उसी में गिर गया किंतु लताजाल में फँसकर वह ऊपर को पैर और नीचे को सिर किये बीच में ही लटक गया।

इतने में ही कुएँ के भीतर उसे एक बड़ा भारी सर्प दिखायी दिया और ऊपर की ओर उसके किनारे पर एक विशालकाय हाथी दिखा। उसके शरीर का रंग सफेद और काला था तथा उसके छः मुख और बारह पैर थे। वह धीरे-धीरे उस कुएँ की ओर ही आ रहा था। कुएँ के किनारे पर जो वृक्ष था, उसकी शाखाओं पर तरह-तरह की मधुमक्खियों ने छता बना रखा था। उससे मधु की कई धाराएँ गिर रही थीं। मधु तो स्वभाव से ही सब लोगों को प्रिय है। अतः वह कुएँ में लटका हुआ पुरुष इन मधु की धाराओं को ही पीता रहता था। इस संकट के समय भी मधु पीते-पीते उसकी तृष्णा शांत नहीं हुई और न उसे अपने ऐसे जीवन के प्रति वैराग्य ही हुआ। जिस वृक्ष के सहारे वह लटका हुआ था, उसे रात दिन काले और सफेद चूहे काट रहे थे। इस प्रकार इस स्थिति में उसे कई प्रकार के भयों ने घेर रखा था। वन की सीमा के पास हिंसक जंतुओं से और अत्यंत उग्ररूपा स्त्री से भय था, कुएँ के नीचे नाग से और ऊपर हाथी से आशंका थी, पाँचवाँ भय चूहों के वृक्ष को काट देने पर गिरने का था और छठा भय मधु के लोभ के कारण मधुमक्खियों से भी था। इस प्रकार संसार-सागर में पड़कर भी वह नहीं डटा हुआ था तथा जीवन की आशा बनी रहने से उसे उससे वैराग्य भी नहीं होता था।

महाराज ! मोक्षतत्त्व के विद्वानों ने यह एक दृष्टान्त कहा है। इसे समझकर धर्म का आचरण करने से मनुष्य परलोक में सुख पा सकता है। यह जो विशाल वन कहा गया है, वह यह विस्तृत संसार ही है। इसमें जो दुर्गम जंगल बताया है, वह इस संसार की ही गहनता है। इसमें जो बड़े-बड़े हिंस्र जीव बताये गये हैं, वे तरह-तरह की व्याधियाँ हैं तथा इसकी सीमा पर जो बड़े डीलडौलवाली स्त्री है वह वृद्धावस्था है, जो मनुष्य के रूप रंग को बिगाड़ देती है। उस वन में जो कुआँ है, वह मनुष्य देह है। उसमें नीचे की ओर जो नाग बैठा हुआ है, वह स्वयं काल ही है। वह समस्त देहधारियों को नष्ट कर देने वाला और उनके सर्वस्व को हड़प जाने वाला है। कुएँ के भीतर जो लता है, जिसके तंतुओं में यह मनुष्य लटका हुआ है, वह इसके जीवन की आशा है तथा ऊपर की ओर जो छः मुँहवाला हाथी है वह संवत्सर (वर्ष) है। छः ऋतुएँ उसके मुख हैं तथा बारह महीने पैर हैं। उस वृक्ष को जो चूहे काट रहे हैं, उन्हें रात-दिन कहा गया है तथा मनुष्य की जो तरह-तरह की कामनाएँ हैं, वे मधुमक्खियाँ हैं। मक्खियों के छत्ते से जो मधु की धाराएँ चू रही हैं, उन्हें भोगों से प्राप्त होने वाले रस समझो, जिनमें अधिकांश मनुष्य डूबे रहते हैं। बुद्धिमान लोग संसारचक्र की गति को ऐसा ही समझते हैं, तभी वे वैराग्यरूपी तलवार से इसके पाशों को काटते हैं।”

धृतराष्ट्र ने कहाः “विदुर ! तुम बड़े तत्त्वदर्शी हो। तुमने मुझे बड़ा सुंदर आख्यान सुनाया है। तुम्हारे अमृतमय वचनों को सुनकर मुझे बड़ा हर्ष होता है।”

विदुरजी बोलेः “राजन् ! शास्ज्ञों ने गहन संसार को वन बताया है। यही मनुष्यों तथा चराचर प्राणियों का संसारचक्र है। विवेकी पुरुष को इसमें आसक्त नहीं होना चाहिए। मनुष्यों की जो प्रत्यक्ष और परोक्ष शारीरिक तथा मानसिक व्याधियाँ हैं, उन्हीं को बुद्धिमानों ने हिंस्र जीव बताया है। मंदमति पुरुष इन व्याधियों से तरह-तरह के क्लेश और आपत्तियाँ उठाने पर भी संसार से विरक्त नहीं होते। यदि किसी प्रकार मनुष्य इन व्याधियों के पंजे से निकल भी जाय तो अंत में इसे वृद्धावस्था तो घेर ही लेती है। इसी से यह तरह-तरह  के शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंधों से घिरकर मज्जा और मांसरूप कीचड़ से भरे हुए आश्रयहीन देहरूप गड्ढे में पड़ा रहता है। वर्ष, मास, पक्ष और दिन रात की संधियाँ – ये क्रमशः इसके रूप और आयु का नाश किया करते हैं। ये सब काल के ही प्रतिनिधि हैं, इस बात को मूढ़ पुरुष नहीं जानते।

अतः बुद्धिमान पुरुष को संसार की निवृत्ति का ही प्रयत्न करना चाहिए, इस ओर से लापरवाही नहीं करना चाहिए।

मनुष्य को चाहिए कि अपने मन को काबू में करके ब्रह्मज्ञानरूप महौषधि प्राप्त करे और उसके द्वारा इस संसार-दुःखरूप महारोग को नष्ट कर दे। इस दुःख से संयमी चित्त के द्वारा जैसा छुटकारा मिल सकता है, वैसा पराक्रम, धन, मित्र या हितैषी किसी की भी सहायता से नहीं मिल सकता।

जो बुद्धिहीन पुरुष तरह-तरह के माया-मोह में फँसे हुए हैं और जिन्हें बुद्धि के जाल ने बाँध रखा हैं, वे भिन्न-भिन्न योनियों में भटकते रहते हैं।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2010, पृष्ठ संख्या 16,17 अंक 208

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ईश्वर प्राप्ति सरल कैसे ?


(पूज्य बापू जी के सत्संग प्रवचन से)

ईश्वरप्राप्ति का गणित बहुत सरल है। लोगों ने विषय-विकारों को महत्त्व देके, किसी ने कल्पना और व्याख्या कर-करके ईश्वर प्राप्ति के मार्ग को कोई बड़ा लम्बा-चौड़ा कठिन मार्ग मान लिया। कोई बड़ा लम्बा चौड़ा कठिन मार्ग मान लिया। ईश्वर प्राप्ति से सुगम कुछ है ही नहीं। मैं तो यह बात मानने को तैयार हूँ कि रोटी बनाना कठिन है लेकिन ईश्वर प्राप्ति कठिन नहीं है। अगर आटा गूँथना नहीं आये तो आटे में गाँठ-गाँठ हो जाती है। रोटी सेंकनी न आये तो हाथ जल जाता है। परमात्मा प्राप्ति में तो न हाथ जलने का डर है, न आटा खराब होने का डर है वह तो सहज है।

संसार की प्राप्ति में तो अपना पुरुषार्थ चाहिए, अपना प्रारब्ध चाहिए, वातावरण चाहिए तब संसार की चीजें मिलती हैं और मिल मिलकर चली जाती हैं। भगवान की प्राप्ति में न तो केवल तीव्र इच्छा हो जाये बस, फिर तो भगवान अपने आप अंदर कृपा करते हैं – यह अनुभव वसिष्ठजी महाराज का है।

‘श्री योगवसिष्ठजी महारामायण’ में आता है कि ‘हे राम जी ! फूल पत्ता और टहनी मसलने में परिश्रम है, अपने आत्मा परमात्मा को पाने में क्या परिश्रम है !’

उपदेशमात्र से मान तो लेते हैं कि परमात्म प्राप्ति ही सार है, सुनते सुनते विचार करते करते, जगत के थप्पड़ खाते खाते लगता है कि तत्त्वज्ञान के बिना, परमात्मज्ञान के बिना जीवन व्यर्थ है किंतु उसमें टिक नहीं पाते क्योंकि टिकने की सात्त्विक बुद्धि, दृढ़ निश्चय, सजगता और तड़प नहीं है। आहार-विहार पवित्र हो, बुद्धि सात्त्विक हो, सजगता हो तथा परमात्म प्राप्त महापुरुषों में और उनके वचनों में महत्त्वबुद्धि हो, परमात्माप्राप्ति की तीव्र तड़प हो तो टिकना कोई कठिन नहीं है। शाश्वत में महत्त्वबुद्धि के अभाव से ही सहज, सुलभ परमात्मा दुर्लभ हो रहा है। नश्वर में महत्त्वबुद्धि होने का फल यह दुर्भाग्य है कि सब कुछ करते कराते भी दुःख, शोक, जन्म-मरण की यातनाएँ मिटती नहीं।

सुबह नींद में से उठते ही थोड़ी देर चुप बैठी और विचारों की ‘वह कौन है जो आँखों को देखने की, मन को सोचने की, बुद्धि को निर्णय करने की सत्ता देता है ?’ उसी में शांत हो जाओ, परमात्माप्राप्ति के नजदीक आ जाओगे। दुःख आये उससे जुड़ो नहीं, सुख आये उससे मिलो नहीं। सुख को बाँटो और दुःख में सम रहो तो उनका जो साक्षी है उस परमात्मा में टिकने लगोगे। वह इतना निकट है कि

सो साहब सद सदा हजूरे।

अंधा जानत ताँको दूरे।।

ज्ञानचक्षु नहीं है और बाहर भागने की आदत है इसीलिए वह कठिन लग रहा है, नहीं तो ईश्वरप्राप्ति जैसा कोई सुगम कार्य नहीं है।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया।।

‘शरीर रूपी यंत्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अंतर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है।’

(गीताः 18.61)

जैसे गाड़ी में बैठने वालों को गाड़ी की गति प्राप्त होती है, जहाज में बैठने वाला जहाज की गति से भागता है, बस में बैठने वाला बस की गति से भागता है, कार में बैठने वाला कार की गति से भागता है ऐसे ही यह इन्द्रियों में बैठने वाला जीव इन्ही यंत्रों में उलझ गया है। जहाँ से बैठने की सत्ता आती है उसमें बैठो तो अभी ईश्वरप्राप्ति हो जाय, जैसे अर्जुन को भगवान की कृपा से बात समझ में आ गयी।

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा। (गीताः 18.73)

अगर कठिन होता तो परीक्षित राजा को सात दिन में कैसे मिल जाता ! भगवत्पाद लीलाशाहजी बापू की कृपा हम पर 40 दिन में कैसे बरसती और कैसे मिल जाता !

एक वर्ष तक ॐकार का जप करे, नीच कर्मों का त्याग करे और ईश्वरप्राप्ति का ऊँचा उद्देश्य बना ले तो साधारण से साधारण आदमी को भी ईश्वरप्राप्ति सहज में हो जाय। लेकिन हमारी रूचि है – यह हो जाय, वह हो जाय….। जो हो – होकर बदलता है वही करने की रुचि रखते हैं।

मान मिल जाय, बड़े हो जायें, बापू जी जैसे हो जायें ऐसा कुछ नहीं चाहिए। हर फूल अपनी जगह पर खिलता है, किसी को नकल नहीं करनी है और बाहर से बापू जी जैसा हो जाने से ईश्वरप्राप्ति हो जाती है इस वहम में नहीं पड़ना। जो जहाँ है ईश्वरप्राप्ति का अधिकारी है और सोचे कि ‘बाहर से बापू जी जैसा हो जाऊँ’, तो माइयों को दाढ़ी आयेगी नहीं, तो क्या ईश्वर नहीं मिलेगा ? जिनके सिर पर बाल नहीं हैं, क्या उनको ईश्वर नहीं मिलेगा ? बाहर से नकल नहीं करनी है, केवल उस मिले-मिलाये में प्रीति चाहिए।

भगवान से प्रीति करने की, भगवान को पान की महत्ता समझ में आ जाय तो मन पवित्र होने लगता है। जब तक भगवान को पाने की महत्ता का पता नहीं, तभी तक सारे दुःख विद्यमान रहते हैं। ईश्वर को पाने में ही सार है – ऐसा नहीं जानते, तभी तक छल-कपट आदि सारे दुर्गुण विद्यमान रहते हैं। यदि वह सम में आ जाय तो सारे छल-कपट कम होते चले जायेंगे, सारी शिकायतें दूर होती चली जाएँगी। जिसको ईश्वरप्राप्ति की रूचि नहीं है उसको गलती बताओगे तो सफाई देगा, अपनी गलती नहीं मानेगा और ज्यों-ज्यों सफाई देगा त्यों-त्यों उसकी गलती गहरी उतरती जायेगी। उसको पता ही नहीं चलेगा कि मैं अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहा हूँ और उसका परमात्मप्राप्ति का मार्ग लम्बा होता चला जायेगा।

तो ईश्वरप्राप्ति में रूचि हो जाये। और यह रुचि कैसे हो ? बार-बार सत्संग का आश्रय लो, ईश्वर कान नाम लो, उसका गुणगान करो, उसको प्रीति करो। और कभी फिसल जाओ तो आर्तभाव से पुकारो। वे परमात्मा-अंतरात्मा सहाय करते हैं, सहाय करते हैं, बिल्कुल करते हैं।  ॐ नारायण… ॐ गोविंद…. ॐ अच्युत….. ॐ केशव…. ॐ परमेश्वर…. ॐ सर्वसुहृदाय नमः…. ॐ अंतर्यामी…. ॐ सर्वज्ञ…. ॐ दयानिधे नमः…… ॐॐ….

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2010, पृष्ठ संख्या 19, अंक 208

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इनको कभी न खोयें – पूज्य बापू जी


पाँच चीजें कभी नहीं खोनी चाहिए।

अपना समय व्यर्थ न खोयें-

आपका समय इतना बहुमूल्य है कि समय देकर आप दुनिया की सब चीजें प्राप्त कर सकते हैं लेकिन दुनिया की सब चीजें न्योछावर करके भी आप बीते हुए आयुष्य का सौवाँ हिस्सा भी वापस नहीं पा सकते।

पचास-साठ साल, अस्सी साल देकर आपने जो कुछ भी एकत्र किया, वह सब का सब आप दे दें, फिर भी पचास-साठ घण्टे तो क्या पाँच मिनट भी आप अपना आयुष्य नहीं बढ़ा सकते। इसलिए अपने अमूल्य समय को व्यर्थ न गँवाये, उसका खूब-खूब सदुपयोग करेंक। समय को किसी के आँसू पोंछने में लगायें, ईश्वरप्राप्ति में लगायें।

जो लोग गपशप में, विषय-भोग में, मित्रों के साथ घूमने-फिरने में, कामनाओं की पूर्ति में, हास्य-विलास में समय को नष्ट कर देते हैं, वे लोग बड़ी गलती करते हैं। समय को बर्बाद करने वाले स्वयं बर्बाद हो जाता है। अतः अपने जीवन के क्षण-क्षण को सँभालकर ऊँचे-में-ऊँचे, अति ऊँचे काम में लगाना चाहिए। आप समय को जैसे हलके, मध्यम या उत्तम काम में खर्च करते हैं तो बदला भी वैसा ही मिलता है। परम श्रेष्ठ परमात्मा के लिए समय खर्च के लिए समय खर्च करते हैं तो बदले में आप परमातममय बन जाते हैं। समय के सदुपयोग की बलिहारी है !

स्वास्थ्य नहीं खोना चाहिए-

सुखी जीवन के लिए शरीर और मन की स्वस्थता जरूरी है। घर, गाँव, क्षेत्र और शुभाशुभ कर्म पुनः पुनः प्राप्त हो सकते हैं किंतु मनुष्य-शरीर पुनःपुनः प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को सदैव स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए पुण्य का अर्जन करना चाहिए।

शरीर जितना नीरोग, स्वच्छ व पवित्र रहेगा, उतना ही आत्मा का प्रकाश इसमें अधिक प्रकाशित होगा। यदि दर्पण ही ठीक न होगा तो प्रतिबिम्ब कैसे दिखायी देगा ! यदि नींव ही कमजोर है तो इमारत कैसे बुलंद होगी ! शास्त्रों में आता हैः शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्। शरीर धर्म का साधन है। शरीर को स्वस्थ रखना जरूरी है। जो आदमी शरीर को स्वस्थ रखना जरूरी है। जो आदमी शरीर को स्वस्थ रखने की कला जानता है, वह बार-बार बीमारी का शिकार नहीं होता है। भगवान ने ‘गीता’ (6.17) में भी शरीर स्वस्थ रखने की बात कही हैः

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।

‘दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।’

शरीर एक मंदिर है जिसमें जीवात्मा का पूर्ण विकास हो सकता है। अतः हमें शरीर-स्वास्थ्य संबंधी कुछ हितकारी उपायों को जानकर अपने जीवन में उन्हें आत्मसात् करके स्वास्थ्य-लाभ लेना चाहिए, जिससे फिर स्वस्थ शरीर का उपयोग अशरीरी परमात्मा की प्राप्ति के निमित्त प्राणिमात्र की सेवा में हो सके और शास्त्र की यह बात चरितार्थ हो सकेः

सर्व भवन्तु सुखिनः सर्व सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।।

‘सभी सुखी हो, सभी नीरोगी रहें, सभी सबका मंगल देखें और कोई दुःखी न हो।’

संयम नहीं खोना चाहिए।

जिसके जीवन में संयम नहीं है वह पशु से भी गया-बीता हो जाता है। इसलिए जीवन में संयम की बहुत आवश्यकता है। संयमहीन मानव किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो पाता और कभी प्रारब्ध से कुछ सफलता प्राप्त भी कर लेता है तो अहंकार में फूलकर अपने सर्वनाश को निमंत्रित करता है। जो मन संयम नहीं बरतता, वह किसी बड़े काम के लायक नहीं है। पशुओं के लिए चाबुक होता है परंतु मनुष्य को बुद्धि की लगाम है। सरिता भी दो किनारों से बँधी रहती है और सागर तक पहुँचती है। जिसने संयम, साधना करके अपने अंतःकरण के ज्ञान-स्वभाव की रक्षा की वह महान हो गया।

हे भारते के युवानो ! तुम भी उसी गौरव को हासिल कर सकते हो। यदि जीवन में संयम को अपना लो, सदाचार को अपना लो एवं समर्थ सदगुरु का सान्निध्य पा लो तो तुम भी महान-से-महान कार्य करने में सफल हो सकते हो। लगाओ छलाँग… कस लो कमर…. संयमी बनो… ब्रह्मचारी बनो और ‘युवाधन सुरक्षा अभियान’ के माध्यम से अपने भाई-बंधुओं, मित्रों, पड़ोसियों को तो क्या सम्पूर्ण राष्ट्रवासियों को संयम की महिमा समझाओ, जिससे वे भी संयम का सहारा लेकर अपनी महिमा में जगने में सफल हो सकें।

सम्मान देने का गुण नहीं खोना चाहिए।

छोटे-से-छोटा और बड़े-से-बड़ा व्यक्ति भी सम्मान चाहता है। सम्मान देने में रूपया-पैसा नहीं लगता है और सम्मान देते समय आपका हृदय भी पवित्र होता है। अगर आप किसी से निर्दोष प्यार करते हैं तो खुशामद से हजार गुना ज्यादा प्रभाव उस पर पड़ता है। अतः स्वयं मान पाने की इच्छा न रखो वरन् औरों को सम्मान दो। मान योग्य कर्म करो पर हृदय में मान की इच्छा न रखो, आप अमानी रहो, इससे आपका हृदयकमल खिलेगा, भगवान को पाने के योग्य होगा।

अपना अच्छा स्वभाव नहीं खोना चाहिए-

जो अच्छा कार्य, अच्छा चिंतन करता है उसको अच्छी चीजें, अच्छी संगति, अच्छे विचार, अच्छी आयु मिलती है। उसका स्वभाव अच्छा होने से मन भी अच्छा रहता है, स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है और अच्छे संस्कार लेकर वह सदगति को पा लेता है। जो बुरे कार्य करता है, बुरे विचार करता है और बुराई के पीछे लगा रहता है उसको वैसे ही विचार, वैसे ही मित्र भी मिल जाते हैं और  फिर उसकी गति भी ऐसी ही हो जाती है।

समय रहते अपने विवेक को जगाकर अपना ऐसा-वैसा स्वभाव बदलकर पशुता से मनुष्यता, मनुष्ता से देवत्व और देवत्व से देवेश्वरत्व (परमात्म-तत्त्व) की तरफ जाने से आपका तो मंगल होगा, आपके कुल-खानदान में जो पैदा होने वाले हैं उनका भी मंगल हो जायेगा। इसलिए भगवान ने कहा हैः स्वभावविजयः शौर्यम्।

आप अपने स्वभाव पर विजय पाओ।

बस ये पाँच चीजें हैं – समय, स्वास्थ्य, संयम, सम्मान और स्वभाव, इन पाँच चीजों की जो रक्षा करता है, वे उसी की रक्षा करके उसको महान बना देती हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2010, पृष्ठ संख्या 11, अंक 208

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