Yearly Archives: 2016

बंधन तोड़कर मुक्त हो जाओ !


 

दूसरों के साथ आपका दो प्रकार का संबंध हो सकता है।

मोह का संबंधः परिवार के जन सदस्यों पर आप अपना अधिकार मानते हैं, जिनसे सुख, सुविधा, सम्मान, सेवा, आराम, वस्तुएँ लेने की आशा रखते हैं, उनके साथ आपका ‘मोह’ का संबंध है। यदि वे आपकी आशा पूरी कर देंगे तो आपको सुख होगा और आशा पूरी नहीं करेंगे तो दुःख होगा। मोह का संबंध आपको सुख-दुःख के बंधन में फँसा देगा। सुख भोगेंगे आप अपनी इच्छा से और दुःख भोगना पड़ेगा आपको विवशता से। यह अटल सिद्धान्त है कि जो सुख का भोग करेगा, उसे विवश होकर दुःख भोगना पड़ेगा।

प्रेम का संबंधः जिनका आप अपने पर अधिकार मानते हैं, जिनके लिए आपके हृदय में यह भावना रहती है कि आप उन्हें अधिक-से-अधिक सुख, सुविधा, सम्मान, सेवा, आराम, प्रसन्नता दें और बदले में उनसे कुछ भी न लें तो उनके साथ आपका ‘प्रेम’ का संबंध है। जब आप उनकी इच्छा पूरी कर देते हैं, उन्हें खुश देखते हैं तो आपका हृदय प्रसन्नता से भर जाता है, जब आप इनकी इच्छा पूरी नहीं कर पाते, उन्हें अप्रसन्न देखते हैं तो आपका हृदय करुणा से भर जाता है।

दोनों संबंधों का अंतर

मोह में अपना सुख प्रधान होता है, प्रेम में दूसरे का हित व प्रसन्नता मुख्य होती है। मोह के संबंध में आप अनुभव करेंगे कि इच्छा पूरी हुई तो सुख हुआ, इच्छा पूरी नहीं हुई तो दुःख हुआ। प्रेम के संबंध में अपनी कोई इच्छा नहीं होती, हृदय में दूसरों के हित की भावना होती है। यदि वे लोग उस भावना के अनुरूप कार्य कर देते हैं तो उनकी प्रसन्नता से आपका हृदय भी प्रसन्नता से भर जाता है। यदि वे उस भावना के अनुरूप कार्य नहीं करते हैं तो आप सोचते हैं कि उन्हें दुःख होगा, उनके दुःख से आपका हृदय करुणा से भर जाता है। मोह आपको सुख-दुःख में बाँधेगा। प्रेम में ‘सुख’ के स्थान पर ‘करुणा’ रहेगी। सुख-दुःख बंधनकारी है। करुणा व प्रसन्नता बहुत बड़ी साधना है। मोह संबंध सीमित लोगों के साथ होता है, प्रेम का संबंध सम्पूर्ण विश्व व विश्व के नाथ भगवान के साथ होता है।
यदि आपके हृदय में सुख-दुःख है तो आप भोगी हैं, यदि आपके हृदय में करुणा व प्रसन्नता है तो आपके हृदय में संतत्व की सुवास है। भगवान राम जी ने स्वयं संतों का यह लक्षण बताया है-
पर दुःख दुःख सुख सुख देखे पर।
‘संतों को पराया दुःख देखकर दुःख (अर्थात् करुणा) और पराया सुख देख के सुख (अर्थात् प्रसन्नता) होता है।’ (श्री रामचरितमानस, उ.कां. 37.1)

क्या सारा संसार आपका परिवार है ?
मोहजनित संबंध के आधार पर सम्पूर्ण संसार आपका परिवार नहीं है क्योंकि सम्पूर्ण संसार की अनुकूलता-प्रतिकूलता में आप सुख-दुःख का अनुभव नहीं करते। विश्व में रोज हजारों लोग जन्मते-मरते हैं, लाखों व्यक्ति बीमार हैं, करोड़ों रुपयों की धन-सम्पत्ति आती जाती है, करोड़ों रुपयों की लाभ-हानि होती है, हजारों दुर्घटनाएँ होती हैं पर इन्हें लेकर न आपको सुख होता है और न दुःख। इस दृष्टि से सम्पूर्ण विश्व आपका परिवार नहीं है। हाँ, प्रेम जनित संबंध के आधार पर सम्पूर्ण विश्व को आप अपना परिवार मान सकते हैं। ऐसा मानना तो आपकी साधना है, महानता है।

आप कहाँ, किनसे बँधे हैं ?
आप क्या चाहते हैं और क्या नहीं चाहते हैं ? इसका उत्तर है आप सुख चाहते हैं, दुःख नहीं चाहते क्योंकि आपका असली स्वभाव सुखस्वरूप है। आप प्रसन्नता, शांति, विश्राम चाहते हैं, परेशानी, अशांति, तनाव नहीं चाहते। आप निश्चिंतता, निर्भयता व सामर्थ्य चाहते हैं, चिंता, भय व शक्तिहीनता नहीं चाहते। आप आनंदपूर्वक जीना चाहते हैं, निराशा-दुःखभरा जीवन नहीं चाहते। आपके जीवन में दुःख, चिंता, भय, निराशा, मानसिक तनाव, अशांति आदि विकार कब और किनको लेकर पैदा होते हैं ? उस शरीर, उन संबंधियों व उस सम्पत्ति को लेकर ही दुःख व चिंता होती है जिसके साथ आपका मोह का संबंध है, जिसे आप अपना परिवार मानते हैं। जिन-जिन व्यक्तियों व वस्तुओं की प्रतिकूलता में आपको दुःख होता है, आप उन्हीं से बँधे हुए हैं।
यदि आप दुःखों, परेशानियों से हमेशा के लिए छूटना चाहते हैं तो आप मोहजनित संबंध को छोड़कर प्रेम के संबंध को महत्त्व दीजिये। ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों के सत्संग का आश्रय लीजिये और हर व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति में सर्वेश्वर-परमेश्वर को निहार के भगवत्प्रेम को उभारिये। साथ ही थोड़ा समय असंग होने में लगाकर अपने असंग मुक्तस्वरूप को जान के मुक्त हो जाइये। फिर करुणा या प्रसन्नता का सुख पाने के लिए दूसरे को खोजने की गुलामी भी छूट जायेगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2015, पृष्ठ संख्या 21, अंक 275
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मानव जीवन के लिए परम उपयोगीः गाय


 

(गोपाष्टमीः 8 नवम्बर 2016)
भारतीय संस्कृति में गाय को माता का स्थान दिया गया है। जिस प्रकार माँ अपने बच्चे का लालन-पालन व सुरक्षा करती है, उसी प्रकार गौ का दूध आदि भी मनुष्य का लालन-पालन तथा स्वास्थ्य व सदगुणों की सुरक्षा करते हैं। गाय की पूजा, परिक्रमा व स्पर्श स्वास्थ्य, आर्थिक व आध्यात्मिक उन्नति की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। गाय को श्रद्धा व प्रेमपूर्वक सहलाते रहने से कुछ महीनों में असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं।

अर्थशास्त्र का मूलाधारः देशी गाय
गौ-विज्ञान सम्पूर्ण विश्व को भारत की अनुपम देन है। भारतीय मनीषियों ने सम्पूर्ण गोवंश को मानव के अस्तित्व, रक्षण, पोषण, विकास और संवर्धन के लिए अनिवार्य पाया। गोदुग्ध ने जन-समाज को विशिष्ट शक्ति, बल व सात्त्विक बुद्धि प्रदान की। गोबर व गोमूत्र खेती के लिए पोषक हैं, साथ ही ये रोगाणुनाशक, विषनाशक व रक्तशोधक भी हैं। मृत पशुओं से प्राप्त चर्म से चर्मोद्योग सहित अनेक हस्तोद्योगों का विकास हुआ। अतः प्राचीन काल से ही गोपालन भारतीय जीवन-शैली व अर्थव्यवस्था का सदैव केन्द्रबिन्दु रहा है। जीवन के समस्त महत्त्वपूर्ण कार्यों के समय पंचगव्य का उपयोग किया जाता था। विज्ञान व कम्पयूटर के युग में भी गौ की महत्ता यथावत् बनी हुई है।

गाय परम उपयोगी कैसे ?
मानव-जाति की समृद्धि गाय की समृद्धि के साथ जुड़ी है। देशी गाय का दूध, दही, घी, गोबर व मूत्र सम्पूर्ण मानव जाति के लिए वरदानरूप हैं। गाय के दूध से निकला घी ‘अमृत’ कहलाता है। स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी राजा पुरुरवा के पास गयी तो उसने अमृत की जगह गाय का घी पीना ही स्वीकार कियाः घृतं मे वीर भक्ष्यं स्यात्। (श्रीमद्भागवतः 9.14.22)

गाय की महिमा बताते हुए पूज्य बापू जी कहते हैं- “गाय के शरीर में ही ‘सूर्यकेतु नाड़ी’ होती है जिससे वह सूर्य की गो किरणों को शोषित करके स्वर्णक्षार में बदल सकती है। स्वर्णक्षार जीवाणुनाशक हैं और रोगप्रतिकारक शक्ति की वृद्धि करते हैं। गाय के दूध व घी में स्वर्णक्षार पाये जाते हैं, जो भैंस, बकरी, ऊँट के दूध में नहीं मिलते।

गोबर और गोझरण मिलाकर महीने में एकाध बार रगड़-रगड़कर नहाने से शरीर में जो तेजस्विता आती है, वह तो आजमा के देख लें, बहुत स्वास्थ्य-लाभ होता है। गोमूत्र अवश्य पीना चाहिए। यह बीमारियों की जड़ें काट के निकाल देता है। यकृत व गुर्दे (किडनी) की खराबी, मोटापा, उच्च रक्तचाप, कोल्स्ट्रोल-वृद्धि, पाचन आदि सब ठीक कर देगा गोमूत्र। अब सब लोग गोमूत्र कहाँ ढूँढने जायें इसलिए 7800 गौओं की सेवा व निवास के लिए अलग-अलग गौशालाएँ बनायीं और वहाँ विधिपूर्वक गोमूत्र से उसका अर्क बनता है। 20-30 मि.ली. यह गोझरण अर्क एक कटोरी पानी में डालकर पियो तो गोमूत्र पीने का फायदा होगा”

विशेषः ये सभी लाभ देशी गाय से ही प्राप्त होते हैं, जर्सी व होल्सटीन से नहीं।

गौ-संरक्षक व संवर्धक पूज्य बापू जी
पूज्य बापू जी गायों का विशेष खयाल रखते हैं। उनके मार्गदर्शन में भारतभर में कई गौशालाएँ चलती हैं। यहाँ कत्लखाने ले जायी जा रही गायों को रोककर उनका पालन-पोषण व्यवस्थित ढंग से किया जा रहा है। बापू जी ने गाय के दूध की महत्ता अपने सत्संगों में बतायी, जिससे लोग गोदुग्ध का उपयोग कर बुद्धिमान व तेजस्वी-ओजस्वी बनें। बापू जी ने गौझरण व गोबर की महिमा व उपयोगिता बतायी तथा लोगों को आसानी से उपलब्ध हो इस हेतु गोझरण अर्क व गौ-चंदन धूपबत्ती आदि गौ-उत्पादों के निर्माण हेतु प्रेरित किया। बापू जी ने गाय के घी व पंचगव्य के लाभ बताये और इन्हें सत्संगियों को आसानी से उपलब्ध करवाया। गायों को पर्याप्त मात्रा में चारा व पोषक पदार्थ मिलें इसका वे विशेष ध्यान रखते हैं। बापू जी के निर्देशानुसार गोपाष्टमी व अन्य पर्वों पर गाँवों में घर-घर जाकर गायों को उनका प्रिय आहार खिलाया जाता है।

‘गोविन्द’ और गोपाष्टमी का रहस्य
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से सप्तमी तक गायों तथा गोप-गोपियों की रक्षा के लिए भगवान ने गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। 8वें दिन इन्द्र अहंकाररहित होकर भगवान की शरण में आये। कामधेनु ने श्रीकृष्ण का अभिषेक किया और उस दिन भगवान का नाम गोविंद पड़ा। इसी समय से कार्तिक शुक्ल अष्टमी को गोपाष्टमी का पर्व मनाया जाने लगा।

गोपाष्टमी को क्या करें ?
सब प्रकार की अभीष्ट सिद्धि एवं सौभाग्य की वृद्धि चाहने वाले को इस दिन प्रातःकाल गायों को स्नान कराके गंध-पुष्पादि से उनका पूजन करना चाहिए। गोग्रास देकर उनकी परिक्रमा करके थोड़ी दूर तक उनके साथ जाना चाहिए। सायंकाल गायें चर के जब वापस आयें तो उस समय भी उनका आतिथ्य, अभिवादन और पंचोपचार-पूजन करके उन्हें कुछ खिलाकर उनकी चरणरज माथे पर लगानी चाहिए।

गायों की रक्षा का संकल्प
इस पर्व पर गोरक्षा का संकल्प लेना चाहिए। गोहत्या का कड़ा विरोध करना चाहिए। किसान गाय, बछड़ा, बैल आदि को बेचें नहीं। दूध न देने वाली गाय अथवा बूढ़ा बैल जितना घास (चारा) खाते हैं, उतना गोबर और गोमूत्र के द्वारा अपना खर्चा निकाल देते हैं। हर व्यक्ति को केवल गाय के ही दूध-घी का उपयोग कर गोसेवा में कम-से-कम इतना योगदान तो अवश्य देना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2015, पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 275
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मेरे गुरुदेव की कितनी नम्रता व सत्संग-निष्ठा !


 

(भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज महानिर्वाण दिवस)

आओ श्रोता तुम्हें सुनाऊँ महिमा लीलाशाह की।
सिंध देश के संत शिरोमणि बाबा बेपरवाह की।।…..

मेरे गुरुदेव (साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज) को 20 साल की उम्र में ईश्वर साक्षात्कार हो गया, 16 साल की उम्र तो अच्छी तरह से समाधि लग जाती थी। 12 साल की उम्र में खाली बारदान अनाज आदि से भर गये, इतना संकल्पबल ! ऐसे महापुरुष 84 साल की उम्र में भी बिना सत्संग के भोजन नहीं करते थे। एकांत में रहते थे नैनीताल के जंगल में तब भी, कोई सत्संग सुनने वाला नहीं है तो मेरे को और दूसरे दो को बुलाते। योगवासिष्ठ हो, उपनिषद् हो…. मैं पढ़ता और गुरु जी सुनते, फिर कृपा करके थोड़ी व्याख्या भी सुना देते। जैसे स्नान मनुष्य को स्वच्छ रखता है, ऐसे ही सत्संग हमारे मन को स्वच्छ रखने का एक अदभुत साधन है। कुछ लोग सत्संग पढ़ते हैं तो वह लिखकर दूसरे को सुना देते हैं। नहीं, नहीं, मेरे गुरु जी तो सत्संग सुनते-सुनते विश्राम पाते थे। मेरे गुरु जी जब 81 साल के हुए, मैंने अपनी आँखों से देखा कि हरिद्वार में एक जगह पर ‘पंचदशी’ का सत्संग चलता था, 20-25 श्रोता होते थे। गुरु जी अगर प्रवचन करते तो हजारों लोग उनके चरणों में आ जाते लेकिन गुरु जी जहाँ पंचदशी का सत्संग चलता था, वहाँ जाकर बैठ जाते थे। सत्संग करने वाले महामंडलेश्वर को जब पता चलता कि ये श्री लीलाशाह जी बापू हैं तो वे उठकर बुलातेः “आइये-आइये, गद्दी पर बैठिये।” अपनी गद्दी पर बिठा लेते थे।
गुरु जी बोलतेः “ठीक है, ठीक है।”
गुरु जी सामने बैठ जाते श्रोताओं के साथ। कितनी बहादुरी !
एक बार मेरे गुरुदेव घूमते-घामते रमण महर्षि तक पहुँच गये। उनसे बातचीत हुई। रमण महर्षि जी बोलेः “आपकी ऐसी ऊँची स्थिति ! फिर इधर-उधर सत्संग करने को इतना काहे को घूमते हो ? मैं तो इधर बैठा हूँ तो बैठा हूँ।”

मेरे गुरुदेव ने कहाः “सबके हृदय में वही है, फिर भी सभी दुःखी हैं। उनका दुःख देखकर मेरे को बैठने की इच्छा नहीं होती इसलिए मैं घूमता हूँ। इधर-उधर करके उनका दुःख हर के उनको आनंदित करता हूँ, उसका भी मेरे को आनंद है।”

रमण महर्षि जी की आँखें भर गयीं और “धन्य हो लीलाशाह जी ! आप धन्य हो !! इतना आनंद छोड़ के जीवों के दुःख से द्रवित होकर उनके मंगल के लिए घूमते हो !” ऐसा कहकर वे मेरे गुरुदेव लीलाशाह जी को गले लगे।

गुरुदेव का महाप्रयाण मेरी गोद में….
महाप्रयाण के समय मेरे गुरुदेव की कैसी लीला कि चौबीसों घंटे साथ रहने वाले सेवकों में से किसी को कुछ हुआ , किसी को शौच जाना हुआ तो किसी को तैयार होने के लिए नहाने को जाना पड़ा। मेरे गुरुदेव जब आखिरी श्वास लेने वाले थे तो इसी गोद में मेरे गुरु जी के महाप्रयाण का मंगल-कार्य, ज्ञानदाता का मस्तक इसी गोद में, निगाहें मेरी निगाह में तथा मेरी निगाहें उनके श्रीचरणों में और दृष्टि से जो कुछ बरसा-बरसाया, उसी का फल है कि अभी करोड़ों लोग लाभ ले रहे हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2015, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 275
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