All posts by Gurukripa

जिसके बिना जीवन अधूरा….- पूज्य बापू जी


चित्त की विश्रांति से सामर्थ्य प्रकट होता है और सामर्थ्य का सदुपयोग करने से निर्भयता आती है । चित्त की विश्रांति प्रभुरस को प्रकट करने वाली कुंजी है । चित्त की विश्रांति प्रसाद की जननी है । विश्रांति साधन ब्रह्मज्ञान कराने में समर्थ है । जैसे – काम करते-करते थक जाते हैं फिर आराम करते हैं तो काम करने की शक्ति संचित होती है । बोलते-बोलते थक जाते हैं फिर नहीं बोलते तो बोलने की शक्ति संचित होती है । दिन भर परिश्रम करते हैं, अपनी ऊर्जा खर्च होती है और रात को कुछ नहीं करते – सो जाते हैं तो दूसरे दिन काम करने की ऊर्जा संचित होती है । यह सबके अनुभव की बात है ।

अभी अपराधियों से पूछताछ करने वालों ने एक नया तरीका खोज लिया है । पहले तो अपराधी को मार-पीटकर सच्ची बात उगलवाते थे । अब अपराधी को रात को सोने नहीं देते तो वह इतना विह्वल हो जाता है कि कोई भी गोपनीय बात छुपा नहीं सकता । सच्ची बात बोलकर वह जान छुड़ा लेता है तो मानना पड़ेगा कि अपराधी व्यक्ति को भी आराम चाहिए ।

आराम तीन प्रकार का होता हैः स्थूल आराम, सूक्ष्म आराम और वास्तविक आराम ।

स्थूल आरामः काम करके थके हैं और नींद आयी, यह स्थूल आराम है ।

सूक्ष्म आरामः कर्म ऐसे सुन्दर, सुहावने मंगलकारी करें कि हृदय में संतोष मिले । आपको भूख लगी है, भोजन की थाली तैयार है परंतु आपने देखा कि कोई व्यक्ति है जो अपने से भी ज्यादा भूखा या दुखियारा है । यदि खुद को थोड़ा भूखा रखकर भी आपने उसको खिला दिया तो उसको तो भूख की पीड़ा से आराम मिलेगा परंतु आपको सूक्ष्म आराम मिलेगा । ऐसे ही माता-पिता व मित्रों के काम आ गये, संस्कृति व धर्म के काम आ गये तो उसमें स्थूल आराम तो नहीं होता, कठोर परिश्रम होता है । जैसे गुरु गोविन्दसिंह जी के बेटे दीवाल में चुने जा रहे थे, उनका स्थूल आराम तो तबाह हो रहा था, मौत आ रही थी लेकिन आत्मसंतोष हो रहा था कि अपने धर्म के लिए दीवाल में चुन जा रहे हैं । बहू कैसी भी हो, सास उसे बेटी समझकर बड़ा दिल रख के उससे व्यवहार करती है, ‘बहू मेरे साथ बुरा व्यवहार करती है किंतु मैं तो बुरा व्यवहार नहीं करूँगी । उसकी गति वह जाने ।’ – ऐसा सोचती है अथवा बहू सास की सब बातें सहन कर लेती है और अपनी तरफ से सास के साथ मंगलमय व्यवहार करती है तो उनको एक प्रकार का आत्मसंतोष का आराम मिलता है ।

लालबहादुर शास्त्री, मोरारजी भाई देसाई जैसे कोई नेता जिन्होंने अपने क्षेत्र में कार्य किया हो, उन्हें चुनाव में हारने पर भी इस प्रकार का आत्मसंतोष होता है कि चलो भाई ! हम तीन बार जीते, चौथी बार हार गये अथवा कभी मंत्री नहीं बने तो भी कोई बात नहीं, हमने अपने इलाके के लोगों की सेवा की है ।’ लेकिन इससे जीवात्मा का परम कल्याण नहीं होता । वह तो होता है वास्तविक आराम पाने से ही ।

वास्तविक आरामः चतुर्मास में देवशयनी एकादशी से देवउठी एकादशी तक भगवान नारायण क्षीरसागर में लेटे-लेटे वास्तविक आराम पाते हैं और उनके संकल्प के प्रभाव से सृष्टि चलती है । आप रात्रि को निद्रा में आराम पाते हैं और सुबह प्रभात काल में जो निर्णय करते हैं वे अच्छे होते हैं तथा झंझटों से बचाने वाले होते हैं । रात्रि की निद्रा को अगर आप योगनिद्रा बनाने में सक्षम हो जायें तो स्थूल आराम के साथ सूक्ष्म आराम और सूक्ष्म आराम के साथ वास्तविक आराम तक आप पहुँच सकते हैं । वास्तविक आराम पाने के लिए ही मनुष्य जन्म मिला है । नींद तो भैंसा भी कर लेता है, पक्षी भी अपने घोंसले में आराम कर लेते हैं । हर जीव को निद्रा चाहिए और वह कर लेता है । स्थूल आराम करना कोई बड़ी बात नहीं है । सूक्ष्म आराम करना कुछ-कुछ अच्छाई है किंतु जिसने वास्तविक आराम पा लिया उसने अपना और अपनी सात पीढ़ियों का वास्तविक कल्याण कर लिया ।

दुनिया के तमाम श्रेष्ठ ग्रंथों में विश्व-साहित् में सबका मंगल चाहने वाले सर्वोपरि ग्रंथ हैं चार वेद । वेद कहते हैं-

ॐ द्यौः शांतिरन्तरिक्षं शांतिः पृथिवी शांतिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ।।

‘स्वर्गलोक, अन्तरिक्षलोक तथा पृथ्वीलोक हमें शान्ति प्रदान करें । जल शांतिप्रदायक हो, औषधियाँ तथा वनस्पतियाँ शांति प्रदान करने वाली हों । सभी देवगण शांति प्रदान करें । सर्वव्यापी परमात्मा सम्पूर्ण जगत में शांति स्थापित करें । शांति भी हमें परम शांति प्रदान करे ।’ (यजुर्वेदः 36.17)

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ।।

‘सभी सुखी हों, सभी नीरोगी रहें, सभी सबका मंगल देखें और किसी को भी किसी दुःख की प्राप्ति न हो ।’

पशुओं को, पक्षियों को, पेड़-पौधों को भी सुख-शांति मिले । सबको सुख-शांति व वास्तविक आराम मिले ।

वास्तविक आराम के बिना जो कुछ मिलेगा वह एक दिन छीना जायेगा । आज तक जो आपने जाना है, पाया है और आज के बाद जो जानोगे, पाओगे वह सब मृत्यु के एक झटके में छूट जायेगा लेकिन जो वास्तविक तत्त्व है उसको एक बार जान लो या पा लो तो मौत का बाप और तैंतीस करोड़ देवता व भगवान नारायण मिलकर भी उसे छीन नहीं सकते । भगवान नारायण सहित सब देवता मिलें और देवताओं तथा भगवान नारायण का आधारस्वरूप आत्मा (वास्तविक आराम) नहीं मिला तो जीवन अधूरा है । उर्वशी अप्सरा को ठुकराने की ताकत रखने वाले अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण मिले, फिर भी उसका रुदन चालू था । 16000 राजकन्याओं के साथ एक ही दिन में विवाह सम्पन्न करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपने उतने ही रूप बना लिये और उतने ही रूप गर्गाचार्यों के भी बना दिये थे । ऐसे समर्थ श्रीकृष्ण जिसके सारथी हैं, ऐसे अर्जुन को भी जब तक वास्तविक तत्त्व का ज्ञान नहीं मिला तब तक उसके सर्व दुःखों की निवृत्ति नहीं हुई और जब वास्तविक तत्त्व का ज्ञान हुआ, वास्तविक आराम मिला तो वही अर्जुन कहता हैः

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा…..

‘मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है ।’ (गीताः 18.73) अर्थात् अपने शुद्ध, बुद्ध, नित्य, मुक्त आत्मस्वभाव की स्मृति ।

आपकी पत्नी राज़ी हो गयी, पति राज़ी हो गया, बॉस राज़ी हो गया, लोगों ने तालियाँ बजाकर आपका ‘वोट बैंक’ पक्का कर दिया तो भी आप पूरे निश्चिंत नहीं हो सकते । कुछ भी मिल जाय फिर भी सारे दुःखों की निवृत्ति और पूर्ण सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती । मदालसा रानी ने अपने चारों बेटों को वास्तविक आराम दिला के ब्रह्मज्ञानी बना दिया । ‘गुरुवाणी’ में आता हैः

पूरा प्रभु आराधिआ पूरा जा का नाउ ।

नानक पूरा पाइआ पूरे के गुन गाउ ।।

जिस मनुष्य ने अटल नाम वाले पूर्ण प्रभु का स्मरण करके आत्मारामी सद्गुरुओं की कृपाप्रसादी को पचाया है, उसे पूर्ण प्रभु मिल गया है । पूर्ण पुरुषों से पूर्ण स्वरूप का ज्ञान पाकर, अपनी पूर्णता की अनुभूति कराने वाले साधन को समझकर सजाग हो जाना चाहिए, अपनी पूर्णता का अनुभव करना चाहिए ।

पूर्ण परमात्मा की आराधना करके उसमें शांत होना सीखो, सम होना सीखो तो आपका परम मंगल हो जायेगा, परम कल्याण हो जायेगा ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2008 पृष्ठ संख्या 2-4

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

महानता के चार सिद्धान्त


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

महानता के चार सिद्धान्त हैं- हृदय की प्रसन्नता, उदारता, नम्रता, समता।

हृदय की प्रसन्नता- जिसका हृदय जितना प्रसन्न, वह उतना ज्यादा महान होता है। जैसे – श्री कृष्ण प्रसन्नता की पराकाष्ठा पर हैं। ऋषि का श्राप मिला है, यदुवंशी आपस में ही लड़कर मार-काट मचा रहे हैं, नष्ट हो रहे हैं, फिर भी श्री कृष्ण की बंसी बज रही है…..

उदारता- श्रीकृष्ण प्रतिदिन सहस्रों गायों का दान करते थे। कुछ-न-कुछ देते थे। धन और योग्यता तो कइयों के पास होती है लेकिन देने का सामर्थ्य सबके पास नहीं होता। जिसके पास जितनी उदारता होती है, वह उतना ही महान होता है।

नम्रता- श्रीकृष्ण नम्रता के धनी थे। सुदामा के पैर धो रहे हैं श्रीकृष्ण ! देखा कि पैदल चलते-चलते सुदामा के पैरों में काँटें चुभ गये हैं, उन्हें निकालने के लिए रुक्मिणी जी से सुई मँगवायी। सुई लाने में देर हो रही थी तो अपने दाँतों से ही काँटा खींचकर निकाला और सुदामा के पैर धोये…. कितनी नम्रता !

युधिष्ठिर आते तो वे उठकर खड़े हो जाते थे। पाण्डवों के संधिदूत होकर गये और वहाँ से लौटे तब भी उन्होंने युधिष्ठिर को प्रणाम करते हुए कहाः ‘महाराज ! हमने तो कौरवों से संधि करने का प्रयत्न किया, किंतु हम विफल रहे।’

ऐसे तो चालबाज लोग और सेठ लोग भी नम्र दिखते हैं ! परंतु केवल दिखावटी नम्रता नहीं, हृदय की नम्रता होनी चाहिए। हृदय की नम्रता आपको महान बना देगी।

समता- श्रीकृष्ण तो मानो, समता की मूर्ति थे। इतना बड़ा महाभारत का युद्ध हुआ, फिर भी कहते हैं कि ‘कौरव-पाण्डवों के युद्ध के समय यदि मेरे मन में पाण्डवों के प्रति राग न रहा हो और कौरवों के प्रति द्वेष न रहा हो तो मेरी समता की परीक्षा के अर्थ यह बालक जीवित हो जाये।’ और बालक (परीक्षित) जीवित हो उठा…..

जिसके जीवन में ये चार सदगुण हैं, वह अवश्य महान हो जाता है। नम्र व्यक्ति बड़े-बड़े कष्टों और क्लेशों से छूट जाता है और दूसरों के हृदय में भी अपना प्रभाव छोड़ जाता है। जबकि अहंकारी व्यक्ति बड़ी-बड़ी विघ्न बाधाओं से जूझते-जूझते थक जाता है और अपने दुश्मन बढ़ा लेता है।

नम्रता व्यक्ति को महान बनाती है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि जहाँ तहाँ बदमाश, लुच्चे और ठगों को प्रणाम करते रहें। नम्रता कहाँ और कैसे दिखानी – यह विवेक भी होना चाहिए। दुष्ट के आगे नम्र बनोगे तो वह आपको बुद्धु मानेगा। अपने शोषक के आगे नम्र हो जाओगे तो वह ज्यादा शोषण करेगा, अतः विवेक का उपयोग करें।

रावण और कंस के जीवन में अहंकार था तथा श्रीराम और श्रीकृष्ण के जीवन में प्रसन्नता, उदारता, नम्रता, समता आदि सदगुण थे। परिणाम क्या हुआ ? सारी दुनिया जानती है।

ये चारों सदगुण कैसे आते हैं ?

धर्म का आश्रय लेने से । जो अपना कर्तव्य ठीक से निभाता है, वह प्रसन्न रहता है। माता-पिता के दिल को दुःखाकर, चोरी करके, दूसरों को सताकर कोई प्रसन्न रह सकता है क्या ? नहीं सदा प्रसन्न रहने के लिए सदाचार, पवित्रता, सात्विकता आदि सदगुणों का आश्रय लेना होता है। ‘श्रीमद्भगवदगीता’ के सोलहवें अध्याय में दैवी सम्पदा के प्रथम तीन श्लोकों को अपने आचरण में लाकर अपना जीवन सार्थक करें।

धर्म क्या है ? कोई आपके यहाँ चोरी करता है तो आपको अच्छा नहीं लगता, इसलिए आप किसी की चोरी न करो। आपसे कोई धोखा करता है तो आपको अच्छा नहीं लगता, अतः आप भी किसी से धोखा न करो। आपके कोई हाथ पैर तोड़ दे या आपका अहित करे तो आपको अच्छा नहीं लगता, इसलिए आप भी किसी का अहित न करो। लेकिन कोई आपको डण्डा मारने आये तो रक्षा के लिए आपको भी डण्डा उठाना पड़ेगा। हिंसा करना तमोगुण है, प्रतिहिंसा करना रजोगुण है और अहिंसक बनना सत्त्वगुण है।

प्रसन्न वही रह सकता है, जिसके पास धर्म है, संयम है। जिसकी इन्द्रियाँ और मन जितने उसके नियंत्रण में हैं, उतना ही वह प्रसन्न, उदार, नम्र और सम रह सकता है। जिसके जीवन में ये चार सदगुण नहीं हैं, वह बाहर से कितना भी ऊँचा दिखे, अंत में थक जायेगा, हार जायेगा, निराश हो जायेगा….. जिसके जीवन में चार सदगुण हैं, वह महान होता जायेगा….

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2002, पृष्ठ संख्या 9,10

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

बंधन किसको है ?


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

श्री योगवाशिष्ठ महारामायण में आता है कि वह आनन्दस्वरूप अपना आत्मा ही परमेश्वर है।

हम नित्य सुख चाहते हैं, सदा सुख चाहते हैं और सहज में सुख चाहते हैं। फिर भी यह मिले तो सुखी होऊँ, यहाँ जाऊँ तो सुखी होऊँ, ऐसा करूँ तो सुखी होऊँ… मन की इस बेवकूफी के पीछे सारी जिंदगी बिता देते हैं। इसलिए सदा सुख पाने के लिए जिससे किया जाता है उसी में डूबने का यत्न करें।

काहे रे बन खोजन जाई।

सर्व निवासी सदा अलेपा तोरे संग सहाई।।

राजकोट के मूल निवासी त्रिवेणीपुरी महाराज, जिनका मुंबई में बहुत बड़ा आश्रम है, वे केदारनाथ में गंगा के तट पर कुटिया बनाकर रहते थे। ‘ईश्वर से ईश्वर को ही माँगते हैं फिर भी अभी तक मुक्ति का अनुभव क्यों नहीं हो रहा है ?’ ऐसा विचार कर वे रोते थे। उनकी ईश्वरप्राप्ति की प्यास बहुत बढ़ गयी थी।

एक शाम को एक बुढ़िया ने आकर कहाः

“त्रिवेणीपुरी  ! आप किससे मुक्त होना चाहते हैं ?”

त्रिवेणीपुरीः “माता जी ! मुझे मोक्ष का अनुभव करना है।”

वृद्धाः “आप किससे मुक्त होना चाहते हैं ? पत्नी से मुक्त होकर संन्यासी हो गये हैं। परिवार से मुक्त होना चाहा तो उसे भी छोड़कर आये हैं। अब किससे मुक्त होना चाहते हैं ? आपको बंधन कहाँ हैं ? खोजें। खोजते-खोजते अगर बंधन को खोज लिया तो मैं आऊँगी, अगर खोजते-खोजते बंधन नहीं मिला तो नहीं आऊँगी।”

इतना कहकर वह वृद्धा चली गयी। त्रिवेणीपुरी महाराज खोजने लगे कि बँधे हैं तो किससे बँधे हैं। मुक्ति किससे चाहिए ? अगर धन से बँधे होते तो धन हमेशा रहना चाहिए, किंतु रूपये पैसे आते हैं और चले जाते हैं। अगर सुख से बँधे होते तो सुख सदा रहना चाहिए, परंतु वह भी आता-जाता है। अगर दुःख से बँधे होते तो दुःख सदा रहना चाहिए, किंतु वह भी आकर चला जाता है। शरीर भी प्रतिदिन मृत्यु की ओर जा रहा है तो बंधन किसको है ? एकान्त में बैठकर खोजते गये तो पता चला कि अरे ! मैं तो निर्बंध नारायण था – मुझे पता न था। ऐसा करते-करते उनकी समाधि लग गयी और उन्हें ज्ञान हो गया। वे बड़े उच्च कोटि के संत हो गये। अब वे हयात नहीं हैं लेकिन मुंबई में अभी भी उनका आश्रम है। अखण्डानंदजी उनसे मिलते-जुलते रहते थे।

वशिष्ठजी महाराज कहते हैं- ‘हे राम जी ! जैसे रण में प्राण निकलने लगें तो भी शूरवीर नहीं भागता बल्कि विजय पाने की इच्छा से शस्त्र को पकड़कर युद्ध करता ही रहता है, ऐसे ही संसार में शास्त्र का विचार ही पुरुषार्थ है। यही पुरुषार्थ करो और शास्त्रों के अनुसार विचारो कि मुक्ति क्या है ? जो विचार से रहित हैं, वे दुर्भाग्य और दीनता को प्राप्त होते हैं।’

जिसने आत्मविचार को त्यागा है समझो, उसने अपना सर्वनाश कर लिया। वह बड़ा अभागा है। वास्तविक सुखी केवल विचारवान ही होता है। विचार यही है कि सत् क्या है और असत् क्या है ? साथ क्या जायेगा और क्या छूट जायेगा ? मैं कौन हूँ और जगत क्या है ? जिसने ऐसा विचार ठीक से किया है उसका भविष्य उज्जवल है। जिसने अपना आत्मविचार नहीं किया समझो, वह मुसीबत में पड़ेगा। अगर आत्मविचार नहीं करता है तो पढ़ा लिखा व्यक्ति भी मूर्ख है और अगर आत्मविचार करता है तो अनपढ़ भी पठितों का पूजनीय है।

पैसा गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ-कुछ गया परंतु अंतरात्मा की शांति चली गयी तो सब कुछ चला गया। इसलिए आत्मानंद, आत्मशांति पाने का ही यत्न करना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2002, पृष्ठ संख्या 8, अंक 120

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ