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तो उस आत्मशिव को पहचानने की जिज्ञासा और सूझबूझ बढ़ जाती है !


महाशिवरात्रिः 24 फरवरी 2017

‘ईशान संहिता’ में आता हैः

माघकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि।

शिवलिंङ्गतयोद्भूतः कोटिसूर्यसमप्रभः।।

‘माघ (हिन्दी काल गणना के अनुसार फाल्गुन) मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की महानिशा में करोड़ों सूर्यों के तुल्य कांतिवाले लिंगरूप आदिदेव शिव प्रकट हुए।’

जैसे जन्माष्टमी श्रीकृष्ण का जन्मदिन है ऐसे ही महाशिवरात्रि शिवजी (शिवलिंग) का प्राकट्य दिवस है, जन्मदिन है। वैसे देखा जाय तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश एक ही अदभुत चैतन्यशक्ति के अवर्णनीय तत्त्व हैं। शास्त्रों में यह भी आता है कि भगवान अजन्मा हैं, निर्विकार, निराकार, शिवस्वरूप हैं, मंगलस्वरूप हैं। उनका कोई आदि नहीं, कोई अंत नहीं। जब वे अजन्मा हैं तो फिर महाशिवरात्रि या जन्माष्टमी को उनका जन्म कैसे ? यह एक तरफ प्रश्न होता है, दूसरी तरफ समाधान मिल जाता हैः

कर्तुं शक्यं अकर्तुं शक्यं अन्यथा कर्तुं शक्यम्।

शिव-तत्त्व कहो, चैतन्य तत्त्व कहो, आत्मतत्त्व कहो, उसकी अदभुत लीला है, जिसका बयान करना बुद्धि का विषय नहीं है। अब बुद्धि जितना नाम-रूप में आसक्त होती है, उतना उलझ जाती है और जितना सत्य के अभिमुख होती है उतना-उतना बुद्धि का विकास होकर परब्रह्म परमात्मा में लीन होती है। सूर्य से हजारों गुना बड़े तारे कैसे गतिमान हो रहे हैं ! एक आकाशगंगा में ऐसे अनंत तारे कैसे नियमबद्ध चाल से चल रहे हैं ! सर्दी के बाद गर्मी और गर्मी के बाद बारिश – ये क्रम और मनुष्य के पेट से मनुष्य तथा भैंस के पेट से भैंस की ही संतानें जन्मती हैं – यह जो नियमबद्धता अनंत-अनंत जीवों में है और अनंत-अनंत चेहरों में कोई दो चेहरे पूर्णतः एक जैसे नहीं, यह सब ईश्वर की अदभुत लीला देखकर बुद्धि तड़ाका बोल देती है।

ऐसी कोई अज्ञात शक्ति है जो सबका नियमन कर रही है और कई पुतलों के द्वारा करा रही है। उसे अज्ञात शक्ति कहो या ईश्वरीय शक्ति, आदिशक्ति कहो।

कैसे हुआ शिवलिंग का प्राकट्य ?

‘शिव पुराण’ की कथा है कि ब्रह्मा जी ने ऐसी अदभुत सृष्टि की रचना की और विष्णु जी ने पालन का भार उठाया। एक समय दोनों देवों को क्या हुआ कि हम दोनों में श्रेष्ठ कौन ? सृष्टिकर्ता बड़ा कि पालन करने वाला बड़ा ? दोनों में गज-ग्राह युद्ध, बौद्धिक खिंचाव शुरु हुआ।

इतने में एक अदभुत लिंग प्रकट हुआ, जो आकाश और पाताल की तरफ बढ़ा। उसमें से आदेश आया कि ‘हे देवो ! जो इसका अंत पाकर जल्दी आयेगा वह दोनों में से बड़ा होगा।’

ब्रह्मा जी आकाश की ओर और विष्णु जी पाताल की ओर चले लेकिन उस अदभुत तत्त्व का कोई आदि-अंत न था। इसी तत्त्व को तत्त्ववेत्ताओं ने कहा कि ‘यह परमात्मा, शिव तत्त्व अनंत, अनादि है।’

अनंत, अनादि माना उसका कोई अंत और आदि नहीं। आत्मसाक्षात्कार करने के बाद भी उसका कोई छोर पा ले…. नहीं, बुद्धि उसमें लीन हो जाती है परंतु ‘परमात्मा इतना बड़ा है’ ऐसा नहीं कह सकती।

आखिर दोनों देव हारे, थके…. दोनों के बड़प्पन ढीले हो गये। अब स्तुति करने लगे। दो महाशक्तियों में संघर्ष हो रहा था, उस संघर्ष को शिवलिंग ने एक दूसरे के सहयोग में परिणत कर दिया। सृष्टि में उथल-पुथल होने की घटनाओं को घटित होने से रोकने, प्राणिमात्र को बचाने की जो घड़ियाँ, जो मंगलकारी, कल्याणकारी रात्रि थी, उसको ‘महाशिवरात्रि’ कहते हैं। इस रात्रि को भक्तिभाव से जागरण किया जाय तो अमिट फल होता है।

पूजा के प्रकार व महाशिवरात्रि का महाफल

इस दिन शिवजी को फूल या बिल्वपत्र चढ़ाये जाते हैं। जंगल में हो, बियाबान (निर्जन स्थान) में हों, कहीं भी हों, मिट्टी या रेती के शिवजी बना लिये, पत्ते-फूल तोड़ के धर दिये, पानी का छींटा मार दिया, मुँह से ही वाद्य-नाद कर दिया, बैंड-बाजे की जरूरत नहीं, शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं, अंतःकरण शुद्ध होने लगता है। तो मानना पड़ेगा कि शिवपूजा में वस्तु का मूल्य नहीं है, भावना का मूल्य है। भावे हि विद्यते देवः।

शिवजी की प्रारम्भिक आराधना होती है पत्र-पुष्प, पंचामृत आदि से। पूजा का दूसरा ऊँचा चरण है कि शिवपूजा मानसिक की जाय – ‘जो मैं खाता पीता हूँ वह आपको भोग लगाता हूँ। जो चलता फिरता हूँ वह आपकी प्रदक्षिणा है और जो-जो कर्म करता हूँ, हे शिवजी ! आपको अर्पित है।’

जब उस शिव-तत्त्व को चैतन्य वपु, आत्मदेव समझकर, ‘अखिल ब्रह्माण्ड में वह परमात्मा ही साररूप में है, बाकी उसका प्रकृति-विलास है, नाम और रूप उसकी माया है’ – ऐसा समझ के नीति के अनुसार जो कुछ व्यवहार किया जाय और अपना कर्तापन बाधित हो जाय तो उस योगी को खुली आँख समाधि का सुख मिलता है। आँख खुली होते हुए भी अदृश्य तत्त्व में, निःसंकल्प दशा में वह योगी जग जाता है।

जो स्वर्ण का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करता है तो 3 पीढ़ी तक उसके यहाँ धन स्थिर रहता है। जो माणिक का बनाकर करता है उसके रोग, दरिद्रता दूर होकर धन और ऐश्वर्य बढ़ता है। इस प्रकार अलग-अलग शिवलिंगों की पूजा करने से अलग-अलग फल की प्राप्ति होती है लेकिन उन सबसे महाफल यह है कि जीव शिव-तत्त्व को प्राप्त हो जाय।

शिव-तत्त्व को पाने के लिए हम तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु। नश्वर चीज का संकल्प नहीं लेकिन शिवसंकल्प हो, मंगलकारी संकल्प हो। और मंगलकारी संकल्प यही है कि संकल्प जहाँ से उठते हैं, उस परब्रह्म परमात्मा में हमारी चित्तवृत्तियाँ विश्रांति पायें।

दो महाशक्तियाँ अपने को कर्ता मानकर लड़ें तो संसार का कचूमर हो जाय, इसलिए संसार की दुःख की घड़ी के समय जो सच्चिदानंद निर्गुण, निराकार था, उसने साकार रूप में प्रकट होकर दोनों महाशक्तियों को अपने-अपने कर्तव्य का पालन करने में लगा दिया। तो केवल वे दो महाशक्तियाँ ही शिव की नहीं हैं, हम लोग भी शिव की विभिन्न शक्तियाँ हैं। हमारा रोम-रोम भी शिव-तत्त्व से भरा है। ऐसा कोई जीव नहीं जो शिव तत्त्व से अर्थात् परमात्मा से एक सेकंड भी दूर रह सके। हो सकता है कि 2 सेकंड के लिए मछली को मछुआरा पकड़ के किनारे पर धर दे लेकिन दुनिया में ऐसा कोई पैदा नहीं हुआ जो हमको उठाकर 2 सेकंड के लिए परमात्मा से अलग जगह पर रख दे, हम उस शिव तत्त्व में इतने ओत-प्रोत है। फिर भी अहंकार हमको दूरी का एहसास कराता है जबकि अनंत की लीला में अनंत की सत्ता से सब हो रहा है, हम अपने को कर्ता मानकर उस लीला में विक्षे कर रहे हैं। यदि इस महाशिवरात्रि से लाभान्वित होने का सौभाग्य हमें मिल जाय, इस मंगल रात्रि का हम सदुपयोग कर लें कि ‘ब्रह्मा और विष्णु जैसी शक्तियाँ भी तुम्हारे तत्त्व के आगे नतमस्तक हैं तो हमारा धन, अक्ल, हमारी जानकारी – यह सब भी तो आप ही से स्फुरित हो रहा है। तो भगवान !

मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है तो तोर।

तेरा तुझको देत हैं, क्या लागत है मोर।।

ऐसा करके यदि हम अपना अहं विसर्जित कर सकें तो उस आत्मशिव को पहचानने की जिज्ञासा और सूझबूझ बढ़ जाती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2017, पृष्ठ संख्या 14,15,17 अंक 290

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आदर्श गृहस्थ जीवन के सोपान


सद्गृहस्थ, आदर्श गृहस्थ बनकर जीवन में सद्गति चाहते हो तो घर को, परिवार को अपना मानकर लोभी, मोही, अभिमानी न बनो। घर, परिवार, धन को अपने लिए समझो परंतु अपना न समझो क्योंकि ये सब संसार की वस्तुएँ हैं, तुम्हारी नहीं हैं। जो कुछ तुम्हारे साथ है वह तुम्हें भाग्य के अनुसार मिला है किंतु वह सदा न रहेगा और तुम स्वयं वर्तमान शरीर के साथ सदा न रहोगे।

तुम्हें जो कुछ सुंदर, अनुकूल, सुखकर मिला है वह किसी प्रकार के तप या पुण्य का फल है। अतः जहाँ तक शुभ, सुंदर का भोग करते हो, वहाँ तक अपने ही पुण्य को क्षीण करते जाते हो। यदि भोग के साथ तुम पुनः तप, दान, पुण्यमत कर्म न करोगे तो एक दिन तुम्हारे पुण्यजनित भोग-सुखों का अंत हो जायेगा।

सुख का भोग करते हुए दूसरों को भी सुख देते रहो, जिससे आगे फिर सुख मिले परंतु दुःख का भोग करते हुए किसी को दुःख न दो, जिससे आगे तुम्हें दुःख न भोगना पड़े।

भोग्य वस्तुओँ का औषधि की नाईं उपयोग करना मना नहीं है, उपभोग करना हानिकारक है। उनमें आसक्त होना, अनुकूल वस्तु-व्यक्ति-परिस्थिति के बिना दुःखी होना, बेचैन होना तुच्छ मानसिकता और मति है। सुखद अथवा दुःखद, अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियों में अपने सम, साक्षी स्वभाव में प्रतिष्ठित रहें, यही ज्ञानयोग की महिमा है। भगवान श्रीकृष्ण गीता (6.32) में कहते हैं-

सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः।

सुखद अवस्था आये चाहे दुःखद अवस्था, उनमें जो सम रहता है वह परम योगी है।

आदर्श सद्गृहस्थ वही है जो दानी, संतोषी, विनम्र, विवेकी होता है और भोग से विमुख होकर योगपथ में चलता है।

गृहस्थ जीवन में तुम्हारे साथ जो कुछ सूझबूझ, योग्यता, शक्ति है, उसके द्वारा सदा ऐसे ही कार्य करो जिनके द्वारा तुम दयालुता, उदारता, सहिष्णुता और नम्रता की वृद्धि कर सको। प्राप्त शक्ति का उपयोग उस रूप में न करो जिससे क्रोध, कठोरता, हिंसा, मोह, ममता, अभिमान, द्वेष आदि दोषों की परिपुष्टि होती हो। शक्ति के द्वारा यथाशक्थि शक्तिहीनों के काम आओ।

जो गृहस्थ अपने जीवन में गृहसंबंधी चिंताओं से, कर्तव्यों व बंधनों से मुक्त नहीं हो जाता वह सद्गृहस्थ नहीं, आदर्श, धर्मात्मा गृहस्थ नहीं। कहीं न कहीं उसने अकर्तव्य का, अन्याय का आश्रय अवश्य लिया होगा। कर्तव्यपरायण, धर्मात्मा, न्यायी गृहस्थ का सब कार्य ठीक समय पर समाप्त होगा, उसकी अवश्य ही सद्गति, परम गति होगी। मन, वाणी, कर्म से यदि तुम भगवान की ही आराधना करना चाहते हो तो जो कुछ करो उस समय यही सोचो क हम भगवान के लिए कर रहे हैं।’ यदि कोई प्रेमी दौड़ना आरम्भ करे और यही समझ ले कि ‘हम भगवान के लिए दौड़ रहे हैं’ तो उसका दौड़ते  रहना भजन हो  जायेगा। यदि कोई निश्चय करके परिवार की सेवा करे कि ‘हम भगवान के लिए ही  परिवार की सेवा कर रहे हैं’ तो उसकी सेवा भजन बन जायेगी। भगवदाकार वृत्ति का दृढ़ होना ही तो भजन-आराधना है।

गृहस्थी के प्रपंच से संबंध, बंधन तोड़ना चाहते हो तो जो कुछ भी प्राप्त है उसे अपना न मानो, जो कुछ भी सुना तथा देखा हुआ अप्राप्त है उसकी इच्छा न करो। जगत के प्राणियों को प्रसन्न करना चाहते हो तो उनकी सेवा करो। गुरुदेव को प्रसन्न एवं संतुष्ट करना चाहते हो तो विषयासक्ति को विषय-विरक्ति में, स्वार्थभाव को सेवा में, संबंधियों के चिंतन को भगवच्चिंतन में, देहाभिमान को आत्मज्ञान में बदल दो। चित्त को स्थिर रखना चाहते हो तो भोग-वासनाओं तथा मोह, लोभ, अभिमान का जिस प्रकार हो सके पूर्ण त्याग करो।

गुरुकृपा अथवा भगवत्कपृपा का निरंतर अनुभव करना चाहते हो तो सत्संग मिलने पर मिथ्या आग्रह, दुराग्रह न करो, स्वच्छंद (मनमुखी) होकर कर्म न करो, प्रमाद में शक्ति तथा आलस्य में समय नष्ट न करो और विषयासक्ति का त्याग करो। शारीरिक, मानसिक और आत्मिक उन्नति के लिए वासना-विकारों का त्याग अत्यावश्यक है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2017, पृष्ठ संख्या 7,8 अंक 289

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संत करें आप समान…..


पूज्य बापू जी

आत्मकल्याण की चाहना से एक व्यक्ति ने जाकर किन्हीं संत से प्रार्थना कीः “मुझ पर अपनी कृपादृष्टि कीजिये नाथ !”

उसकी श्रद्धा देखकर गुरु ने उसे मंत्र दे दिया और कहाः “बेटा ! एक वर्ष तक भलीभाँति इस मंत्र का जप करना। बाद में स्नान करके पवित्र होकर मेरे पास आना।”

एक वर्ष पूरा हुआ। वह शिष्य स्नानादि करके पवित्र होकर गुरु के पास जा रहा था, तब गुरु की ही आज्ञा से एक महिला ने इस तरह झाड़ू लगायी कि धूल उस शिष्य पर पड़ी। अपने ऊपर धूल पड़ते देख वह शिष्य अत्यंत आगबबूला हो उठा एवं उस महिला को मारने दौड़ा। वह तो भाग गयी।

वह पुनः गया नहाने के लिए और नहा-धोकर पवित्र हो के गुरु के पास आया। गुरु ने सारी बात तो पहले से जान ही ली थी। गुरु ने कहाः “अभी तो तू साँप की तरह काटने दौड़ता है। अभी तेरे अंदर मंत्रजप का रस प्रकट नहीं हुआ। जा, फिर से एक वर्ष तक मंत्रजप कर फिर मेरे पास आना।”

एक वर्ष बाद पुनः जब वह नहा धोकर पवित्र हो के आ रहा था, तब उस महिला ने धूल तो क्या उड़ायी, उसके पैर से ही झाडू छुआ दी। झाड़ू छू जाने पर वह भड़क उठा किन्तु वह मारने न दौड़ा। फिर से नहा धो के गुरु चरणों में उपस्थित हुआ।

गुरु ने कहाः “बेटा ! अब तू साँप की तरह काटने तो नहीं दौड़ता लेकिन फुफकारता तो है। अभी भी तेरी वैर-वृत्ति गयी नहीं है। जा, पुनः एक वर्ष तक जप करके पवित्र हो के आना।”

तीसरा वर्ष पूरा हुआ। शिष्य नहा धोकर गुरु के पास आ रहा था। इस बार गुरु के संकेत के अनुसार उस महिला ने कचरे का टोकरा ही शिष्य पर उँडेल दिया। इस बार पूरा कचरा उँडेल देने पर भी वह न मारने दौड़ा, न क्रोधित हुआ क्योंकि इस बार जप करते-करते वह जप के अर्थ में तल्लीन हुआ था। उसके चित्त में शांति एवं तत्त्वज्ञान की कुछ झलकें आ चुकीं थी, वह निदिध्यासन की अवस्था में पहुँच गया था। वह बोलाः “हे माता ! तुझे परिश्रम हुआ होगा। मुझ देहाभिमानी के देह के अभिमान को तोड़ने के लिए तू हर बार साहस करती आयी है। मेरे भीतर के कचरे को निकालने के लिए माता ! तूने बहुत परिश्रम किया। पहले यह बात मुझे समझ में न आती थी किंतु इस बार गुरुकृपा से समझ में आ रही है कि आदमी जब भीतर से गंदा होता है, तब ही बाहर की गंदगी उसे भड़का देती है। नहीं तो देखा जाये, तो इस कचरे में भी तत्त्वरूप से तो वह परमात्मा ही है।”

यह कहकर वह पुनः स्नान करके गुरु के पास गया। ज्यों ही वह गुरु को प्रणाम करने गया, त्यों ही गुरु ने उसे उठाकर अपनी छाती से लगा लिया और कहाः “बेटा ! क्या चाहिए ?”

शिष्य सोचने लगा कि ‘जब सर्वत्र वही है, सबमें वही है तो चाह किसकी करूँ और चाह भी कौन करे ?’

गुरु की करूणा कृपा बरस ही रही थी। गुरुकृपा तथा इस प्रकार के चिंतन से धीरे-धीरे वह शिष्य खोता गया…. खोता गया….. खोते-खोते वह ऐसा खो गया कि वह जिसको खोजता था वही हो गया। ठीक ही कहा हैः

पारस और संत में बड़ा अंतरहू जान।

एक करे लोहे को कंचन, ज्ञानी आप समान।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2017, पृष्ठ संख्या 6 अंक 289

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