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पूज्य बापू जी के प्रेरक जीवन-प्रसंग


ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों की थोड़ी समय की भी निष्ठापूर्वक की गयी सेवा गजब का रंग लाती है। उससे लौकिक-अलौकिक लाभ तो होते ही हैं, साथ ही आध्यात्मिक उन्नति भी होती है। प्रस्तुत है इसी के कुछ ज्वलंत उदाहरण पूज्य बापू जी के हृदयस्पर्शी जीवन प्रसंगों में-

डीसा (गुज.) के रहने वाले स्वर्गीय भाणजीभाई प्रजापति अपने जीवन का एक प्रसंग बताते हुए कहते थे कि “पूज्य बापू जी ने जिस आश्रम में रहकर 7 साल तक घोर तपस्या की थी, मैं उस आश्रम के सामने ही मूँगफली की लारी  लगाता था।

एक बार बापू जी वहाँ पर आये और बोलेः “मेरी यह चिट्ठी डाकघर के डिब्बे में डाल आओ।”

मैं खुशी से वह चिट्ठी डाल आया। सेवा का ऐसा  सुअवसर मुझे 2-3 बार मिला था। एक मेरी ग्राहकी बिल्कुल नहीं हुई थी पर जैसे ही मैं चिट्ठी डालकर आया तो मेरी इतनी ग्राहकी हुई कि पेटी पैसों से भर गयी पर मूँगफली खत्म ही नहीं हो रही थी। तभी से मैं आश्रम में बार-बार आने लगा और बापू जी के प्रति श्रद्धा और भी बढ़ गयी।

‘तेरी 7 पीढ़ियों की समस्याएँ हल हो जायेंगी’

एक दिन मैंने बापू जी से कहाः “महाराज जी ! मेरे को बड़े साँईं जी (भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाह जी बापू) के पास जाना है।”

बापू जी बोलेः “क्यों जाना है ?”

“जी, दर्शन करना है और कुछ घर की परेशानी बतानी है।”

“ठीक है, तू मेरे साथ चलना, जो भी समस्या होगी हल हो जायेगी। तू परेशानी तो बोल।”

मेरी सारी समस्याएँ बापू जी ने सुनीं और थोड़ी देर आँखें बंद कर लीं, फिर बोलेः “देख, मैं जैसा बोलूँगा तू वैसा करेगा तो तेरी इस जन्म की ही नहीं, 7 पीढ़ियों की समस्याएँ हल हो जायेंगी।”

मैंने कहाः “जी महाराज जी ! करूँगा।”

“तू मेरे गुरुदेव को सिर्फ इतना बोलना कि साँईं जी ! मुझे आत्मा के दर्शन कब होंगे ?”

दर्शन की कतार में मेरी बारी आयी तो मैंने पूज्य लीलाशाह जी बापू से वैसा ही कहा तो उनकी आँखें करुणा से भर आयीं और वे मुझे ऊपर से नीचे तक देखने लगे।

मैं बहुत चंचल था, फिर से बोलाः “साँईं जी ! कब होंगे दर्शन ?”

“होंगे पुट (बेटा) ! होंगे।”

साँईं जी ने मुझ पर शक्तिपात किया तब से मुझे अपने-आप इतनी हँसी आने लगी कि बंद ही नहीं होती थी। तब घरवाले मुझे पागल समझते थे। कोई भी बात बोलें तो मैं बहुत हँसता था। फिर कुछ दिनों में मेरी स्थिति सामान्य हो गयी और मेरी सारी समस्याएँ हल हो गयीं।

गुरुकृपा से हुए हनुमान जी के दर्शन

मैं बापू जी के पास आता-जाता रहता था तो एक दिन बापू जी बोलेः “अरे भाणा ! तू हनुमान जी के दर्शन करेगा ?”

मैंने भी बोल दियाः “हाँ महाराज ! करूँगा। आप करायेंगे ”

“हाँ-हाँ, तू मेरे साथ चल।”

मुझे एकांत में बनास नदी के किनारे ले गये और वहाँ रहने के लिए कहा। वहाँ एक पीपल के पेड़ के नीचे मैंने अपनी झोंपड़ी बनायी। बापू जी ने हनुमान जी का मंत्र दिया और बोलेः “तू अनुष्ठान चालू कर।”

भोजन में कभी दूध तो कभी मूँग लेता। सातवें दिन बापू जी बोलेः “देख, आज हनुमान जी आयेंगे, सावधान रहना, डरना नहीं और जप नहीं छोड़ना।”

रात भर  जपता रहा। सुबह 4 बजे मेरी कुटिया में प्रकाश-प्रकाश दिखा तो मैं डर गया।

बाद में बापू जी ने सब बताया तो बापू जी ने मेरे ऊपर गंगाजल छिड़का और बोलेः “अनुष्ठान एक दिन और बढ़ा, हनुमान जी को आना ही पड़ेगा। कैसे नहीं आयेंगे !”

दूसरे दिन सुबह 4 बजे हनुमान जी आये तो कुटिया में इतना प्रकाश फैल गया कि मुझसे देखा नहीं जा रहा था। उसी प्रकाश में पीपल के पेड़ से एक तेजस्वी कपि उतरते हुए दिखे और आवाज सुनाई दीः “बेटा ! यह मंत्र बंद कर दे, कलियुग चल रहा है, तू मेरा तेज सह नहीं पायेगा।”

मैंने हनुमान जी को प्रणाम किया और खुशी-खुशी बाहर आया कि ‘बापू जी को बताऊँ !”

आश्रम पहुँचा और मैंने जैसे ही आश्रम का दरवाजा खोला तो देखा कि चबूतरे पर बापू जी और हनुमान जी आमने-सामने बैठे हैं ! मुझे देख के हनुमान जी दीवार को चीरते हुए बाहर चले गये।”

चार अक्षरों में पूरा ज्ञान

साधनाकाल में पूज्य बापू जी जब डीसा में रहते थे, उस समय पहली बार जब पूज्य श्री मधुकरी (भिक्षा) करने गये थे तो एक सिंधी माई ने भिक्षा देने से मना कर दिया था। यह प्रसंग तो सभी ने सुना ही होगा। उस घर से चलकर बापू जी जब दूसरे घर गये तो वहाँ जिन्होंने भिक्षा दी थी उनका नाम है मिश्री बहन। वे उस दिन को याद करते हुए कहती हैं कि “उस दिन मैंने खीर पूड़ी बनायी थी। बापू जी जब हमारे घर आये तो मैंने उन्हें वही भिक्षा के रूप में अर्पण की थी।

बापू जी ने पूछाः “क्या नाम है बेटी ?”

मैने नाम बताया, फिर बोलेः “साँईं लीलाशाह जी बापू के आश्रम में सत्संग होता है, तू जाती है वहाँ ?”

“नहीं महाराज !”

“जाया कर।”

बापू जी ने सत्संग का समय भी बताया कि सुबह-सुबह होता है। उनकी पावन व हितकारी वाणी का ऐसा प्रभाव पड़ा कि दूसरे दिन तो जो काम मुझे 8 बजे करना था वह सारा 6 बजे ही निपटाकर मैं सत्संग शुरु होने के 15 मिनट पहले ही पहुँच गयी।

वहाँ जा के देखा तो क्या माहौल था ! सब लोग एकदम शांत बैठे थे। बापूजी ने शिवजी की तरह ध्यानस्थ थे और लोग उन्हें देख-देख के ध्यान कर रहे थे।

फिर सत्संग हुआ, किसी ने श्री योगवासिष्ठ महारामायण पढ़ा, बापू जी ने उस पर व्याख्या की। बापू जी वेदांत के ऊपर ही सत्संग करते थे। ऐसा रोज होता था। फिर तो मुझे भक्ति, साधना का ऐसा रंग लगा कि वर्णन करने को शब्द नहीं हैं। श्री योगवासिष्ठ के श्रवण का चस्का लगा कि अगर मैं योगवासिष्ठ नहीं सुनूँ तो नींद ही न आये। वर्षभर में कभी बापू जी एक महीने के लिए हिमालय चले जाते थे। जब भी बापू हिमालय जाते तो मुझे बड़ा रोना आता था कि ‘अब मुझे योगवासिष्ठ कौन सुनायेगा ? मैं तो एकदम अनपढ़ हूँ।’

एक बार बापू जी लौटे तो मैंने बोलाः “बापू जी ! आप तो चले जाते हैं और मुझे योगवासिष्ठ सुनने को नहीं मिलता और दूसरा कोई सुनाने वाला है नहीं। आप ऐसी कृपा कीजिये कि मुझे पढ़ना आ जाये।”

बापू जी प्रसन्न होकर बोलेः “क्या बात है ! तू पढ़ेगी ?”

“जी, बापू जी !”

पूज्य श्री बोलेः “स्लेट और चाक ले के आ।”

मैं लेकर गयी तो बापू जी ने 4 अक्षर लिख के दिये और बोलेः “जब तू ये बिना देखे लिखना सीख जायेगी तो तुझे पढ़ना आ जायेगा।

मैं अभ्यास करती रही। ब्रह्मवाक्य सत्य सिद्ध हुए। जब मैं उऩ अक्षरों को बिना देखे लिखना सीख गयी तो मुझे पढ़ना आ गया। आज मैं योगवासिष्ठ पढ़ती हूँ और हिन्दी व गुजराती – दोनों भाषाएँ पढ़ लेती हूँ।”

आश्चर्य की बात तो यह है कि जब उन बहन जी से पूछा गया कि “वे 4 अक्षर वर्णमाला के कौन-से अक्षर थे ?” तो उन्होंने बताया कि “वे अक्षर – अ आ इ ई…. (पूरी वर्णमाला) में से कुछ थे ही नहीं, वे अलग ही अक्षर थे। मैं जब से पढ़ना सीखी तब से वे अक्षर भूल गयी।”

जैसे शिवजी द्वारा प्राप्त 14 सूत्रों से पाणिनी मुनि ने संस्कृत का व्याकरण रचा था, ठीक वैसे ही बापू जी ने 4 अक्षरों से पूरी वर्णमाला सिखा दी और एक अनपढ़ को श्री योगवासिष्ठ महारामायण जैसे वेदांत के गूढ़ ग्रंथ का जानकार बना दिया।

बापू जी ने ऐसा ध्यान सिखाया…

मिश्री बहन आगे बताती है कि “मैं रोज बापू जी का सत्संग सुनती और बस, मुझे केवल ध्यान करने की इच्छा होती थी। एक दिन मैं ध्यान करने बैठी तो मेरे ध्यान में समस्त देवी-देवता तथा इन्द्रदेव आये बोलेः “चलिए हमारे स्वर्ग में, हम आपको लेने आये हैं।” मैंने कहाः “मुझे तो ब्रह्मज्ञानी सदगुरु पूज्य बापू जी मिल गये हैं, मेरे तो वे ही सब कुछ हैं। तुम्हारा स्वर्ग तुम्हें मुबारक हो, हमको नहीं चाहिए।” इतना सुनकर इन्द्रदेव आशीर्वाद देकर चले गये।”

वे बहन जी कहती हैं कि “पूज्य बापू जी ने मुझे आज्ञा दी थी कि “हर गुरुवार को यहाँ (डीसा में) बहनों-बहनों को बुलाकर सत्संग करना।” एक दिन मैं पूज्य श्री के दर्शन करने अहमदाबाद गयी तो मैंने बापू जी से प्रार्थना कीः “गुरुदेव ! आपकी आज्ञा है कि ‘तू हर गुरुवार को सत्संग करेगी।’ पर यहाँ कोई आता ही नहीं है।”

बापू जीः “अगर कोई नहीं आता है तो मेरी तस्वीर रख के सत्संग कर।”

उन्होंने गुरु आज्ञा मानी तो आज वे अनपढ़ बहन अन्य बहनों को योगवासिष्ठ की व्याख्या सुना रही हूँ। यह गरुकृपा का ही चमत्कार है। धन्य हैं गुरुदेव, जिन्होंने 4 अक्षरों में भाषा का पूरा ज्ञान कराया, साथ में परमात्माप्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर किया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2017, पृष्ठ संख्या 11-13 अंक 294

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भगवत्प्राप्ति के 14 विघ्न व 6 महत्त्वपूर्ण बातें – पूज्य बापू जी


भगवत्प्राप्ति में 14 प्रकार के विघ्न आते हैं-

स्वास्थ्य के प्रति लापरवाहीः यह बड़े-में-बड़ा विघ्न है। यदि मनुष्य अस्वस्थ है तो ध्यान भजन नहीं कर पाता। अतः यह जरूरी है कि शरीर स्वस्थ रहे लेकिन शरीर के स्वास्थ्य की चिंता व चिंतन न रहे यदि किसी कारण से स्वास्थ्य लाभ नहीं रहता तब भी अपने को भगवान में व भगवान को अपने में मानकर देह की ममता और सत्यता हिम्मत से हटाओ।

खानपान में अनियमितताः देर से खाना खाने से भी अस्वस्थता घेर लेगी और ध्यान भजन में अरुचि हो जायेगी।

साधन आदि में संदेहः यह संदेह कि ‘हम साधन करते हैं, ठीक है कि नहीं ? भगवान मिलेंगे कि नहीं ?’ अरे, अंतर्यामी भगवान जानते हैं कि आप भगवान के लिए साधन करते हैं, फिर क्यों संदेह करना ?

उलटा नाम जपत जगु जाना।

बालमीकि भय ब्रह्म समाना।। (श्री राम चरित. अयो. कां. 193.4)

सदगुरु का संग या सत्संग न मिलनाः जिसने सत्संग और सेवा का लाभ नहीं लिया, सदगुरु का महत्त्व नहीं समझा, वह सचमुच अभागा है। आत्मवेत्ताओं का सत्संग तो मनुष्य के उद्धार का सेतु है। सत्संग माने सत्यस्वरूप परमात्मा में विश्रांति। जिसके जीवन में सत्संग नहीं होगा वह कुसंग तो जरूर करेगा और एक बार कुसंग मिल गया तो समझ लो तबाही-ही-तबाही ! लेकिन अगर सत्संग मिल गया तो आपकी 21-21 पीढ़ियाँ निहाल हो जायेंगी। हजारों यज्ञों, तपों, दानों से भी आधी घड़ी का सत्संग श्रेष्ठ माना गया है, सदगुरु का सान्निध्य सर्वोपरि माना गया है क्योंकि सदगुरु का सत्संग-सान्निध्य जीव को जीवत्व से शिवत्व में आरूढ़ करता है। इतना ही नहीं, सत्संग से आपके जीवन को सही दिशा मिलती है, मन में शांति और बुद्धि में बुद्धिदाता का ज्ञान छलकता है।

नियमनिष्ठा न होनाः इससे भी साधना में बरकत नहीं आती। जिसके जीवन में कोई दृढ़ नियम नहीं है उसका मन उसे धोखा दे देता है। नियमनिष्ठा आदमी को बहुत ऊँचा उठाती है।

प्रसिद्धि की चाहः थोड़ी बहुत साधना करते हैं तो पुण्याई से प्रसिद्धि आदि होने लगती है। यदि व्यक्ति असावधान रहता है तो प्रसिद्धि के लिए कुछ-का-कुछ करने लग जाता है, फिर साधन नियम छूट जाता है।

कुतर्कः कुतर्क मतलब ‘भगवान हैं कि नहीं ? यह मंत्र सच्चा है कि नहीं ?’ अथवा विधर्मियों या ईश्वर से दूर ले जाने वाले व्यक्तियों के प्रभाव में आकर फिसल जाना।

प्राणायाम व जप का नियम छोड़नाः जो 10 प्राणायाम और 10 माला का छोटा सा नियम दीक्षा के समय बताते हैं, उसको छोड़ देना भी भगवत्प्राप्ति में बड़ा विघ्न है।

बाहरी सुख में ही संतुष्ट होनाः अल्प (सीमित) में ही संतोष हो जाये…. ‘चलो, घर है, नौकरी है… बस खुश हैं।’ नहीं-नहीं, बाहर के थोड़े से सुखों में आप संतुष्ट न हों, आपको तो परमात्मा का परम सुख पाना है। थोड़े से ज्ञान में आप रुको नहीं, आपको परमात्मा का ज्ञान पाना है।

भगवान को छोड़कर संसार की तुच्छ चीजों की कामना करनाः सांसारिक तुच्छ कामनाएँ न बढ़ायें। भगवान का भजन भी निष्काम भाव से करें। ‘यह मिल जाय….. वह मिल जाय…..’ ऐसा सोचकर भजन न करें बल्कि भगवान की प्रीति के लिए भगवान का भजन करें।

ब्रह्मचर्य का अभावः कामविकार में अपनी शक्ति का नाश हो जाता है तो फिर ध्यान भजन में बरकत नहीं आती है। तो ‘दिव्य प्रेरणा प्रकाश’ पुस्तक का अभ्यास करना और संयम रखना।

कुसंगः कुसंग में आने से भी अपना साधन-भक्ति का रस बिखर जाता है। जैसे तैसे व्यक्तियों के हाथों का बना खाने, जैसे-तैसे व्यक्तियों के सम्पर्क में आने और उनसे हाथ मिलाने से भी अपनी भक्ति क्षीण हो जाती है। उससे बचना चाहिए।

दोष दर्शनः दूसरों में दोष-दर्शन करने से वे दोष अपने में पुष्ट हो जाते हैं। हमारे मन में थोड़े दोष होते हैं तभी दूसरों में दोष दिखते हैं। इसलिए आप किसी के दोष देखकर अपने मन को दोषों का घर न बनाइये, उसकी गहराई में छुपे हुए अंतर्यामी परमात्मा को देख के अपने दिल में भगवद्भाव जगाइये।

साम्प्रदायिकताः ‘मैं फलाने धर्म का हूँ, फलाने मजहब का हूँ, ऐसा हूँ….।’ नहीं-नहीं, हम जो भी हैं, सब उस एक परमेश्वर के हैं।

इन 14 विघ्नों से बचने वाला व्यक्ति जल्दी से परमात्मा को पा लेता है।

भगवत्प्राप्ति की ले जाने वालीं 6 महत्त्वपूर्ण बातें

  1. जो साधना करें उससे ऊबे नहीं।

जन्म कोटि लगि रगर हमारी।

            बरऊँ संभु न त रहउँ कुआरी।। (श्रीरामचरित. बा. कां. 80.3)

‘पायेंगे तो परमात्मा का आनंद पायेंगे, परमात्मा का सुख, परमात्मा की सत्ता पायेंगे, बाहर की नश्वर सत्ता, नश्वर सुख पाकर रुक नहीं जायेंगे !’ ऐसा दृढ़ विचार करने वाला जल्दी ईश्वर-सुख को पाता है।

  1. अपना नियम और साधना निरंतर करना।
  2. सत्कारपूर्वक (आदरपूर्वक) और श्रद्धापूर्वक साधना करना।
  3. सभी से सज्जनता का व्यवहार करना।
  4. पाप करने से बचना।
  5. प्रभु में विश्वास और प्रीति करने वाले को जल्दी से जल्दी भगवत्प्राप्ति होती है।

स्रोतः ऋषि प्रसादः जून 2017, पृष्ठ संख्या 14,15 अंक 294

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मुंज की गुरुभक्ति


पूज्यपाद संत श्री आशाराम जी बापू

चाहे जीवन में कितनी भी विघ्न बाधाएँ आयें और चाहे कितनी भी प्रलोभन आयें किन्तु उनसे प्रभावित न होकर भी जो शिष्य गुरुसेवा में जुटा रहता है, वह गुरु का कृपापात्र बन पाता है। अनेक विषम कसौटियों में भी जिसकी गुरुभक्ति विचलित नहीं होती उसका ही जीवन धन्य है।

गुरु गोविन्दसिंह के पास मुंज नामक एक जमींदार आया और बोलाः “कृपा करके मुझे शिष्य बना लीजिए ?”

गुरु गोविन्दसिंहः “तुम किसको मानते हो ?”

मुंजः “अमुक कुलदेवी को। हमारे घर में उनका मंदिर भी है।”

गुरु गोविन्द सिंहः “जाओ, उस कुलदेवी को प्रणाम करके छुट्टी दे दो। घर का मंदिर उखाड़ फेंको।”

मुंजः “जी, जो आज्ञा।”

मंदिर तोड़ देना कोई मजाक की बात नहीं है। किन्तु जमींदार की श्रद्धा थी। ʹगुरु की कृपा से कर रहा हूँ… कोई बात नहींʹ – यह भाव था अतः उसने मंदिर तुड़वा दिया। मंदिर तुड़वाने से समाज के लोगों ने उसका बहिष्कार कर दिया और उसकी खूब निंदा करने लगे।

इधर जमींदार पहुँच गया गुरु गोविन्दसिंह के चरणों में। जमींदार की योग्यता को देखकर गुरु गोविन्दसिंह ने उसे दीक्षा दे दी एवं साधना की विधि भी बतला दी।

अब वह जमींदार इधर-उधर के रीति-रिवाजों में व्यर्थ समय नष्ट न करते हुए गुरुमंत्र का जप करने लगा, ध्यान करने लगा। उसका पूरा रहन-सहन बदल गया। खेती-बाड़ी में ध्यान कम देने लगा। समाज के लोगों द्वारा अब ज्यादा विरोध होने लगा और सभी लेनदारों ने उससे एक साथ पैसे माँगे। जमींदार मुंज ने अपनी जमीन गिरवी रखकर सबके पैसे चुका दिये और स्वयं किसी के खेत में मजदूरी करने लगा।

उस समय जो जमीन गिरवी रख देता था उस किसान का ऊपर उठना लगभग असंभव का था क्योंकि ब्याज की दर बहुत ज्यादा थी। एक समय का जमींदार मुंज आज स्वयं एक मजदूर के रूप में काम करने लगा फिर भी गुरु गोविन्दसिंह के श्रीचरणों में उसकी प्रीति कम न हुई।

गुरु गोविन्दसिंह ने जाँच करवाई तो पता चला कि पूरे समाज में वह अलग हो गया है, समाज ने उसका बहिष्कार कर दिया है फिर भी उसकी श्रद्धा नहीं टूटी है। यह जानकर वे बहुत प्रसन्न हुए। समाज से बहिष्कृत मुंज ने गुरु के हृदय में स्थान बना लिया।

कुछ समय पश्चात गुरु ने पुनः जाँच करवाई तो पता चला कि उसकी आय ऐसी है कि कमाये तो खाये और न कमाये तो भूखा रहना पड़े।

गुरु ने मुंज को चिट्ठी लिखकर भेजी कि इतने पैसे चाहिए।

गुरु को कहाँ पैसे चाहिए ? किन्तु शिष्य की श्रद्धा को परखने एवं उसकी योग्यता को बढ़ाने के लिए ही गुरु कसौटी करते हैं। सच ही तो है कि कंचन को भी कसौटी पर खरा उतरने के लिए कई बार अग्नि में तपना पड़ता है।

गुरु की चिट्ठी पाकर मुंज ने पत्नी से कहाः “पैसे चाहिए।”

पत्नी बोलीः “नाथ ! मेरे सुहाग की चूड़िया हैं और जेवर हैं। उन्हें बेच दीजिये और गुरुदेव को पैसे भेज दीजिये।”

मुंज ने सब बेच डाला फिर भी दो-चार आने कम पड़े। अब क्या करें ”

पत्नी ने कहाः “मैं बाल काट देती हूँ उसे बेचकर दो-चार आने की कमी पूरी कर लीजिये।”

सुहाग की चूड़ियाँ तो बेच दीं किन्तु अब अपने बाल बेचने तक को तैयार हो गई ! कैसी है भारत की नारी ! पति की श्रद्धा तो है गुरु में, किन्तु पत्नी भी कुछ कम नहीं। अपने स्वामी के प्रत्येक कार्य में सहयोग देने के लिए अपने तन की भी परवाह कहाँ ? धन्य है आर्यनारी !

पत्नी ने मुंडन करवा दिया और जमींदार ने उसके बाल बेचकर पूरे पैसे गुरु के पास भिजवा दीजिए। गुरुदेव ने कुछ समय के बाद दूसरी चिट्ठी लिखीः “हजार रूपये चाहिए।”

उस जमाने के हजार रुपये आज के एक लाख से कम नहीं हो सकते। अब हजार रूपये कहाँ से लाना ? घर में तो फूटी कौड़ी भी न थी।

उस समय जातिवाद का बोलबाला था। छोटी जाति के लोग स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकते थे कि इनके बेटे से हमारी बेटी की शादी होगी। मुंज ने प्रस्ताव रखाः “यदि आप लोग सोचते हैं कि हमारा खानदान ऊँचा है और आप छोटे हैं फिर भी आप यदि चाहें तो मैं अपने बेटे की सगाई आपकी बेटी से कर सकता हूँ। मुझे दहेज में केवल एक हजार रूपये चाहिए और कुछ भी नहीं।”

मुंज ने हजार रूपये में बेटे तक को बेच दिया। एक छोटे खानदान की लड़की से बेटे की शादी करने में छोटी जाति का, छोटे विचार के लोगों का, किसी का भी ख्याल नहीं किया। धन्य है उसकी गुरु निष्ठा !

गुरु ने देखा कि अभी भी इसकी श्रद्धा नहीं टूटी। गुरु ने संदेश भेजाः “इधर आकर आश्रम का रसोई घर संभालो। रसोईघर में काम करो एवं लोगों को भोजन बनाकर खिलाओ।”

मुंज गुरु आज्ञा शिरोधार्य करके रसोईघर में काम करने लगा। कुछ समय बाद गुरु ने पूछाः “रसोईघर तो संभालते हो किन्तु तुम खाना कहाँ खाते हो ?”

मुंजः “गुरुदेव ! भण्डारे में सबको जीमकर फिर मैं भोजन पा लेता हूँ।”

गुरु क्रोधित हो गयेः “तू सेवा करने आया है या गुरु का अन्न हड़प करने के लिए आया है ? इधर रसोई बनाकर सबको खिला दो। फिर अपनी लकड़ी काट ले। लकड़ी बेचकर घर में भोजन करके शाम को आकर फिर से यहाँ रसोईघर का काम कर।”

मुंजः “जो आज्ञा, गुरुदेव !”

अब मुंज सुबह चार बजे उठकर गुरु-आश्रम के रसोईघर में काम करता। दोपहर 11 बजे तक भोजन बनाकर सबको खिलाता और फिर लकड़ियाँ काटने चला जाता। लकड़ियाँ बेचकर सीधा-सामान खरीदकर शाम को पुनः आ जाता आश्रम के रसोई घर में। काम बहुत और खाना रूखा-सूखा। ऐसा करते-करते उसका शरीर बहुत दुर्बल हो गया।

एक दिन लकड़ी काटकर उसका गट्ठा बनाकर मुंज जंगल से लौट रहा था। दुर्बलता के कारण चक्कर आ गये और एक कुएँ में लकड़ी के भारे सहित गिर पड़ा। जंगलों में पनघट बिना के कुएँ होते थे।

गुरु ने देखा कि संध्या हो गयी। अभी तक मुंज खाना बनाने क्यों नहीं आया ? घर पर एक आदमी को भेजा तो समाचार मिला कि मुंज दोपहर से लकड़ी काटने गया है। अभी तक नहीं लौटा।

जंगल में मुंज की खोज करवाने के लिए आदमियों को भेजा। उन्होंने आवाज लगाईः “मुंज ! कहाँ है….? मुंज ! कहा है……?”

कुएँ से आवाज आयीः “मैं यहाँ हूँ….”

गुरु को खबर मिली। गुरुदेव स्वयं कुछ आदमियों को लेकर एवं सीढ़ी, रस्सी आदि लेकर चल पड़े। स्वयं दूर खड़े रहकर आदमियों से मुंज को बाहर निकलवाया।

किसी ने कहाः देख, तेरी क्या हालत हो गयी ? तेरा मंदिर टूट गया। तेरा खानदान नष्ट हो गया। समाज से तू बहिष्कृत हो गया। तेरा घर बिक गया। तू मजदूरी करता था वह भी गुरु ने छुड़वा दी। अपना काम करवा रहे हैं और भोजन भी नहीं मिलता। तू ऐसे चक्कर खाकर मर जाता। शरीर होगा तभी तो साधना करेगा। अब तो ऐसे गुरु का पीछा छोड़ !”

गुरु ने उस आदमी को स्वयं ही भेजा था मुंज की श्रद्धा तुड़वाने के लिए किन्तु वाह रे मुंज !

मुंज कहता हैः “आप कृपा करके मुझे पुनः कुएँ में डाल दीजिए। भूखे रहकर मरना अच्छा है। कुएँ में भूखा मरूँगा किन्तु गुरु का होकर मरूँगा।”

गुरु ने यह सुना तो उनका हृदय भर आया। गुरुदेव बोलेः “मुंज गुरु की आत्मा है। मुंज मेरा पक्का शिष्य है। मुंज मुझरूप हो गया। आज मेरा हृदय यह मुंज ही है। अब से तुम लोगों को मुंज से शिक्षा दीक्षा लेनी होगी।”

गुरु ने मुंज को सदगुरु बना दिया। उसे सत्य का बोध करा दिया।

मुंज की दृढ़ गुरुभक्ति ने उसे गुरुपद पर ही प्रतिष्ठित करवा दिया। कैसी विषम परिस्थितियाँ ! फिर भी मुंज हारा नहीं। कितने प्रयास किये गये फिर भी मुंज हारा नहीं। कितने प्रयास किये गये श्रद्धा हिलाने के लिए किन्तु मुंज की श्रद्धा डिगी नहीं। तभी तो उसके लिए गुरु के हृदय से भी निकल पड़ाः “यह तो मेरा हृदय है।”

धन्य है मुंज की गुरुभक्ति ! धन्य है उसकी निष्ठा और धन्य है उसका गुरुप्रेम !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1997, पृष्ठ संख्या 17,18,19 अंक 53

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