श्री अष्टावक्र गीता पर पूज्य श्री एक अमृतवचन
अष्टावक्र जी कहते हैं- धर्माधर्मौ सुखं दुःखं मानसानि न ते विभो। न कर्ताऽसि न भोक्ताऽसि मुक्त एवासि सर्वदा।। ‘ओ अनंत (व्यापक) ! धर्म-अधर्म एवं सुख-दुःख का केवल मन से ही संबंध है, तुमसे नहीं। तुम न कर्ता हो और न भोक्ता हो। तुम स्वरूपतः नित्य मुक्त ही हो।’ (अष्टावक्र गीताः 1.6) सुख-दुःख, धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप – …