गुरू के प्रति सच्चे भक्तिभाव की कसौटी, आंतरिक शांति और उनके आदेशों का पालन करने की तत्परता में निहित है । गुरुकृपा से जिनको विवेक और वैराग्य प्राप्त हुआ है, उनको धन्यवाद है । वे सर्वोत्तम शांति और सनातन सुख का भोग करेंगे । यह चबूतरे ठीक नहीं बने, इसलिए इनको गिराकर दोबारा बनाओ । श्री गुरू अमरदास जी ने यह आज्ञा तीसरी बार दी, शिष्यों ने यह आज्ञा शिरोधार्य की । चबूतरे गिराए गए और एक बार फिर से बनाने आरम्भ कर दिए । इस प्रकार कई दिनों तक चबूतरे बनाने और गिराने का सिलसिला चलता रहा । हर बार गुरू महाराज जी आते और चबूतरों को नापसंद करके पुनः बनाने की आज्ञा दे जाते । पर आखिर कब तक, धीरे-2 सभी शिष्यों का धैर्य टूटने लगा । मन और बुद्धि गुरू आज्ञा के विरूद्ध तर्क-वितर्क बुनने लगे । ठीक तो बने हैं क्या खराबी है इनमें, ना जाने गुरुदेव को क्या हो गया है । व्यर्थ ही हमसे इतनी मेहनत करवा रहे हैं, सभी की भावना मंद पड़ने लगी । लेकिन इतने पर भी चबूतरे बनवाने, गिरवाने का क्रम नहीं रुका । श्री गुरू अमरदास जी ने तो मानो परीक्षा रूपी छलनी लगा ही दी थी । जो कंकड़ थे वे सभी अपने आप छंटते चले गए, एक-2 करके इस सेवा से पीछे हटते चले गए । अंत में केवल एक ही खरा शिष्य रह गया, यह शिष्य थे श्री रामदास जी, सभी के जाने के बाद भी वे अकेले ही प्राणपन से सेवा कार्य में संलग्न रहे । पूरे उत्साह और लगन के साथ गुरू आज्ञा के अनुसार चबूतरे बनाते और गिराते रहे । ग्रंथाकार बताते हैं कि यह क्रम अनेकों बार चला, फिर भी रामदास जी तनिक भी विचलित नहीं हुए । अंततः श्री गुरू अमरदास जी ने उनसे पूछ ही लिया, रामदास ! सब यह काम छोड़ कर चले गए फिर तुम क्यूं अब तक इस कार्य में जुटे हुए हो । श्री रामदास जी ने करबद्ध होकर विनय किया हे सच्चे बादशाह सेवक का धर्म है सेवा करना, अपने मालिक की आज्ञा का पालन करना फिर चाहे आप चबूतरे बनवाएं, चाहें गिरवाएं मेरे लिए तो दोनों ही सेवाएं हैं । शिष्य के इन भावों ने गुरू को इतना प्रसन्न किया कि उन्होंने उसे अपने गले से लगा लिया । अध्यात्मिक संपदा से माला-माल कर दिया, समय आने पर गुरू पद पर भी आसीन किया । केवल सिख इतिहास ही नहीं, हम चाहे गुरू-शिष्य परम्परा के किसी भी इतिहास को पलट कर देख लें, हमें असंख्य ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे जहां गुरुओं ने अपने शिष्यों की बहुत प्रकार से परीक्षाएं ली । कभी-2 कबीरदास जी हाथ में मदिरा की बोतल लेकर बीच चौराहे मदमस्त झूमे, कभी निजामुद्दीन औलिया अपने शिष्यों को नीचे खड़ा कर स्वयं वैश्या के कोठे पर जा चढ़े । कभी स्वामी विरजानन्द जी ने दयानन्द जी को अकारण ही खूब डांटा फटकारा, यह सब क्या था । गुरुओं द्वारा अपने शिष्यों की ली गई परीक्षाएं ही थी, परंतु इन परीक्षाओं को लेने से पूर्व इन सभी गुरुओं ने अपने पूरे होने का प्रमाण शिष्यों को पहले ही दे दिया था । एक पूर्ण गुरू पहले अपने शिष्य को यह पूर्ण स्वतंत्रता देते हैं कि वह उनकी गुरूता की परख करे । शास्त्र ग्रंथों में वर्णित कसौटी के आधार पर उनका परीक्षण करें और जब वे इस कसौटी पर खरे उतर जाएं तभी उन्हें गुरुरूप में स्वीकार करें । कहने का भाव है कि पहले गुरू अपने पूर्ण होने की परीक्षा देते हैं, तभी शिष्य की परीक्षा लेते हैं । इस क्रम में वे अपने शिष्य को अनेक परीक्षाओं के दौर से गुजारते हैं । कारण एक नहीं अनेक हैं सर्वप्रथम *खरी कसौटी राम की कांचा टिके ना कोए* । गुरू खरी कसौटी के आधार पर शिष्य को परखते हैं कि कहीं मेरे शिष्य का शिष्यत्व कच्चा तो नहीं है ठीक एक कुम्हार की तरह । जब कुम्हार कोई घड़ा बनाता है तो उसे बार-2 बजाकर भी देखता है टन-2 वह परखता है कि कहीं मेरा घड़ा कच्चा तो नहीं रह गया, इसमें कोई खोट तो नहीं है । ठीक इसी प्रकार गुरू भी अपने शिष्य को परीक्षाओं के द्वारा ठोक बजाकर देखते हैं । शिष्य के विश्वास,प्रेम, धैर्य, समर्पण, त्याग को परखते हैं, वे देखते हैं कि शिष्य के इन भूषणों में कहीं कोई दूषण तो नहीं, कहीं अहम की हल्की सी भी कालिमा तो इसके चित्त पर नहीं छायी हुई । यह अपनी मनमति को विसार कर पूर्णतः समर्पित हो चुका है या नहीं । क्यूंकि जब तक सुवर्ण में मिट्टी का अंश मात्र भी है उससे आभूषण नहीं गढ़े जा सकते । मैले, दागदार वस्त्रों पर कभी रंग नहीं चढ़ता, उसी तरह जब तक शिष्यों में जरा सा भी अहम, स्वार्थ, अविश्वास या अन्य कोई दुर्गुण है तब तक वह अध्यात्म के शिखरों को नहीं छू सकता । उसकी जीवन रूपी सरिता परमात्म रूपी सागर में नहीं समा सकती । यही कारण है कि गुरू समय-2 पर शिष्यों की परीक्षाएं लेते हैं । कठोर ना होते हुए भी कठोर दिखने की लीलाएं करते हैं । कभी हमें कठिन आज्ञाएं देते हैं तो कभी हमारे आस पास प्रतिकूल परिस्थितियां पैदा करते हैं क्यूंकि अनुकूल परिस्थितियों में तो हर कोई शिष्य होने का दावा करता है । जब सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा होता है,तो हर कोई गुरू चरणों में श्रद्धा और विश्वास के फूल अर्पित करता है । सभी शिष्यों को लगता है कि उन्हें गुरू से विशेष स्नेह है । *झंडा गडियो प्रेम का चहुं दिश पीयू-2 होय ना जाने इस झुंड में कोन सुहागिन होय* । प्रत्येक शिष्य अपने प्रेम का झंडा गाड़ता है, पर किसे पता है प्रेमियों के इस काफिले में कौन मंजिल तक पहुंच पाएगा । कौन सच्चा प्रेमी है इसकी पहचान तो विकट परिस्थितियों में ही होती है क्यूंकि जरा सी विरोधी व प्रतिकूल परिस्थितियां अाई नहीं कि हमारा सारा स्नेह, श्रद्धा और विश्वास बिखरने लगता है, शिष्यत्व डगमगाने लगता है जब श्री गुरू गोविंद सिंह जी ने अपने शिष्यों को कसौटी पर कसा तो हजारों के झुंड में से पांच प्यारे ही निकले ।जब लैला के देश में मजनू को मुफ्त में चीजें मिलने लगी थी तो एक लैला के कई मजनू पैदा हो गए थे, परन्तु जब लैला ने मजनू के जिगर का एक प्याला खून मांगा तो सभी नाम के मजनू फरार हो गए, केवल असली मजनू रह गया । स्वामी जी यदि आप खबर कर देते तो हम अवश्य ही आपकी सेवा में हाजिर हो गए होते फिर मजाल है कि आपको आनंदपुर छोड़ना पड़ जाता ।आप एक बार हमें याद करते तो सही, यह गर्वीले शब्द थे भाई डल्ला के । श्री गुरू गोबिंदसिंह जी ने भाई डल्ला को नजर भर कर देखा, मुस्कुराए और कहा अच्छा भाई डल्ला जरा अपने किसी सिपाही को सामने तो खड़ा करना । आज ही नई बंदूक अाई है इसे मैं आजमाना चाहता हूं, गुरू ने बन्दूक को क्या आजमाना था, आजमाना तो था भाई डल्ला को । डल्ला ने यह सुना नहीं कि उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई, तभी श्री गुरुगोबिंद सिंह जी ने अपने शिष्यों को बुलावा भेजा, दोनों सरपट दौड़ते आए । इन्हें भी वही आज्ञा सुनाई गई, दोनों एक दूसरे को पीछे करते हुए कहने लगे महाराज निशाना मुझ पर आजमाइए । दूसरा कहता नहीं महाराज मुझ पर आजमाइए । श्रीगुरू गोविंद सिंह जी ने दोनों को आगे पीछे खड़ा करके बन्दूक की गोली उनके सिर के पीछे उपर से निकाल दी । गुरू को मारना किसे था केवल परीक्षा लेनी थी इसलिए सच्चा शिष्य तो वही है जो गुरू की कठिन से कठिन आज्ञा को भी शिरोधार्य करने का दम रखता है चाहे कोई भी परिस्थिति हो, उसका विश्वास व प्रीति गुरू चरणों में अडिग रहती है । सच, शिष्य का विश्वास चट्टान की तरह मजबूत होना चाहिए । वह विश्वास, विश्वास नहीं जो जरा से विरोध की आंधियों में डगमगा जाए । गुरू की परिस्थितियों को देखकर वह उन्हें त्याग जाए । गुरू की परीक्षाओं के साथ एक और महत्वपूर्ण तथ्य जुड़ा है वह यह है कि परीक्षाएं शिष्य को केवल परखने के लिए नहीं होती हैं, निखारने के लिए होती हैं । तभी कबीर दास जी ने कहा कि जहां यहां *खरी कसौटी राम की, कांचा टिके ना कोय ।* वहीं एक अन्य साखी में यह भी कह दिया *खरी कसौटी तौलता,* *निकसी गई सब खोंट।* अर्थात गुरू की परीक्षा एक ऐसी कसनी कसौटी है जो साधक के सभी दोष, दुर्गुणों को दूर कर देती है । परीक्षाओं की अग्नि में तप कर ही एक शिष्य कुंदन बन पाता है । बुल्लेशाह इसी अग्नि में तपकर साईं बुल्लेशाह बने, उनके गुरू शाह इनायत ने उन्हें इतने इम्तिहानों के दौर से गुजारा । एक समय तो ऐसा भी आया जब उन्हें प्रताड़ित कर आश्रम तक से बाहर निकाल दिया गया, उनके प्रति नितांत रूखे व हृदय हीन हो गए । बहुत समय तक उन्हें अपने दर्शन से भी वंचित रखा, परन्तु यहां हम सब यह याद रखें कि बाहर से गुरू चाहे कितने भी कठोर प्रतीत होते हैं किन्तु भीतर से उनके समान प्रेम करने वाला दुनिया में और कोई कहीं नहीं मिलेगा । उनके जैसा शिष्य का हित चाहने वाला और कोई नहीं । वे यदि हमें डांटते, ताड़ते भी हैं तो हमारे ही कल्याण के लिए, चोट भी मारते हैं तो हमें निखारने के लिए ।यही उद्देश्य छिपा था शाह इनायत के रूखेपन में, वे अपने शिष्य का निर्माण करना चाहते थे इसलिए उन्होंने बुल्लेशाह को वियोग वेदना की प्रचंड अग्नि में तपाया । जब देखा कि इस अग्नि परीक्षा में तपकर शिष्य कुंदन बन चुका है तब वे उस पर पुनः प्रसन्न हो गए, ममतामय, प्रेम भरे स्वर में उसे बुल्ला कह कर पुकारा । बुल्ला भी गुरू चरणों में गिर कर खूब रोया और बोला हे मुर्शीद ! मैं बुल्ला नहीं भुल्ला हूं । मुझसे भूल हुई थी जो मैं आपकी नज़रें इनायत के काबिल ना रहा । साईं इनायत ने उसे गले से लगाकर कहा नहीं बुल्ले तुझसे कोई भूल नहीं हुई । यह तो मैं तेरी परीक्षा ले रहा था, तुझे इन कटु अनुभवों से गुजारना आवश्यक था ताकि तुझमें कहीं कोई खोट ना रह जाए, कल को कोई विकार या सैयद होने का अहम तुझे भक्ति-पथ से डिगा ना दे और तू खुदा के साथ ईकमिक हो पाए । स्वामी रामतीर्थ जी प्रायः फ़रमाया करते थे कि यदि प्यारे के केशों को छूने की इच्छा हो तो पहले अपने को लकड़ी की भांति उसके आरे के नीचे रख दो जिससे चीर-2 कर वह तुमको कंघी बना दे । कहने का भाव है कि गुरू की परीक्षाएं शिष्य के हित के लिए ही होती हैं । परीक्षाओं के कठिन दौर बहुत कुछ सीखा जाते हैं, याद रखें सबसे तेज़ आंच में तपने वाला लोहा ही सबसे बढ़िया इस्पात बनता है । इसलिए एक शिष्य के हृदय में सदैव यही प्रार्थना के स्वर गूंजने चाहिए कि हे गुरुदेव ! मुझमें वह सामर्थ्य नहीं कि आपकी कसौटियों पर खरा उतर सकूं, आपकी परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो सकूं परन्तु आप अपनी कृपा का हाथ सदैव मेरे मस्तक पर रखना,मुझे इतनी शक्ति देना कि मैं हर परिस्थिति में इस मार्ग पर अडिग होकर चल पाऊं । मुझे ऐसी भक्ति देना कि आपकी कठिन से कठिन आज्ञायों को भी पूर्ण समर्पण के साथ शिरोधार्य कर सकूं । आपके चरणों में मेरा यह विश्वास अटल रहे कि आपकी हर करनी मेरे परम हित के लिए ही है, मैं गुरू का गुरू मेरे रक्षक यह भरोसा नहीं जाए कभी जो करिहे हैं सो मेरे हित्त यह निश्चय नहीं जाए कभी ।
All posts by Gurubhakti
बाबा बुल्लेशाह कथा प्रसंग भाग 10
बुल्ले शाह का ऐसा बेढंगा रूप देखकर इनायत शाह भी मंद मंद मुस्कुरा उठे, बुल्लेशाह दौड़कर महफिल के चबूतरे पर खड़ा होकर गाने लगा कि,चाहे यह दुनिया सौ बाते बनाएं, मखौलो के कितने ही तूफां उठाए।*मुझपर श्रद्धा की बीजली गिरी है, मुझे अब किसी की भी परवाह नहीं है।* बुल्लेशाह ने इनायत की तरफ इशारा करते हुए आगे गाया.. कि*रूहानी शाम का तोहफा ये लाया हूं तुम्हारे ही लिए,**मै सराफा सजके आया हूँ प्रभु तुम्हारे ही लिए।**यह खनकने वाले हर घुघंरू की छन-छन, हाथों की कत्थई मेहंदी, बाजूए में सजे कंगन,बालों का गजरा, पेशानी पर सजी बिंदिया की झिलमिल तेरी एक मुस्कान है मेरे सभी गहनों की मंजिल।**तुम कहो तो नीली नीली रात का सुरमा लगा लू,**दो इजाजत तो फूलों को अपने गालों पर सजा लू।* *तुम कहो तो मैं आसमा को खींचकर के ओढ लूंगा,**इन सितारों को उठाकर बालियों में जोड़ लूंगा।**तुम मेरे साजन.. गुरु… तुम मेरे रांझण… मेरे आका हो मेरे ओलिया हो…. चांद पर चढ़कर जमाने से कहूं तुम मेरे क्या हो,**दुल्हनों का पैरहन पहना है बस खातिर तुम्हारे ,ओ इनायत तुम मुझे इस जिंदगी से भी हो प्यारे।*बुल्ले शाह जज्बातों के तूफान से जूझ रहा था। इतना गाकर वह इनायत के चरणों में गिर पड़ा.. और सहसा फिर खड़ा होकर गाने लगा कि, *”बुल्ला में जोगी नाल ब्याही लोका कमलया खबर ना काई मैं जोगीदा माल पाजें पीर मनाके।* ए मेरे ओलीया इनायत! मेरी रूह का तेरे साथ निकाह हो चुका है जमाने को इसकी खबर नहीं शायद इसलिए हंसते हैं। *मैं वसा जोगीदा नाल ने मत्थे तिलक लगाके, मैं वससा न रहसा होड़े कौण कोई न जांदी न मोड़े।* मेरे जोगिया मैं तेरे निगाहों में रहकर आखरी मुकाम तक तेरे साथ जाऊंगी देखती हूं किस दुनिया में तुफा में ताकत है कि मेरा रुख मोड़ दे। *माही नहीं कोई नूर इलाही, अनहद दी जिस मुरली बाही। लक्खा गए हजारा आए उस देह किसे न पाए, जोगी नहीं कोई जादू साया। भर भर प्याला शौक पलाया, मैं पीती हुई निहाल अंग विभू रमाके। रांझा जोगीड़ा बन आया, वह सांगी सांग रचाया। कुन फैकुन आवाजा आया, तखत हजारों रांझा धाया* सुनो साक्षात खुदा ही अपना ला मुकाम छोड़कर मेरा माही जोगी बनकर उतर आया है। इसलिए मेरी रूहे हीर उसकी दीवानगी में गुम है । उसकी इश्क की मोहताज है । बुल्लेशाह अपनी अदंरूनी भावनाओं को काफियों के धागे में पिरोकर रख रहा था । शिष्य और आशिक मजाक भूलकर बुल्लेशाह की रवानगी में बहने लगे । गुरु भाई और संगत उसकी इस अलबेली अदाओं पर फिदा हो उठे । किसी ने कहा, वाह! तो किसी ने कहा, सुभान अल्लाह! मगर उधर इनायत बुल्ले को यूं अजनबी सी हालत में देखकर पहले तो मंद मंद मुस्कुराते रहे परंतु फिर अचानक गंभीर होकर तख्त छोड़कर अपनी कुटिया में चले गए । परंतु ऐसा क्यों ? इनायत तो महफिल की आखरी कव्वाली तक को इज्जत बक्श के जाते थे। यहां जुटे अपने हर एक शिष्य हर आशिक की हर कही अनकही भावना को सुनकर जाते थे। साथ ही अपनी रहमतों के नजराने नवाज कर जाते थे। मगर, आज क्या हो गया ? अभी तो बहुत कुछ बाकी था। अभी तो गुरु के दीद से दिल भरा ही ना था । गुरु के रवाना होते ही महफिल में सन्नाटा छा गया.. जैसे झन्ना के चटक जाए किसी साज का तार …जैसे रेशम की किसी डोर से कट जाती है उंगली ….ऐसे एक दर्द सा होता है …कहीं सीने में खींचकर तोड़नी पड़ जाती है जब तुझसे नजर। तेरे जाने की घड़ी सख्त घड़ी होती है। बुल्ले शाह इसी सोच के दायरे में था कि तभी एक गुरु भाई ने उसे आकर कहा कि, बुल्ले! शाहजी तुम्हें याद फरमाए है। बुल्ले शाह तुरंत इनायत शाह की तरफ दौड़ पड़ा । परंतु यह क्या इनायत बाहर शामियाने में कुछ और थे कुटिया में कुछ और उनके होठों पर खिलती मुस्कान गायब थी। चेहरे पर नितांत गंभीरता थी।बुल्ले शाह डर सा गया। दोनों हाथ एकाएक कानो तक उठ गए। इनायत ने निगाहें उठाकर उसे सिर से पैर तक निहारा… बड़ी पैनी नजर थी.. गुरू की । जिन अंगो को भी ये निगाहें छुती वही वही से बुल्ला सिमटता सिकुड़ता चला जाता। कुछ देर बाद तो वह एक सिमटी हुई पुड़िया बन गया। गर्दन झुक गई । ठुड्डी छाती से जुड़ी । तभी इनायत शाह बोले बुल्ले हमें पता है तेरी मनसा का.. हम वाकिफ है तेरी जज्बातों से… अच्छी तरह जानते हैं कि तू ऐसे क्यों सजा धजा है… हम तेरे इन भावों की कद्र के साथ-साथ इज्जत भी करते हैं । मगर बुल्ले! हमें तेरा यह अंदाज पसंद नहीं आया। दुनिया का इश्क जिस्मानी है इसलिए वो जिस्म को ही सजाते सवारते है। लेकिन तेरा और मेरा रिश्ता तो रूहानियत का है। इस रूहानी इश्क के रस्मो रिवाज अलग है । इसमें जिस्म को नहीं आत्मा को सजाना होता है। इनायत की निगाहें बुल्ले शाह के एक एक श्रृंगार को निहारने लगी फिर बोले, बुल्ले! मुझे तेरी आत्मा का श्रृंगार चाहिए। उसके लिए इन सोने-चांदी के गहनों की जरूरत नहीं। श्रद्धा ही आत्मा की बिंदिया है.. विश्वास ही आत्मा का सिंदूर है… और धैर्य ही आत्मा की लाली है । प्रेम और शांति ही आत्मा के जेवर है.. तुझे सजना है तो ऐसा आत्मिक श्रृंगार कर। यही शिष्य का सच्चा श्रृंगार होता है। जिस्म फ़ानी को सजाने से क्या हासिल होगा मौत के घर में उसे एक दिन तो जाना है तू अपनी रूह को सवार.. उसे झाड़ और पोछ कि जिसकी मंजिल उस खुदा का आशियाना है। बुल्ला अपने गुरु को एक टक देखता और सुनता रहा । और पछतावे की खाई में मानो अपने आपको गिरता हुआ पाया। परंतु गुरु उसे ऐसा ना देख सके गुरु होते ही ऐसे हैं आकाश की बुलंदियों से शिक्षाओं के इशारे करते हैं । मगर शिष्य गर्दन उठाने के सिलसिले में अगर हीनता का झटका खाकर फर्श पर आ गिरे तो वे बेचैन हो उठते हैं। झठ ऊपर से उतरकर अपने शिष्य को बांहों में थाम लेते हैं । क्योंकि गुरु का एक मकान ऊंचा आसमान है.. तो दूसरा शिष्य का हदय है। वे अपने इस प्यारे आशियाने को तिनका तिनका बिखरते कैसे देख सकते हैं? दिल में बस कर जिसके वो हर वक्त रहते हैं, उसे फिर दर्द के घेरों में कैसे देख सकते हैं ?इनायत भी ना देख सके इसलिए अपनी गुरुता को एक ओर छोड़कर जोर से ताली बजा उठे। निगाहों में मस्ती से लिए बोले…”अच्छा छोड़… जो हो गया सो हो गया… वैसे माशाल्लाह.. तु बेहद हसीन लग रहा है । अच्छा तूने यह चुटीया गुथनी कहां से सीखी ? बुल्ले शाह पल्लू उंगली पर लपेटता हुआ बोला, “शाह जी मैं तो सब उल्टा पुल्टा कर बैठा। गुस्ताखी माफ हो।”इनायत उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, “ओ ना न यह गुस्ताखी नहीं है , हमें तो इससे तेरी शिष्शत्व की खुशबू आ रही है। तेरे सीने में धधकती मशाले इश्क की सीख मिल रही है.. तेरी मोहब्बत का सबूत है।” “मगर उसे पेश करने का तरीका तो गलत ही था ना शाह जी।” बुल्ले शाह बीच में ही बोल गया ।इनायत शाह मुस्कुरा उठे, परंतु न हाँ कहा न ना । बुल्ला समझता था कि गुरु की मुक मुस्कान गलती का इजहार होती है । वह झठ खड़ा हुआ सीने पर हाथ रखकर बोला”इजाजत दो गलती सुधारने का मौका चाहता हूं।” अब बुल्ला फूर्ती से कुटिया से निकला और अपनी कुटिया में जा पहुंचा। कुछ ही देर में वह फिर बाहर आया मगर अब अपने लिबास में आया। श्रृंगार जल्दबाजी में उतरा हुआ था। पोछने के चक्कर में लाली कानों तक जा पहुंची । पानी के छक्के मारकर काजल उतारने की पूरी पूरी कोशिश की हुई थी ..मगर इससे बुल्ला और भी भयानक लगने लगा । सिर के सिंदूर का भी यही हाल था। वह भी मांग की तंग सड़क छोडकर बाहर आ गई। खैर बुल्ले को इस सबकी खबर कहाँ, उस पर तो कोई और ही धून सवार थी । पूरी रफ्तार से वह फिर महफिल मे जा पहुंचा। गुरू भाई उसे फिर से देखकर दंग रह गए। परंतु बुल्ला सीधा मंच पर जा खड़ा हुआ इस दफा कोई लटका ..झटका नहीं, पूरे होशो हवास में था। अब कि वह दीवानगी में झुमने नहीं आया था.. गुरु का संदेश देने आया था। *कर कतण वन ध्यान कुड़े तु आपड़ा दाज रंगा लैनी, तु तद होवे परधान कुड़े। इक औखा वेला आवेगा, सब साके सैठा भज जावेगा। कर मदद पार लम्हावेगा ओ बुल्ले दा सुल्तान कूड़े* अर्थात… हे मेरी आत्मा रूपी लड़की… शरीर को सजाना छोड़ उस सिमरन के दहेज को इकट्ठा कर जो तेरे साथ जाएगा। इसी से तेरे गुरु रीझेंगे। आखिरी वक्त में मुश्किल की घड़ियों में तेरा सच्चा सुल्तान तेरे गुरु ही तुझे पार लगाएंगे। इसलिए सतगुरु के शिष्यों हे मेरे भाइयों ! एक लम्हा भी बर्बाद ना करो ।
बाबा बुल्ले शाह कथा प्रसंग भाग -9
बुल्लेशाह के पिताजी ने बुल्लेशाह को हँसी-खुशी उस के गुरु के पास रहने की अनुमति दे दी। इनायत की रंगी दुनिया में बुल्लेशाह का खूब-खासा बसर होने लगा।जाहिर है जब शिष्य समस्त क़ायनात के सुख-वैभव, नजारों को लतिया डाले तो गुरु के शाही खजाने उसके लिए लूटने को बेकरार कैसे न हो?इनायत शाह ने बुल्लेशाह को अपने इश्क़ का अनमोल नजराना दे डाला। उसके तन-मन और कतरे-2 को अपना आशियाना बना लिया। उसे खुद को दे दिया।अब तो बुल्लेशाह की आँखों का जलवा सिर्फ इनायत हो गये, उसके सद्गुरु हो गये। कानों की खुराक सिर्फ गुरु के ही बोल, साँसों का चलना-रुकना सिर्फ गुरु की एक मुस्कान का मोहताज़ !दिल का हँसना-रोना उनके ही इशारों का गुलाम! बुल्लेशाह की हर सोच के ताने-बाने में उसके गुरु गूथ गये।*ख्वाइशों-तम्मनाओं का फूल-2 भी न हो उठा इनायत,**दिल की फ़िजा में इश्क़-बहार छा गये!* *खोशा नसिब की इश्क़ पर छाई फ़सले बहार,* *घटाएँ झूम उठी, फजाएँ हो गई शरसार!*ऐसी रंगत ,ऐसी शरसारी चढ़ी कि बुल्लेशाह प्रेम की रंगशाला बनता गया।*प्राण पत्थर थे,अब फूलमाला हुए,**हम अँधेरों में हँसता उजाला हुए!**गुरु की प्रीति के रंग ने जब हमें रँग दिया,**हम स्वयं प्यार की रंगशाला हुए!*इन नवाजिशों को दामन में बटोरकर बुल्लेशाह प्रेमडगर पर डग भर रहा था कि एक दिन आश्रम के लिए कुछ खरीददारी करनी थी। बुल्लेशाह बाजार की तरफ चल पड़े। एकाएक उसकी नजर एक मकान के ऊँचे छज्जे पर गई। वहाँ एक युवती बैठी थी।युवती आईने के सामने साजो-श्रृंगार कर रही थी – “माँग में कुमकुम, माथे पर बिंदिया,नैनों में सुरमयी सुरमा, होठों पर लाली, कलाइयों में खनखन करती सतरंगी चूड़ियाँ!”बुल्लेशाह अचकचा गया। वह टकटकी लगाये उसे देखता रहा।ऐसा नहीं कि आज से पहले उसने किसी सजी-सँवरी युवती को नहीं देखा था या फिर इस सुंदर लड़की पर उसका मन तरंगित और ईमान डोल उठा था। नहीं,ऐसा भी नहीं कि वह श्रृंगाररस का बिल्कुल ही गैर जानकर था। वह अपनी चटकीली-तड़किली बहनों-भाभीयों की सोहबत में रह चुका था, लेकिन बस आजतक इस ओर उसने कभी ग़ौर ही नहीं फ़रमाया था। सिर्फ अपनी दुनिया में मशगूल रहता था, लेकिन आज इस नजारे ने उसकी सुरूर भरी आँखों पर दस्तक दे डाली। “यह कैसा अजीबो-गरीब शौक़!आखिर ये लीपा पोती क्यों, किसलिए ?” बुल्लेशाह सोचने लगा।वह सहसा बोल पड़ा- “आपा, सुनो बहन! तुम ऐसे सज-सँवर क्यों रही हो?”युवती ने कनखियों से निचे झाँका। लिबास और हुलिए से पहचान गई कि,शाह इनायत का कोई शागिर्द है। उनके आश्रम का अनब्याहा शिष्य है। दिखने में जरूर छड़ा नौजवान है मगर चेहरे पर किसी बच्चे का भोला परछावा है,आँखों मे मासूमियत का भाव है,फिर पुकार भी तो आपा रहा है अर्थात बहन कहकर बुला रहा है। इसलिए वह खिलखिलाकर हँस पड़ी। चुटकी कसते हुए बोली, “क्या बताऊँ,तुम जैसे बरवे कलंदर को? जाओ शेख जी,जाओ! शागिर्दी करो! बा-ईमान इबादत करो, वरना नाहक़ तुम्हें अपने गुरु की नाराजगी झेलनी पड़ेगी।”बुल्लेशाह ने उसी सादे मिजाज से फिर पूछा,”बताओ न आपा! यह ज़ेबों-ज़ीनत, बनाव-सजाव क्यों?आखिर किस वजह से, सबब क्या है इनका?”युवती झेंपते हुए बोली,”उफ़! एक तो गुस्ताख़ और अड़ियल हो, उपर से नादान डप्पू भी। अरे मियाँ! तुम क्या जानो इश्क़ के राज! मोहब्बतों-उलफ़्तों के किस्से तुम्हारे अल्हड़ वैरागी खोपड़ी में कहाँ घुसने वाले है?”अच्छा, जरा बताओ – “परवाना शम्मा पर क्यूँ फ़िदा होता है?इसलिए ना क्योंकि, शम्मा नारंगी अंगारों का श्रृंगार करती है!चटकीली चिंगारियो और शरारों से सजी-धजी रहती है! है ना?”बुल्लेशाह ने बाँवरे की तरह हाँ में सिर हिला दिया।”समझो मियाँ! सजीले-सँवरे रूप पर ही आशिक़ सैदा होते है। मैं भी अपने शौहर के लिए सँवर रही हूँ।” युवती खनकती हँसी के साथ छमछम करती हुई अंदर चली गई।बुल्लेशाह ने सोचा कि,”बुल्ले मोहब्बत तो तूने भी की है। मुकामे इश्क़ को फ़तह करने के ख्वाब तो तूने भी देखे हैं। अरे पगले! इनायत तेरे हबीब-महबूब है, दिलबर-दिलनशीं है, तेरे खसम, खाविंद, शौहर, सिरताज सबकुछ वही तो है! जहानवालों की इश्कबाजी तो रँगमिजाजी है, ऐशपरस्ती है,अय्याशी का जरिया है,जिस्मानी है। बुढ़ापे या फिर कब्र के अजाब में दफन हो जाती है, मगर तेरा तो इश्क और माशूक़ दोनों ही रूहानी है, ईलाही है। तेरी तो रूह ने अपने गुरु से पाक आशिक़ी की है और यह ईलाही इश्क़ ऐसा कि कयामत तक बरकरार रहेगी। कयामत के दिन भी तेरी धड़कनों को गुलजार करेंगी गुरु की याद से। फिर तू अपने माशूक़ के वास्ते क्यूँ नहीं सजता-सँवरता? हो सकता है इनायत रीझकर मुस्कुरा दे! गुरु की मुस्कान कितनी प्यारी होती है कि समस्त संसार उस एक मुस्कान पर न्योछावर! हाँ-2 चल, बन-ठन श्रृंगार कर!”*दिल ये कहता है तुझे सजना-सँवरना होगा,**अपनी साँसों से बँधी शांतिपूर्ण आयत के लिए,**अपने नस-2 में बसे रिश्ते की सतित्व के लिए।**ये रस्म अच्छी है इस इश्क़ की निस्बत के लिए,**की तू प्रेयसी सा सजे अपने इनायत के लिए!* *सुर्ख सिंदूर अब इस माँग में भरना होगा,* *दिल ये कहता है बुल्ले,**तुझे सजना-सँवरना होगा!*बुल्लेशाह पोशाक सज्जावाले दर्जी समशेरखाँ की दुकान पर चला गया। दर्जी बुल्लेशाह का पुराना मित्र था। “भाई हमें एक बढ़िया सा लिबास उधार दे दो। हो सके तो भाभीजाँ का कुछ साजो-श्रृंगार भी देना।”समशेरखाँ आँखे मटकाते हुए दोस्ताना अंदाज में पूछ ही बैठा कि,”जनाब! तबियत तो ठीक है!” बुल्लेशाह ने कहा कि ,”तबियत को ही तो हरा करने की कोशिश कर रहा हूँ मियाँ!”बुल्लेशाह सारा साजो-सामान जुटाकर अस्ताने अर्थात आश्रम लौट आया। सीधा अपनी कुटिया की राह ली। किवाड़ बन्द कर साकल लगा दी। संध्या हो चली। रोजाना की तरह आश्रम के बीच के खुले आँगन में कव्वाली और मुशायरे के लिए खुदा के आशिक जुट रहे थे। मुहूर्त हो चुका था।महफ़िल शबाब में थी।गुरुभाइयों ने बुल्लेशाह का किवाड़ खटखटाया। “बुल्ले!शाहजी तख्त पर तशरीफ़ रख चुके हैं, इसलिए फौरन बाहर आओ।”आवाज को कोई जबाब नहीं मिला, मानो बन्द किवाड़ से निगल गया। दोबारा, तिबारा उन्हें खटखटाया मगर हरबार उन्हें चीरकर सिर्फ़ सन्नाटा ही बाहर आया। गुरुभाई भी कुछ समय बाद वापस महफ़िल में आकर बैठ गए।यहाँ इनायत अपने नूरानी जलाल से शिष्यों को नूर नवाज रहे थे।काफियों के तरन्नुम पर फ़िज़ा झूमने लगी। हारमोनियम, नफिरियाँ, ढोलकियाँ साथ बज रही थी, परन्तु तभी इन धुनों से जुदा एक निराली छमछम ने दखल दिया। यह घुंघरुओं की रुनझुन रुनक-झुनक थी, कंगनों की खनक थी। सभी की नजरे झंकार की ओर मुड़ गई। यह क्या? सामने जो नजारा था, वह आश्रम के इतिहास में पहली बार दिखा था।एक छरहरे शरीर और लम्बे डील की युवती तड़किले-भड़कीले शरारे में चमकीलीे ज़री और गोटों से मढ़ा सिर पर लम्बा घुँघट!सबकी भौहें कमान सी तन गई।आँखों मे हैरानी तैर गई। मन की जमीन पर क्यों और कैसे के सवाल आकार ले उठे। इससे पहले कि यह सवाल कोई अंजाम लेते कि झन्नाटे से घुँघट उठ गया।सामने सजीला बाका बुल्लेशाह खड़ा था। मोटी-2 भौवों के बीच टिकी-बिंदिया, घनी-बिखरी दाढ़ी-मूँछो के बीच से चमकते लाली पुते होंठ, दाढ़ी के बीच गालो पर चढ़ी गाढ़ी लाली, अपलम-चपलम उसने अपने उलझे बालों को ही गूथ लिया था, टेढ़ी-मेढ़ी माँग में सिंदूर भरा था।भरा नहीं था, उड़ेल डाला था।जितना सजना मुमकिन था, उतना सजा हुआ था।यह देख गुरुभाइयों की आँखों की पुतलियाँ बाहर सी आ गई। कुछ पल तो सबको समझने में लगा कि,”आखिर यह अजीबो-गरीब जन्तु कौन है? जब दिमाग ने जरा कसरत की तब पता चला कि बुल्लेशाह है।”बुल्लेशाह शरमाऊँ ढंग से मुस्कुरा उठा। बस अब क्या था, इस मुस्कान ने मौजूदा रसिकों में एक लहर दौड़ा दी। एक नर्म गुलगुली सब दाँत निरोपते हुए पूरी की पूरी बत्तीसी दिखा उठे। ढोलकी, नफिरियाँ एक तरफ चुप, बस हर तरफ किलकारियाँ थी। कोई चुटकियाँ तो कोई तालियाँ बजाकर खिलखिलाने लगा था।कोई ठहाका लगाकर दोहरा हुआ। कोई पेट पकड़कर लोटमपोट हँसने लगा। परन्तु क्या बुल्लेशाह की इस हरकत पर उसके गुरु प्रसन्न होंगे या नाराज़….?—————————————————आगे की कहानी कल के पोस्ट में दिया जायेगा …