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अंधकार में अवतार लिया प्रकाशमय जग को किया


श्री कृष्ण जन्माष्टमीः 2 सितम्बर 2010

(पूज्यपाद बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी की रात… बारिश हो रही है और वसुदेव – देवकी कारागार में हैं…. उनके रिश्तेदार भय और आतंक से आतंकित हैं, दुःख में हैं, शोषित हो रहे हैं। ऐसों के यहाँ आने के लिए भगवान श्रीकृष्ण मध्यरात्रि, अँधेरी रात चुनते हैं। अंधकार में पड़े हुए जीव के यहाँ, साधक के यहाँ प्रकाशमय श्रीकृष्ण, दुःख में डूबे हुए समाज के यहाँ सुख स्वरूप श्रीकृष्ण, विषाद में पड़े हुए लोगों के बीच, माधुर्य बरसाने वाले कृष्ण का अवरतरण होता है। कहाँ होता है ? जेल में किसके यहाँ होता है ? वसुदेव-देवकी के यहाँ।

शुद्ध बुद्धि का नाम है देवकी और सत्त्वमय प्रकाश का नाम है वसुदेव। इस जीव का सत्त्वमय प्रकाश हो और शुद्ध बुद्धि हो तो इसके हृदय में भी श्रीकृष्ण का अवतरण होता है, प्रागट्य तो वसुदेव-देवकी के यहाँ होता है परंतु पोषण होता है नंद-यशोदा के यहाँ। वसुदेव जी कृष्ण को ले गये और यशोदा की गोद में रख दिया। यशोदा सोयी है, न माला कर रही है, न इंतजार कर रही है, सोयी हुई यशोदा के पास कृष्ण पहुँचते हैं। अपने लीला-माधुर्य में सराबोर करने के लिए श्रीकृष्ण क्या करते हैं ? रोते हैं।

यशोदा के यहाँ शक्ति का, माया का जन्म हुआ है और वसुदेव – देवकी के यहाँ आनंद का प्रागट्य हुआ है। शक्तिवाले सोते रहते हैं और आनंदवाले जागते और जगाने वाले को छुड़ाने का काम करते हैं। वसुदेव जी माया को ले गये। कृष्ण ने ऊवाँऽऽऽ…..ऊवाँऽऽऽ करके मैया को जगाया कि ‘मैं आया हूँ तेरे घर, अब तू कब तक सोयेगी ?’ सोये हुए को जगाना यह भगवान का भगवदपना है। असाधनवाले को भी सहज में मिलना यह भगवान का भगवदपना है।

जन्माष्टमी के दिन किया हुआ जप अनंत गुना फल देता है। युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछाः “जन्माष्टमी के उपवास से क्या फायदा होता है ?” श्रीकृष्ण बोलेः “उस व्यक्ति के जीवन में धन-धान्य, यश की कमी नहीं रहेगी।” जन्माष्टमी के दिन अगर कोई संसार-व्यवहार करता है तो विकलांग संतान होगी अथवा तो जानलेवा बीमारी पकड़ लेती है।

श्रीकृष्ण मथुरा जा रहे हैं तो सड़कों पर लोग दायें-बायें खड़े हैं और उनके रूप-लावण्य, माधुर्य, उनकी चितवन का आनंद ले रहे हैं। लोग तो कृष्ण को देखकर गदगद हो रहे हैं पर कृष्ण एक कुबड़ी स्त्री पर टिकटिकी लगाये हुए हैं। उसका नाम है कुब्जा, वह कंस के पास अंगराग लेकर जा रही है। कृष्ण बोलते हैं- “ओ सुन्दरी !”

उस कुरुपा में भी सौंदर्य देखने वाला कैसा है तुम्हारा अकालपुरुष ब्रह्म ! कुब्जा ने सोचा कि ‘किसी सुंदरी को बुलाते होंगे, मैं तो कुब्जा हूँ।’ अनसुना करके खबुर-खबुर जूतियाँ घसीटती हुई धूल उड़ाती जा रही है। श्रीकृष्ण ने फिर से आवाज लगायीः “ओ सुन्दरी !” उसने देखा कि यहाँ तो छोरे-छोरे हैं, कोई छोरी तो है नहीं ! वह आगे बढ़ी। श्रीकृष्ण ने फिर से प्रेम में भरकर कहाः “ओ सुन्दरी !” अब उसका छुपा हुआ प्रेमस्वभाव छलका, उसने कहाः “बोलो सुन्दर !”

कृष्ण बोलेः “यह अंगराग मुझे दोगी ?”

बोलीः “हाँ ! लो, लगा लो, लगा लो।”

बात बन गयी। कुछ न कुछ दिये बिना जीव कैसे मुझे पायेगा ! अंगराग माँग लिया। विश्व को देने वाले वे दाता अंगराग लगाने वाली एक साधारण कुब्जा-कुरुपा, कुबड़ी को बोलते हैं- “ए सुंदरी !” और वह कृष्ण को बोलती हैः “बोलो सुन्दर !” काम बन गया !

श्रीकृष्ण बताते हैं कि प्रेम ही विश्व में राज्य करता है। स्वामी रामतीर्थ बोलते थे यह कायदा-कानून तो अपने अधिकार की रक्षा और दूसरे का शोषण करने का एक राजमार्ग है। डण्डे के बल से, आतंक के बल से जो करवाया है, वह लोग बेचारे मजबूरन करते हैं और व्यवस्था है त वह प्रेम के बल से है। माँ बच्चे को प्रेम से पालती-पोसती है। बच्चा भी कर्तव्य समझकर प्रेम से माँ-बाप, गुरु या समाज की सेवा करता है। संत कबीर जी कहते हैं-

प्रेम न खेतों ऊपजे प्रेम न हाट बिकाय।

राजा चहो प्रजा चहो शीश (अहं) दिये ले जाय।।

और तुम्हारा वास्तविक स्वभाव प्रेम है। प्रेम जब धन में फँसता है तो लोभ बनता है, परिवार में फँसता है तो मोह बनता है, शरीर की अहंता में फँसता है तो अहंकार बनता है। प्रेम अगर किसी नाम-रूप में उलझता है तो मायामय बनकर फँसाता है और प्रेम को अगर शुद्ध-बुद्ध रूप में देखा जाय तो वह परमात्मा ही है।

अंगराग लिया और उसके पैर पर पैर रखके ठोड़ी को यूँ झटका मारा तो सचमुच वह कुबड़ी सुंदरी हो गयी। कृष्ण कन्हैया लाल की जय !

भगवान का भगवानपना केवल अवतारकाल में ही नहीं था, वह अब भी है। हमारा भगवान यह नहीं जो कभी हो और कभी न हो, कहीं हो और कहीं न हो, किसी में हो और किसी में न हो, उसको भारतवासी पूर्ण परमात्मा नहीं मानते। आया और चला गया, फिर नहीं है उसको हम भगवान नहीं मानते। भगवान तो हम मानते हैं जो पहले थे, अभी हैं और बाद में रहेंगे। कभी साकार रूप मे विशेष लीला करने के लिए प्रेमावतार में आ गये, मर्यादा-अवतार में आ गये, कच्छप-अवतार में आ गये, मत्स्य-अवतार में आ गये और सर्वत्र ज्यों के त्यों भरपूर भी रहे… जिस-जिस अवतार में जितनी बुद्धि, योग्यता और सामर्थ्य की आवश्यकता होती है, उतना ही प्रगट करते हैं और फिर वह अवतार अन्तर्धान हो जाता है, फिर भी भगवान सबमें रहते हैं। जैसे कहीं-कहीं छोटी तरंग, कहीं बड़ी, कहीं बहुत बड़ी तरंग…. फिर भी समुद्र में पानी हो तो व्याप रहा है।

जीवन केवल समस्याएँ और उनके समाधान के लिए नहीं है। जीवन हास्य के लिए, विनोद के लिए, आनंद के लिए, माधुर्य के लिए, अपने सुखस्वभाव को छलकाने के लिए है और अंतरात्मा में विश्रान्ति पाने के लिए है। श्रीकृष्ण के पास गंधर्व-विद्या है। उसमें वाद्ययंत्र भी होता है, गायन और नृत्य भी होता है। वाद्य में भी बंसी सर्वोपरि है तो उसको बजाने वाले श्रीकृष्ण भी सर्वोपरि हैं।

श्रीकृष्ण ने इतना मन लगाकर चार वेद, चार उपवेद का ज्ञान पाया कि उनके ज्ञान की थोड़ी-सी छटा है, जो गीता होकर विश्वंदनीय हो रही है। ऐसे श्रीकृष्ण के अवतरण का दिवस है जन्माष्टमी-महोत्सव।

आप कभी यह नहीं मानना कि वे दूर हैं, दुर्लभ हैं, परिश्रम से मिलेंगे, पराये हैं, कुछ साधन होगा, कुछ तपस्या होगी, कुछ क्या-क्या होगा। तब मिलेंगे…. नहीं-नहीं। सो साहिब सद सदा हजूरे, अंधा जानत ताको दूरे। श्रीकृष्ण सुबह उठते हैं तो शांत भाव में रहते हैं। वे तुम्हें प्रेरणा देते हैं कि प्रातः उठते ही अपने आत्मस्वभाव में, आनंद-स्वभाव में, शांतस्वभाव में संकल्परहित स्थिति में टिक रहो। जिसको जाना है उसका आदर करो, जिसको माना है उसमें दृढ़ श्रद्धा करो। करने की शक्ति का, जानने की शक्ति का, मानने की शक्ति का ठीक सदुपयोग करो।

गुरु की वाणी वाणी गुर, वाणी विच अमृत सारा।

भगवान ने गुरुरूप में अर्जुन को तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया और अर्जुन ने स्थिति पायी। अर्जुन कहता हैः नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा। तो गीता के ज्ञान से ही आम आदमी को यह संदेशा मिलता है कि भगवान के साकार दर्शन के बाद भी जब भगवद्-तत्त्व का ज्ञान देने वाले गुरु हमको मिलें अथवा भगवान गुरु की भूमिका अदा करें, तब हम दुःखों से बचते हैं। इसलिए कहते हैं-

गुरुकृपा ही केवलं शिष्यस्य परं मंगलम्।

मंगल तो देवता की कृपा से हो जायेगा, तपस्या से हो जायेगा, किसी के वरदान से हो जायेगा, किसी के साथ-सहयोग से हो जायेगा परंतु परम मंगल तो सदगुरु के, साक्षात्कारी महापुरुष के ज्ञान से ही होगा। श्रीकृष्ण ऐसे सदगुरु हैं, ऐसे महापुरुष हैं।

जो विद्या अरण्य में दी जाती है वह युद्ध के मैदान में श्रीकृष्ण ने बंसी बजाते हुए दी है। वीर अर्जुन को भी उस गीता का प्रसाद मिलता है और भक्त संजय को भी मिलता है। बाहर से और भीतर से जो अंधे हैं धृतराष्ट्र…. बाहर से आँखें नहीं हैं और भीतर से ऐसी ममता है कि भीतर से भी कुछ सूझता नहीं है, उन्हें भी गीता का प्रसाद मिला है।

वैदिक धर्म में प्रार्थनाएँ हैं, मंदिर में प्रार्थनाएँ करते हैं, यकीन-श्रद्धा है, करूणा भी है, अहिंसा भी है किंतु एक खास बात है – विशेषता यह है कि इसमें हित की प्रधानता है। अगर उँगली कटाने से हाथ बच जाता है तो उँगली काटो। अगर हाथ कटाने से शरीर बच जाता है तो हाथ कटाओ। दुर्योधन को मारने से मानवता की रक्षा होती है तो दुर्योधन को पहुँचाओ। अर्जुन कहता है कि “मैं भिक्षा माँगकर खाऊँगा, युद्ध नहीं करूँगा।” कृष्ण ने प्रोत्साहित किया कि ‘जो आततायी हैं, जो निर्दोषों को सताते हैं और फिर मानते नहीं हैं, ऐसे लोगों को दण्ड देना क्षत्रिय का कर्तव्य है।’

कर्तव्यता में देखो तो कृष्ण पूर्ण ! केवल कर्तव्य, नृत्य, हास्य- विनोद है ऐसा नहीं, वैराग्य भी उनमें पूर्ण है। भगवान के छः-के-छः ऐश्वर्य कृष्ण-अवतार में छलकते हैं। बारह साल वृंदावन नहीं आये। नहीं तो ललनाएँ तरस रही हैं, लाले पुकार रहे हैं… कैसा वैराग्य ! गोवर्धन उठाने का ऐश्वर्य भी भगवान में है। धर्म-अनुष्ठान करते हैं, धर्म भी पूर्ण है। यश भी पूर्ण है। अर्जुन और उद्धव जैसों को ज्ञान देने का सामर्थ्य श्रीकृष्ण में है।

अमीरी की ऐसी की, सब जर लुटा बैठे।

फकीरी की तो ऐसी की, ज्ञान के द्वार आ बैठे।।

जीवन में लोलुपता का अभाव, भय का, शुष्कता का अभाव देखना है तो श्रीकृष्ण के जीवन में देखो। श्रीकृष्ण के बेटे उनकी बात नहीं मानते और कभी उनके मुँह पर सुना भी देते हैं किंतु कृष्ण उदास नहीं होते। आज साधारण सेठ का बेटा नहीं मानता तो सेठ कहता हैः “मैं तो मर गया ! दो छोकरे तो मानते हैं पर तीसरा ऐसा है।” आँसू बहार रहे हैं… दो मान रहे हैं उसकी खुशी में तू बंसी बजा। श्रीकृष्ण के बेटे तो मानते ही नहीं थे। साधु-संत आते, अरे ! भीम जैसे आते, युधिष्ठिर आते तो श्रीकृष्ण खड़े हो जाते, ऐसे शिष्टाचार के धनी। और श्रीकृष्ण के छोरे तो साधु-संत जा रहे थे तो उनकी मखौल उड़ाने के लिए एक लड़के को तसला बाँध के, अंदर मूसल रख के महिला का पहनावा पहना के बोलेः “महाराज ! यह गर्भवती है। इसको बेटा होगा कि बेटी ?” संत बोलेः “न बेटा आयेगा, न बेटी आयेगी, तुम्हारा नाश करने वाला आयेगा।” लो ! इन शैतानों की शैतानियत समाज को दुःख देगी इसलिए अपने होते-होते अपने बेटों को भी ऋषियों के द्वारा रवाना करते हैं। कैसा वैराग्य ! कैसा समाज के हित की भावना से भरा हुआ यह भगवान है !!

सचमुच, हम भाग्यशाली हैं कि हमारा वैदिक धर्म में जन्म हुआ है, हम और भी महाभाग्यशाली हैं कि भारतीय संस्कृति का जो स्तम्भ है ऐसा वेद और गीता का ज्ञान सुनने और सुनाने वाले माहौल में हम पैदा हुए हैं। आप ‘दासोऽहम्-दासोऽहम्’ करके सिकुड़-सिकुड़ के दीन-हीन होकर अपनी शक्तियों को कुंठित मत करिये। आप तो संकल्प कीजियेः “मैं भगवान का हूँ, भगवान मेरे हैं। भगवान विकारों के बीच भी निर्विकार हैं तो मैं भी विकारों के बीच भी निर्विकार रहूँगा। भगवान सुख में आसक्त नहीं होते और दुःख में दुःखी नहीं होते, दुःख का भी सदुपयोग करते हैं तो मैं भी ऐसा करूँगा।’

जब जाने का समय हुआ तो एक शिकारी के द्वारा संसार से विदाई ले रहे हैं। शिकारी ने देखा कि यह कोई मृग है, कसा निशाना और तीर श्रीकृष्ण के पैर के तलवे में लगा। शिकारी शिकार समझ के दौड़ता हुआ आया, देखा तो घबराया। श्रीकृष्ण बोलेः “कोई बात नहीं। मैं जानता हूँ ऐसी होनी थी तू जा, निश्चिंत हो जा।”

आखिरी श्वास लेने की वेला है और जिसने तीर मारा है उसको देखकर भी नाराजगी नहीं होती। क्या बात है ! कैसा है तुम्हारा भगवान !! ‘हाय रे, ए तू चला जाऽऽ… अब मैं प्राण-त्याग करता हूँ… आह….!!’ ऐसा करक नहीं गये। अंतिम यात्रा कैसे करनी चाहिए यह भी कृष्ण बताते हैं।

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।

सुखं व यदि दुःखं स योगी परमो मतः।।

‘हे अर्जुन ! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सबमें सम देखता है वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।’

(गीताः 6.32)

सुखद अवस्था आये तो भी, दुःखद अवस्था आये तो भी आप अपने परम ज्ञान में रहिये, परम चेतना में रहिये, परम आनन्द में रहिये और परमपुरुष गुरु के तत्त्व में रहिये, उलझिये मत।

कंस को तो हृदयाघात करके भेज सकते थे अथवा त और कोई दुश्मन देकर पहुँचा सकते थे परंतु भगवान का भगवदपना यह है कि एक उद्देश्य के पीछे कई कल्याणकारी उद्देश्यों को लेकर वर अव्यक्त सत्ता व्यक्त हो जाती है, निराकार साकार हो जाता है, अजन्मा सजन्मा हो जाता है, सबसे असंग रहने वाला सबका संगी बन जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 16,17,18,19  अंक 212

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वर्षा ऋतु में स्वास्थ्य-सुरक्षा


ग्रीष्म ऋतु में अत्यधिक दुर्बलता को प्राप्त हुए शरीर को वर्षा ऋतु में धीरे-धीरे बल प्राप्त होने लगता है। आर्द्र (नमीयुक्त) वातावरण जठराग्नि को मंद कर देता है। शरीर में पित्त का संचय व वायु का प्रकोप हो जाता है। परिणामतः वात-पित्तजनित व अजीर्णजन्य रोगों का प्रादुर्भाव होता है। अतः इन दिनों में जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला, सुपाच्य व वात-पित्तशामक आहार लेना चाहिए।

सावधानियाँ

भोजन में अदरक व नींबू का प्रयोग करें। नींबू वर्षाजन्य रोगों में बहुत लाभदायी है।

गुनगुने पानी में शहद व नींबू का रस मिलाकर सुबह खाली पेट लें। यह प्रयोग सप्ताह में 3-4 दिन करें।

प्रातःकाल में सूर्य की किरणें नाभि पर पड़ें इस प्रकार वज्रासन में बैठ के श्वास बाहर निकालकर पेट को अंदर-बाहर करते हुए ‘रं’ बीजमंत्र का जप करें। इससे जठराग्नि तीव्र होगी।

भोजन के बीच गुनगुना पानी पीयें।

सप्ताह में एक दिन उपवास रखें। निराहार रहें तो उत्तम, अन्यथा दिन में एक बार अल्पाहार लें।

सूखा मेवा, मिठाई, तले हुए पदार्थ, नया अनाज, आलू, सेम, अरबी, मटर, राजमा, अरहर, मक्का, नदी का पानी आदि त्याज्य हैं।

देशी आम, जामुन, पपीता, पुराने गेहूँ व चावल, तिल अथवा मूँगफली का तेल, सहजन, सूरन, परवल, पका पेठा, टिंडा, शलजम, कोमल मूली व बैंगन, भिंडी, मेथीदाना, धनिया, हींग, जीरा, लहसुन, सोंठ, अजवायन सेवन करने योग्य हैं।

श्रावण मास में पत्तेवाली हरी सब्जियाँ व दूध तथा भाद्रपद में दही व छाछ का सेवन न करें।

दिन में सोने से जठराग्नि मंद व त्रिदोष प्रकुपित हो जाते हैं। अतः दिन में न सोयें। नदी में स्नान न करें। बारिश में न भीगें। रात को छत पर अथवा खुले आँगन में न सोयें।

औषधि प्रयोगः

वर्षा ऋतु में रसायन के रूप में 100 ग्राम हरड़ चूर्ण में 10-15 ग्राम सेंधा नमक मिला के रख लें। दो ढाई ग्राम रोज सुबह ताजे जल के साथ लेना हितकर है।

हरड़ चूर्ण में दो गुना पुराना गुड़ मिलाकर चने के दाने के बराबर गोलियाँ बना लें। 2-2 गोलियाँ दिन में 1-2 बार चूसें। यह प्रयोग वर्षाजन्य सभी तकलीफों में लाभदायी है।

वर्षाजन्य सर्दी, खाँसी, जुकाम, ज्वर आदि में अदरक व तुलसी के रस में शहद मिलाकर लेने से व उपवास रखने से आराम मिलता है। एंटीबायोटिक्स लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2010, पृष्ठ संख्या 30, अंक 211

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सितारों से जहाँ कुछ और भी है…..


(पूज्य बापू जी का सत्संग-गंगा से)

एक महात्मा हो गये स्वामी राम।  स्वामी रामतीर्थ नहीं, दूसरे स्वामी राम। अभी उनका शरीर तो नहीं है पर देहरादून में संस्था है। देश-विदेश में उनके बहुत अनुयायी थे। स्वामी राम के गुरु बड़े उच्चकोटि के संत थे। वे एकांतप्रिय थे, जिस किसी से ज्यादा बात करना या मिलना उन्हें पसंद नहीं था।

स्वामी राम ने अपनी बाल्यावस्था में लिखा है कि भुवाल नाम के एक संन्यासी थे, जो संन्यास-दीक्षा के पहले बंगाल की ‘भवाल’ रियासत के राजकुमार थे। विवाह के बाद वे अपनी पत्नी के साथ दार्जिलिंग में रहते थे। उनकी पत्नी पहले से ही किसी डॉक्टर से प्रेम करती थी लेकिन शादी हो गयी इस राजकुमार से। फिर भी वह डॉक्टर उससे मिलने आता-जाता रहा। उनकी पत्नी और डॉक्टर ने मिलकर राजकुमार को साँप से विष के इंजेक्शन (सुई) लगाने शुरू कर दिये। राजकुमार समझते रहे कि यह विटामिन सी सुई लग रही है। डॉक्टर ने धीरे-धीरे वि, की मात्रा बढ़ायी और कुछ महीनों बाद विष ने अपना प्रभाव दिखाया, राजकुमार की मृत्यु हो गयी। दिखावा किया कि स्वाभाविक ढंग से मृत्यु हुई है।

राजकुमार की शव यात्रा में हजारों लोग एकत्रित हो गये। जलाने के लिए शहर से कुछ दूर एक पहाड़ी नाले के किनारे श्मशानघाट में ले गये। चिता तैयार की गयी लेकिन देव की लीला तो देखो ! एकाएक उस पहाड़ी इलाके में बहुत तेज बरसात आयी, दार्जिलिंग में तो वैसे ही कभी भी बरसात आ जाय। उस पहाड़ी इलाके में बरसात भी तेज आयी। ऐसी मूसलाधार बरसात आयी कि सारे लोग भाग गये। चिता को अग्नि लगी ही थी, शव का कफन थोड़ा-बहुत जला-न जला और बरसात ने सब तहस-नहस कर दिया। बरसात के कारण पहाड़ी नाले में भयंकर बाढ़ आ गयी और वह शव उसमें बह गया।

श्मशानघाट से तीन मील दूर स्वामी राम के गुरु अपने शिष्यों के साथ एक गुफा में ठहरे थे। उन्होंने उस कफन में लिपटे तथा बाँसों में बँधे शव को नाले में बहते देखा तो अपने शिष्यों को बोलेः “इस शव को ले आओ।” शव को नाले से निकालकर अर्थी की लकड़ी आदि जो बाँधी थी रस्सी-वस्सी से, वह खोली। लाश को उठाकर लाया गया। गुरुजी बोलेः “देखो, इसमें प्राण हैं, अभी यह मरा नहीं है। यह पूर्वजन्म का मेरा शिष्य है।” थोड़ा उपचार करके राजकुमार को उठाया लेकिन वे मौत की यह घटना, पूर्व का जीवन सब कुछ भूल गये थे। उनको गुरु ने पुनः दीक्षा दी और अपने साथ रख लिया। वे साधु बन गये। सात वर्ष तक साथ में रहे फिर गुरु जी बोलेः “जाओ बेटा ! देशाटन करो, विचरण करते-करते आगे बढ़ो। कहीं अटकना नहीं, अनुकूलता में रुकना नहीं और प्रतिकूलता को भी सत्य मत मानना। रोज अपना नित्य नियम और भगवद् ध्यान आदि करते रहना। समय पाते सब ठीक हो जायेगा।”

‘जो आज्ञा’ कहकर वे तो रवाना हुए। गुरुजी ने अपने शिष्यों से कहाः “इसकी बहन इसे पहचान लेगी और जब यह अपनी बहन से मिलेगा तब इसकी खोयी हुई स्मृति पुनः लौट आयेगी।”

राजकुमार परिव्राजक के रूप में भ्रमण करते हुए अनजाने में अपनी बहन के द्वार पर जा पहुँचे। बहन ने भैया को पहचान लिया और भैया का नाम लेकर पुकारा। भैया की खोयी हुई स्मृति जागृत हो गयी, उन्होंने अपनी पूरी कहानी बतायी। बात बिजली की नाईं गाँव में फैल गयी। लोग आपस में बोलने लगे कि ‘राजकुमार तो मर गये थे, हम तो श्मशान में छोड़कर आये थे !’

राजकुमार के संबंधियों ने न्यायालय की शरण ली। बाबाजी ने अपने दो शिष्यों को राजकुमार की मदद में भेज दिया। शिष्यों ने भी जब सच्चाईपूर्वक बात कही तो हजारों आदमी उनके पक्ष में हो गये और कौतूहलवश हजारों आदमी दूसरे पक्ष में भी हो गये। दार्जिलिंग के न्यायालय में इतनी भीड़ कभी नहीं हुई थी जितनी इसके निमित्त हुई। लोग उत्सुक थे कि सच्चाई क्या है ?

राजकुमार योग-साधना करते थे, अपनी स्मृति के बल से स्मरण करके न्यायालय में अपना पूरा वृत्तान्त बताया कि ‘ऐसे-ऐसे साँप के जहर के इंजेक्शन मुझे देते थे। मैं समझता था कि विटामिन मिल रहा है। इस तरह से मेरी मृत्यु हुई, ऐसी शवयात्रा हुई। मूसलाधार वर्षा हुई, शव बह गया और इस तरह से गुरुजी ने मुझे बचाया।’

आखिर न्यायालय में यह सिद्ध हो गया कि राजकुमार की पत्नी ने अपने प्रेमी डॉक्टर से मिलकर उनको साँप के जहर के इंजेक्शन दिये थे तथा स्वामी जी ने उनको अपना पूर्व-साधक समझकर मदद की और शेष जिंदगी बचायी है।

राजकुमार की जीत हुई और वे पुनः अपने भवाल नामक राज्य में लौट पड़े। उनके गुरुजी की यही आज्ञा थी। वे एक साल तक रहे फिर शरीर छोड़ दिया।

इन कथाओं से यह बात सामने आती है कि तुमको जितना दिखता है, सुनाई पड़ता है उतना ही जगत नहीं है, जगत और कुछ, बहुत सारा है लेकिन यह अष्टधा प्रकृति के अंदर हैं। जब तक प्रकृति को ‘मैं’ मानते रहेंगे, प्रकृति के शरीर को ‘मैं’ मानते रहेंगे व वस्तुओं को ‘मेरा’ मानते रहेंगे, तब तक असली ‘मैं’ स्वरूप जो परमात्मा है वह छुपा रहता है और जन्म मृत्यु, जरा व्याधि की यातनाओं के कष्ट और शोक तथा राग द्वेष, तपन में जीव तपते रहते हैं। ऐसा भी कोई है जो इन सबसे परे राग-द्वेष, कष्ट, शोक को जान रहा है। जिन्होंने अपने उस चिदानंदस्वरूप को, सत्स्वरूप को ‘मैं’ के रूप में जान लिया वे धन्य हैं ! उनके दर्शन करने वाले भी धन्य हैं ! ब्रह्म गिआनी का दरसु1 बडभागी पाईऐ।(गुरुवाणी) 1 दर्शन.

वह लक्ष्य रखो, ऊँचा उद्देश्य, ऊँचा लक्ष्य रखो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2010, पृष्ठ संख्या 28,29 अंक 211

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