ऋषि प्रसाद

सांसारिक, आध्यात्मिक उन्नति, उत्तम स्वास्थ्य, साँस्कृतिक शिक्षा, मोक्ष के सोपान – ऋषि प्रसाद। हरि ओम्।

केवल तभी तुम वास्तव में हिन्दू कहलाने योग्य हो…. स्वामी विवेकानंद जी


यदि कोई हिन्दू धार्मिक नहीं है तो मैं उसे हिन्दू ही नहीं कहूँगा। दूसरे देशों में भले ही मनुष्य पहले राजनैतिक हो और फिर धर्म से थोड़ा सा लगाव रखे पर यहाँ भारत में तो हमारे जीवन का सबसे बड़ा एवं प्रथम कर्तव्य धर्म का अनुष्ठान है और फिर उसके बाद यदि अवकाश मिले तो …

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किसको प्रसन्न करें तो पूरण हों सब काम ?


परेषां चेतांसि प्रतिदिवसमाराध्य बहुधा प्रसादं किं नेतुं विशसि हृदय क्लेशकलितम्। प्रसन्ने त्वय्यन्तः स्वयमुदितचिन्तामणिगणो विविक्तः संकल्पः किमभिलषितं पुष्यति न ते।। ‘हे हृदय ! तू खूब क्लेश से युक्त होकर दूसरों के चित्त की प्रतिदिन अनेक प्रकार से आराधना करके उनकी प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए क्यों प्रवृत्त होता है ? स्वयं तेरा अंतःकरण प्रसन्न होते ही, …

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आत्मज्ञान का पूर्ण अधिकारी कौन ? – संत एकनाथ जी


भगवान श्रीकृष्ण उद्धवजी के कहते हैं- “हे उद्धव ! इस जगत में केवल दो ही अवस्थाएँ हैं। पहली विरक्ति और दूसरी विषयासक्ति। तीसरी कोई अवस्था ही नहीं। जहाँ विवेक से विषयों की आसक्ति क्षीण होती है वहाँ परिपूर्ण वैराग्य बढ़ता है और जहाँ विवेक क्षीण होने से वैराग्य भी क्षीण होने से वैराग्य भी क्षीण …

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