Yearly Archives: 2016

योगीराज तैलंगस्वामी के वचनामृत


 

‘गुरु’ शब्द का अर्थ है – ‘ग’ शब्द से गतिदाता, ‘र’ शब्द से सिद्धिदाता और ‘उ’ शब्द से कर्त्ता, यानी जो गति-मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं, उन्हें गुरु कहा जाता है, इसीलिए ईश्वर और गुरु में प्रभेद नहीं है।

ऐसे गुरु को कभी मनुष्यवत् नहीं समझना चाहिए। अगर गुरु पास में हों तो किसी भी देवता की अर्चना नहीं करनी चाहिए। अगर कोई करता है तो वह विफल हो जाता है।
गुरु ही कर्त्ता, गुरु ही विधाता है। गुरु के संतुष्ट होने पर सभी देवता संतुष्ट हो जाते हैं। ‘ग’ वर्ण उच्चारण करने पर महापातक नष्ट हो जाते हैं, ‘उ’ वर्ण उच्चारण करने पर इस जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं और ‘रु’ वर्ण के उच्चारण से पुर्वजन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं।

गुरु का महत्त्व इसलिए है कि शिष्य को संसार-समुद्र से पार कराने की पूरी जिम्मेदारी उनकी है। इसके लिए भगवान के निकट वे उत्तरदायी होते हैं।

जो सर्वशास्त्रदर्शी, कार्यदक्ष, शास्त्रों के यथार्थ मर्म के ज्ञाता हों, सुभाषी हों, विकलांग न हों, जिनके दर्शन से लोक-कल्याण हो, जो जितेन्द्रिय हों, सत्यवादी, शीलवान, ब्रह्मवेत्ता, शान्त चित्त, मात-पितृ हित निरत, आश्रमी, देशवासी हों – ऐसे व्यक्ति को गुरु के रूप में वरण करना चाहिए।

सड़े-जले बीज से पौधे जन्म नहीं लेते, इसलिए बीज का चुनाव ठीक से करना चाहिए। सदगुरु सहज ही नहीं मिलते। दीक्षा लेना साधारण बात नहीं है। उपयुक्त गुरु सर्वदा सुलभ न होने के कारण ही मानव की यह दुर्दशा हुई है।

प्राचीन काल में उपयुक्त शिष्य काफी मिलते थे, इसलिए सदगुरुओं का अभाव नहीं होता था। भगवान के लिए अगर तुम्हारा हृदय व्याकुल होगा तब निश्चित है कि भगवान तुम्हारे सहायक बनकर सदगुरु से मुलाकात करा देंगे। सदगुरु राह चलते नहीं मिलते। जब तक मन में सदगुरु के लिए आशा बलवती न हो, तब तक सदगुरु नहीं मिलते और दिल बेचैन रहता है। सत्शिष्य बने बिना सदगुरु की महिमा पूरी तरह नहीं जान सकते।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2002, पृष्ठ संख्या 25 अंक 115
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Rishi Prasad 268 Apr 2015

अखंड सौभाग्य देने वाला वटसावित्री व्रत 19 जून 2016


वटसावित्री पर्व नारी-सशक्तिकरण का पर्व है, जो को अपने सामर्थ्य की याद दिलाता है। यह आत्मविश्वास व दृढ़ता को बनाये रखने की प्रेरणा देता है, साथ ही ऊँचा दार्शनिक सिद्धान्त प्रतिपादित करता है कि हमें अपने मूल आत्म-तत्त्व की ओर, आत्म-सामर्थ्य की ओर लौटना चाहिए।
वटवृक्ष की महत्ता
भारत के महान वैज्ञानिक श्री जगदीशचन्द्र बसु न क्रेस्कोग्राफ संयंत्र की खोज कर यह सिद्ध कर दिखाया कि वृक्षों में भी हमारी तरह चैतन्य सत्ता का वास होता है। इस खोज से भारतीय संस्कृति की वृक्षोपासना के आगे सारा विश्व नतमस्तक हो गया।
वटवृक्ष विशाल एवं अचल होता है। हमारे अनेक ऋषि-मुनियों ने इसकी छाया में बैठकर दीर्घकाल तक तपस्याएँ की हैं। यह मन में स्थिरता लाने में मदद करता है एवं संकल्प को अडिग बना देता है। इस व्रत की नींव रखने के पीछे ऋषियों का यह उद्देश्य प्रतीत होता है कि अचल सौभाग्य एवं पति की दीर्घायु चाहने वाली महिलाओं को वटवृक्ष की पूजा उपासना के द्वारा उसकी इसी विशेषता का लाभ मिले और पर्यावरण सुरक्षा भी हो जाय। हमारे शास्त्रों के अनुसार वटवृक्ष के दर्शन, स्पर्श, परिक्रमा तथा सेवा से पाप दूर होते हैं तथा दुःख, समस्याएँ एवं रोग नष्ट होते हैं। ‘भावप्रकाश निघंटु’ ग्रंथ में वटवृक्ष को शीतलता-प्रदायक, सभी रोगों को दूर करने वाला तथा विष-दोष निवारक बताया गया है।
महान पतिव्रता सावित्री के दृढ़ संकल्प व ज्ञानसम्पन्न प्रश्नोत्तर की वजह से यमराज ने विवश होकर वटवृक्ष के नीचे ही उनके पति सत्यवान को जीवनदान दिया था। इसीलिए इस दिन विवाहित महिलाएँ अपने सुहाग की रक्षा, पति की दीर्घायु और आत्मोन्नति हेतु वटवृक्ष की 108 परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत लपेट कर संकल्प करती हैं। साथ में अपने पुत्रों की दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य के लिए भी संकल्प किया जाता है। वटवृक्ष की व्याख्या इस प्रकार की गयी है।
वटानि वेष्टयति मूलेन वृक्षांतरमिति वटे।
‘जो वृक्ष स्वयं को अपनी ही जड़ों से घेर ले, उसे वट कहते हैं।’
वटवृक्ष हमें इस परम हितकारी चिंतनधारा की ओर ले जाता है कि किसी भी परिस्थिति में हमें अपने मूल की ओर लौटना चाहिए और अपना संकल्पबल, आत्म-सामर्थ्य जगाना चाहिए। इसी से हम मौलिक रह सकते हैं। मूलतः हम सभी एक ही परमात्मा के अभिन्न अंग हैं। हमें अपनी मूल प्रवृत्तियों को, दैवी गुणों को महत्त्व देना चाहिए। यही सुखी जीवन का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। वटसावित्री पर्व पर सावित्री की तरह स्वयं को दृढ़प्रतिज्ञ बनायें।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2015, पृष्ठ संख्या 21, अंक 268
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Rishi Prasad 270 Jun 2015

स्वास्थ्य के लिए परम हितकारी – पीपल


पीपल के सभी अंग उपयोगी व अनेक औषधीय गुणों से भरपूर हैं। जहाँ एक ओर यह वृक्ष आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व रखता है, वहीं दूसरी ओर आयुर्वेदिक और आर्थिक तौर पर भी महत्वपूर्ण है। पीपल में भगवद्भाव रखकर जल चढ़ाने तथा परिक्रमा करने से आध्यात्मिक लाभ के साथ स्वास्थ्य लाभ सहज में ही मिल जाता है। पीपल शीत, कफ-पित्तशामक, रक्तशुद्धिकर व घाव ठीक करने वाला है। यह मेध्य, हृदयपोषक व बल-वीर्यवर्धक है।

पीपल के औषधीय उपयोग
वातरक्त (गाउट) – प्रोटीन्स के अत्यधिक सेवन से शरीर में यूरिक ऐसिड की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे वातरक्त हो जाता है। इसमें शरीर के सभी जोड़ों में दर्द व सूजन हो जाती है। 20 ग्राम पीपल की जड़ की छाल 320 मि.ली. पानी में डालकर उबालें। चौथाई पानी शेष रह जाने पर उस काढ़े को गुनगुना होने दें। 1 चम्मच शहद के साथ पीने से गम्भीर वातरक्त भी ठीक हो जाता है।

खूनी बवासीर– पीपल के फूलों को सुखाकर चूर्ण बना लें। एक चम्मच चूर्ण का 10 मि.ली. आँवला रस व 10 मि.ली. शहद के साथ दिन में 2 बार सेवन करें।
रक्तपित्त- पीपल के फल का चूर्ण व मिश्री समभाग मिला के रख लें। 1-1 चम्मच चूर्ण दिन में 3 बार पानी के साथ लें।

घाव– पीपल के हाल ही में गिरे हुए सूखे पत्तों का चूर्ण लगाने से घाव जल्दी भर जाता है।

सिरदर्द व जुकाम– पीपल के चार कोमल पत्ते चबा-चबाकर उनका रस चूसें तथा बाद में पत्तों को थूक दें। दिन में 2-3 बार ऐसा करने से कफ-पित्तजन्य सिरदर्द ठीक हो जाता है। यह जुकाम में भी उपयोगी है।

धातु-दौर्बल्य व मासिक धर्म के विकार– छाया में सुखाये गये पीपल के फलों का चौथाई चम्मच चूर्ण 1 गिलास गुनगुने दूध में मिलाकर रोज पीने से धातु-दौर्बल्य दूर होता है। स्त्रियों का पुराना प्रदर-रोग और मासिक की अनियमितता दूर हो जाती है। इससे कब्ज में भी लाभ होता है।

कब्जनाशक प्रयोग– पीपल के सूखे फल, छोटी हरड़ व सौंफ समभाग मिला के पीस के रखें। 3 से 5 ग्राम चूर्ण रात को गुनगुने पानी से लेने से कब्ज दूर होता है।

पेट के रोग- 5-5 ग्राम पीपल के पके हुए सूखे फल, छोटी हरड़, सौंफ और 15 ग्राम मिश्री – सबको पीसकर चूर्ण बना लें। रात को सोते समय 3 ग्राम चूर्ण गुनगुने पानी से लें। इसमें जठराग्नि प्रदीप्त होती है, मल साफ आता है व पेट के कई रोग शांत होते हैं।
फोड़ा, बालतोड़- पीपल के दूध का फाहा फोड़े या बालतोड़ पर लगाने से वह कुछ ही दिनों में सूख जाता है।

हृदयरोग- 3 ग्राम पीपल के फल का चूर्ण दूध के साथ सेवन करने से कुछ ही दिनों में हृदयरोग में लाभ होता है।

हृदय व दमा रोगियों के लिए विशेष प्रयोग
पीपल के पत्तों में हृदय को बल और आरोग्य देने की अदभुत क्षमता है। पीपल के 15 हरे कोमल पत्ते, जो पूरी तरह विकसित हों, उनका ऊपरी व नीचे का भाग कुछ काट दें। पत्तों को धोकर एक गिलास पानी में धीमी आँच पर पकने दें। पानी आधा शेष रहने पर छान के पियें। इस पेय को हृदयाघात के बाद 15 दिन तक सुबह शाम लगातार लेने से हृदय पुनः स्वस्थ हो जाता है।

पीपल के सूखे पत्तों को जलाकर उनकी 5 ग्राम राख को सुबह शहद के साथ 40 दिन तक लेने से दमे में लाभ होता है। ऊपर बतायी गयी विधि से बनाया गया पेय दमा के रोगियों के लिए भी खूब लाभदायी है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2015, पृष्ठ संख्या 31,32 अंक 270
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