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संत चरनदास जी


 

अलवर शहर (राजस्थान) से 8 कि.मी. दूर डेहेरा नामक गाँव में सन् 1703 ई. के भादों शुक्ल तृतिया, मंगलवार के दिन पिता मुरलीधर व माता कुंजीदेवी के घर संत चरनदास जी का अवतरण हुआ। नामकरण संस्कार के समय उनका नाम रणजीत रखा गया। उनके पिताश्री साधु स्वभाव के, त्यागी वृत्तिवाले, प्रभुभक्त और एकांत प्रेमी थे। वे घंटों तक ध्यान में लीन रहते थे। उनकी माता कुंजीदेवी संतसेवी और विदुषी थीं।

संत चरनदास जी को 5 वर्ष की अल्पायु से ही रामनाम के जप का स्वाद लग गया था। वे स्वयं तो प्रेम से रामनाम जपते थे, साथ में अपने साथियों को भी प्रभु के नाम-सुमिरन की प्रेरणा देते थे। एक दिन वे जब, रामनाम कीर्तन में मस्त थे, तब वैरागी तपस्वी वेदव्यासनंदन, शुकदेव जी उन्हें अपनी गोद में लेकर प्यार किया, इससे उनके हृदय में प्रभुप्रेम की प्रबल धारा प्रवाहित हो गयी। तत्कालीन रीति के अनुसार छठे वर्ष में उन्हें पाठशाला पढ़ने के लिए भेजा गया, परंतु अध्यापकों के लाख प्रयत्नों के बावजूद भी उन्होंने लौकिक विद्या पढ़ना अस्वीकार कर दिया। उन्होंने एक दिन अध्यापकों का हठ देखकर कहाः

आल जाल तू क्या पढ़ावे।

कृष्ण नाम लिख क्यों न सिखावे।।

जो तुम हरि की भक्ति पढ़ाओ।

तो मोकू तुम फेर बुलाओ।।

इस पंक्ति से उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि उनकी रुचि प्रभुनाम-जप में अधिक और लौकिक विद्या में कम है।

जब रणजीत 8 वर्ष की आयु अवस्था के हुए, तब एक दिन उनके पिता जी जंगल में एकांत साधना करते हुए अचानक लोप हो गये। इस घटना के कुछ महीने बाद उनके दादा प्रागदास जी व दादी यशोदा का भी अचानक निधन हो गया। पति के बाद सास-ससुर की छाया भी सिर से उठ जाने से कुंजीदेवी के दिल पर गहरा आघात लगा। रणजीत अपनी माता के दुःखी हृदय पर प्रेम के फाहे रखने में सफल हो गये। माता कुंजीदेवी का मन दुःख और चुप्पी से अब ऊब चुका था। उनके लिए अब डेहरा गाँव में रहना असहनीय हो गया था, इस कारण वे पुत्र के साथ दिल्ली में स्थित अपने मायके चली गयीं।

दिल्ली में कुंजीदेवी के चाचा भिखारीदास शाही दरबार में उच्च पदाधिकारी थे। उन्होंने कुंजीदेवी को हर प्रकार से मदद देने का आश्वासन दिया। उन्होंने रणजीत को अरबी व फारसी भाषा सिखाने के लिए कादिरबख्श नामक एक मौलवी को नियुक्त किया। उस मौलवी ने भी रणजीत को पढ़ाने का भरसक प्रयत्न किया, परंतु उन्हें भी निराशा ही हाथ लगी।

उन दिनों छोटी उम्र में ही विवाह हो जाते थे। रणजीत के लिए भी कई रिश्ते आये, परंतु वे विवाह के लिए राज़ी न हुए। माता ने उनके सामने वंश को आगे बढ़ाने की इच्छा प्रकट की तथा नाना ने धर्मग्रंथो के उदाहरणों से गृहस्थ आश्रम की विशेषता सिद्ध करके और शास्त्रों में से वंश को आगे बढ़ाने के धर्म का विवरण देकर उन्हें विवाह की प्रेरणा देनी चाही, परंतु रणजीत ने संसार की नश्वरता, मनुष्य-जन्म के मूल उद्देश्य आदि का उल्लेख करके बार-बार इस बात पर जोर दिया कि ‘मेरा मन प्रभुभक्ति में इतना लीन हो चुका है कि मेरे लिए गृहस्थ धर्म निभा पाना असम्भव है।

10 वर्ष की अल्पायु में ही रणजीत के हृदय सागर में प्रभुप्रेम की लहरें पूरे जोर से उठने थीं। वे सदा साधु-संतों की संगति और भजन मंडलियों में सम्मिलित होने के लिए उत्सुक रहते थे। भूखे-प्यासे, गरीब, लाचारों की सेवा-सहायता में उनकी विशेष रूचि थी। उनका ध्यान एक ही लक्ष्य पर केन्द्रित था और वह था परमात्म-प्राप्ति ! प्रभु प्रेम में उनकी आँखों से प्रेमाश्रुओं की झड़ी लगी रहती थी और वे अपने खाने पीने, पहनने, सोने तक की सुध-बुध खो बैठते थे।

16 वर्ष की उम्र तक जब अपने प्रयत्नों से प्रभु के दर्शनों की तड़प शांत न हुई तो उनके हृदय में सदगुरु मिलन की प्यास जाग उठी। वे सदगुरु के विरह में पल-पल, क्षण-क्षण व्याकुल रहने लगे।

चातक मीन पतंग जब, पिया बिन नहीं रह पाये।

साध्य को पाये बिना, साधक क्यों रह जाय।।

वे कभी सदगुरु की खोज में दूर-दूर तक जाते, कभी नागाओं, सिद्धों, योगियों के पास जाते तो कभी संन्यासियों, उदासियों के पास, परंतु उन्हें कहीं भी शांति प्राप्त न हुई। वे 16 से 19 वर्ष त सदगुरु की खोज में दर-दर भटकते रहे। आखिर मुजफ्फरनगर (उ.प्र.) के पास गंगा-यमुना के दोआबे पर स्थित मोरनातीस नामक स्थल पर उन्हें एक महात्मा के दर्शन हुए, जिन्हें देखते ही उनके मन में प्रेम, श्रद्धा और शांति की ऐसी प्रबल तरंग उठीं कि उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उनकी वर्षों की खोज आज पूरी हो गयी है। वे महात्मा और कोई नहीं बल्कि वही शुकदेव जी महाराज थे, जिन्होंने बालक रणजीत को गोदी में बिठाकर प्यार किया था। जिन सदगुरु की खोज थी वे मिल गये। उस वक्त रणजीत की उम्र 19 वर्ष थी। उन्होंने प्रेममय हृदय और आँसुओं से भरे नेत्रों से सदगुरु के चरणकमलों में माथा टेकते हुए स्वयं को गुरुचरणों में समर्पित कर दिया। महात्मा शुकदेव जी ने उन्हें विधिवत दीक्षा दी और उनका परमार्थी नाम श्यामचरनदास रख दिया। शुकदेव जी ने उन्हें दिल्ली वापस जाकर दीक्षा के अनुसार अभ्यास करने की आज्ञा दी। आगे चलकर वे संत चरनदास जी के नाम से प्रसिद्ध हुए। वे टूटे हृदय से दिल्ली प्रस्थान कर गये। सदगुरु से बिछुड़ने के कारण वे बड़े व्याकुल हो गये। दिन भूखे-प्यासे विरह में व्यतीत हो गया, रात्रि को सदगुरु ने ध्यान में आकर ढाढस बँधाया और कहाः

जब-जब ध्यान करे हो।

ऐसे ही तुम दर्शन पै हो।

अरु हम तुम कभू जुदे जू नाहीं।

तुम मो में मैं तुम्हारे माँही।।

सदगुरु शिष्य के अंतःकरण में ज्योतिर्मय स्वरूप में सदैव विद्यमान रहते हैं। यह स्वरूप कभी भी शिष्य का साथ नहीं छोड़ता। सदगुरु-प्रदत्त युक्तियों के अभ्यास से यही ज्योतिर्मय स्वरूप शिष्य को आत्मा-परमात्मा की अभिन्नता का ज्ञान करा देता है। दिल्ली लौटकर चरनदास जी ने बरिम नाले के पास आरामदायक स्थान पर पक्की गुफा बनवा कर उसमें गुरु आज्ञानुसार तन, मन से अभ्यास शुरु कर दिया। वहाँ उन्होंने 12 वर्ष तक अभ्यास किया। वे कई-कई दिनों तक समाधि में लीन रहते थे। एक बार आस-पास फैली हुई आग गुफा में भी पहुँच गयी, पर ध्यानमग्न चरनदास जी उसी प्रकार गुफा में बैठे रहे। लोगों ने यही समझा के वे जलकर राख हो गये होंगे, पर जब वे ध्यान से उठकर बाहर आये तो उन्हें सही-सलामत देखकर सभी दंग रह गये।

वे सदगुरु की आंतरिक प्रेरणा के अनुसार फतेहपुरी में एक आश्रम बनाकर रहने लगे। समाज के हर वर्ग और धर्म के लोग उनके सत्संग में आने लगे। एक बार संत चरनदास जी ने एक गरीब के लड़के की शादी के लिए सोने की 40 मोहरें और बहुत से सेवकों को उसकी सहायता के लिए भेजा। रात में आश्रम को सुनसान देखकर चोर आ गये, उन्होंने बहुत से सामान की कई गठरियाँ बाँध लीं, परंतु उन्हें आश्रम से बाहर जाने का मार्ग ही नहीं दिखाई दिया। चोरों को परेशान देखकर  चरनदास जी ने स्वयं उठकर उन्हें रास्ता दिखाया और सामान ले जाने को कहा। चोर लज्जित होकर क्षमा माँगते हुए कहने लगेः ‘अब हम सुई तक नहीं ले जायेंगे।’ पर संत चरनदास जी ने उनसे जबरदस्ती गठरियाँ उठवायीं और उनके साथ जाकर आश्रम के बाहर छोड़ आये। उन्होंने न कभी किसी का बुरा सोचा और न ही किसी को कुछ बुरा कहा। यदि कोई उनकी निंदा भी करता तो वे कहते कि निंदक शत्रु नहीं अपितु सच्चा मित्र है, जो निंदा के साबुन से हमारे दुर्गुणरूपी मैल को धोता है। उनके परम शिष्य रामरूप जी ने लिखा हैः ‘संत चरनदास कभी भी वाद-विवाद में नहीं उलझते थे। वे एकांत-प्रेमी थे और बार-बार कहते थे कि मैं बुरे-से-बुरा था पर मेरे सदगुरु शुकदेव जी ने मुझ पर कृपा करके मेरा बेड़ा पार कर दिया।’

किसू काम के थे नहीं कोई न कौड़ी देय।

गुरु शुकदेव कृपा करी, भई अमोलक देह।।

संत चरनदास जी ने दिल्ली में कई आश्रम बनवाये तथा फतेहपुरी आश्रम में 5 वर्ष बिताये। फतेहपुर निवास के समय वे एक बार वृंदावन गये थे। मार्ग में 7 ठगों ने उन्हें घेर लिया, परंतु उनकी अमीदृष्टि से वे स्वयं को ठगाकर उनके अनन्य भक्त बन गये। उनके 108 प्रमुख शिष्यों में इन सातों के नाम भी आते हैं। इसी यात्रा के दौरान उन्हें पुनः सदगुरु जी के दर्शन प्राप्त हुए। गुरुदेव ने उन्हें भक्तिमार्ग का प्रचार करने की आज्ञा दी। यहाँ से लौटकर उन्होंने घासमंडी में आश्रम बनवाया। यहाँ एक वर्ष व्यतीत कर वे परीक्षितपुर आ गये। वहाँ नंददास जी उनसे विधिवत दीक्षा लेने वाले प्रथम शिष्य बने। नंददास जी के बाबा हरि दास जी ने अपनी पत्नी, चारों पुत्रों और एकमात्र पुत्री सहजोबाई, दयाबाई और नूपीबाई संत चरनदास जी की तीन प्रमुख शिष्याएँ थीं।

बाद में वे परीक्षितपुर से गद्दनपुर चले गये। वहाँ पर एक मुसलमान फकीर मुहम्मद बाकर ने उनकी शरण ग्रहण की और वहाँ से वे पानीपत आ पहुँचे, यहाँ का नवाब शाकर खाँ और एक खतरनाक डाकू उनके शिष्य बन गये। उन्होंने उस डाकू का नाम रामधड़ल्लामल रखा। इसी यात्रा के दौरान सन् 1757-58 ई. में चरनदास जी की माता का देहांत हो गया। माता के परलोक गमन के पश्चात सुखदेवपुर आ गये। यह स्थान चाँदनी चौक के पास मुहल्ला बन्नीमारां और हौजकाजी के मध्य स्थित है। चरनदासजी अनेक स्थानों की यात्रा की, परंतु उनका कार्यक्षेत्र दिल्ली व उसके आस-पास का क्षेत्र ही रहा।

उन्होंने नादिरशाह के भारत पर आक्रमण के छः महीने पूर्व ही उसके आक्रमण की तिथि मुहम्मदशाह की हार, नादिरशाह द्वारा राज्य वापस देकर लौट जाने की तिथि आदि कई महत्त्वपूर्ण बातों की जानकारी अपने सेवकों को दी थी। उनकी इस भविष्यवाणी को सुनकर नादिरशाह ने उन्हें जेल में डाल दिया, परंतु उस समय उसके आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रही, जब उसी रात को चरनदास जी नादिरशाह के सिर पर पदाघात कर उसे जगा दिया। आश्चर्यचकित व भयभीत नादिरशाह उनके चरणों में गिर क्षमायाचना करने लगा तथा कई गाँवों की जागीरें व धन-सम्पत्ति उनके नाम कर दी। वे न तो किसी सेवक के घर भोजन करते थे और न ही किसी से धन, वस्त्रादि की भेंट लेते थे, परंतु जरूरतमंदों की भरपूर सहायता करते थे। उनका यह क्रम 60 वर्ष की अवस्था तक चला, तत्पश्चात उन्होंने शिष्यों की अत्यधिक संख्या और उनकी व्यवस्था हेतु सेवा-भेंट लेना स्वीकार किया, परंतु उसमें से अपने लिए एक पाई का भी उपयोग नहीं किया। उन्होंने ब्रह्मलीन होने के एक वर्ष, तीन महीने व दो दिन पहले ही अपने परम धाम जाने के संकेत दे दिये थे। वे उन दिनों फतेहपुरी स्थित सुखदेवपुरा आश्रम में निवास करते थे। संवत् 1839 विक्रमी, मार्गशीर्ष सप्तमी को बुधवार के दिन वे 79 वर्ष की आयु पूरी कर स्वधाम पधार गये। उन्होंने स्वधाम जाने की इच्छा पहले ही प्रकट कर दी थी, फिर भी उन्होंने अपना उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं किया। बाद में उनके 108 शिष्यों ने अलग-अलग गद्दियाँ चलाईं जिनमें रामरूप, सहजोबाई, जुगतानंद आदि की गद्दियाँ प्रमुख थीं। चरनदास जी के शिष्यों ने अपनी रचनाओं में उनकी अलौकिक प्रतिभा व जीवन के विषय में विस्तार से गाया है। सहजोबाई ने तो यहाँ तक कहा किः

साँईं चरनदास पर तन मन वारूँ।

गुरु न तजूँ, पर हरि को तजि डारूँ। (सहजोवाणीः पृष्ठ 3)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2002, पृष्ठ संख्या 14-17 अंक 118

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योगविद्या से भी ऊँची है आत्मविद्या


 

संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

योग में चित्तवृत्ति का निरोध हो जाता है और व्यक्ति समाधिस्थ हो जाता है। समाधि से सामर्थ्य आता है, परंतु जीवत्व बाकी रह जाता है। ‘पातंजल योगदर्शन’ और ‘कुंडलिनी योग’ के अनुसार अभ्यास करने पर मनोजय हो जाता है, समाधि हो जाती है, सामर्थ्य आ जाता है, परंतु जब साधक समाधि से उठता है तो उसे जगत सच्चा लगता है। इसलिए इन समाधियों को लय समाधि कहा गया है।

योगविद्या से मन का लय हो जाता है जबकि आत्मविद्या से मन का बाध हो जाता है।

मन के बाध और लय में क्या फर्क है ?

आपने रस्सी में साँप देखा और आपको भय लगा। किसी ने आपको आश्वासन दिया और वीरता की अच्छी बातें कहीं। आपने सोचा कि यह साँप मेरा क्या बिगाड़ेगा ?’ और आप खाने-पीने में, सुख-सुविधा के साधनों में मस्त हो गये। इस प्रकार रस्सी में दिखने वाले साँप से आपका भय गायब हो गया। परंतु फिर जब रस्सी में दिखने वाली साँप की तरफ गये तो हृदय की धड़कनें बढ़ गयीं… अर्थात् आप कुछ समय के लिए साँप की सत्यता भूल गये, फिर आपने देखा तो वही रस्सी साँप होकर सच्चा भासने लगी। यह है मन का लय होना।

अगर टार्च लेकर आपने रस्सी को देख लिया तो फिर रस्सी दिखेगी तो साँप के आकार की, परंतु साँप आपको सच्चा नहीं लगेगा, क्योंकि वह बाधित हो गया। यह है मन का बाध।

ऐसे ही आत्मविद्या संसाररूपी सर्प को बाधित कर देती है और योगविद्या मन को लय कर देती है तो संसाररूपी सर्प नहीं दिखता। योगविद्या के साथ यदि आत्मविद्या नहीं है तो योगविद्यावाले का पतन हो सकता है। इसलिए ‘गीता’ में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हैः योगभ्रष्टोऽभिजायते। पतन से तात्पर्य संसारी व्यक्ति की तरह पतन से नहीं, संसारी की जो स्थिति है उससे तो योगविद्यावाले बहुत ऊँचे होते हैं, परन्तु आत्मविद्या की ऊँचाई के आगे वे बच्चे हैं।

जब तक आत्मविद्या को ठीक से नहीं समझते, तब तक धन का, विद्या का, सत्ता का कोई न कोई भूत अंदर घुस जाता है और तुच्छ चीजों का, प्रकृति के गुण-दोषों का आरोप अपने में करके हम लोग एक दायरा बना लेते हैं और उस दायरे से बाहर नहीं निकल पाते। ‘मैं पटेल’, ‘मैं सिंधी’, ‘मैं गुजराती’ – इसी दायरे में उलझकर रह जाते हैं। लोग भले कहें और हम भी ऊपर-ऊपर से ‘हाँ’ कहें, परंतु भीतर से समझना चाहिए कि हम गुजराती भी नहीं, पटेल भी नहीं, सिंधी भी नहीं, हम तो हम ही हैं। जो उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय में एकरस साक्षी है, वह परम सत्ता और हम एक हैं।

जिस सत्ता से यह तन पैदा हुआ, यह मन उत्पन्न हुआ, बुद्धि व अहं उत्पन्न हुए और बदलते रहते हैं, जो इन सबको सत्ता-स्फूर्ति देता है और सबको बदलने की सत्ता देता है, वह चैतन्य आत्मा हम हैं। उसी को तत्त्वरूप से जानना – यह आत्मविद्या का लक्ष्य है।

ऋद्धि-सिद्धि का सामर्थ्य, सफलता आदि सब प्रकृति के अंतर्गत होते हैं। जिन्होंने पानी को घी बना दिया – ऐसे योगियों का नाम मैंने सुना है। बीमार को ठीक कर दिया…. मुर्दे को जिंदा कर दिया…. यह सब ठीक है, परंतु हैं सब प्रकृति के अंतर्गत। तत्त्वज्ञान इससे बहुत ऊँची चीज है। तत्त्वज्ञान पाने के लिए अहं को विसर्जित करना पड़ता है। योगविद्या में मन का लय होता है, एकाग्रता से सामर्थ्य आता है, परंतु ब्रह्मविद्या में मन बाधित हो जाता है और तत्त्व का बोध हो जाता है।

मन आत्मा में लय हो जाय – यह एक बात है और मन बाधित हो जाय – यह दूसरी बात है। जैसे, विश्वासपात्र व्यक्ति ने सर्प से निश्चिंत कर दिया तो आप निश्चिंत हो गये, परंतु विश्वासपात्र व्यक्ति की जगह कोई दूसरा आकर कहने लगे कि ‘भाई ! उन्होंने भले कह दिया कि साँप नहीं काटेगा परंतु आप सँभलना….’ तो उसकी सत्यता मौजूद रहेगी। ऐसे ही योगविद्या में कितने भी ऊँचे चले जाओ तो भी योगी को थोड़े बहुत पतन का भय बना रहता है, परंतु ज्ञानी को कोई भय नहीं क्योंकि ज्ञानी के लिए जगत बाधित हो जाता है। जैसे, टॉर्च से रस्सी को रस्सी जानकर सर्प की सत्यता चली जाती है, ऐसे ही आत्मज्ञानी के लिए जगतरूपी सर्प बाधित हो जाता है। ऐसा ज्ञानवान जगत से निर्लेप हो जाता है।

जैसे, सूर्य अपने स्थान पर रहकर जगत को अपने किरणरूपी हाथ से छू लेता है फिर भी निर्लिप्त रहता है, ऐसे ही वह चैतन्य ‘मैं’ अपनी सत्ता-स्फूर्ति की चेतना के द्वारा सारे शरीरों को छूता है फिर भी निर्लिप्त रहता है। जैसे, सूर्य सब पेड़ पौधों को छूता है और उसी की सत्ता से सब जीते हैं, फलते-फूलते हैं परंतु वे मिट जायें, नष्ट हो जायें फिर भी सूर्यनारायण का बाल तक बाँका नहीं होता। ऐसे सूर्यनारायण में भी जिसकी सत्ता है उस सत्ता का कुछ नहीं बिगड़ता। वही सत्ता आँखों के द्वारा देखती है, कानों के द्वारा सुनती है, जिह्वा के द्वारा बोलती है, मन के द्वारा सोचती है, बुद्धि के द्वारा निर्णय लेती है, वही सत्ता लेकर अहं ‘मैं-मैं’ करता है। वही सत्ता स्वरूप ‘मैं’ हूँ, ऐसा बोध हो जाना यह आत्मविद्या का उद्देश्य है।

जीव का यह स्वभाव है कि वह जिस शरीर में आता है उसी शरीर को ‘मैं मानकर अपनी आयुष्य गिनता है। वास्तव में देखा जाय तो उसने हजारों शरीरों में कई-कई बार जन्म लिये और जिस-जिस शरीर में जन्म लिया उसी को ‘मैं’ मान लिया, परंतु वह वास्तव में ‘मैं’ नहीं है। अगर वह शरीर ‘मैं’ होता तो शरीर चले जाने के बाद ‘मैं’ भी चला जाता…. परंतु ऐसा नहीं है।

आपका वास्तविक स्वरूप कहीं आता-जाता नहीं है – ऐसा ज्ञान हो जाना आत्मविद्या का लक्ष्य है जबकि प्राकृतिक गुण-दोष और पदार्थ आने जाने वाले हैं।

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।

‘ज्ञान के समान कोई पवित्र नहीं है।’

यदि कोई इस आत्मविद्या के विचार में नित्य तल्लीन रहे तो उसकी कामनाएँ, आकर्षण आद दूर हो जाते हैं। कामनाएँ दूर होते ही काम्य  पदार्थ उसकी शरण खोजने आते हैं। फिर उसे यश की इच्छा नहीं होगी तब भी यश उसके पीछे पड़ेगा, उसे धन की इच्छा नहीं होगी तब भी धन उसकी गुलामी करेगा, भोग की  इच्छा नहीं होगी तब भी भोग उसके इर्दगिर्द में मँडरायेंगे। कोई कहे कि ‘महाराज ! हमें भी तो यश, धन, भोग की कोई इच्छा नहीं है फिर भी यश तो नहीं मिला।’ अरे, ‘इच्छा नहीं है’ कहकर भी यश तो चाहते हैं, गहराई में तो इच्छा है ! भीतर से इच्छा हटनी चाहिए। गहराई से इच्छा हटते ही इच्छित पदार्थ आपके इर्दगिर्द मँडराने लगते हैं – यह प्रकृति का नियम है।

जिसके चित्त में कोई इच्छा नहीं होती, उसके चित्त में राग-द्वेष भी कैसे हो सकते हैं ? जिन्होंने अपने हृदय में ठीक से साक्षी होकर अपने स्वरूप को जान लिया, उनको सदैव-सर्वत्र अपना-आपा ही नज़र आता है। ऐसे महापुरुषों के चित्त में राग-द्वेष कहाँ ?

प्रारम्भ में राग-द्वेष से बचा जाता है, बाद में देश-काल की माया से भी बचा जाता है। अमुक देश में, अमुक काल में प्रीति करना – यह भी माया है। यह माया भी आत्मविद्या की प्राप्ति के बाद छूट जाती है।

योग विद्या में तो राग-द्वेष से बचने पर प्रवेश मिल जाता है और पहुँच भी जाती है, परंतु आत्मविद्या तो राग-द्वेष से पार करके, देश-काल से भी पार कर देती है और परब्रह्म-परमात्मस्वरूप में जगा देती है। ऐसी आत्मविद्या की महिमा है !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2002, पृष्ठ संख्या 2-4, अंक 118

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असली टकसाल


 

गुरु जी मिलते हैं तो दो प्रकार के लाभ होते हैं- एक लघु लाभ और दूसरा गुरु लाभ। तंदुरुस्ती, यश, धन, आरोग्य – ये लघु लाभ हैं तथा भगवान की भक्ति, प्रीति, भगवान में शांति और ‘भगवान मेरे से दूर नहीं, मेरा आत्मा ही ब्रह्म है ‘ यह ज्ञान – ये गुरु लाभ हैं।

संत कबीर जी मथुरा की यात्रा के लिए निकले। बाँके बिहारी के मंदिर के पास कबीर जी को एक आदमी दिखा। कबीर जी ने उसको गौर से देखा। कबीर जी की आँखों में इतनी गहराई, कबीर जी की आत्मा में भगवान का इतना अनुभव कि वह आदमी उनको देखकर मानो ठगा-सा रह गया !

कबीर जी ने पूछाः ‘क्या नाम है तुम्हारा ? कहाँ से आये हो ?”
उसने कहाः “मेरा नाम धर्मदास है। मैं माधोगढ़, जिला रीवा (मध्य प्रदेश) का रहने वाला हूँ।”
“तुम इधर कैसे आये ?”
“मैं यहाँ भगवान के दर्शन करने आया हूँ।” कबीर जी ने पूछाः “कितनी बार आये हो यहाँ ?”
“हर साल आता हूँ।”
“क्या तुमको सचमुच भगवान के दर्शन हो गये ? तुमको भगवान नहीं मिले हैं, केवल मूर्ति मिली हैं। मेरा नाम कबीर है। कभी मौका मिले तो काशी आना।” ऐसा कह के कबीर जी तो चले गये।

कबीर जी की अनुभवयुक्त वाणी ने गैबी (विलक्षण) असर किया। धर्मदास गया तो था बाँके बिहारी जी के दर्शन करने लेकिन मंदिर में जाने अब मन नहीं कर रहा था, घर वापस लौट आया। लग गये कबीर जी के वचन ! अब घर में ठाकुर जी कीक पूजा करता तो देखता कि ‘अंतर्यामी ठाकुर जी के बिना ये बाहर के ठाकुर जी की पूजा भी तो नहीं होगी और बाहर के ठाकुर जी की पूजा करके शांत होना है अंतरात्मारूपी ठाकुर में। मुझे निर्दुःख नारायण के दर्शन करने हैं और वह सदगुरु की कृपा के बिना नहीं होते। वे दिन कब आयेंगे कि मैं सदगुरु कबीर जी के पास पहुँचूँगा ?’ दिन बीता, सप्ताह, एक महीना, 6 महीने बीत गये। एक दिन धर्मदास सब छोड़-छाड़कर कबीर जी के पास पहुँच गये काशी। कबीर जी के पास जाते ही

धरमदास हर्षित मन कीन्हा,
बहुर पुरुष मोहि दर्शन दीन्हा।

धर्मदास का मन हर्षित हो गया। जिनको मथुरा में देखा था, काशी में फिर उन्हीं पुरुष के दर्शन हो गये।

मन अपने तब कीन्ह विचारा, इनकर ज्ञान महा टकसारा।

यह कबीर जी का ज्ञान महा टकसाल है। यहाँ तो सत्य की अशरफियाँ ढलती हैं, आनंद की गिन्नियाँ बनती हैं। मैं कहाँ अपनी तिजोरी में कंकड़-पत्थर इकट्ठे कर रहा था ! आपका जीवन और आपका दर्शन सच्चा सुखदायी है। ये संत अपने सत्संग से, दर्शन से सुख, शांति और आनंदरूपी गिन्नियाँ हृदय-तिजोरियों में भर देते हैं।

इतना कह मन कीन्ह विचारा,
तब कबीर उन ओर निहारा।

तब कबीर जी ने धर्मदास की ओर गहराई से देखा। ऐसा लगा मानो बिछुड़ा हुआ सत्शिष्य गुरु जी को मिला हो। हर्षित मन से कबीर जी ने कहाः आओ धर्मदास पगु धारो..… आओ धर्मदास ! अब काशी में पैर जमाओ। मेरे सामने बैठो। चिहुंक चिहुंक तुम काहे निहारो.… टुकुर –टुकुर क्या मेरे को देख रहे हो ? धर्मदास हम तुमको चीन्हा।…. धर्मदास हमने तुमको पहचान लिया। तुम सत्पात्र हो, सत्शिष्य हो इसलिए मैंने तुमको असली बात कह दी थी। बहुत दिन में दरसन दीन्हा। फिर भी तुमने बहुत दिन के बाद मेरे को दर्शन दिया, 6 महीने हो गये।

कबीर जी ने थोड़ी धर्मदास पर कृपादृष्टि डाली, सत्संग सुनाया। धर्मदास गदगद हो गये, धन्य-धन्य हो गये। सोचा कि ‘मैंने आज तक तो रूपये पैसों के नाम पर नश्वर चीजें इकट्ठी की हैं। मैं उन्हें खर्च करने के लिए जाऊँगा तो मेरे को समय देना पड़ेगा।’ व्यवस्थापकों को संदेशा भेज दियाः ‘जो भी मेरी माल-सम्पत्ति, खेत मकान हैं, गरीबों में बाँट दो। भंडारा कर दो, शुभ कार्यों में लगा दो। मैं फकीरी ले रहा हूँ। संत कबीर जी की टकसाल में मेरा प्रवेश हो गया है। ब्रह्मज्ञानी संत मिल गये हैं। हृदय में आत्मतीर्थ का साक्षात्कार करूँगा। इस सम्पत्ति को सँभालने या बाँटने का मेरे पास समय नहीं है।’

मुनीमों ने तो रीवा जिले में डंका बजा दिया कि जिनको भी जो आवश्यकता है ऐसे गरीब गुरबे और सात्त्विक लोग जो समाज की सेवा करते हैं आश्रम-मंदिरवाले, वे आकर ले जायें। जुटाने के लिए तो जीवनभर लगा दिया लेकिन छोड़ने के लिए मृत्यु का एक झटका काफी है अथवा छोड़ना है तो ‘भाई ! ले जाओ।’ बस, इतना ही बोलना है। कबीर जी के चरणों में धर्मदास लग गये तो लग गये और अपने आत्मा-परमात्मा के परम सुख को पाया।

धर्मदास सन् 1423 में जन्मे थे और करीब 120 वर्ष तक धरती पर रहे। कबीर जी का कृपा प्रसाद पाकर लोगों को महसूस करा दिया कि बाहर का धन कंकड़-पत्थर से ज्यादा मूल्यवान नहीं है। यह राख बन जाने वाले शरीर के लिए है, बाहर का है। असली धन तो सत्संग है, भगवान का नाम है, भगवान की शांति-प्रीति है। असली धन तो परमात्म-प्रसाद है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2015, पृष्ठ संख्या 14,15 अंक 273
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