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गुरू ने लेटे-लेटे ही की कुछ ऐसी लीला कि शिष्य की निष्ठा अटल हो गई ।


गुरू के प्रति भक्ति-भाव होना अध्यात्मिक निर्माण कार्य की नींव है । भावना का उफान या उत्तेजना गुरू भक्ति नहीं कहलाता । शरीर प्रेम यानि गुरू प्रेम का इन्कार, शिष्य अगर अपने शरीर की देखभाल करता है तो वह गुरू की सेवा नहीं कर पाता ।

साधक के दुष्ट स्वभाव के नाश का एकमात्र उपाय गुरू सेवा है । गुरू की कृपा, गुरूभक्तियोग का आखिरी लक्ष्य है । दशरथ के पिताश्री, स्वयं दशरथ और ब्रह्म राम भी गुरू के द्वार पर गए । सदगुरु दाता तो वैसे भी करुणा करके भर ही देते हैं लेकिन कुछ हमारी ओर से भी कदम उठे, यह आवश्यक है ।

*हमको है यह आरज़ू कि वो नकाब उठाए खुद, लेकिन उनको है इन्तजार कि तकाजा करे कोई* परमात्मा, सदगुरु भगवान अपने आप खुद को लुटा देते हैं लेकिन वह भी कभी-2 चाहते हैं कि तकाजा करे कोई जिसे शास्त्रों ने कहा अथाह तो ब्रह्म जिज्ञासा ।

गुरू के घर में जाना, गुरू के द्वार जाना या सामीप्य पाना इसका मतलब है कि गुरू के घट को टटोलना । गुरू की जागी हुई चेतना का, आत्मा का, चेतना का परिचय पाना । पहुंचे हुए फकीर की आंखों को देखना, लोग यदि पहुंचे हुए फकीर की आंख पहचान लें तो आप कुछ सुनाइए, सत्संग कीजिए यह बोलना ही बंद कर दें ।

*वो पलके झुकाएं, वो पलकें उठाएं, जो जाने सो समझे यही गुफ्तगू है ।* गुरू गृह में जाने का मतलब उनकी जगी हुई चेतना की पहचान के लिए चैतसिक सम्बन्ध जोड़ना, उनके घट में क्या है, क्या लिए बैठे हैं यह जागृत महापुरुष ।क्या मिलेगा उस दर से जो जाने, जो समझे कि यही गुफ्तगू है बात इतनी ही है ।

गुरू के द्वार जाने से, गुरू का सामीप्य पाने से नौ निधि की प्राप्ति होती है । पहली निधि, विषाद से मुक्ति – भगवान करे किसी को विषाद ना हो, परमात्मा किसी को ग्लानि ना दे,

सर्वे भवन्तु सुखि ना: सर्वे संतु निरामया: । हम सब इसी सनातन धर्म की उद्घोषणा करते रहते हैं और यही तो सनातनता है यही शाश्वत है लेकिन जगत में तो सब होता ही रहता है कभी ग्लानि, कभी खुशी, कभी विषाद, कभी प्रसाद यानि प्रसन्नता हम इन द्वन्दों से सटे हुए जी रहे हैं,परन्तु जब कभी मन में विषाद हो तो गुरू गृह जाइए । वहां से कोई प्रसाद लिए बिना नहीं लौटता है, उसका विषाद प्रसाद में कन्वर्ट ना हुआ हो यह असम्भव है । घटना घटती है इसमें कोई अंधश्रद्धा का प्रश्न नहीं है क्यूंकि यह अध्यात्मिक विज्ञान है दुनिया में कहीं भी जाने से विषाद कम नहीं हो पा रहा है ।

इधर-उधर सिर रखने से और हां-हां करने से नहीं लगता कि कहीं विश्राम मिलता है । मिलता है तो विशाल विनय से गुरू द्वार में जाने से मिलता है । उनके सामीप्य से मिलता है तो एक तो हमें गुरू के द्वार पर विषाद से मुक्ति मिलती है हम प्रसाद से भर जाते हैं । जाते हैं तब कुछ और होते हैं, लौटते हैं तो कुछ और हो जाते हैं ।

तो गुरू में ही आपकी निष्ठा हो, गुरू में ही आपकी श्रद्धा हो, बाकी तो संसार विषाद में वृद्धि ही करता है कम तो कहीं नहीं हो पा रहा । विचारों का एक तुमुल युद्ध दिमाग को कसके रखता है इसको आज का साइंस टेंशन कहता है तो विषाद से मुक्त होने के लिए गुरू गृह जाइए ।

दूसरी निधि है विद्या – गुरू के घर में व्यवस्था है विद्या प्रदान करने की । अब विद्या की तो बहुत बड़ी व्याख्या है, कई प्रकार की विद्याएं हैं गोस्वामी जी कहते हैं कि गुरू गृह जाने से समस्त विद्याएं प्राप्त हो जाती हैं यानि साधक की हर क्षेत्र में गति होने लगती है ।

गुरू गृह गए पढ़न रघुराई अल्प काल विद्या सब अाई*

समस्त प्रकार की विद्या गुरू के सामीप्य से गुरू द्वार से साधक को सहज ही प्राप्त हो जाती है । ऐसी विद्या की प्राप्ति होती है जिससे माया का समस्त प्रपंच हमारे लिए सुखद हो जाता है ।

तीसरी निधि – विवेक गुरू के गृह में विवेक की वृद्धि होती है जो गया है उसका विवेक बढ़ता है । विवेक का पंख लगता है और साधक ऊंची उड़ान भरने लगता है ।

चौथी निधि है – विकास, गुरू गृह जाने से हम सांसारिक लोगों के कुछ मनोरथ होते हैं कि हमारा विकास हो और हो और हो ।

विकास की वृद्धि होती है चाहे वह धर्म विकास हो चाहे अर्थ विकास हो, चाहे काम विकास, चाहे मोक्ष विकास

बरनऊ रघुबर विमल जसु जो दायकु फल चारु गुरू चरन सरोज रज*

तो गुरू के सामीप्य से विकास होता है धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में, परंतु यही आखिरी साधन नहीं हैं ।

हमारा दाम कौड़ी का भी नहीं होता और लाखों में मूल्यन होने लगता है, यह गुरू द्वार की महिमा है ।

पांचवी निधि गुरू द्वार से प्राप्त होती है – विश्राम, गुरू के घर से एक दान मिलता है वह है विश्राम का, विकास के बाद विश्राम ना मिले तो विकास किस काम का ।

पैसा बहुत मिल जाए और आप विश्राम ना कर सकें तो क्या, पैसे सबको मिलने चाहिए पर विश्राम परम आवश्यकता है ।

गोस्वामी जी कहते हैं

*जाकि कृपा लवलेश ते, मति मंद तुलसीदास हों पायो परम विश्राम*

गुरू के द्वार पर परम विश्राम की प्राप्ति होती है ।

छठवीं निधि प्राप्त होती है – वैराग्य, गुरुद्वार पर गुरू के सामीप्य से सहज ही साधक में सांसारिक माया से वैराग्य उत्पन्न होने लगता है । बाहर से सब कुछ होगा लेकिन अंदर से असंगता दीन दुगुनी, रात चौगुनी बढ़ती जाएगी । यह गुरू द्वार की महिमा है, गुरू सामीप्य की महिमा है ।

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सातवीं निधि – गुरू द्वार से जिज्ञासा की प्राप्ति होती है, बार-2 गुरू के दर्शन, उनसे मानसिक सम्बन्ध यह साधक के अंतः कर्ण में जिज्ञासा उत्पन्न करती है । जो नहीं देखा, जो नहीं सुना, उस परमात्म तत्व के प्रति जिज्ञासा अथवा तो ब्रह्म जिज्ञासा ।

आठवीं निधि – गुरू द्वार से प्राप्त होती है विचार शून्यता की, हमारे विचार शून्य होने लगते हैं ऐसे महापुरुषों के पास जाने से हमको अनुभव होता होगा कि हमारे विचार शून्य हो जाते हैं लाख सोच के गए हों, कुछ भी नहीं बोल पाते ।

तो गुरू के समक्ष उनके सामीप्य से, दर्शन से साधक सहज ही विचार शून्य हो जाता है और विचार की शून्यता सबसे बड़ी उपलब्धि है । जितनी देर भी उम्र बढ़े विचार शून्यता की जिसको हमारी योग धारणा में पतंजलि की पूरी प्रक्रिया में आगे-2 जाते निर्विकल्प समाधि माना जाता है ।

निर्विकल्प समाधि की अवस्था के लिए गुरू के साधकों को अलग से प्रयत्न नहीं करना पड़ता । गुरू दर्शन और गुरू सामीप्य ही साधक को निर्विकल्पता की ओर ले जाती है ।

नौवीं निधि – गुरू द्वार से प्राप्त होती है विश्वास की, गुरू के घर जाने से विश्वास दृढ़ होता है ।

विश्वास बढ़ाने की कोई भी व्यवस्था विश्व में नहीं है सिवाय गुरू द्वार के, किसी अस्पताल में जाने से या दवाइयां खाने से विश्वास नहीं बढ़ता, भरोसा नहीं बढ़ता । भरोसा बढ़ता है किसी जागृत महापुरुष के चरणों द्वारा, इसलिए सूरदास जी कहते हैं –

*भरोसो दृढ़ इन चरनन ही केरो*

दुनिया में कहीं भी जाओ धोखा ही धोखा मिल रहा है, फरेब मिल रहा है । बहकाने वाले सब उसके यार बन गए और समझाने वाले मुफ्त में गुनहगार बन गए । ऐसे जगत में रहना पड़ता है । गुरू के द्वारा हमारा भरोसा दृढ़ होता है, हमारा मन ऐसा है कि उसमें अनेकों प्रकार की अच्छी-बुरी तरंगें आती रहती हैं ।

अमीर खुसरो अपने गुरू निजामुद्दीन औलिया के इतना निकट था कि गुरू ने उसे छूट दे रखी थी कि वह गुरू के कमरे में रहता, वहीं सोता । क्या भाग्य रहा होगा, एक थाली में भोजन करते, मुर्शीद और शागिर्द दोनों । गुरू की कफनी खुसरो पहनता, निजामुद्दीन औलिया ने कहा भी था,

कि अमीर खुसरो की जब यात्रा पूरी हो तो उसकी कब्र बिल्कुल मेरे निकट बनवाना, दूर मत ले जाना । गुरू का इतना प्यार पाया था अमीर खुसरो ने, एक दिन रात्रि के समय वह पैर दबा रहा था एक तो एकांत है फिर पहुंचे हुए फकीर का एकांत, बात ही कुछ और हो जाती है ।

अंधेरे में भी रोशनी होती है, अमीर पैर दबाता रहा, पांच मिनट के लिए तरंगें बदली मन की, वह पैर दबाते हुए सोचने लगा कि क्या यह सच में पहुंचे हुए पीर हैं ? क्या यह जाग्रत व्यक्ति हैं, या मैंने अंधश्रद्धा से पैर पकड़ लिए हैं ? क्या सचमुच यह पहुंचे हुए हैं ? हमारे जैसे ही खाते-पीते हैं, मजाक करते हैं, टहलते हैं, कहते हैं नींद आ रही है सो जाना है ।

सब संसारियों के ही तो लक्षण हैं, अमीर खुसरो के मन में ऐसे भाव उठने लगे । बार-2 मन में यह ग़लत तरंगें टकराने लगी कि यह सचमुच सच्चे पीर हैं हम सभी जानते हैं कि जब हम बहुत दौड़ रहें हों तो धीरे-2 चलने से विश्रांति मिलती है । धीरे-2 चलने के बाद फिर खड़े रह जाएं तो विश्रांति और बढ़ जाती है ।

खड़े रहने से बैठ जाएं तो अधिक विश्रांति, बैठने से थोड़ा अपने को लेटा दें तो और विश्रांति । बिल्कुल सो जाएं तो और विश्रांति और सोने में भी करवट बदलें तो और विश्रांति । अमीर के मन में यह सब गलत तरंगें चल रही थी उसी समय निजामुद्दीन औलिया ने करवट बदली ।

गुरू की कृपालुता देखिए, वे एक ही शब्द बोलकर करवट बदल लेते हैं कि अमीर बेटे करवट बदल ले ।

बस बात खत्म हो गई गुरू का यही मंत्र था मानों संकेत था जैसे मैंने करवट बदली और मैं विश्राम महसूस कर रहा हूं बेटे तेरे मन में क्या चल रहा है,जरा तू भी करवट बदल ले फिर तो भरोसा दृढ़ हुआ अमीर का *छाप तिलक सब छीनी तोसे नैना लगाकर* फिर क्रांति घटी तो गुरू के बिना विश्वास का दृढ़ीकरण और कौन करेगा । गुरू के द्वार से , गुरू के सामीप्य से यह नौ निधियां जीवन में सहज ही प्राप्त हो जाती हैं ।

अगर आप शिष्य हैं तो यह कथा आपके लिए है ।


प्रत्येक विद्यार्थी के अंदर गुरू के प्रति अपनी विचित्र ही धारणा होती है । जब कोई किसी संत के पास जाता है तब वह उसके वास्तविक स्वरूप को देखने को तैयार नहीं होता । जब संत से आपकी आशाएं पूरी नहीं हो पाती तो आप निर्णय लेते हैं कि यह अच्छे संत नहीं हैं ।

संत के पास पहुंचने का यह अच्छा उपाय नहीं है, संत के पास दृढ़ संकल्प एवम् कुछ सीखने की प्रवृति, प्रबल इच्छा के साथ जाइये । तब वहां कोई भी समस्या नहीं होगी, आप सच्चे गुरु को कैसे प्राप्त कर सकते हैं । शास्त्रों में कहावत है कि जब शिष्य तैयार होता है तो गुरू स्वयं प्रकट हो जाते हैं ।

यदि आप स्वयं तैयार नहीं हैं, परिपक्वता को नहीं प्राप्त हैं तो गुरू आपके पास खड़े भी रहेंगे तो भी आप उन्हें पहचान नहीं पाएंगे । यदि आपको हीरे का ज्ञान ना हो और हीरा वहां प्रस्तुत हो तो आप उसे शीशे का टुकड़ा समझ कर उसकी अवहेलना करते हुए वहां से चले जायेंगे ।

साधना की प्रथम अवस्था में साधक या तो सहज भाव की उपेक्षा करता हुआ अति बौद्धिक बन जाता है या तर्क एवम् बुद्धि की उपेक्षा करता हुआ अत्याधिक भावुक बन जाता है । अति भावुकता या बुद्धि-बाधिता दोनों ही साधक के लिए उपयोगी नहीं क्यूंकि दोनों से ही अहंकार का विकास होता है ।

जो लोग अनुशासन में विश्वास ना करते हों उन्हें ज्ञान या मोक्ष की आशा नहीं करनी चाहिए । केवल कहने मात्र से कोई भी गुरू ज्ञान नहीं देते, वह शिष्य में कुछ लक्षणों को देखने का प्रयास करते हैं । वह जानना चाहते हैं कि कौन कितना तैयार है, कोई शिष्य गुरू की आंख में धूल नहीं झोंक सकता ।

गुरू बड़ी ही सरलता से यह देख लेते हैं कौन सा शिष्य कितना योग्य एवम् प्रौढ़ है । जब गुरू देखते हैं कि शिष्य अब पर्याप्त प्रौढ़ हो गया है तो वे उसे उच्च शिक्षाओं के लिए क्रमशः तैयार करना शुरू कर देते हैं ।

जब बत्ती और तेल दोनों तैयार हो जाते हैं तब गुरू इस दीप को जला देते हैं यही गुरू का काम है और दिव्य प्रकाश ही, आत्म प्रकाश ही इन सभी प्रयासों का परिणाम है । गुरू के पास शिक्षा देने की अनोखी विधियां होती हैं और कभी कभी बहुत रहस्यमय भी होती हैं ।

वे अपनी वाणी तथा कर्म से शिक्षा देते हैं किन्तु कुछ विशिष्ट प्रसंगों में बिना मौखिक वार्तालाप के भी बहुत सी शिक्षाएं दे सकते हैं क्यूंकि अनेकों महत्वपूर्ण शिक्षाएं जिनका मूल बुद्धि से परे प्रतिभा एवम् प्रज्ञा के साम्राज्य में है उन्हें वाणी से व्यक्त नहीं किया जा सकता ।

एक बार किसी साधक ने अपने गुरू से कहा कि वे उनको अच्छा नहीं पढ़ा रहे । गुरू ने कहा यहां आओ कुछ देर के लिए मैं तुम्हारा शिष्य बन जाता हूं और तुम मेरे गुरू बन जाओ और वैसा ही व्यवहार करो जैसा मैं तुम्हारे साथ करता हूं ।

शिष्य ने कहा किन्तु मुझे यही ज्ञात नहीं है कि क्या करूं । गुरू ने कहा कि चिंता मत करो तुम सब जान जाओगे, इसके बाद गुरू अपनी आंखें बंद किए हुए हाथ में छिद्रयुक्त जल पात्र लेकर आए और बोले गुरुजी मुझे कुछ दीजिए ।

शिष्य ने कहा मैं कैसे कुछ दे सकता हूं, आपके पात्र में एक बड़ा सा छिद्र है । तब गुरू ने कहा अपना नेत्र खोलकर कि तुम्हारे अंतः कर्ण में भी तो छिद्र है और मुझसे कुछ प्राप्त करना चाहते हो । जब स्वयं में छिद्र होता है तब अन्य में हम दोष दर्शन करते हैं ।

स्वयं का पात्र दुरुस्त करो, गुरू से कुछ अपेक्षा रखने की आवश्यकता नहीं, गुरू स्वयं तुम्हें देने के लिए ही बैठे हैं । तुम अपेक्षा ना भी रखो तो भी वे तुम्हारी झोली भरने के लिए ही बैठे हैं । स्वामी शिवानंद जी कहते हैं कि संसार सागर से उस पार जाने के लिए सचमुच गुरू ही एकमात्र आधार हैं ।

सत्य के कंटकमय मार्ग में आपको गुरू के सिवा और कोई उचित मार्ग दर्शन नहीं दे सकता । गुरुकृपा के परिणाम अदभुत होते हैं, ये दैनिक जीवन के संग्राम में गुरू आपको मार्गदर्शन देंगे और आपका रक्षण करेंगे ।

गुरू ही ज्ञान के पथ प्रदर्शक हैं, गुरू, ब्रह्म, ईश्वर, आचार्य, उपदेशक, दैवीय गुरू आदि सब समानार्थी शब्द हैं इसलिए ईश्वर को प्रणाम करने से पहले अपने गुरू को प्रणाम करो क्यूंकि वे आपको ईश्वर के पास ले जाते हैं ।

क्या आपने ईश्वर को देखा है? (सन्यासी का आध्यात्मिक सफर) भाग २


जब कोई व्यक्ति संसार मे सफलता हासिल करने निकलता है तो सभी रिश्तेदार उसका हौसला बढ़ाते हैं, जब तक किसी कला मे कुशल होने की कोशिश करता है तो सभी मित्र और शिक्षक उसे हिम्मत देते हैं, प्रोत्साहित करते हैं यदि आप मिस इंडिया या मिस यूनिवर्स बनने की कोशिश मे है तो आपके लिए बहुत सारे लोग तालियां बजाने को तैयार हो जाते है मगर ईश्वर की खोज करने के लिए कोई आपको प्रोत्साहित नहीं करता। ये मार्ग ऐसा है कि सतगुरु के अलावा इस मार्ग पर आपका हाथ पकड़कर और कोई चलाने मे सक्षम नहीं, स्वयं ईश्वर भी। इस समस्त संसार मे एक सतगुरु ही सच्चे आश्रय दाता है, सच्चे पथ प्रदर्शक है। इस मार्ग पर प्रारंभ मे आपको अकेले ही चलना होगा। नरेंद्र भी जब ईश्वर की खोज के लिए निकले तो शुरुआत मे सभी लोगो ने इसे उनका पागलपन ही समझा लेकिन उनके एक दूर के रिश्तेदार डॉ. रामचंद्र दत्त। जिनके साथ उनकी अच्छी मित्रता हो गई थी, उन्होंने इस मार्ग पर नरेंद्र को प्रोत्साहित किया क्यों कि वे नरेंद्र को अच्छी तरह समझते थे जब नरेंद्र ने बी. ए की परीक्षा दे दी तो घर मे उनके विवाह की बाते होने लगी, उनके पिता ने रिश्ते की बात आगे बढ़ानी चाही तो नरेंद्र ने साफ मना कर दिया क्योंकि बचपन से ही उन्हें शादी, ब्याह मे थोड़ी सी भी रुचि नहीं थी।

उन्हें तो जीवन के अंतिम सत्य की तलाश थी, नरेंद्र को यह तो चेतना थी कि मुझे अंतिम सत्य को पाना है परन्तु उन्हें सतगुरु के विषय मे कुछ ज्ञात न था, इस विषय पर नरेंद्र ने डॉ. रामचंद्र दत्त से अपने मन की बात कही, दादा मैं विवाह नहीं करना चाहता क्यों कि विवाह मेरी आवश्यकता नहीं है बल्कि यह तो मेरे लक्ष्य के बिल्कुल विपरीत है, रामचंद्र दत्त ध्यान से नरेंद्र की बात सुन रहे थे उन्होंने नरेंद्र को एक टक देखा और कहा तो क्या है तुम्हारा लक्ष्य? उच्च शिक्षा हासिल करना, पद प्रतिष्ठा प्राप्त करना, समाज सुधार करना या फिर देश को स्वतंत्र करना… क्या है?

नरेंद्र ने कहा- नहीं मेरा लक्ष्य तो सिर्फ ईश्वर की खोज करना है, मुझे अपने लिए कोई साथी नहीं बल्कि केवल एक ईश्वर का ही साथ चाहिए।

आप बाबा को समझा दे कि हर स्त्री मेरे लिए केवल मां समान है, मैं हर स्त्री को किसी और दृष्टि से देख ही नहीं सकता, नरेंद्र का जवाब सुनकर रामचंद्र दत्त आश्चर्यचकित हुए उन्होंने नरेंद्र को समझाते हुए कहा कि इतने सारे लोग ब्याह करते ही हैं उनके बाल बच्चे है उन्हें पालते है, पोसते है। वे भी तो मंदिर जाते है और ईश्वर की भक्ति करके पुण्य अर्जित करते हैं तो तुम भी विवाह कर को और ईश्वर की खोज को जारी रखो।

इस पर नरेंद्र ने कहा कि लोग मंदिर जाकर केवल प्रसाद चाहते हैं, ईश्वर नहीं पाते। मैं साक्षात ईश्वर पाना चाहता हूं मैं ईश्वर को वैसे ही पाना चाहता हूं जैसे पौराणिक कथाओं मे साधकों ने पाया है कृप्या आप मेरी भावनाओं को समझे और मेरे पक्ष मे बाबा से बात करे। रामचंद्र दत्त नरेंद्र को देखकर मुस्कराए और उनके कंधे पर हाथ रखकर कहा यदि तुम अपनी इच्छा से सांसारिक बंधनों से पार रहकर ईश्वर को पाना चाहते हो तो दक्षिणेश्वर जाकर श्री रामकृष्ण की शरण मे जाओ, वे ही तुम्हे सही मार्ग दिखा पाएंगे। नरेंद्र ईश्वर के मार्ग पर एक सदगुरु ही सच्चे आश्रय दाता होते हैं। तुम उनकी शरण मे जाओ रामकृष्ण परमहंस सच्चे सदगुरु है। यह घटना नरेंद्र के जीवन को अलग ही मोड़ पर ले गई।

नरेंद्र के मन को रामकृष्ण परमहंस रूपी चित्रकार का स्पर्श हुआ तो उनके जीवन में व्यापक परिवर्तन हुआ, दरअसल लोग ईश्वर को तभी याद करते हैं जब उनके जीवन मे कोई समस्या आती हैं लेकिन नरेंद्र का जीवन तो सुख सुविधा से संपन्न था फिर भी उनके मन मे ईश्वर को पाने की लालसा थी प्रायः यह देखा जाता है कि साधक के पास कुछ धन आ जाता है तो उस धन से वह स्वयं का पतन कर लेता है अथवा तो साधक के पास बिल्कुल धन ना हो तो वह ईश्वर का मार्ग त्याग देता है लेकिन नरेंद्र ने ऐसा न किया। सत्य के खोजी के अंदर ये भावना जागनी चाहिए कि मुझे ये सत्य ही चाहिए, पहले मैं इससे बेखबर था मुझे पता न था अब जब सतगुरु की कृपा से,संतो की कृपा से खबर मिल गई है तो मैं क्यों रूकु? अब मुझे केवल परम सत्य पाना है, ऐसे पिपासा हर साधक मे होनी चाहिए अगर हमारे अंदर भी नरेंद्र की भांति ईश्वर को पाने की सच्ची प्यास है तो सत्य हमारे लिए बहुत सीधा और सहज और सरल होगा क्यों कि हम सभी के जीवन मे प्रारंभ से ही सतगुरु का आश्रय है, सतगुरु का वरद हस्त हम साधकों के सर पर है, परम सत्य जानने के लिए मात्र प्यास जागना सबसे मुख्य कदम होता है बल्कि तृषा निवारक के लिए तो सतगुरु पहले से ही अमृत कुंभ लेकर हमारे प्रत्यक्ष खड़े ही है, लेकिन जब तक किसी के सामने असली प्यास जाग्रत नहीं होती तब तक व्यक्ति तमाम बाहरी बातो मे ही उलझा रहता है, अध्यात्म का मार्ग ऐसा है कि यहां प्यासे के पास तृषा निवारक ईश्वर उसे भेट करने सतगुरु के रूप मे अवश्य आ जाते है।

एक क्षण का विलंब नहीं लगता, सतगुरु ही वो परम चेतना है, परम सत्ता है जो पिपासुओ को पूर्व सत्ता का अनुभव करा सकता है, नरेंद्र की तड़प ने उनकी मुलाक़ात ठाकुर रामकृष्ण देव से कराई और नरेंद्र ने अपना पूरा जीवन उनके श्री चरणों मे अर्पित कर दिया जिन्हें आज हम स्वामी विवेकानंद के नाम से जानते है।