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अपने जन्म और कर्म को दिव्य कैसे बनाएँ?


नारायण… नारायण…. नारायण… नारायण…

जन्मदिवस बधाई हो..

पृथ्वी सुखदायी हो, जल सुखदायी हो

तेज सुखदायी हो, वायु सुखदायी हो

जन्मदिवस बधाई हो..

मन सुखदायी हो, मति सुखदायी हो

गति सुखदायी हो, स्नेही सुखदायी हो

जन्मदिवस बधाई हो..

            इस प्रकार जन्मदिवस जो लोग मनाते हैं, मनवाते हैं, बहुत अच्छा है, ठीक है लेकिन उससे थोड़ा और भी आगे जाने की नितांत आवश्यकता है ।

            कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु…   ऊँच और नीच योनियों में जन्म होने का कारण है गुणों का संग। ध्यान से सुनना। पौने दो करोड़ लोग का रोज धरती पर जन्म होता है। जन्मोत्सव मनाना चाहिए लेकिन विवेकपूर्ण मनाने से बहुत फायदा होता है और विवेक में अगर वैराग्य मिला दिया जाय तो और विशेष फायदा होता है। विवेक वैराग्य के साथ अगर भगवान के जन्म-कर्म को जानने वाली गति-मति हो जाय तो परम कल्याण समझो ।

            कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु…  ऊँच और नीच योनियों में जन्म लेने का कारण है गुणों का संग। हम जीवन में कई बार जन्मते रहते हैं। शिशु जन्मा और शिशु की मौत हुई तो बालकपना आया । बालक का जन्‍म मरा तो किशोर बना, किशोर मरा तो युवक का जन्म हुआ, युवक मरा तो वृद्ध का जन्म हुआ। मैं ‘सुखी’ हूँ तो आपका सुखमय जन्म हुआ। मैं ‘दुःखी’ हूँ, उस समय आपका दु:खमय जन्म हुआ। मैं ‘बीमार’ हूँ तो हमने अपनी बीमारी के साथ जन्म मान लिया। मैं ‘स्वस्थ’ हूँ तो स्वास्थ्य के साथ जन्म लिया। इन गुणों के साथ संग करने से सत-असत योनियों में जीव भटकता है। स्थूल शरीर को पता नहीं कि मेरा जन्म होता है और आत्मा का जन्म होता नहीं, बीच में है सूक्ष्म शरीर और सूक्ष्म शरीर जिस समय जिस भाव में होता है उसी समय उस भाव का उसका जन्म माना जाता है । मैं ‘पापी’ हूँ तो अभी पापमय जन्म है, मैं ‘पुण्यात्मा’ हूँ तो पुण्यमय जन्म है। मैं बीच में हूँ  तो बीच का जन्म है और मेरे को पता ही नहीं कि क्या है सब? कुछ समझ में नहीं आता तो अज्ञानता का जन्म है । श्रीकृष्ण सारे जन्मों से हटाकर हमको दिव्य जन्म की ओर ले जाना चाहते हैं।

            गीता के चौथे अध्याय का नौवां श्लोक है: 

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ (गीता 4.9)

            “अर्जुन,  जो मेरे जन्म-कर्म को दिव्य और अलौकिक, ‘तत्व’ से जानता है वह शरीर त्याग कर फिर जन्मों को प्राप्त नहीं होता, मुझे ही प्राप्त हो जाता है।

भगवान में अगर जन्म और कर्म मानें तो भगवान का भगवानपना सिद्ध नहीं होता। अगर भगवान में जन्म और कर्म नहीं मानते हैं तो भगवान में क्रिया करना, आना-जाना, उपदेश देना, युद्ध करना, संधिदूत बनना अथवा हाय सीते! हाय लक्ष्मण! करना, यह संभव नहीं है। भगवान में जन्म-कर्म नहीं मानते तो क्रिया और दर्शन जो हो रहा है वह संभव नहीं है। अगर मानते हैं तो भगवान का भगवानपना सिद्ध नहीं होगा। भगवान को भी जन्म लेना पड़े और कर्म करना पड़े तो भगवान किस बात के? तो वेदांत सिद्धांत के अनुसार इसको बोलते हैं ‘विलक्षण लक्षण’।  इसमें भगवान में जो जीव के लक्षण से भी मेल खाए और ईश्वर के लक्षण से भी मेल खायें और फिर भी दोनों में दिखे उसको बोलते हैं ‘विलक्षण’, अनिर्वचनीय ।

भगवान का जन्म और कर्म दिव्य कैसे हैं? बोले : अनिर्वचनीय  ‘दिव्य’ है । न ईश्वर में जन्म-कर्म है न जीवत्व के बंधन और वासना है, इसलिए भगवान के जन्म और कर्म दिव्य माने जाते हैं। भगवान के जन्म और कर्म दिव्य मानने से, जानने से आपको भी लगेगा कि जो कर्म होते हैं तो पंचभौतिक शरीर में होते हैं, मन की मान्यता से होते हैं। स्वरूप में उसको जानने वाला जन्म से और कर्म से ‘ज्ञान’ विलक्षण है। ‘मैं’ वह हूँ ज्ञानस्वरूप। मन में ‘दु:खीपने’ का भाव आया, उसी समय ‘मैं दुःखी’ का जन्म हुआ। ‘सुखीपने’ का भाव हुआ तो सुख का जन्म हुआ। मैं ‘बालक हूँ’ तो ‘बालकपने’ का जन्म हुआ, ‘मैं वृद्ध हूँ’ तो वृद्धत्‍व का जन्म हुआ लेकिन मैं इन सबको जानने वाला हूँ।

संगो अयं पूरुषः केवल निर्गुणस्य… मैं इन सब परिस्थितियों से असंग हूँ, ज्ञानस्वरूप हूँ, प्रकाशमात्र हूँ, चैतन्यस्वरूप हूँ, आनंदस्वरूप हूँ। इस प्रकार भगवान अपने स्वत: स्फुरित स्वभाव को जानते हैं, स्वत: सिद्ध स्वभाव को जानते हैं। ऐसे आप भी अपने स्वत: सिद्ध स्वभाव को जान लें तो आपका जन्म और कर्म दिव्य हो जाएगा। शरीर को ‘मैं’ मानना और शरीर की अवस्था को ‘मेरी’ मानना यह जन्म है। हाथ, पैर, इंद्रियों से कर्म होता है और उसमें कर्तृत्व मानना तो कर्म है लेकिन कर रहे हैं हाथ-पैर और ‘मैं’ उनको सत्ता देने वाला चैतन्य हूँ, इस प्रकार जानने वाले के जन्म और कर्म दिव्य हो जाते हैं। वास्तविक में उत्तम साधक तो जानता है, हाथ-पैर काम करते हैं, आँख देखती है, कान सुनता है, बुद्धि निर्णय करती है। इन सब में बदलाहट होती है, देश में बदलाहट होती है। अभी हम यहां बैठे हैं, थोड़ी देर के बाद और जगह बैठे होंगे। अभी हम 12:51 को यह बोल रहे हैं तो 12:50 भूतकाल हो गया और 12:55 भविष्य हो गया।  …तो काल को भी हमारा ज्ञानस्वभाव देखता है। हम देश से भी परे हैं, काल से भी परे हैं। यह वस्तुऍं आती है, जाती हैं, इन सब को जानने वाले ज्ञानस्वरूप हम स्वत: सिद्ध हैं। इनके आने-जाने को भी हम देखते हैं, देश को भी देखते हैं, काल को भी देखते हैं, वस्तु को भी देखते हैं। वह देखने वाला जो अपने आप में स्मृति आ जाए, अपने आप में जाग जाए तो उसका जन्म-कर्म दिव्य हो जाएगा।

जिसने भगवान के जन्म और कर्म को दिव्य नहीं माना, नहीं जाना तो अपने जन्म और कर्म को दिव्य कैसे जानेगा? कैसे मानेगा? कोई लोग बोलते हैं ‘मेरा जन्म होता है’, ‘हम मर जायेंगे’, ‘सुखी है-दुखी है’, तो समझ लो निगुरा है निगुरा, उसको गुरु के ज्ञान का, श्रीकृष्ण के ज्ञान का पता ही नहीं। संगात… यह संगात जो है,  गुणों का संगात, सात्विक-राजस-तामस, सात्विक-राजसमिश्रित, राजस तामस मिश्रित, सात्विक-तामसमिश्रित, इनसे जो भी विचित्र-विचित्र कर्म बनते हैं, विचित्र-विचित्र भाव बनते हैं, यह सब बदलता है फिर भी जो नहीं बदलता वह दिव्य स्वरूप का अधिष्ठान है, बदलाहट को जानने वाला है। जैसे तरंग हुए, बुलबुले हुए, झाग हुए, भँवर हुए लेकिन पानी ज्यों का त्यों। ऐसे ही मन में स्फुरणा हुआ, बुद्धि में निर्णय हुए, शरीर में बदलाहट हुई, सुखाकार-दुखाकर वृत्तियाँ हुई लेकिन वो सब वृत्तियाँ जिस परमात्मा सत्ता से जानी जाती है, वह मैं ‘आत्मा’ हूँ, ऐसा जो जान लेता है वह मरने के बाद नीचयोनि या उच्चयोनि में भटकता नहीं है। भगवान के स्वत:स्वभाव में, सिद्धस्वभाव में स्थित हो जाता है।

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥

           अर्जुन जो मेरे जन्म-कर्म को दिव्य और अलौकिक जानता है… । लौकि‍क कर्म वह होते हैं जिसमें फल की वासना होती है, कर्तृत्व का भाव हो और देह में अहं हो तो लौकिक है लेकिन ज्ञान में ‘मैं’ है, कर्तृत्‍व का भान नहीं है, फल आकांक्षा नहीं है… उसके जन्म और कर्म दिव्य हो जाते हैं। महापुरुषों का जन्मोत्सव मनाने से महापुरुषों को तो कोई फायदा-नुकसान का सवाल नहीं है लेकिन हम लोगों को फायदा होता है कि उस निमित्त हम भी अपने जन्म को, कर्म को दिव्य बनाएँ, कर्म बंधन से छूट जाए।

अष्टावक्र मुनि ने कहा- कर्तृत्वं-भोक्तृत्वं जब तक रहेगा तब तक जीव जन्म-मरण में भटकेगा। अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा… अपने आत्मा को अकर्ता-अभोक्ता जब मानता है उसी समय वो कर्मबंधन से छूट जाता है । वास्तविक में शुभ कर्म तो करें लेकिन शुभ कर्म का कर्ता अपने को न मानें, प्रकृति ने किया और परमात्मा की सत्ता से हुआ। अशुभ कर्म से बचें और कभी गलती से हो गए तो अशुभ कर्म के कर्तापन में न उलझें और फिर-फिर से न करें। हृदयपूर्वक उसका त्याग कर दें, प्रायश्चित हो गया। शुभ-अशुभ में अपने को न उलझाऍं।  सुख और दुख में अपने को न उलझाएँ। पुण्य और पाप में अपने को न उलझाएँ। अपने ज्ञान-स्वभाव में जग जाए तो उसका जन्म-कर्म दिव्य हो जाता है।

‘बाबा हम तो संसारी हैं.. हम तो ऐसे हैं.. हम तो वैसे हैं’।

‘अरे संसार मैं आये हैं तो संसारी है । संसारी मानकर सरकनेवाला अपने को मत जानो, कई ऐसे संसार में रहनेवाले लोगों ने अपने जन्म-कर्म को दिव्य बना दिया। ठाकुर मेघसिंह बड़े जागीरदार थे। जागीरदार तो थे, साथ-साथ में बड़े सत्संगी भी थे और सत्संग के प्रभाव से वे जानते थे कि जो कुछ होता है, मंगलमय विधान में होता है, हमारे विकास के लिए होता है, हमें जन्म और कर्म की कर्तृत्‍व भाव से बचना है, मंगलमय विधान-ईश्वर के विधान में विश्वास रखना है।

अब सब दिन, सब के एक जैसे नहीं आते। ठाकुर मेघसिंह जागीरदार थे, कोई वादा करते तो जल्दबाजी में नहीं करते।  विचार करके हाँ बोलते और बोली हुई हाँ को निभाते अथवा तो कभी अवसर मिलता तो बोले- ‘अच्छा जो ईश्वर की मर्जी होगी प्रयत्न करेंगे’ ताकि झूठ न बोलना पड़े और अपना वचन झूठा न पड़े। मंगलमय विधान में विश्वास होने के कारण कोई भी परिस्थिति उन्हें डावाँडोल नहीं कर सकती थी।

शारिरिक तितिक्षा सहने की योग्यता होनी चाहिए और मन में जो शास्त्रीय नियम से ठान लिया है उसको करवाने में बुद्धि को बलवान बनाना चाहिये और जो परिस्थितियाँ आये उसमें क्षमता आ जाये, इस प्रकार जन्म और कर्म दिव्य बनाने में सभी लोग कुशल है सभी लोग सक्षम है, जो भी कौशल्य, चाहे उन्हें सहज में ही परमात्मा तरफ से कुशलता मिलती है ।

मेघसिंह जागीरदार का एक सेवक था- मेरुदान चारण। सेवा तो बड़ी तत्परता से करता था और अपने स्वामी का विश्वास भी पा लिया था लेकिन उस चारण ने कुसंग के कारण, कुछ कर्मयोग के अनुसार समझो, उसके मन में जागीरदार के प्रति द्वेष पैदा हो गया। रात्रि को जागीरदार रनिवास की तरफ जा रहा था और उस सेवक मेरुदान ने खँजर निकाला, पीछे से अपने स्वामी पर प्रहार करने के लिए। मगलमय विधान मंगल ही करता है, इस प्रकार का दृढ़ विश्वास रखने वाले, निश्चिंतता से जागीरदार जा रहे थे लेकिन एकाएक पीछे से सेवक के हाथ में खँजर… सामने नजर डाली तो बैल भागा आ रहा है। आगे-पीछे का सोचे इतनी देर में तो बैल आया दौड़ता-दौड़ता और ऐसा जोरों का सिंग,  मेरुदान चारण की छाती में सिंग घोष दिया। धड़ाक से गिरा, हाथ का खँजर ऐसा घूमा कि उसी की नाक कट गई, चारण की। करनी आपो आप नी, के नेड़े के दूर… ये मंगलमय विधान है। बैल का प्रेरक कौन है? स्वामी आ गये हैं, स्वामी को छूता नहीं है और सेवक के अंदर में गद्दारी है तो सेवक को बैल छोड़ता नहीं है, कैसा मंगलमय विधान है? अगर स्वामी का आयुष्य इसी ढँग से पूरा होनेवाला होता तो ऐसा भी हो सकता था। अब बेहोश… गिरा चारण। उसके सामने रनिवास था। सेवकों को बुलाया, स्वयं भी लगा, उठाया, अपने महल में, अपने मकान में ले गए।

पत्नी ने देखा, चीखी ‘आपके सेवक के हाथ में इतने जोरो से पकड़ा हुआ खंजर, मालूम होता है कि इसने आप की हत्या करने की नीच वृत्ति ठानी और भगवान ने आपको बचाया’

बोले : ‘तू ऐसा क्यों सोचती है? हम उसमें संदेह क्यों करें?’

लेकिन अनुमान और वार्तालाप से पत्नी को तो यह बात समझ में आ गई थी, पति पहले ही समझे  थे लेकिन ‘उसका क्या दोष है? बिचारे का ऐसा नहीं हो सकता है, तुम्हारी गलती हो सकती है उसको गद्दार मानने की,  तुम ईश्वर से माफी ले लो’।

ईश्वर से माफी मांगी। कटार के द्वारा नाक कटे हुए उस सेवक की सेवा, चाकरी कराकर स्वस्थ तो किया लेकिन बेहोशी हालत में से होश आया तब पति-पत्नी आपस में जो बात कर रहे थे, उस चारण ने सुनी कि हमारे लिये इनको संदेह गया और स्वामी ने मेरे को देखा भी था और पत्नी को भी कहते हैं- ‘ऐसा तो मैंने भी देखा था लेकिन हो सकता है कि मेरी रक्षा के लिए उन्होंने कटार पकड़ी हो, तो तुम कभी भी इसमें संदेह नहीं करना, मेरुदान मेरा ईमानदार, वफादार सेवक है, वह मुझे खँजर मारे यह संभव नहीं। अगर मारे तभी भी ऐसा कोई विधान होगा।’

इस उदार वचनों ने… और ईश्वर की विधान में आस्था रखनेवाले वचनों ने मेरूदान का शरीर तो नकटा रहा लेकिन मद उसका बदल गया कि मैंने इतनी-इतनी नीचता की और स्वामी मेरी इज्जत रख रहे हैं। फूट-फूटकर रोया कि ‘मुझ अभागे ने आपको नहीं पहचाना, आप मंगलमय विधान में सम रहने वाले सत्पुरुष हैं, आपके कर्म दिव्य है, आपका जन्म दिव्य है! मैं तो आपका यश देखकर जलता था। पहले तो आप के प्रति वफादारी थी, बाद में फिर आप के प्रति नफरत हुई और मैनें तो सचमुच आप की हत्या करने के लिए खँजर पकड़ा था लेकिन मेरे को मेरी करनी का फल मिला। अब मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ लेकिन क्षमा के साथ दंड भी चाहता हूँ, नहीं तो मेरी आत्मा मुझे कोसेगी।’ 

‘चारण तुझे दंड दूँ, बिना दंड के नहीं मानोगे?

‘नहीं स्वामी! आपके द्वारा मुझे दंड मिलना ही चाहिये!’  

‘तो मैं तीन प्रकार के दंड देता हूँ, शरीर से किसी का बुरा नहीं करना, मन से किसी का बुरा ना सोचना, बुरा ना मानना और बुद्धि से ‘कोई बुरा है’ ऐसा निश्चय ना करना, जो कुछ है मंगलमय विधान की लीला है। यह त्रिदंड साधेगा तो तू भी जन्म-कर्म की दिव्यता को पा लेगा।’ ऐसी औदार्य वाणी सुनकर मेरूदान तो चरणों में गिर पड़ा । स्नेह से उसको पकड़ कर उठाया, प्रेरित किया… ‘कर्म करने में सावधान, होने में प्रसन्न रहो।’  

ऐसे पुरुषों की जीवन में केवल एक बार ही कोई घटना आकर चुप हो जाये, ऐसा नहीं है। सभी के जीवन में सभी प्रकार की घटनाएँ घटती रहती है। उनका बेटा सोलह साल का…। तीन महीने पहले शादी की थी, घोड़े से गिर पड़ा और जख्म तो आया शरीर को, वो ठीक हो गया लेकिन मस्तक को जो चोट लगी, कई इलाज करने के बाद भी वह चोट भीतर ही भीतर शरीर में जहर फैलाने में सक्षम हो रही थी। हकीम डॉक्टरों ने कहा कि कुछ घंटों का मेहमान है। उदास पुत्र को देखकर पिता बोलता है, मेघसिंह जागीरदार कि बेटा उदास क्यों है? मैं जागीरदार हूँ, सारी जागीरी की मालकियत अब तेरी है लेकिन यह मालकियत सँभालने की अगर तेरी प्रारब्ध नहीं है तो तू उसकी मालकियत संभालेगा जो विश्व का जागीरदार है। जैसे कोई छोटा काम छोड़कर, छोटा ओहदा छोड़कर बड़े ओहदे की तरफ जाता है, ऐसे ही तू यह मेरी जागीरी छोड़कर परमात्मा की जागीरी का पुत्र होने जा रहा है, इसमें उदास होने की क्या जरूरत है? जन्म तो दि‍खता हैं, वास्तव में जन्म है नहीं, कर्म भी दिखते हैं लेकिन कर्तापने की तुच्छ भावना से अगर तुम इस शरीर को ‘मैं’ नहीं मानो और कर्म  ‘मैं कर रहा हूँ’, ऐसा अहं नहीं पालो तो तुम्हारे कर्म और जन्‍म दिव्य हो जाएंगे। अभी-अभी तुम दिव्यस्वरूप का चिंतन करो। भगवान के दिव्य मंगलमय विधान में शरीर जैसे ऐसी बुलबुले पैदा होकर, तरंग पैदा होकर मिट जाते हैं तो पानी का क्या बिगड़ा? गहने बनकर मिट जाते हैं तो सोने का क्या बिगड़ा? शरीर बन कर मिट जाये तो भी तुझ आत्मा का क्या बिगड़ा? तू तो परमात्मा का सनातन सपूत है। बात रही पुत्रवधू की… वह भी इस घर की है, लाडली है और वह भी पवित्रता से जीएगी और वह भी पति के लोक को प्राप्त होगी। तू अपने जन्म-कर्म दिव्‍य करके अपने दिव्य-स्वभाव में, दिव्य-स्वरूप में विलय होगा और यह भी पीछे से… । ऐश आराम भोग-विलास का जीवन इसका जल्दी से पूरा हो गया, तो इसका योग का जीवन पूरा होता है तो इसकी भी तुझे चिंता नहीं है और यह भी खानदान की संतान है। बहू को भी उपदेश दिया और बेटे को भी उपदेश दिया। देखते-देखते बेटे ने आँख बंद कर ली सदा के लिए..। बहू ने, सास ने,पिता ने और लोगों ने, यथा योग्य उसकी अंत्येष्टि की लेकिन मानों कुछ दुर्घटना नहीं घटी। ईश्वर की करनी में, ईश्वर के विधान में जब हम खड़े होते हैं ना तब छाती ठोककर रोते हैं, छाती पीटते हैं। बेटा जीना चाहिए था, मर गया… हाय-हाय! पति जीना चाहिए था चला गया.. हाय-हाय! ऐसा होना चाहिए था लेकिन नहीं हुआ.. हाय-हाय! मंगलमय विधान में, ना जाने क्या-क्या हमारी उच्च गति करने के लिए भगवान की लीलाएँ हैं। जो थारी मर्जी वो म्हारी मर्जी, जो थारी दृष्टि वो म्हारी दृष्टि… ऐसा करनेवाले व्यक्ति के जन्म और कर्म दिव्य हो जाते हैं।

            जन्मदिवस बधाई हो….. वास्तव में यह दिवस विवेक करने का दिवस है। 71 साल कैसे गये, उनमें क्या गलतियाँ हुई। 70 साल कैसे गये, उनमें क्या गलती  हुई अथवा क्या अहंता आ गई । अब 71 वॉं साल आता है तो उसमें यह गलती और अहंता न आए, इस प्रकार का सोचना, यह तो दिव्यता की तरफ है लेकिन मैं इतना धन कमाऊँगा, ऐसा करूँगा… वैसा बना कर दिखाऊँगा, ऐसा करके दिखाऊँगा, अगले साल डेढ़ करोड़ नफा निकाला था मेरी कंपनी ने, अभी दो करोड करूंगा। अगले साल हमने 1500 करोड नफा किया था अब स्टील प्लांट बोकारो ने… हमने 2000 करोड नफा किया था ।  हम आपके चरण में पड़े हैं तो हमारा बोकारो स्टील प्लांट और प्रगति करेगा… तो यह न जन्म दिव्‍य है न कर्म दिव्‍य है यह तो अपने को उलझानेवाले प्लानिंग है। मैं अभी इतना पढ़ा हूँ , अगले साल इतना बन जाऊँगा, ऐसा बनकर दिखाऊँगा, वैसा बनकर दिखाऊँगा… तो आप कर्म के दलदल में, जन्म के दलदल में अपने को फैंकते हैं । श्रीकृष्ण के नजरिये से आप जन्म-कर्म से अपना पल्ला झाड़कर और तत्परता से करें लेकिन कर्तृत्व भाव, भोक्तृत्व भाव, फल लोलुपता, फलाकांक्षा आदि‍ नहीं रखें । ज्ञानस्वभाव का तो कभी जन्म होता ही नहीं और उसकी मृत्यु भी नहीं होती, शरीर मर गया फिर भी मरने को जानता है। जो जानता है तो उसकी मौत कैसे होगी? शरीर का जन्म हुआ और मृत्यु हुई। अगर मृत्यु से मृत्यु हो जाती होगी तो करोड़ों बार शरीर की मृत्यु हुई तो तुम तो नहीं मरे… तो तुम्हारे ज्ञानस्वभाव की तो कभी मृत्यु होती नहीं। केवल मैं दुखी हूँ .. मैं सुखी हूँ .. कर्म का करता हूँ .. मैं बच्चा हूँ ..मैं जवान हूँ ..मैं बुढ़ा  हूँ .. मैं फलानी जाति का हूँ ..फलानी जाति का हूँ, यह व्यवहारिक भ्रमणाऍं है । अगर भ्रमणाऍं समझ कर बाहर से करें, जैसे रंगमंच में अपना-अपना पार्ट अदा करते हैं बाहर से करे लेकिन अंदर से जाने ‘सोहम’… मैं वो ही हूँ।सत चित आनंद ।  जो पहले था, अभी है, बाद में रहेगा वह सच्चिदानंद आत्मा मैं हूँ। कर्म, हाथ से, पैर से, शरीर से, मन से हुए । ये सारा जगत जो दिख रहा है इसको शास्त्रीय भाषा में कहा ‘विश्व’। स्थूल शरीर आपका विश्वरूप से एकाकार है, सूक्ष्म शरीर तेजस है और कारण शरीर पारतत्व है, वो प्राज्ञ है‌। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर..।  कारण शरीर में नींद आती है, सूक्ष्म शरीर में चिंतन और सपना आता है, स्थूल शरीर में कर्म होते हैं लेकिन यह अपने में मानने की गलती से आदमी के कर्म बंधनकारक होते हैं।

            गुणसंग में लग जाते हैं, सत और असत योनियों में भटकाते हैं। सत्संग समझ में आ जाए तो बेटे को जन्म देने वाला,  बहु को सांत्वना देने वाला और मेरूदान चारण की गद्दारी सहने वाला मेघसिंह निर्लेप नारायण के पद में स्थित हो गया तो आपको क्या घाटा है? आपको क्या देर है? केवल विवेक जगा दो। जो नहीं है उसको नहीं मानो और जो है वह है, बस…!  बचपन सच्चा नहीं है, चला गया। जो इदं बोलते हैं ना, वह सच्चा नहीं है लेकिन इदं जिससे प्रकाशित होता है वह सत्य है। यह बचपन था, वह जवानी थी,  वह किशोरावस्था थी, वह दुखद अवस्था थी, सुखद अवस्था थी, था.. थी… जो देख रहा है, होगा, होगी, जो दिखेगा.. वह जिससे दिखेगा वह ज्यों का त्यों है। दिखनेवाला प्रकृति का विलास है, खिलवाड़ है, मायामात्र है।

            बाबा! मेरा मन ठीक नहीं होता, ऐसा नहीं होता… ।

            बाबा ने कहा कि दुनिया में कई मन है और मेरा कुत्ता ठीक नहीं है…  दुनिया में कई कुत्ते हैं उसकी चिंता नहीं है लेकिन मेरा कुत्ता है, ऐसे ही यह मेरा मन है, यह मत सोचो। मेरा भगवान है, भगवान का मैं हूँ तो फिर मन अपने-आप ठीक होता है। बे-ठीक जितना ठीक करने पडोगे उतना कूदेगा। जितना बे-ठीक की तरफ उसको जाने दोगे उतना वह ले डूबेगा। ना बे-ठीक की तरफ जाने दो, ना ठीक करने की चिंता में पड़ो। जो ठीक है उसमें आप आ बैठो।

बोले : चाहते हैं कि सुख-दुःख, मान-अपमान में सम रहें लेकिन…..

…लेकिन क्या? जब कूड़े-करकट पर बैठोगे और चाहते हो कि मक्खियाँ नहीं भिनभिनाए तो मक्खियाँ तो भिनभिनाएगी..। मच्छर, मक्खियाँ, जीव-जंतु शरीर को ना काटे लेकिन आप बैठे हो म्‍युनिसिपल्टी का सारा कूड़ा-करकट जहां पड़ा है उस ढेर पर बैठे हो और चाहते हो कि ऐसा ना हो। ऐसे ही अपने को देह में, अपने को कर्म में, अपने को गुणों में लगाकर फिर सोचते हैं कि ऐसा ना हो-ऐसा हो, वैसा ना हो-वैसा हो.. तो श्रीकृष्ण कहते हैं कि:

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥

हे अर्जुन! जो मेरे जन्म-कर्म को दिव्य और अलौकिक ‘तत्व’ से जानता है वह शरीर त्यागने पर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, मुझे ही, मुझ ज्ञानस्‍वभव में, मुझ चैतन्यस्वभाव में एकाकार हो जाता है।

            शास्त्र कहते हैं कि : कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु… गुणों के साथ, परिस्थितियों के साथ हम जुड़ जाते हैं। जैसे दुख आया तो दुख के साथ जुड़े, हम दु:खी हैं, हम बच्चे हैं, हम बीमार हैं, हम जवान हैं… तो इनके साथ जुड़ गए न…। हम तो ज्यौं के त्यौं हैं, ये तो आते-जाते हैं तो जुड़ने की जो आदत है कई जन्मों की, उस आदत को विवेक से उखाड़ के हटा दो। यह आदत है तो मन में है, शरीर में है, मुझ चैतन्य में ये कोई आदतें नहीं, मैं ज्ञान-स्वभाव, परमात्मा-सत्ता में हूँ। ॐ… तं नमामी हर‍िं परं ।

सभी को आज के दिन यह बात पक्की कर लेनी चाहिए कि अवतार भगवान के होते हैं, स्फूर्ती अवतार भी होता है, नित्य अवतार भी होता है, नैमित्तिक अवतार भी होता है, आवेश अवतार भी होता है, प्रवेश अवतार भी होता है। यह भगवान के अवतारों को तुम थोड़ा जान लोगे ना तो…. अवतरति‍ ईति‍ अवतार:जो ऊपर से नीचे की और आए। जैसे चक्रवर्ती राजा, बाबू के ऑफिस में आए और बाबू के कार्यालय में काम करने लगे। ऐसे ही वास्तविक में आपका भी अवतार ही है। यह अवतार है, ऐसा मनुष्य जीवन में ही समझ में आएगा। आप अकर्ता, अभोक्ता, चैतन्य है लेकिन शरीरों से जुड़ते-जुड़ते, जुड़ते-जुड़ते मनुष्य देह में आए। अब समझो कि मनुष्य-देह से मेरा कोई विशेष संबंध नहीं है, जैसे और देह छूट गया ऐसा यह भी छूट जाएगा। जैसे आप गाड़ी में, बस में, ऑटो में बैठते हैं, यात्रा पूरी करते ही छोड़ देते हैं, ऑटो को, बस को, जहाज को रसोई घर में या स्नानागार में नहीं ले जाते हैं, अपने साथ नहीं रखते हैं ऐसे ही, इस शरीर को और शरीर के संबंधों को, सदा साथ में नहीं रख सकते लेकिन जो सदा साथ है उसको कभी छोड़ नहीं सकते। जिस को छोड़ नहीं सकते उसको ‘मैं’ मानने में क्या आपत्ति है। जिसको कभी छोड़ नहीं सकते उसको आप ‘मैं’ मानिये। जिसको रख नहीं सकते उसकी आसक्ति छोड़ दीजिये। रख नहीं सकते उसकी ममता-आसक्ति छोड़ दीजिये और छोड़ नहीं सकते उसको ‘मैं’ मानिये। आप ज्ञानस्वभाव को छोड़ सकते हैं क्या? दुख को जानेवाला है। ये भगवान है, भगवान हैं कि नहीं उसको जानने वाला भी मेरा ज्ञानस्वभाव चाहिए। सुख को जानने वाला भी ज्ञानस्वभाव चाहिए, तो अपना ज्ञानस्वभाव, चैतन्यस्वभाव नित्य अवतरित होता रहता है सभी परिस्थितियों में। उसीसे परिस्थितियों का पता चलता है, परिस्थितियाँ बदल जाती है लेकिन परमात्म-सत्ता ज्यौं की त्यौं रहती है।

आवेश अवतार, स्फूर्ति अवतार…, जैसे परशुराम का आवेश अवतार स्फूर्ति अवतार..। जब तक राम नहीं मिलु थे, रामजी के दर्शन नहीं हुए थे तब तक उनका आवेश अवतार रहा, रामजी मिल गए तो रामजी के साथ उनका अवतार तत्व रामजी में समा गया फिर सामान्य रहे । सदा के लिए कृष्ण के नाईं अवतार नहीं रहे। नित्य अवतार, नैमित्तिक अवतार, रावण और कंस का निमित्त लेकर जो अवतरण हुआ वह नैमित्तिक अवतार है और संतों के हृदय में जो ज्ञान-स्वभाव का, आनंद-स्वभाव का, चैतन्य-स्वभाव का लोक-मांगल्य स्वभाव का अवतरण होता रहता है उसे बोलते हैं  ‘नित्य अवतार’। ऐसे ही अर्चनावतार होता है। भक्त ने हनुमानजी की उपासना की, अब उस भक्त को कोई विरोधी शत्रु ने… हनुमान जी के ध्यान में मग्न है, पीछे से जाकर रामपुरी… ‘आर-पार कर दूंगा लेकर तो वो मिट जाएगा। वह रामपुरी लेकर आ रहा है और भक्त की पीठ में पीछे से छुरा भोंकना है चाकू का… हनुमानजी की मूर्ति के दो टुकड़े हो गए और गुर्राते हुए आवेशमय अवतार हुआ। हनुमानजी ने मारनेवाले को ही मारकर यमपुरी पहुँचा दिया। हनुमानजी कहीं से भागकर आए, ऐसी बात नहीं है अथवा उस भक्त ने हनुमानजी को बोला, वो नहीं है लेकिन कण-कण में जो ज्ञानसत्ता, चैतन्यसत्ता व्याप्त रही है, वह आवेश अवतार के निमित्त कभी रक्षा करने के लिए प्रगट भी हो जाती है। नृसिंह अवतार… आवेश अवतार अथवा द्रौपदी की साड़ी में प्रवेश अवतार तो इस प्रकार भगवान की सत्ता अन्‍तर्यामी अवतार, प्रेरणा अवतार…। आप अच्छा करते हैं फिर शांत होकर क्‍या करूँ, करूँ ना करूँ, मन तो कहता है करो, बुद्धि ने भी समर्थन दिया, लोगों ने भी समर्थन किया लेकिन हृदय में खटका और अंदर से आवाज आई कि नहीं करना है.. नहीं जाना है। बाद में पता चला कि अरे! बाप रे बाप! अगर मैं उसी बस की यात्रा करता, प्रेरणा नहीं मानता, बस से नीचे नहीं उतरता तो बस मोरबी पहुँची और मोरबी का बाँध टूटा तो कई लोग बहकर मर गए, हजारों…। बाईस हजार लोग तो सरकारी आँकड़ा है लेकिन कितने और ज्यादा मरे होंगे, भगवान जाने। ऐसे ही भोपाल गैस कांड हुआ । तो कभी-कभी ऐसे समय में अन्‍तर्यामी अवतरण होता है। रेलवे स्टेशन पर बैठे थे जम्मू कश्मीर में और बापू ने प्रेरणा दी- उठो! उठो! बाहर जाओ! बाहर जाओ! बाहर जाओ! वो बाहर गए, थोड़ी देर में धड़ाधड़ गोलियॉं आतंकवादियों ने आकर बरसाई कई लोग मर गए लेकिन वो जप-ध्यान करता था तो उसके अन्‍तर्यामी ने अवतरित होकर उसको बचा दिया। पूजा-पाठ, जप-ध्यान से विवेक जगता है तो अन्‍तर्यामी के संकेत मिलते रहते हैं। कभी-कभी तो अपना मन बदमाश होता है तो अन्‍तर्यामी का रूप लेकर अपने को संकेत देता है, जिसमें अहंकार हो, वासना हो, वो संकेत अन्‍तर्यामी के नहीं होते।

जैसे एक लड़का गया, गुरु ने बोला- जाओ बेटा नर्मदा किनारे अनुष्ठान करो।

तप करने को नर्मदा है, ज्ञान साधने को गंगा है, ध्यान करने को भगवान विष्णु आदि उनके रूप हैं, वह अनुष्ठान छोड़कर आ गया।

बोले- क्यों अनुष्ठान हो गया 40 दिवस पूरा?

बोले- अरे गुरुजी, भगवान ने प्रेरणा किया कि जाओ बेटा जाओ, जल्दी से अच्छी, फलानी लड़की है, अच्छे खानदान की।  उसके साथ शादी कर लो। दोनों मिलकर भजन करना, मैं राजी हो जाऊँगा।

हरामी, यह तेरा मन ही भगवान का रूप लेकर तेरे को कहता है।  तो जब ऐसी प्रेरणा मिले तो आप अन्‍तर्यामी की प्रेरणा मत समझना। ऐसे वल्लभाचार्य ने ग्रंथ लिखा तो बोले- मेरे प्रभु अन्‍तर्यामी की प्रेरणा से मैंने लिखा और बिल्कुल सच्चाई से उनको अंतर-प्रेरणा हुई होगी । रामानुजाचार्य ने भी यह ईश्वर की प्रेरणा से लिखा लेकिन दोनों में फिर संस्कार भेद से ग्रंथों में कुछ भेद दिखता है तो प्रेरणा, सत्ता तो भले भगवान की है लेकिन संस्कार अपने भी काम करते हैं। शराबी को अन्‍तर्यामी प्रेरणा कर रहा है कि जाओ आज ईद मनाओ, दि‍वाली मनाओ, बोतल लो, बाँटो और पीयो.., शराबी का मन अन्‍तर्यामी ऐसा बन जाएगा। भक्तों का अन्‍तर्यामी बन जाएगा कि चलो आज उत्सव है, कुंभ चल रहा है, जाओ गोता मारो और बापू का सत्संग सुनो… तो ये अन्‍तर्यामी नहीं, अंतर-संस्कार होते हैं।

प्रसन्नस्वरूप तू है


हमारा और परमेश्वर का संबंध सनातन है, सीधा-सादा है। हमारा और वस्तुओं का संबंध, हमारा और व्यक्तियों का संबंध माना हुआ संबंध है। माना हुआ सबंध (मान्यताएँ बदलती है और वस्तुएँ टूटती-फूटती है) बदल जाता हैं। वास्तविक संबंध किसी भी परिस्थिति में नहीं टूटता। वास्तविक संबंध को जानना है और माने हुए संबंध को अनासक्त भाव से निभाना है। आसक्ति से आदमी की योग्यताएँ क्षीण हो जाती है। कर्म के फल की वाँछा से अंतःकरण की योग्यता कुंठित हो जाती है और फल तो जितना प्रारब्ध में होगा वह मिलकर ही रहता है। निष्काम भाव से किये हुए कर्म अंतःकरण की शुद्धि करते हैं।

            अंतःकरण की शुद्धि- ये बड़ी उपलब्धि है। जैसे फानूस (लालटेन) की कालिमा हटा देने से लालटेन का प्रकाश बाहर फैलता है, लालटेन के काँच की कालिमा हटाकर साफ-सुथरा कर देने से लालटेन का प्रकाश बाहर फैलता है, वह चमकता है, ऐसे ही अंतःकरण की अशुद्धि मिटाने से परमात्म-प्रकाश, परमात्म-सामर्थ्य, परमात्म-आनंद, मतलब परमात्मा का दिव्य-प्रसाद उस व्यक्ति के द्वारा निखरता है। परमात्मा तो सब में है और सब का सनातन-स्वरूप है। जो नहीं पहचानते उनका भी वास्तविक स्वरूप परमात्मा ही है- ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन।

            आप भगवान के सनातन अंश है फिर भी दुःख, मुसीबत, शोक, चिंता, पीड़ा, मृत्यु, जन्म आदि जो कष्ट सह रहे हैं ये सारे के सारे कष्टों का एक ही कारण है कि आपके और ईश्वर के बीच जो अज्ञान है वही सारी मुसीबतें दे रहा है। तो अंतःकरण के तीन दोष हैं- ‘मल’, ‘विक्षेप’ और ‘आवरण’। ‘मल’ माने वासनाओं की भीड़, ये मिले, ये मिले, ये मिले, ये खाऊँ, ये खाऊँ…  इच्छाएँ। इससे वह अंतःकरणरूपी काँच मैला है और जितनी इच्छाएँ ज्यादा होती है उतना चित्त ज्यादा विक्षिप्त रहता है-‘विक्षेप’।

तो ‘मल’, ‘विक्षेप’… तीसरा होता हैं ‘आवरण’। ‘आवरण’ क्या होता है कि जो है उसको नहीं जानते, जो नहीं है उसको मानते हैं। वास्तविक में जो हम है उसका फायदा नहीं उठाते और जो नहीं है उसी को संभाल-सजाकर मर रहे है। इसी का नाम है ‘अविद्या’। यह अविद्या आने से, अविद्या को संभालने से, अविद्या होने से आदमी को सारे कष्टों का शिकार बनना पड़ता है। जो विद्यमान न रहे उस शरीर को ‘मैं’ मानते है, सदा उसको विद्यमान रखना चाहते है। जो वस्तु विद्यमान न रहेगी, सदा उसको संभालते है, क्योंकि अविद्या का प्रभाव है मस्तिष्क में। अब बात रही, दूर कैसे करें? अंतःकरण शुद्ध हो, काँच साफ हो तो प्रकाश दिखेगा ठीक से। तो अंतःकरण मलीन कैसे होता हैं? और शुद्ध कैसे होता है? ये भी अपन लोग जानेंगे तभी तो फायदा उठायेंगे।
सुख की लालच और दुःख का भय इन दो कारणों से अंतःकरण मलीन रहता हैं। बाहर की वस्तुओं से सुख लेने की लालच और कोई वस्तु या व्यक्ति न जाये उस दुःख का भय। ‘सुख की लालच और दुःख का भय’, इससे अंतःकरण अशुद्ध होता हैं। सुख की लालच छोड़ दें और दुःख का भय छोड़ दें तो अंतःकरण बस शुद्ध हो जाये। परमात्म-प्रकाश, परमात्म-आनंद, परमात्म-मस्ती आने लगेगी। इसमें आहारशुद्धि, मंत्रजाप, सेवा, दान-पुण्य, ये सब सहायक चीजें हैं।


            तो एक साधन होता है ‘बहिरंग’, दूसरा साधन होता है ‘अंतरंग’। जैसे तीर्थयात्रा करते हैं तो बहिरंग साधन माना जाता हैं। भगवन्नाम का जप करते हैं तो वह अंतरंग साधन हैं क्योंकि जप का अर्थ हृदय में, जप का प्रभाव रक्त में, नस-नाड़ियों में पड़ेगा। गुरूदत्त जप है ये अंतरंग साधन हैं। जप का अर्थ समझते हैं तो और अंतरंग साधन हो जाता हैं। अंतरंग माना आत्मा के निकट वाला साधन। जैसे गाड़ी को बाहर से रोकना, दस-पॉंच आदमी खड़े होकर गाड़ी को रोक दें, ये बहिरंग है और ब्रेक पर पैर रखकर गाड़ी रोके, ये अंतरंग हैं, लायनरों पर प्रेशर पड़ता हैं। बाहर से धक्का देकर अथवा घोड़ा-वोडा बाँध के गाड़ी को घसीटना, दौड़ाना, ये बहिरंग है और गाड़ी में मशीन फिट करके पेट्रोल देना, ये अंतरंग हो गया। ऐसे ही अंतःकरण की शुद्धि कुछ बहिरंग साधनों से भी होती हैं, अंतरंग साधनों से जल्दी होती हैं, आसानी से होती हैं। जैसे तीर्थाटन किया तो जिसके शरीर में अहं हैं,
अपने पाँच कोष हैं, कवर हैं, अपने उस स्वरूप के ऊपर पाँच कवर हैं। जैसे बादाम रोगन पर पाँच कवर हैं.. बादाम का फल- उसके ऊपर एक कवर,  फिर वो हरी-हरी गिरी‍- दो, फिर वो कठोर लकड़े जैसी कवर- तीन, फिर लाल कवर- चार, फिर वो सफेद गिरी- पाँच, उसके अंदर बादाम का तेल । ऐसे ही उस बादाम के फल की वैल्यू क्यों हैं? तेल के कारण! ऐसे ही मानव की वैल्यू क्यों हैं? कैसे है? कि ‘आत्मा’ के कारण। तो जिसका अन्नमय कोष में ज्यादा स्थिति हैं, ऐसे आदमी को बहिरंग साधन अच्छा लगेगा, धार्मिक तो होगा लेकिन अंतर्मुख-ध्यान-व्यान-मजा नहीं, तीर्थयात्रा, मेहनत की भक्ति…। जिसका अन्नमय कोष से कुछ अंतर हैं, मन प्राणमय कोष में हैं उसको प्राणायाम, आसन, उपवास ये अच्छा लगेगा। जिसकी मनोमय कोष में स्थिति हैं उसको भगवान का भजन-कीर्तन, मंदिर, भगवान के नाम का जप-ध्यान अच्छा लगेगा। जिसकी विज्ञानमय कोष में स्थिति हैं उसको भगवान-तत्व की कथा-वार्ता के विचार उठेंगे और समझेगा ‘भगवान’ क्या?, ‘ठाकुर’ क्या?, ‘कृष्ण’ क्या?, ‘तीर्थ’ क्या?, ‘मैं’ क्या? ये बात उसको स्फुरणा भी होगा समझने की और अच्छी भी लगेगी, जहाँ सुनाई पड़ेगा।
तो अन्नमय कोष, बहिरंग आदमी है, उससे प्राणमय कोष में जीनेवाला आदमी थोड़ा अंतरंग हैं। इससे मनोमय कोष में जीनेवाला आदमी और अंतरंग हैं। इससे विज्ञान मय कोष में जीनेवाला आदमी और अंतरंग हैं, उससे भी आनंदमय कोष में जीनेवाला आदमी और अंतरंग हैं। आनंदमय कोष में जीनेवाला आदमी, साधक, अगर किसी सदगुरू को मिल जाता हैं.. काम बन जाता हैं।
आनंदो ब्रह्म, ब्रह्म इति परमात्मनो इति वेदांतेनः

            वेदांतवेत्ताओं का परमात्मा कोई सगुण साकार, कोई मूर्तिधारी किसी देश में बैठा हैं, ऐसा नही हैं। आनंदस्वरूप वो परमात्मा हैं और तेरे हृदय में प्रकाशित हो रहा है, वही है। एक विचार उठा और दूसरा उठने को हैं, उसके बीच की अवस्था है वो ही चैतन्य परमात्मा। बुद्धि को जो अनुकूल चीज मिलती हैं, मन को जो प्रसन्नता होती हैं वो प्रसन्नता जहाँ से आती हैं, वो प्रसन्नस्वरूप परमेश्वर हैं, वो ही तू हैं, बाकी वस्तु और भोगने के साधन तू नही हैं। इस प्रकार का गुरूदेव उपदेश दे और शिष्य का कल्याण हो जाता हैं, साक्षात्कार हो जाता हैं, फिर दस मिनट में समझ ले, दस दिन में समझ ले…ये समझकर उसमें टिक जाता हैं। तो ऐसा तो कोई कोई तैयार साधक मिलता हैं इसलिए उसको  साक्षात्कार हो जाता हैं, बाकी के लोग आत्म-साक्षात्कारी पुरूष के संग में आएँगे तो जो अन्नमय कोष में जी रहे हैं, जैसे तीर्थयात्रा, ऐसे रुपये-पैसे, पद संभाल कर जो सुखी होना चाहता हैं वो अन्नमय कोष में हैं। ऐसे पुरूष को जब गुरू मिल जाएँगे तो उसका एक कोष गुरु-मुलाकात से, गुरु-दृष्टि से, गुरु-कृपा से, गुरु-सान्निध्य से…।

            गुरू उनको कहते हैं हम, जो अंधकार को मिटा के आत्म-प्रकाश देने का सामर्थ्य रखते हो अथवा तो उसका दूसरा अर्थ है- इंप्रेस न हो और ऊँचे से ऊँची स्थिति में, जैसे सुमेरू हैं, आँधी चले, तूफान चले, बाढ़ आये, सुमेरू को कुछ नहीं होता, हिमालय को कुछ नहीं होता। ऐसे जहाँ कुछ नहीं होता वहाँ जो टिके हुए पुरूष, उनको गुरू कहा जाता हैं। ऐसे गुरु, गोविंद से भी ज्यादा आदरणीय माने गए हैं-

गुरू गोविंद दोनों खड़े किसको लागू पाय

बलिहारि गुरूदेव की गोविंद दियो दिखाय

ईश ते अधिक गुरू में प्रीति, जानि करत सुजान

बोले- ईश्वर से अधिक गुरू में प्रीति?

कि- हाँ! ईश्वर की मूर्ति में श्रद्धा करोगे, हृदय शुद्ध होगा लेकिन वो मूर्ति उपदेश नहीं देगी, गलतियाँ नही काटेगी-छाँटेगी। सम्प्रेक्षण-शक्ति बरसायेगी नहीं लेकिन ऐसे पुरूष गलतियाँ काटेंगे-छाँटेंगे, उपदेश देंगे और उसमें उनका संकल्प- “इनका भला हो!” ऐसे संकल्प से वो बोलेंगे!

            भागवत में ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुष की महिमा में शुकदेवजी परीक्षित को बताते हैं कि भगवान में तीस गुण हैं, उद्धारक-शक्तियाँ, जीव का भला करने का और भगवत्प्राप्त ब्रह्मवेत्ता महापुरूष में छत्‍तीस गुण होते हैं। ऐसे पुरूष जल्दी से मिलते नहीं और मिलते हैं तो हम पहचान नहीं पाते और पहचान लिया तो फिर माता के गर्भ में नहीं आते हम। ऐसे पुरुषों के लिए ही उच्च अवस्था पर पहुँचे हुए ऋषि ने गाया है- गुरूर्ब्रह्मा... ब्रह्मा जी जैसे सृष्टि करते हैं, ऐसे हमारे अंदर  आध्यात्मिक संस्कारों की सृष्टि करते हैं। गुरुर्विष्णु… जैसे विष्णुजी पालन करते हैं, ऐसे ही हमारे आध्यात्मिक संस्कारों का पोषण करते हैं वे।
गुरुर्देवो महेश्वर:.. हमारे गुरू क्या है? कि- महेश्वर हैं, शिव हैं। जैसे शिवजी प्रलय कर देते हैं, ऐसे ही हमारे अंदर जीव-भाव के, राग-द्वेष के संस्कारों को खत्म करते हैं। इससे भी ऋषि संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने देखा कि ये तो ठीक है- उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय हुआ, लेकिन उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय के बाद भी जो नहीं मिटता उसका साक्षात्कार कराने वाले तो साक्षात ब्रह्म हैं-

गुरूर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वराः

गुरू साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नमः

ऐसे गुरुदेव को हम नमस्कार करते हैं।

अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया ।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

            अज्ञान तिमिर से जो हम भटक रहे थे, अगले जन्म के माँ के गर्भ में लटके थे, कभी किसी माँ का गर्भ मिला, टिके और कभी ऐसे ही बह गए बाथरूम में। इस बात को तो नास्तिक आदमी भी अस्वीकार नहीं कर सकता हैं। इस जन्म में भी न जाने कितनी-कितनी बार गर्भों में  ट्राय करते-करते बहे होंगे और अभी ये शरीर को गर्भ-वास मिल गया। ऐसा थोड़े है कि सीधा गर्भ-वास मिल गया और पैदा हो गये होंगे। कई बार ऐसे ही बह गये होंगे और मर गये और साक्षात्कार नहीं किया तो फिर वो ही तो रूटीन होगी। पशु के गर्भ में भी, टिकने का मिलता हैं, कभी नहीं मिलता। तो पशु का कितना दुःखी जीवन, मनुष्य का कितना सारा दुःखी जीवन। तो ये दुःखद-जीवनों से हटाकर मुक्ति के माधुर्य का अनुभव कराने वाले गुरु। उन गुरूओं का अनुभव हैं कि अंतःकरण की अशुद्धि, इच्छा से, सुख की इच्छा से और दुःख के भय से होती हैं। सुख की इच्छा मिटाना हैं तो सुख-स्वरूप हरि का ध्यान और सुख-स्वरूप परमात्मा के नाते संसार में व्यवहार करें तो सुख की इच्छा मिटेगी। सुख की इच्छा मिटते ही दुःख का भय अपने आप चला जायेगा और मंत्र-जाप करने से भी निर्भयता आती हैं, सत्संग से भी निर्भयता आती हैं तो सुख की लालच, दुःख का भय मिटे।  

            तो परम गुरू मनु महाराज का आवाहन किया राजा इक्ष्वाकु ने और प्रार्थना की कि- ” भगवन! राज-पाट का सुख देख लिया। दिन-दिन आयुष्य नष्ट हो रही हैं। सोने के बर्तनों में भोजन कर लिया, चाँदी के रथों में घूम के देख लिया, लेकिन प्रभु कोई सार नहीं, मुझ दास पर कृपा करो, मैं बड़ा दुःखी हूँ। लोगों की नजर से तो राजाधिराज अन्नदाता महाराज हूँ लेकिन विवेक से देखता हूँ कि क्या? इस पृथ्वी पर मेरे जैसे कई पुतले आ गये। मौत के मुँह में दिनों-दिन नजदीक जा रहा हूँ। मेरे चित्त में बड़ा क्षोभ हो रहा है। मैं अनाथ बालक की नाईं आपकी शरण हूँ!”

            तब …कृपा-सागर, प्राणीमात्र के परम-सुहृद, आत्मवेत्ता, ब्रह्मवेत्ता, मनुष्यमात्र के नहीं, जीवमात्र के सुहृद होते हैं । कृपामय वाणी से कहने लगे मनु महाराज कि- “हे राजा इक्ष्वाकु! तू नित्य अंतर्मुख रह। अंतरात्‍मारूपी ईश्वर से तू जुड़ा रह अर्थात आत्म-ध्यान, आत्म-चिंतन और आत्मा-परमात्मा की प्रसन्नता के लिए काम कर। तू नित्य अंतर्मुख रह। तेरे सारे क्लेश, सारे दुःख, पाप-ताप नष्ट हो जायेंगे। हे राजन! घर में जो भोजन मिले, सहज में, आरोग्यता का ख्याल करके खा ले। ये चाहिये, वो चाहिये, जीभ का स्वाद का गुलाम मत बन।” मनु महाराज राजा इक्ष्वाकु को बोलते हैं और आशाराम महाराज अपने साधकों को बोलता हैं…”जो भोजन मिले खा लो।” मैं बिल्कुल विश्वास से कहता हूँ, मुझे पक्का स्मरण हैं, मैंने कभी ऐसा नहीं कहा कि आज मेरे लिए ये सब्जी बनाओ और अनजान कोई होता हैं सेवक तो पूछता हैं कि ‘क्या बनाएँ?’ तो मेरे को होता हैं कि ये क्या पूछ रहा हैं? कभी-कभी नारायण, आजकल कभी-कभी पूछ लेता हैं ‘ये बनाऊँ वो बनाऊँ’ तो हृदय में आश्चर्य भी होता हैं और उसकी बेवकूफी भी लगती हैं। क्या पता ये गुरूदेव की कृपा है, आप लोगों के आशीर्वाद हैं लेकिन ‘ये खाऊँ,ये खाऊँ,ये खपे, ये खपे’ कब तक? जो होता है, अनुकूल पड़ता हैं तो ठीक से खा लेते हैं नहीं तो थोड़ा कम खाकर पेट भरना हैं। जीभ का स्वाद नहीं। इंद्रियों का स्वाद ज्यों-ज्यों छोड़ते जाओगे त्यों-त्यों आत्म-स्वाद में तुम्हारा खूँटा गड़ता जायेगा, आत्म-स्वाद में तुम्हारी स्थिति होती जायेगी और ज्यों-ज्यों आत्म-स्वाद मिलेगा त्यों-त्यों तुम सच्चे परमेश्वरीय सुख का आस्वादन करोगे और, और लोग भी तुम्हारे संग में आकर आस्वादन के भागी बनेंगे। जैसे लालटेन का का काँच साफ हैं, तो काँच तो चमकता हैं लेकिन काँच के द्वारा दूर-दूर तक प्रकाश जाता हैं। ऐसे ही तुम्हारा जीवन तो चमकेगा, तुम्हारे जीवन के द्वारा दूर-दूर तक परमात्म-आनंद के वेव्स, परमात्म-मस्ती, परमात्म-ज्ञान, परमात्म-ध्यान के वेव्स दूर-दूर तक फैलेंगे।  


“हे राजन! तुम नित्य अंतर्मुख रहो। घर में जो भोजन मिले स्वाभाविक उसको खा लो। जहाँ नींद आए वहाँ सो जाओ..ऐसा बिस्तर हो, ऐसा गादी हो,ऐसा तकिया हो,ऐसा फलाना हो..छोड़ो! जहाँ नींद आए वहाँ सो जाओ। जो वस्त्र मिल जाए वो पहन लो…एक आदमी आया कि-बापू तमे खादीज पहरो छो…पहले हम खादी ज्यादा पहनते थे…मैंने कहा-हाँ मैं खादी भी पहनता हूँ… कि मैं खादी ना ज वस्‍त्रों जोयो छे तमारे माटे मैं खादी लाया ..मैंने कहा-हमारे लिए कुछ नहीं लाना।हमारा अब शरीर का जो प्रारब्ध हैं, जिस वक्त विधाता-परमात्मा जिसको जो प्रेरणा करेगा!हमारा अपना शरीर नहीं तो खादी का कपड़ा हमारा कैसे? जो आएगा पहन लेते हैं!जो वस्त्र मिले अंग ढकने के लिए, मर्यादा के, उस सामाजिक-सोशल मर्यादा के इर्द गिर्द जो वस्त्र मिले पहन लिए, जो भोजन मिला खा लिया, जहाँ नींद आई सो गए! मुख्य काम ये हैं कि आत्मचिंतन, आत्मध्यान, आत्मज्ञान!


गोरखनाथ ने कहा- हंसिबो खेलिबो धरिबो ध्यान... हँसते-खेलते जीवन निर्भार बनाओ। कई लोग ध्यान करते हैं न तो यूँ अकड़ के।  तू ध्यान करता हैं कि झगड़ा करता हैं? ध्यान करता हैं कि कुश्‍ती करता हैं? भगवान आनंद-स्वरूप हैं तो पहले अपने हृदय को आनंद से भरकर फिर प्रवेश कर ध्यान में।

विवेकानंद ठीक बोलते थे कि वॉली-वॉल खेलने के बाद गीता जितनी समझ में आयेगी उतना कमरे में बैठकर, मंदिर में बैठकर गीता उतनी समझ में नहीं आयेगी। प्राण-अपान की गति विकसित होगी, चित्त प्रसन्न होगा फिर गीता पढ़ो तो कुछ धार्मिक लोग चिड़चिडे स्वभाव के हो जाते हैं, उन्होंने धर्म की यात्रा की नहीं, युनिफार्म की यात्रा की।


हसिबो खेलिबो धरिबो ध्यान।

अहर्निश कथिबो ब्रह्मज्ञान।।

खावे पीवे न करें मन भंगा।

कहे नाथ मैं तिसके संगा।।


            खाये-पीये लेकिन मन किसी में फँसने न दे, मन भंग न करें.. पहले तो ऐसा खाते थे, अब क्या ऐसा टुकड़ा।  पहले तो ऐसा जीते थे, अब ऐसा जी रहे। पहले तो गरीबी में जी रहे थे, अब अमीरी में। पहले अच्छा पहनते थे, अब घटिया पहन रहे हैं। पहले घटिया पहनते थे, अब  अच्छा पहन रहे हैं.. इन तुच्छ चीजों को अपने अंतःकरण में मत भरो, मत आने दो। पहनता था शरीर, घटिया भी शरीर ने पहन लिया, बढ़िया भी शरीर ने पहन लिया। बढ़िया भी खा लिया, घटिया भी खा लिया.. ये सब आतिशबाजी का हाथी तो हैं। ऐसे ही यह शरीर आतिशबाजी का पुतला हैं। इसका एड्रेस तो श्मशान हैं। रामतीर्थ ने सिलकीन धोती मँगाई और पहनी। बोले- स्वामीजी आज तो आपका वट हैं, आप तो चमक रहे हैं, इतना बढ़िया धोती पहने हैं गुरूजी। बोले- ये तो सती का सिंगार हैं। ये तो सती का सिंगार है। ये आखि‍री जन्म हैं, ला दिया किसी ने, पहन लिया। हो गया…। सती का सिंगार हैं, इसकी बात क्या करते हो? मेरी बात करो। मैं कौन हूँ? तुम भी वही हो। मैं ‘कृष्ण’ बनकर आया था, लोगों ने मुझे नहीं पहचाना। मैं ‘राम’ बनकर आया था, लोगों ने मुझे नहीं समझा। मैं ‘बुद्ध’ बनकर आया, लोगों ने मेरे को नहीं समझा। अब मैं ‘रामतीर्थ’ बनकर आया हूँ और मेरा कहना है कि तुम भी वही हो जो अनेक रूपों को  ले के आया हूँ, उसकी बात करो। सिलकीन साड़ी पहनी हैं, घड़ियाल सोने की रामतीर्थ ने पहनी, आपने क्या खाया? आपने क्या बोला? आपने क्‍या? हम कभी कुछ खाते ही नहीं। हम कभी कुछ पहनते ही नहीं। चिदानंद रूपः शिवोहं शिवोहं…। आनंदमय कोष में जीता हुआ व्यक्ति अगर तत्वज्ञान मिल जाए तो आनंदस्वरूप में टिक जायेगा।

‘बुद्धि’ अद्वैत में सोती है


आदमी दुःखी क्यों होता हैं और ईश्वर प्राप्ति में तकलीफ क्यों होती हैं? …कि ऐसा हो-ऐसा न हो, ऐसा मिले-ऐसा न मिले…।

पक्का कर लो, अपनी तरफ से अड़चन नहीं बनेंगे और आप-चाही सब होती हैं क्या? आज तक तुमने कितना-कितना चाहा? तो तुम्हारा चाहा सब हो गया क्या? जो चाहते हो वह सब होता नहीं, जितना होता है वह सब भाता नहीं और जो भाता है वह टिकता नहीं, फिर काहे को पकड़ करो।  होता हैं तो होता हैं, ठीक है नहीं तो वाह-वाह,  वाह-वाह..। ऐसा हो-ऐसा न हो, ऐसा न हो-ऐसा हो, ऐसा करके अपनी वासनाओं का पुतला मत बनो। आप रहो अपने ईश्वर स्वभाव में, अपने शांत-सम स्वभाव में। प्रयत्न करो, फिर जो हो- ‘सम’, इसको बोलते है ‘समत्वं योग उच्यते’। ये बड़ी भारी तपस्या है।

सब-कुछ त्यागकर मैं भिक्षा माँगकर रहूँगा अथवा सब-कुछ पाकर मैं बड़ा होकर रहूँगा…नहीं,  अभी जहाँ हैं, “मैं कौन हूँ?” …बस और “कौन पुरुष स्फुरित करता हैं?”, मेरे को बुरे विचार आते है, नहीं आये… तो लड़ो मत उनसे। बुरे विचार आते हैं तो वैसा करो मत, उससे उपराम, बस ईश्वर में… लेकिन ईश्वर में मन लगता नहीं… तो नहीं लगता तो कोई बात नहीं, ना लगे। ईश्वर में मन ना लगो तो ना लगो, जहाँ-तहॉं, जहाँ लगता हैं उसकी गहराई में ईश्वर हैं, चलो जाओ… गाय में लगा, कुत्ते में लगा, घोड़े में लगा, गधे में लगा… किसमें लगा? जहाज में लगा… ड्यूटी में लगा? …तो ड्यूटी में मन इधर भागा, उधर भागा.. तो ये भागने को जानता कौन हैं और किसकी सत्ता से भागते हो? ऐसा पूछो, अपने आप लग जायेगा, इसको बोलते हैं अविकम्‍प योग। एक तो मन लग गया… ‘समाधि’… वो हो गया समाधियोग लेकिन उसमें नहीं लगे तो इससे भी आसान तरीका हैं, चलते-फिरते ज्ञान की बैटरी डाल दो मन की गाड़ी में… अविकम्‍प योग हो गया। मन लगे तो लगे, न लगे तो फिर ज्ञान में, विचार में शांत हो जायेगा, मौन हो जायेगा। श्वाँस अंदर गया.. ॐ,  बाहर आये तो गिनती, अंदर गया तो शांति… बाहर आये तो गिनती।

‘साधना’ क्यों करनी पड़ती हैं? कि ‘असाधन’ हो गया इसीलिये साधन करना पड़ता है। ईश्वर भी है, हम भी है फिर पाने के लिये मेहनत क्यों? ईश्वर मिलना चाहते हैं और हम भी मिलना चाहते हैं फिर भी देरी क्यों? …कि वो गलत तरीके से जो सच्चा मान लिया हैं उसको निकालने के लिए गड़बड़ करनी पड़ती हैं। आप लोग पान-मसाला खाना छोड़ दो, तो आपके लिए क्या देरी है? पान-मसाला, जर्दा छोड़ना क्या देरी है?, खाते ही नहीं है लेकिन जो जर्दा खाने की आदत में फँसे है उनके लिये जर्दा छोड़ने के लिये मेहनत हैं। तो, साधन करते हैं लेकिन असाधन को पकड़ के रखते हैं। भजन करते है लेकिन अभजन की तरफ खींचने वाली चीजों को महत्व दे देते हैं, कहीं ये छूट न जाए, ऐसा न हो जाए, वैसा न हो जाए…। …वैसा न हो जाए?…काहे को फिकर करता हैं? माँ के गर्भ में था उस समय कौन था तेरा रक्षक? कौन था पोषक? माँ के शरीर का पोषक कौन था? किसने रक्तवाहिनियों में रक्त बहा के नाभि के द्वारा तेरा पोषण किया है? वो प्रभु चले गये है क्या? सो गये हैं क्या? अथवा उसकी सत्ता से उनकी जगह थोड़ी खाली हो गई हैं क्या? कोई दूसरा आ गया है क्या? दो भगवान हो गए है क्या सृष्टि में?  एकमेव अद्वितीय…

तुम्हारी बुद्धि रात  में किसमें सोती हैं? पता है? अद्वैत में सोती हैं… । अद्वैत में बुद्धि सोती हैं तो पुष्ट होती हैं और फिर द्वैत में आती हैं तो बिखरती हैं, फिर थक-थका के अद्वैत में जाती हैं। वहाँ कोई नही! तत्र पिता अपिता भवति, माता अमाता भवति, मित्र अमित्र भवति… गहरी नींद में मित्र, मित्र नहीं। पिता, पिता नहीं। माता, माता नहीं… अद्वैत एक सत्ता।

फूलों से सजी हुई सज्जा और इत्र छिटका हुआ कमरा और ललनाओं की हास्य-विलास और सेवा-चाकरी लेते-लेते राजा सो गया है। सोने से पहले खिड़की से निहारा कि एक युवक अपना कँबल बिछाकर लेट रहा हैं। क्या… उस युवक की जिंदगी हैं, भाग्य बेचारे का! मैं भी युवराज हूँ,  राज्याभिषेक हुआ और इतना राजमहल में ऐश करते-करते सो रहा हूँ और वो बेचारा युवक एक कँबल बिछाकर… साधु पड़ा है मंदिर के प्रांगण में…।

सुबह हुई, वह राजा सैर करने गया। वह महात्मा भी नदी किनारे सैर करते हुए… नहाकर, आगे को जाना था।

व्यंग्‍य में राजा ने कहा, युवराज ने –”क्यों महाराज! महल के सामने वाले मंदिर के प्रांगण में सोये थे रात को, वो ही हो न महाराज?” 
बोले-“हाँ”
“महाराज रात कैसी बीती?”

महाराज की चमकती आँखों ने उस युवराज के व्यंग को भाँप लिया और चमकते, अपने प्रातः स्फुरित होनेवाले अनुभव को स्मरण करते हुए राजाधिराज, महाराजाओं के बाप का बाप, नंगे पैर, नंगे सिर, कंधे पर कँबल लिये हुए महापुरुष ने कहा- “राजा! रात कैसी बीती! कुछ तो तुम्हारे जैसी और कुछ तुम्हारे से बहुत-बहुत बढ़िया।”

बोले- “कुछ रात मेंरे जैसी और कुछ मेंरे से बहुत-बहुत बढ़िया… ये कैसे?”

बोले- “तुम घोड़े से नीचे उतरो तब ना! यह रहस्य समझना हैं तो थोड़ा नम्रता का सद्गुण तो युवराज आप में होगा ही!”

मजबूर कर दिया उस मायावी सुखों में उलझे हुए युवराज को, सुलझे हुए युवक ने, अकिंचन युवराज ने…। सब-कुछ वैभव इकट्ठा कर के सुखी होने में भटकने वाले राजाधिराज को, आत्मा में संतुष्ट होने वाले महाराज ने मजबूर कर दिया नीचे उतरने को।

तले पर बैठ गये महाराज।

“राजा, कैसी बीती रात!, कुछ तो तुम्हारे जैसी, कुछ तुम्हारे से उत्तम…।  इसका उत्तर सुनो! गहरी नींद में आपको पता था कि मैं राजमहल में हूँ? फूलों की शैय्या पर हूँ?…नहीं। वहाँ शैय्या, शैय्या नहीं रहती और मुझे वो भी पता नहीं था कि कँबल पर हूँ और आपको वो भी पता नहीं था कि कोमल गद्दे पर हूँ। गहरी नींद में सब उसी परमेश्वर की गोद में चले जाते हैं। अद्वैत में बुद्धि सोती हैं। गहरी नींद में कोई भेद-भाव नहीं रहता हैं। सजावट तो तुम्हारे नकली शरीर और नकली अहं को खुश करती हैं, असलियत में कोई फर्क नहीं हैं। एक सड़ी-गली झोंपड़ी में गहरी नींद में पड़ा हुआ बुड्ढ़ा और एक राजमहल में लेटा हुआ युवराज, गहरी नींद में दोनों समान पुष्ट होते हैं। …तो तुम्हारे को जितनी देर गहरी नींद आई… और मेरे को आई… तो हम दोनों एक थे, लेकिन तुम जब करवट लेते थे या तुम जब जगे तो तुम्हारा सुख का आश्रय था ललनाएँ, फूल, सुगंध..।  नाक की नाली के द्वारा तुम सुख खोज रहे थे अथवा स्पर्श के द्वारा तुम सुख खोज कर भिखमंगे-से हो रहे थे। बुरा मत मानना… और मैं
“ॐ सच्‍च‍िदानंद, ॐ चैतन्यदेव, ॐ आत्मदेव…” …तो मैं तो बीच-बीच में ईश्वर के चिंतन में आत्म-रस पान करता था और तुम विषय-विकारों की नालियों में उलझ रहे थे इसलिए कुछ तो मेरी रात तुमसे बढ़िया गई और कुछ तुम्हारे बराबरी की गई।

सज्जनता का अंश रहा होगा उस युवराज में। बोले- “महाराज! आपने तो मेरी आँखें खोल दी। मुझ अभागे को ये दुर्भाग्यपूर्ण विलासिता नरकों में ले जाये, वह मिली है और आप सौभाग्यशाली हैं कि आपको ऐसी समझ मिली हैं। महाराज ये समझ कहाँ से लाये?”

बोले- “बिनु सत्संग विवेक न होई। ये समझ सत्संग से मिली हैं। तुम इतना इकट्ठा करते हो फिर भी इतना निर्भीक सुख नहीं हैं, शाश्वत सुख नहीं हैं और मेरे पास कुछ भी नहीं हैं फिर भी राजन…।  

उस महापुरुष के मधुमय नेत्रों से खबर मिल रही थी कि पाया हुआ प्रभु को…। प्रभुमय निगाहों से विलासी राजा के जीवन को भी करवट दिला देता हैं। एक महापुरुष हजारों कंगाल दिलों को अपनी कृपा-दृष्टि से निहाल-खुशहाल कर देता हैं जबकि दस राजा मिलकर भी दस आदमी को भी निहाल-खुशहाल और परम-पद के पथिक नही बना सकते। काहे की इतनी आपा-धापी कर-करके परेशान हो रहे हैं? जो पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा वो चीजों को, उस स्थिति को पा-पाकर, खो-खोकर मरे जा रहे हैं। पतंगा भागता है मजा लेने के लिये लाईट के आगे और अंत में सजा मिलती हैं, ऐसे ही सब विषय-विकारों में मजा लेने को भागते हैं, अंत में थककर, निराश होकर खप जाते हैं। इसी को बोलते हैं माया, मा… या… । ‘मा’ माना जो नहीं, ‘या’ माना जो दिखे… इसको बोलते हैं धोखा।

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।

जो मुझ परमेश्वर को, चैतन्य को, सच्चिदानंद को प्रपन्न होता हैं, वह इस मेरी माया को तर जाता हैं। नजरिया कहाँ हैं? नश्वर पर है कि नश्वर की गहराई में छुपे हुए शाश्वत पर हैं? शत्रु पर है कि शत्रु की गहराई में छुपे हुए हितैषी पर हैं? नेत्र… कि नाक पर नजर है…  कि ललना के गाल पर नजर है कि ललुआ के गाल के ऊपर नजर हैं…  कि ललुआ और ललना के अंदर रक्तवाहिनियों में जो सत्ताधीश हैं और अंतःकरण में हैं और वही तुम्हारे अंतःकरण में सुबह स्फुरित करता हैं उसकी नजरिया हैं? बहुत कीमती समय हैं! व्यर्थ नहीं गँवाओ!