आत्मबल ही वास्तविक बल है
पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू जो बलवान है, प्राणशक्ति से युक्त है उसके लिए पराये भी अपने हो जाते हैं जबकि दुर्बलों के लिए अपने भी पराये हो जाते हैं। वीरभोग्या वसुन्धरा। बल ही जीवन है। निर्बलता ही मौत है। समस्त बलों का उदगमस्थल है आत्मा। आत्मा के कारण ही सब प्रिय लगता है और …