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(माघ मास व्रतः 23 जनवरी से 22 फरवरी 2016)


पापों, रोगों, संतापों का नाश और उत्तम मति प्रदान करने वाला व्रत

पूरा माघ मास ही पर्व मास माना जाता है। इस मास का ऐसा प्रभाव है कि धरती पर कहीं का भी साफ जल गंगाजल की नाईं पवित्र, हितकारी माना जाता है। पद्म पुराण (उत्तर खण्डः 221.80) में लिखा है कि

कृते तपः परं ज्ञानं त्रेताया यजनं यथा।

द्वापरे च कलौ दानं माघः सर्वयुगेषु च।।

‘सत्ययुग में तपस्या को, त्रेता में ज्ञान को, द्वापर में भगवान के पूजन को और कलियुग में दान को उत्तम माना गया है परंतु माघ का स्नान तो सभी युगों में श्रेष्ठ समझा गया है।’

भगवान राम के पूर्वज राजा दिलीप ने वसिष्ठ जी के चरणों में प्रार्थना कीः “प्रभु ! उत्तम व्रत, उत्तम जीवन और उत्तम सुख, भगवत्सुख का मार्ग बताने की कृपा करें।”

वसिष्ठ जी बोलेः “राजन् ! माघ मास में सूर्योदय से पहले जो स्नान करते हैं वे अपने पापों, रोगों और संतापों को मिटाने वाली पुण्याई प्राप्त कर लेते हैं। यज्ञ-याग, दान करके लोग जिस स्वर्ग का पाते हैं, वह माघ मास का स्नान करने वाले को ऐसे ही प्राप्त हो जाता है।”

अतः संकल्प करो कि “मैं पूरे माघ मास में भगवद् चिंतन करके प्रातः स्नान करूँगा।” चाहे रात को देर सवेर सोयें, संकल्प करें की मुझे सूर्योदय से पहले इतने बजे स्नान करना ही है।’ तो सुबह आँख खुल ही जायेगी। नियम निष्ठा रक्षा करती है। थोड़ी ठंड लगेगी लेकिन शरीर में ठंड झेलने की ताकत आयेगी तो शरीर गर्मी भी पचा लेगा। आदमी प्रतिकूलता से जितना भागता है, उतना कमजोर संकल्पवाला हो जाता है और प्रतिकूलता को दृढ़ता से जितना झेलता है, उतना वह दृढ़संकल्पी हो जाता है।

सूर्योदय के समय सूरज दिख रहा हो चाहे बाद में दिखे, तुम तो पूर्व की तरफ जल-राशि अर्पण करके उस गीली मिट्टी का तिलक का कर लो और लोटे में जो थोड़ा पानी बचा हो उसको देखते हुए ॐकार का जप करके थोड़ा सा जल पी लो। आपको भगवच्चरणामृत, ताजे भगवत्प्रसाद का एहसास होगा।

माघ स्नान से स्वर्ग की प्राप्ति

पद्म पुराण में कथा आती है कि सुब्रत नामक एक ब्राह्मण था। उसने नियम-अनियम की परवाह किये बिना जीवनभर धन कमाया। बुढ़ापा आया, अब देखा कि परलोक में यह धन साथ नहीं देगा। और तभी दैवयोग से एक रात उसका धन चोर चुरा ले गये। तो धन चोरी के दुःख से दुःखी हुआ और बुढ़ापे में अब मैं क्या करूँ ?…. ऐसा शोक कर रहा था, इतने में उसे आधा श्लोक याद आ गया कि ‘माघ मास में ठंडे पानी से स्नान करने से व्यक्ति की सद्गति होती है और उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है।’ तो उसने माघ स्नान शुरु किया। 9 दिन स्नान किया, 10वें दिन ठिठुरन से शरीर कृश हो गया और मर गया। उसने दूसरा कोई पुण्य नहीं किया था लेकिन माघ स्नान के पुण्य प्रभाव से वह स्वर्ग को गया।

माघ मास में विशेष करणीय

इस मास में पुण्यस्नान, दान, तप, होम और उपवास भयंकर पापों का नाश कर देते हैं और जीव को उत्तम गति प्रदान करते हैं। जिस वस्तु में आसक्ति है, उस वस्तु को बलपूर्वक त्याग दें तो अधर्म की जड़ें कटती हैं। जो माघ मास में इन छः प्रकार से तिलों का उपयोग करता है, वह इहलोक और परलोक में वांछित फल पाता हैः तिल का उबटन, तिलमिश्रित जल से स्नान, तिल से तर्पण या अर्घ्य, तिल का होम, तिल का दान और तिलयुक्त भोजन। किंतु ध्यान रखें, रात्रि को तिल व तिल के तेल से बनी वस्तुएँ खाना वर्जित है, हानिकारक है। माघ में मूली न खायें।

माघ मास में जप तो जरूर करना चाहिए। इस मास में एक समय भोजन करने से व्यक्ति दूसरे जन्म में धनवान कुल में जन्म लेगा। दूसरी बात, माघ मास में धीरे-धीरे गर्मी बढ़ती है तो एक समय भोजन करने वाला स्वस्थ रहेगा और उसका सत्त्व गुण बढ़ेगा। ज्यादा खायेगा तो आलस्य और तमोगुण बढ़ेगा। तो यह स्वास्थ्य के साथ-साथ पुण्यलाभ की व्यवस्था है अपने व्रत-पर्वों में।

पूरे माघ मास का फल

पूरा मास जल्दी स्नान कर सकें तो ठीक है नहीं तो एक सप्ताह तो अवश्य करें। त्रयोदशी से माघी पूर्णिमा तक अंतिम 3 दिन प्रातः स्नान करने से भी महीने भर के स्नान का प्रभाव, पुण्य प्राप्त होता है।

जो वृद्ध या बीमार हैं, जिन्हें सर्दी जुकाम आदि हैं वे सूर्यनाड़ी अर्थात् दायें नथुने से श्वास चलाकर स्नान करें तो सर्दी जुकाम से रक्षा हो जायेगी।

ऐसा तीर्थस्नान तो सभी कर सकते हैं

इस मास में तीर्थस्नान की महिमा है। बाहर के तीर्थ में स्नान न कर सको तो हृदय से ही मानसिक तीर्थों में जाकर स्नान कर लिया – ‘सत्य तीर्थ, क्षमा तीर्थ, मौन तीर्थ, ब्रह्मचर्य तीर्थ, अद्रोह (द्वेषरहितता) तीर्थ, इन्द्रियनिग्रह तीर्थ, ज्ञान तीर्थ, आत्मतीर्थ, ध्यान तीर्थ, सर्वभूतदया तीर्थ, आर्जव (सरलता) तीर्थ, दान तीर्थ, दम (मनोनिग्रह) तीर्थ, संतोष तीर्थ, नियम तीर्थ, मंत्रजप तीर्थ, प्रियभाषण तीर्थ, धैर्य तीर्थ, अहिंसा तीर्थ और शिव (कल्याण स्वरूप परमात्मा) स्मरण तीर्थ…. इन आध्यात्मिक तीर्थों में हम जा रहे हैं और फिर हम परमात्मा के नाम का जप करते हैं। मन की शुद्धि सब तीर्थों से उत्तम तीर्थ है।’ यह माघ स्नान माघ मास में बहुत लाभ देगा।

यदि कोई निष्काम भाव से केवल भगवत्प्रसन्नता, भगवत्प्राप्ति के लिए माघ-स्नान करता है तो उसको भगवत्प्राप्ति भी बहुत-बहुत आसानी से होती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2016, पृष्ठ संख्या 20,21 अंक 277

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ईश्वर तक पहुँचने की चाबीः भगवन्नाम


नाम में महान शक्ति है पर अर्थ का ज्ञान होने पर उसकी वास्तविकता समझ में आती है। जब द्वेषवश किसी को उल्लू, गधा, सुअर आदि बुरे नामों से पुकारा जाता है तो वह अपना संतुलन खो बैठता है। सभी अपना नाम पुकारे जाने पर प्रत्युत्तर देते हैं।

सिद्ध महापुरुषों की वाणियाँ बताती हैं कि भगवन्नाम में महान सामर्थ्य है। असंख्य लोगों ने जप की सहायता से आध्यात्मिक उन्नति की है। यह एक महत्त्वपूर्ण साधना-पद्धति है। भगवन्नाम जप करने वाले साधक में भगवन्नाम की शक्ति अवश्य प्रकट होती है। भगवन्नाम मन में उठ रहे अशुभ विचारों को निरस्त करता है। साधक के लिए नाम-जप के बिना पूर्ण पवित्र जीवन-यापन एक तरह से असम्भव है। अतः हमें निरंतर गुरुमंत्र का और जिन्हें दीक्षा लेने का सौभाग्य नहीं मिला उन्हें भगवन्नाम का जप करना चाहिए ताकि हमारे शरीर एवं मन पवित्र और आध्यात्मिक स्पंदनों से स्पंदित होते रहें। नाम महाराज हमारी बाधाओं को दूर करते हैं और हमारे आत्मा और परमात्मा का एकत्व-ज्ञान पाने में सहायता करते हैं।

जप या ध्यान का अभ्यास करते समय तन्द्रा (झोंके खाना) मत आने दो। यदि सुस्ती आती है तो उठकर कमरे में जप करते-करते टहल लो। जब मन चंचल और बहिर्मुख होता है, तब दीर्घ (लम्बा) या प्लुत (उससे अधिक लम्बा) भगवन्नाम उच्चारण करना चाहिए।

गुरुमंत्र के हर जप के साथ भावना करो कि ‘हमारे शरीर, मन और इन्द्रियों के दोष निकल रहे हैं, बुद्धि शुद्ध हो रही है।‘ गुरुमंत्र का जप मन को शांत करता है। जब मस्तिष्क अत्यन्त तनावपूर्ण अथवा अवसादपूर्ण स्थिति में आ जाय तो तत्काल प्रभुनाम गुनगुनाते हुए आनंदस्वरूप आत्मा का चिंतन शुरु कर दो। पवित्र भावना करो कि ‘इससे शरीर एवं मस्तिष्क में एक नयी लय के साथ संतुलन की स्थिति की शुरुआत हो रही है।’ आप अनुभव करेंगे कि कैसे चित्त की बहिर्मुख प्रवृत्ति शांत और अन्तर्मुख हो रही है।

गुरुमंत्र-जप की तुलना उस मजबूत रस्सी से की जा सकती है, जिसका एक सिरा नदी में है और दूसरा किनारा बड़े कुंदे से बँधा है। जिस प्रकार रस्सी को पकड़ के आगे बढ़ते हुए तुम अंत में कुंदे को छूते हो, उसी प्रकार भगवन्नाम की प्रत्येक आवृत्ति तुम्हें भगवान के समीप ले जाती है। जप सचेत होकर तथा ध्यानपूर्वक करना चाहिए और धीरे-धीरे इसे बढ़ाना चाहिए।

कई बार हम अपने समक्ष उपस्थित खतरे की कल्पना से बढ़ा-चढ़ा लेते हैं। परिस्थिति प्रायः इतनी बुरी नहीं होती जितनी हम मान लेते हैं। गुरु-ज्ञान, अद्वैत ज्ञान का सहारा हो तो हर परिस्थिति से अप्रभावित रह सकते हैं। परंतु यदि परिस्थितियों में सत्यबुद्धि नहीं हट रही हो तो सदा प्रार्थना, जप करें। यदि पराजित भी हो जायें तो भी हमारी पराजय सफलता की सीढ़ी बन जायेगी। भगवन्नाम मन को एक तरह से सम्बल प्रदान करता है।

गुरुमंत्र जप के साथ गुरुदेव का ध्यान करना चाहिए लेकिन जब ध्यान के योग्य मनःस्थिति न हो, तब एकाग्रता से एवं प्रीतिपूर्वक गुरुमंत्र का 10-20 माला जप करो। यदि वे यंत्रवत भी हो जायें तो भी लाभ होगा। तुम्हारी इच्छा हो या न हो, जप किये जाओ। ‘मन नहीं लगता’ ऐसा सोच के मन के द्वारा ठगे मत जाओ। गुरु-परमात्मा का चिंतन करते हुए उनसे प्राप्त भगवन्नाम-रसामृत का पान करते-करते रसमय होते जाओ। संकल्प-विकल्पों से कभी हार न मानो। गुरुमंत्र का जप इस तरह करते रहो कि तुम्हारे कान (सूक्ष्म रूप से) उसे सुनें और मन उसके अर्थ का चिंतन करे।

जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाने का सरल साधन है भगवान को अपना मान के भगवत्प्राप्ति हेतु प्रीतिपूर्वक भगवन्नाम का सुमिरन और जप। इस कलिकाल में सबके लिए सुलभ और अमोघ साधन है भगवन्नाम जप। इस असार संसार में केवल भगवन्नाम व गुरु ज्ञान व आत्म ज्ञान ही सार है।

गुरुमंत्र-जप, ध्यान, सत्संग-श्रवण व सदगुरु-आज्ञाओं का पालन करने से परमात्मा सत्य लगने लगेंगे। जैसे असार संसार की सत्यता समाप्त होती जायेगी, वैसे-वैसे सत्स्वरूप परमात्मा की ‘सत्’ता का ज्ञान होने लगेगा और भगवन्नाम, नामी (परमात्मा) और नाम जपने वाला – तीनों एक हो जायेंगे।

जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई। (श्रीरामचरि. अयो. कां. 126.2)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2016, पृष्ठ संख्या 19,21 अंक 277

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