All posts by Gurukripa

खखं खखइया खा खा खइया….पूज्य बापू जी


एक चांडाल चौकड़ीवालों का गाँव था । काशी से पढ़ के कोई भी वहाँ से पसार होवे तो वे बोलें- “महाराज ! शास्त्रार्थ करो हमारे गाँव के पंडित से । अगर तुम जीतोगे तो तुमको जाने देंगे फूलहार से स्वागत करके और हार जाओगे तो तुम्हारी किताबें छीन लेंगे और केवल धोती और एक लोटा देंगे, बाकी का सामान छीन लेंगे । शास्त्रार्थ करो ।”

शास्त्रार्थ करें तो उनका  पंडित थोड़ी बातचीत करके बोलेः “खखं खखइया।”

अब ‘खखं खखइया’ तो न किसी उपनिषद में है, न गीता में, न महाभारत में है । उसकी कहीं कोई व्याख्या ही नहीं है । तो वह बेचारा पंडित चुप हो जाय और चांडालचौकड़ी के लोग उसको लूट लेवें । ऐसा चला-चला-चला….. । किसी गुरु का एक पक्का चेला था । उसने ॐकार मंत्र जप था तो बुद्धि विकसित हुई थी । उसका बड़ा भाई काशी से पढ़ के आया तो वह भी अपने को उस गाँव में लुट के आया । बोलाः “गुरुकुल से तो हम पास हो के आये हैं लेकिन वे चांडाल चोकड़ी गाँव वाले सब को लूट लेते हैं, ऐसे ही हमको भी लूट लिया ।”

छोटे भाई ने कहाः “भैया ! मैं तो काशी में नहीं गया हूँ लेकिन मैं गुरु जी का दिया हुआ मंत्र जपता हूँ – ॐकार मंत्र । “खखं खखइया….’ उसने यह जो सवाल पूछा है, इसका जवाब तो हम ही देंगे, चलो ।”

गाँव में गये, पोथी-वोथी बगल में डाल के, झोला-झंडी के साथ अपना तिलक-विलक करके ।

चांडालचौकड़ी वालों ने देखा तो बोलेः “ओ पंडित ! शास्त्रार्थ करना पड़ेगा ।”

बोलेः “शुभम् ! शुभम् ! अहं अभिलाषामि (अच्छा ! अच्छा ! मैं भी करना चाहता हूँ ।)”

“अगर जीत जाओगे तो स्वागत हो जायेगा, हार जाओगे तो सब छीन लिया जायेगा ।”

“एवमस्तु ! शुभम् भवेत् । (ठीक है, ऐसा ही हो ! अच्छा हो ) तैयारी करो ।”

मंच लगाये । अब सवाल कहाँ से आये ? तो ऐसा-वैसा थोड़ा श्लोक-विश्लोक…. फिर बोलेः “खखं खखइया का उत्तर दीजिये ।”

“तुम्हारा प्रश्न अधूरा है । खखं खखइया…. क्या मतलब ? पूरा श्लोक सुनाओ ।”

चांडाल चौकड़ीवाला पंडित कुछ बोल न पाया तो वे बोलेः “आप लोग कौन-से पंडित को लाये हो ? पूरा श्लोक भी नहीं जानते ? ये तो श्लोक की पूँछड़ी ही बोलते हैं, आगे भी बोलना चाहिए न । बोलो पंडित जी ! आगे का तुम नहीं बोल सकते हो, हम बताते हैं । पूरा श्लोक हैः

जोतं जोतइया, बोवं बोवइया, कटं कटइया, पीसं पीसइया, गूँधं गूँधइया, पकं पकइया…. बाद में खा खा खखं खखइया, खा खा खइया खइया, खा खा खा खा खइया, खखं खखइया खा खइया ।”

पहले खेत जोतेगा, फिर बोवेगा, फिर काटेगा, फिर पीसेगा, फिर गूँथेगा, फिर पकेगा, फिर खखं खखइया खा खइया ।

आज तक पूरे गाँव का उल्लू बन रहे थे और यात्रियों को लूट रहे थे । गुरुमंत्र जपने वाले चेले ने इनकी पोल खोली तो उसकी जय-जयकार हो गई और चांडाल चौकड़ी का पर्दाफाश हो गया । जैसा भूत वैसा मंतर, जैसा देव, वैसी पूजा । ‘खखं खखइया’ यह शास्त्र का नहीं था तो इसने भी जोतं जोतइया, बोवं बोवइया आदि जोड़ दिया ।

कहने का मतलब है कि कितने-कितने ग्रंथ, सिद्धान्त, शास्त्र पढ़ के बुद्धि में रख दो फिर भी यदि आपका स्वतंत्र मनोबल नहीं है, बुद्धिबल नहीं है तो गुलाम होकर जिंदगी पूरी हो जायेगी – नौकरी कर कराके । अगर अपना सो-विचार है, गुरुमंत्र है तो गुलामी से छूटने की तरकीब होगी । गुलामी किसी को पसंद नहीं है । गुलामी में पराधीनता होती है ।

एक गुलामी होती है काम-धंधे व नौकरी की, दूसरी गुलामी होती है प्रकृति के प्रभाव की । जब प्रकृति चाहे तब बूढ़े हो गये और मर गये तो गुलाम होकर मरे, स्वतंत्र नहीं हुए । पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं । फिर प्रकृति जन्म देवे, गर्भ मिले तो मिले, नहीं तो नाली में बहो, घोड़ा बन जाओ, गधा बन जाओ, कुत्ता बन जाओ, बिलार बन जाओ या तो स्वर्ग में भटको फिर पुण्य नष्ट करके फिर मरो…. तो यह है पराधीन जीवन । जप-तप और गुरुकृपा स्वाधीन जीवन कर देते हैं । मरने के बाद प्रकृति के प्रभाव में भटकें नहीं, स्वतंत्र हो जायें, ईश्वर के स्वभाव में जगें, मोक्ष के स्वभाव में जगें ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2020, पृष्ठ संख्या 14 अंक 326

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

इसका नाम है आत्मसाक्षात्कार !


जिज्ञासु साधकों को अपने परम लक्ष्य ‘आत्मसाक्षात्कार’ सुस्पष्ट तात्पर्य-अर्थ जानने की बड़ी जिज्ञासा रहती है, जिसकी पूर्ति कर रहे हैं करुणासिंधु ब्रह्मवेत्ता पूज्य बापू जीः

अपने-आपका बोध हो जाय, अपने-आपका पता चल जाय इसे बोलते हैं आत्मसाक्षात्कार । यह साक्षात्कार किसी अन्य का नहीं वरन् अपना ही साक्षात्कार है । आत्मसाक्षात्कार का तात्पर्य क्या है ? भगवान दत्तात्रेय कहते हैं कि नाम, रूप और रंग जहाँ नहीं पहुँचते ऐसे परब्रह्म में जिन्होंने विश्रान्ति पायी है, वे जीते जी मुक्त हैं ।

जिसकी सत्ता से ये जीव, जगत, ईश्वर दिखते हैं, उस सत्ता को ‘मैं’ रूप से ज्यों का त्यों अनुभव करना-इसका नाम है आत्मसाक्षात्कार । जीव की हस्ती, जगत की हस्ती और ईश्वर की हस्ती जिसके आधार से दिखथी है और टिकती नहीं है, बदलती रहती है फिर भी जो अबदल आत्मा है उसे ज्यों का त्यों जानना, यही है आत्मसाक्षात्कार । जो तुमसे अलग नहीं है उससे मिले रहो और जो तुमसे अलग हैं – आने जाने वाले विकार, उनसे नहीं मिलो इसी का नाम है आत्मसाक्षात्कार ! लो !

अपना-आपा ऐसी ही चीज है जो बिना मेहनत के जानने में आता है और एक बार समझ में आ जाता है तो फिर कभी अज्ञान नहीं होता । अपने स्वरूप का, अपने आत्मा का ऐसा ज्ञान हो जाना, पता चल जाना इसको बोलते हैं आत्मसाक्षात्कार । यह बड़े में बड़ी उपलब्धि है । इसके अतिरिक्त जितनी भी उपलब्धियाँ प्राप्त हों, फइर चाहे सब देवी-देवता ही खुश क्यों  न जायें, तब भी यात्रा अधूरी ही रहेगी । संत नरसिंह मेहता ने ठीक ही कहाः

ज्यां लगी आत्मतत्त्व चीन्यो नहीं, 

त्यां लगी साधना सर्व झूठी ।

जब तक आत्मदेव का अनुभव नहीं किया, ब्रह्मस्वरूप को नहीं जाना तब तक साधना अधूरी है ।

देखने के विषय अनेक लेकिन देखने वाला एक, सुनने के विषय अनेक – सुनने वाला एक, चखने के  विषय अनेक – चखने वाला एक, मन के संकल्प-विकल्प अनेक किंतु मन का द्रष्टा एक, बुद्धि के निर्णय अनेक लेकिन उसका अधिष्ठान एक ! उस एक को जब ‘मैं’ रूप में जान लिया, अनंत ब्रह्मांडों में व्यापक रूप में जिस समय जान लिया वे घड़ियाँ सुहावनी होती हैं, मंगलकारी होती हैं । वे ही आत्मसाक्षात्कार की घड़ियाँ हैं ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2020, पृष्ठ संख्या 2 अंक 326

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

अरे पकड़ो-पकड़ो ! चोर जा रहा है….


एक बार महमूदपुर गाँव (हरियाणा) में एक मंडली का कथा-कीर्तन हो रहा था । स्वामी नितानंद के कानों में भी भक्तिरस से सिक्त वह मधुर ध्वनि पड़ी तो वे भी वहाँ पहुँच गये । मंडली के प्रधान ने उन्हें सितार लेकर कुछ गाने को कहा । प्रतिदिन नितानंद जी के अलबेले व्यवहार को देखने वाले गाँव वालों ने कहाः “इन्हें सितार मत दीजिये, कहीं तोड़ न दें ।” नितानंद ने सितार हाथ में लिया और संगीत के साथ आध्यात्मिक मस्ती में यह भजन उनके होठों से निर्झर की तरह बहने लगाः

सोई जन मस्ताना-मस्ताना, जिन पाया पद निरवाना ।….

अंतर की गहराई से निकले उनके बोल आत्मचैतन्य की मिठास बिखेर रहे थे । भजन पूरा कर उन्होंने सितार दिया और चल दिये ।

मंडली के मुख्य महंत बहुत प्रभावित हुए । दूसरे दिन वे नितानंद जी के पास गये और उस भजन का तात्पर्य पूछकर लिखने लगे । उन्होंने नितानंद से ईश्वर अनुभूति का मार्ग पूछा । संत कुछ कहते उससे पहले महंत की दृष्टि उस ओर आ रहे ग्वालों पर पड़ी । महंत जी तुरंत उठकर चलने लगे । स्वामी नितानंद जोर से हँसते हुए कहने लगेः “अरे पकड़ो-पकड़ो ! चोर जा रहा है ।”

लोगों ने कहाः “स्वामी जी ! ये तो महंत जी हैं, आप यह कैसी अजीब बात कह रहे हैं ?”

इन अलमस्त साधुपुरुष ने मुस्कराते हुए कहाः “महंत जी के मन में यह भाव आया कि ‘मैं एक महंत होकर एक अप्रतिष्ठित संत से निर्देश ले रहा हूँ ।’ और वे अपने इस अहंभाव को छुपाकर चोरों की भाँति यहाँ से चलते बने इसलिए मैंने ऐसा कहा ।”

लोगों ने महंत जी को शपथ दिलाकर उनके मन के भावों को सच-सच प्रकट करने की प्रार्थना की । महंत जी ने कहाः “नितानंद जी ने बिल्कुल सत्य बात कही है । भाइयो ! आज मुझे अनुभव हुआ कि पद-प्रतिष्ठा, धन, सत्ता – किसी भी प्रकार का अहंकार इतना धोखेबाज है कि अंतर्यामी परमात्मा ऐसे संतों के रूप में धरती पर आ के हमें अपनी ओर आकर्षित करके बुला भी लेता है लेकिन यह अहंकार हमें वहाँ से भी रीता ही रखकर भगा के ले जाता है ।”

नितानंद जी बोलेः “महंत ! मैं यही अहंकार परमात्मा में लीन करने की बात तुम्हें बताने वाला था किंतु तुच्छ अहं इसके पहले ही तुम्हें यहाँ से ले जा रहा था ।  परमात्मा में अपने व्यक्तित्व को, अहं को खो दिया तो मुझे निर्वाण पद का सुदृढ़ निश्चय अर्थात् ब्रह्म का ज्ञान हुआ । तुम भी ऐसा अभ्यास करो ।”

संत का अंतर्यामित्व एवं ऊँची अनुभूति देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग नतमस्तक हुए । उन्हें सीख भी मिली की परम सत्य को पाये हुए ऐसे संतों को अपनी मति से तौला नहीं जा सकता । अतः उनके बारे में कुछ मान्यता बनाने के बजाय उनके ज्ञान का लाभ उठाकर अपना जीवन धन्य करना चाहिए ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2020, पृष्ठ संख्या 7 अंक 326

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ