ऋषि प्रसाद

सांसारिक, आध्यात्मिक उन्नति, उत्तम स्वास्थ्य, साँस्कृतिक शिक्षा, मोक्ष के सोपान – ऋषि प्रसाद। हरि ओम्।

श्री अष्टावक्र गीता पर पूज्य श्री एक अमृतवचन


अष्टावक्र जी कहते हैं- धर्माधर्मौ सुखं दुःखं मानसानि न ते विभो। न कर्ताऽसि न भोक्ताऽसि मुक्त एवासि सर्वदा।। ‘ओ अनंत (व्यापक) ! धर्म-अधर्म एवं सुख-दुःख का केवल मन से ही संबंध है, तुमसे नहीं। तुम न कर्ता हो और न भोक्ता हो। तुम स्वरूपतः नित्य मुक्त ही हो।’ (अष्टावक्र गीताः 1.6) सुख-दुःख, धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप – …

Read More ..

वीरांगना का शौर्य और छत्रपति का मातृभाव


दक्षिण भारत का एक छोटा सा राज्य था बेल्लारी। उसका शासक कोई वीर पुरुष नहीं बल्कि शौर्य की प्रतिमा विधवा नारी मलबाई देसाई थीं। छत्रपति शिवाजी की सेना ने बेल्लारी पर चढ़ाई की। शिवाजी की विशाल सेना का सामना वहाँ के मुट्ठीभर सैनिक कैसे करते ! किंतु बेल्लारी के सैनिक खूब लड़े। छत्रपति ने उन …

Read More ..

माँ मंहगीबा जी का आज्ञापालन और ब्रह्मनिष्ठा


ब्रह्मलीन मातुश्री माँ महँगीबा जी का महानिर्वाण दिवसः 15 अक्तूबर हमारी संस्कृति में संसारी रिश्तों (शरीर के नाते संबंधों) से बढ़कर आत्मिक रिश्तों (परमात्मा के नाते माने गये संबंधों) का आदर है, ज्ञान का आदर है। यही हमारी संस्कृति की महानता है। हमारे देश में ऐसे भी सौभाग्यशाली मनीषी हुए हैं जिन्होंने अपने रिश्तेदारों में …

Read More ..