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गुरुभक्तों के अनूठे वरदान (बोध कथा)….


मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ मांगो तुम मुझसे कोई एक वर मांग लो यदि आपको अपने गुरु से ऐसे वचन सुनने को मिले तो आप वरस्वरूप उनसे क्या मांगेंगे? यह प्रस्ताव कितना लुभावना सा है हमे सोचने को मजबूर कर ही देता है। भोगी से योगी तक सभी इस पर विचार करते है फ़र्क बस इतना ही है कि इसका जवाब गढ़ने के लिए एक सांसारिक अपनी बुद्धि की चतुराई लड़ाता है और एक साधक गुरुभक्त मन की भक्ताई लगाता है अर्थात भक्तिभावना लगाता है।

भागवत के एक ही प्रसंग में जब हिरण्यकश्यपु को मांगने का अवसर मिला तो उसने भरपूर बुद्धि भिड़ाई और बहुत ही टेढ़ी अंदाज में अमरता मांग ली मैं न पृथ्वी में मरु न आकाश में न भीतर मरु न बाहर मरु आदि आदि.. परन्तु हिरण्यकश्यपु वध के बाद जब भगवान नरसिंह ने भक्त प्रह्लाद को वर मांगने को कहा तो वह सजल आंखे लिए बोला- मेरी कोई कामना न रहे मेरी यही कामना है। मतलब की सांसारिक व्यक्ति की मांग मैं मेरे के स्वार्थी दायरों के बाहर नही आ पाती बड़ी छिछली सी होती है मगर एक शिष्य की एक गुरुभक्त की सोच व्यापकता को उपलब्ध होती है क्योंकि उसका प्रेम व्यापक से है व्यापकस्वरूप गुरुदेव से है।

कई भक्तो ने ऐसे अवसर पर अपने भक्तिभाव से सराबोर सुंदर और भक्ति वर्धिनी उदगार व्यक्त किये है इस अवसर पर कि तुम मुझसे कुछ वर मांगो।

पहला गुरुभक्त कहता है कि-

ऐसे में मैं गुरुजी से गुरुजी को मांग लूंगा। गुरुजी को मांगने का मतलब क्या है? यही कि गुरुदेव हमारे भीतर ऐसे समा जाए कि हमारे हर विचार हर व्यवहार हर कर्म पर वे झलके ताकि जब समाज हमे देखे तो समाज को गुरुमहाराज की ही याद आये उनकी ऊंचाई का भान हो और वह गदगद होकर कह उठे जब शिष्य ऐसे है तो साक्षात इनके गुरु कैसे होंगे।

इस अवसर पर दूसरा गुरुभक्त कहता है कि- जब भी श्री गुरुमहाराज इस धरा पर आए मैं भी उनके साथ ही आऊ और मैं उनकी आयु का ही होऊ और मेरी चेतना को यह ज्ञान हो कि मेरे गुरुवर साक्षात भगवान है और फिर मैं जी भर के उनकी सेवा करूँ और उनसे प्यार करूँ। तो भाई उनकी आयु के होने के पीछे क्या रहस्य है? गुरुदेव की आयु के होने से यह लाभ होगा कि मैं उनके अवतरण काल मे ज्यादा से ज्यादा जीवन बिता पाऊंगा और उनके सानिध्य का आनंद लाभ उठा पाऊंगा उनसे पहले आया तो हो सकता है कि उन्हें छोड़कर मुझे इस धरती से जाना पड़े, उनके अवतरण के काफी बाद में मेरा जन्म हुआ तो हो सकता है कि वे मुझे इस संसार मे अकेले छोड़कर चले जाएं।

तीसरा गुरुभक्त कहता है इस अवसर पर कि अगर गुरुमहाराज जी मुझसे वरदान मांगने को कहेंगे तो मैं यही मांगूंगा कि- वे मुझे एक ईंट के समान बनाये और वह ईंट उनके आश्रम के नींव में लगाई जाए इसके पीछे मेरी भावना बस यही है कि जबतक मै जियूँ छिप के..प्रदर्शन, नाम, बड़ाई से अछूता रहकर गुरुदेव की सेवा करता रहूं और जैसे एक ईंट मिट कर मिट्टी हो जाता है अंततः मैं भी गुरुदरबार की मिट्टी बनू, गुरुचरणों की रज बन जाऊं अर्थात सदा-सदा निमाणी भाव से उनका होकर रहूं।

इस अवसर पर चौथा गुरुभक्त कहता है कि-हे गुरुदेव! वर देना तो एक ऐसा दास बनाना जिसका अपना कोई मन मौजी सोच विचार न हो इस दास की बुद्धि में सिर्फ उन्ही विचारों को प्रवेश मिले जो गुरुदेव को पसंद हो जब विचार गुरुदेव के होंगे तो कार्य भी गुरुदेव के होंगे, कार्य गुरुदेव के होंगे तो जीवन भी गुरुदेव का होकर रह जायेगा इस दास को यह पता होगा कि मेरे मालिक अब क्या चाहते है जैसे महाराज जी हमारे कहने से पहले ही हमारे मन की बात जान जाते है वैसे ही दास को गुरुवर के कहने से पहले ही गुरुवर के मन की बात पता होगी। बात पता चलते ही वह सक्रिय होकर उन्हें पूरा करने लगेगा यदि मैं संक्षेप में कहूँ तो मुझे ऐसा दास बनने की चाह है जैसा गुरुदेव का हाथ जिसकी अपनी कोई मति नही, सोचते गुरुमहाराज जी है वही सोच हाथ तक पहुंच जाती है और बस हाथ उसे पूरा कर देता है। जो महाराज जी सोचे मैं भी अन्तर्वश उसे पूरा करता जाऊँ।

पांचवा भक्त इस अवसर पर कहता है कि- अगर गुरुमहाराज जी से मुझे कुछ मांगने का अवसर मिलेगा तो शायद मैं उस समय कुछ बोल ही नही पाऊंगा मेरी आँखों से बहते अश्रु गुरुदेव से अपनी इच्छा जरूर व्यक्त कर देंगे परन्तु मेरी वाणी मौन रहेगी।

इस अवसर पर छठा भक्त कहता है- जब आखिरी श्वास निकले तो गुरुदेव के श्री चरणों मे मेरा मस्तक हो उनका मुस्कुराता हुआ प्रसन्न चेहरा मेरी आँखों के सामने.. और वे गर्वोक्त स्वर में

मुझसे कहें कि बेटे तुझे जो कार्य मैने सौंपा था वह पूर्ण हुआ चल अब यहां से लौट चले।

इस अवसर पर सातवां गुरुभक्त कहता है कि- हे गुरुदेव! सुंदर भावों से युक्त मन मुझे दे दो क्योंकि मेरे पास भाव का ही अभाव रहता है और गुरुदेव की दृष्टि अगर हमसे कुछ खोजती है तो भावों को ही खोजती है वैभव सौंदर्य, वाक पटुता अन्य कुछ नही यदि हम भावों द्वारा उनसे जुड़े है तो वे हमेशा हमसे हमारे लिए उपलब्ध है इसलिए हे गुरुदेव! मैं तो वरदान स्वरूप में भावों की ही सौगात माँगूंगा।

गुरु का प्रसाद….


जिज्ञासु ने कहा कि महात्मा जी गुरू से जो प्रसाद मिले, वह अगर अपने व्रत या दशा के विरुद्ध जाता हो तो उसे खाना चाहिए या नहीं । महात्मा जी ने कहा इसी बात को लेकर एक दिन बड़ी प्रश्नोत्तरी हो गई । एकादशी का दिन था, कोई सज्जन विद्वान पंडित हमारे गुरुदेव के पास गये और गुरुदेव ने उन्हें कुछ खाने को दे दिया प्रसाद रूप में । सबको बांटा गया तो उन्हें भी मिला, वे थे उपवासी वैष्णव ब्राह्मण ।

प्रसाद की अवहेलना करना बड़ा पाप माना जाता है फिर भी उन्हें संदेह हो गया । उन्होंने हमसे पूछा कि आज एकादशी है खाना या नहीं खाना, मैंने पूछा यह क्या है ? तो सज्जन ने कहा प्रसाद है । मैंने कहा कि गुरू ने जो प्रसाद दिया यदि उसमें प्रसादबुद्धि सच में है तो यह प्रसाद गुरू जैसा, ईश्वर जैसा परम पवित्र है इसे ग्रहण कर सकते हो । हां अन्न मत खाना, शिष्य को श्रद्धा, धैर्य और समझ के अनुरूप उसका उपयोग करना चाहिए ।

सर्वसाधारणतः उसकी अपनी भावना पर है, भावना के अनुसार प्रसाद अपना प्रभाव दिखलाता है । रामकृष्ण परमहंस के गले में कैंसर हुआ था, उनके आस-पास बहुत से शिष्य भी थे, सब कपड़े डाले हुये मुंह को ढके हुए थे, आंखें भी ढकी हुई थी, कहीं कोई जंतु अंदर ना घुस जाये ।

ऑपरेशन हो गया था उनके घाव का, निकाला हुआ सब द्रव्य एक कटोरे में रखा हुआ था, उन शिष्यों के भय और संशय को दूर कर विवेकानंद के मन में बड़ा क्षोभ और दुख हो गया ।

उन्होंने वह कटोरा उठाया और पूरा पी गये, विवेकानंद जी बोले तुम लोग डरो मत । तुम्हारे लिए यह रोग है और मेरे लिए यह गुरू का अमृत प्रसाद है और वह उनके लिए अमृत ही हुआ, रोग नहीं । अतंर्श्रृद्धा में एक महान शक्ति है, वह अमृत को जहर और जहर को अमृत भी बना सकती है । प्रसाद को प्रसाद ही समझना चाहिए, उसे अन्न आदि नहीं समझना चाहिए, उसको डॉक्टरी दृष्टि से नहीं देखना चाहिए ।

अब इस विषय में थोड़ा विमर्श करेंगे, क्या दिया बाबा ने ? कि लड्डू दिया । इसमें क्या है, इसमें डालडा है जिससे चर्बी बढ़ती है बेसन भी बहुत भारी और वायुकारक है । शक्कर के मिलने से इसमें और भी भारी बन जाता है पचने के लिए पूरा कठिन है, अच्छा आदमी भी खाये तो पेचिश होगा ही फिर भी थोड़ा खा सकते हो । यह लड्डू विज्ञान किधर होना चाहिए कि बंबई के होटल में, गुरू के पास नहीं ।

दूसरी दृष्टि यह है कि बाबा ने क्या दिया ? प्रसाद दिया । उसके लिए प्रसाद महाप्रसाद के सिवाय और कुछ नहीं । उसमें फिर विज्ञान नहीं, महाविज्ञान नहीं अनुकूल हो या प्रतिकूल यह भी प्रश्न नहीं । यह प्रसाद तो ठीक है बाह्य है लेकिन जो गुरू अमृत प्रसाद देते हैं अपने श्रीवचनो के रूप में उसे तो रोज ग्रहण करना ही चाहिए । बाहर का प्रसाद तो आपके शरीर से मन तक फिर मन से आत्मा तक पहुंचेगा परन्तु गुरुवचनामृत प्रसाद तो सीधे आपके सुषुप्त आत्मा तक जाकर उसे झंकृत, उसे जागृत कर देगा, परन्तु लोग इस प्रसाद को तो यूहीं समझ कर इसे ग्रहण ही नहीं करते । अब तुम कहो महात्मा जी हम तो रोज सत्संग श्रवण करते ही हैं आपका । तो भैया इस प्रसादी को तुमने कितना खाया और कितना पचाया या यूहीं ले जाकर कहीं रख कर भूल गये । सच्ची गुरू की प्रसादी तो सेब, संतरे या मैंगो नहीं है, गुरू की प्रसादी जो पचा लिया वो तो प्रसाद बनाने वाला बन जायेगा । इसमें कोई शंका नहीं है परन्तु तुम्हे तो प्रसाद ग्रहण ही नहीं करना है ।

गुरुदेव का तो काम ही है प्रसाद देना और तुम्हारा काम ही है गुरुदेव का कुछ ना लेना । क्यूं जी, सत्य कहा ना ? अरे भाई मैं तो कहता हूं कि यदि यह गुरुप्रसादी थोड़ी सी भी अपने साथ ले जाओ तो कोई विकार तुम्हें लूट नहीं सकता । तो महात्मा जी कैसे पता चले कि हमने प्रसादी पचायी है या नहीं *महाप्रसादे गोविंदे नामनी ब्रह्माणी वैष्णवी स्वलप-पुन्यवताम राजन विश्वासो नैव जायते* ।

प्रसाद वह है जो सर्व दुखों का, सर्व अनिष्ठों का नाश करता है । गुरू की प्रसादी पचाने पर भगवान में रुचि बढ़ेगी और वह साधक सिद्घता की ओर अग्रसर होगा और गुरू की प्रसादी तख्त पर रख छोड़ने से बद्धता में ही घूमते रहोगे फिर उसका चित्त राग-द्वेष से उपर उठ ही नहीं सकता, छिद्रान्वेषण से उपर नहीं उठ सकता । दूसरों को देखकर अपने चित्त को मलिन करेगा, दूसरों में दोष दर्शन करेगा, इधर-उधर की गप ही करेगा तो समझो उसने अपने गुरू की प्रसादी का अनादर किया ।

दूसरों के गुण-दोष देखकर जो इंस्पेक्टर बन जाता है, दूसरों की उन्नति देखकर जो बंदर बन जाता है वो क्या पायेगा गुरू की प्रसादी को, ऐसे लोगों से तो हम बड़े ही कठोर होते हैं बाबा क्यूंकि यहां आकर भी कोई उन्नत ना हो, सेवा करके भी उन्नत ना हो तो कहीं और की तो आस ही क्या । अभी कुछ दिन पहले ही हमारे पास कोई आया दौड़ते हुए, कहने लगा महात्मा जी ! फलाना आपका बहुत पुराना चेला है और मैंने उसे ऐसे -2 करते देखा ।

मैंने कहा खुद देखा या सुना, महात्मा जी लोगों के द्वारा सुना । हमने तुरन्त उसे डांटते हुये कहा कि लोगों की इतनी ही फिक्र है कि कौन क्या कर रहा है किसमे क्या दोष है तो तू एक काम कर मैं इस व्यासगद्दी से उत्तर जाता हूं तू ही ऊपर बैठ जा । इतना सुनकर वो थोड़ा शर्मिंदा सा हुआ, मैंने कहा अब चुप हो जा और बैठकर जप कर ।

कुछ देर बाद पता चला कि फिर उसने वही बात दूसरे आश्रम में रहने वालों से भी कही । हम कहते हैं कि अरे भाई आप मेरे यहां दूसरों के दोषों का मुआयना करने आये हो क्या, जरा बता दो । यहां तो गुरू के पास रहकर अपने दोषों को मिटाना होता है परन्तु आप करते हैं इससे बिल्कुल विपरीत तो यह गुरू की प्रसादी का अनादर ही तो हुआ ।

वे तुम्हें अगले जन्म में भी खोज लेंगे, निश्चिंत रहो (रमण महर्षि कथा)


सत्य के साधक को मन एवं इन्द्रियो पर संयम रखकर अपने आचार्य के घर रहना चाहिए और खूब श्रद्धा एवं आदरपूर्वक गुरु की निगरानी मे शास्त्रो का अभ्यास करना चाहिए उसी चुस्तता से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और आचार्य की पूजा करनी चाहिए शिष्य को चाहिए कि  वह आचार्य को साक्षात ईश्वर के रूप मे माने। मनुष्य के रूप मे कदापि नही।

शिष्य को आचार्य के दोष नही देखने चाहिए क्योंकि वे तमाम देवो के प्रतिनिधि हैं शिष्य को सब सुख वैभव का विष की तरह त्याग कर देना चाहिए और अपना शरीर गुरु की सेवा मे सौप देना चाहिए।

अरूणाचल मे स्थित स्कंध आश्रम मे महर्षि रमण जी के शिष्य पंक्तिबद्ध हो उनके सामने बैठे थे महर्षि रमण बहुत कम बोलते थे, अधिकतम समय उनका मौन ही रहता था, जिज्ञासु जब प्रश्न करते तब कुछ महर्षि बोलते ।

किसी जिज्ञासु ने कहा हे भगवन मुझे लगता है कि मै अपनी इच्छाओ का गुलाम बन चुका हूं जितना इनके बंधन से मुक्त होना चाहता हूं, उतना ही ये मुझे जकङ लेती है मै क्या करूं?

गुरूदेव महर्षि जी कहते हैं कि सोचकर देखो पिंजरे मे बंद एक पक्षी के बारे मे ।

वह पिंजरे से मुक्त होना चाहता है इसलिए बार बार अपनी चोंच से उसकी सलाखो पर प्रहार करता है, अपने पंखो को उन सलाखो पर मारता है परिणाम उसकी चोंच लहुलुहान हो जाती है और पंख जख्मी। ठीक यही स्थिति तुम्हारी है अपने मन रूपी पिंजरे मे तुम कैद हो, इस पिंजरे की सलाखे तुम्हारी उठती इच्छाये है तुम इस पिंजरे से मुक्त होने के लिए इन सलाखो से टकराते हो यानि इच्छओ को जबरन दबाने की कोशिश करते हो इसलिए बार बार हार जाते हो।

जिज्ञासु ने कहा तो फिर क्य उपाय है भगवन मै अपने मन के पिंजरे से कैसे मुक्ति पाऊं? यदि पंछी को पिंजरे से बाहर आना है तो उसे किसी ऐसे को खोजना होगा जिसके पास पिंजरे की चाबी है और वह उस चाबी से पिंजरा खोल दे तभी पंछी गगन मे स्वछंद उङान भर सकता है

जिज्ञासु ने कहा मेरे मन के पिंजरे की चाबी किसके पास है? सद्गुरु के पास। उनके पास ही वह ज्ञान की चाबी है, जिससे मन का पिंजरा खुलता है, आत्मज्ञान पाकर ही एक व्यक्ति अपने मन के स्तर से उपर उठकर अपने आकाश मे यानि ब्रह्मरन्ध्र मे स्वतंत्ररूप से उङान भर पाता है।

दूसरे जिज्ञासु ने कहा भगवन मेरे मन मे हरपल विचारो का तुफान आया ही रहता है परंतु जब से मैंने आपका सत्संग सुनना शुरू किया है, तब से अपने गलत विचार को सही मे बदलने की कोशिश करता हूं। ऐसा करना सही है ना?

महर्षि जी ने कहा उतना ही सही है जितना कि चोर को पुलिस बना देना। एक विचार से दूसरे विचार को नही मारा जा सकता। यु तो मन की सत्ता हमेशा कायम रहेगी इसलिए यदि मन को मारना चाहते हो तो अच्छे बुरे विचारो से उपर उठो। विचार शुन्य स्थिति को पाओ। तभी कुछ लाभ है अन्यथा नही,

दूसरे जिज्ञासु ने कहा भगवान क्या आपके इतने सुन्दर सत्संग प्रवचनो को सुनने भर से ही हमे मोक्ष नही मिल जाएगा? आपका सत्संग सुनने के बाद भी हमे साधना या अन्य प्रयास करने की क्या जरूरत है,

अच्छा यदि ऐसा हो सकता तो फिर तो इस आश्रम के छात्र और दिवारो को कब का मोक्ष मिल गया होता। ये तो कब से मेरे हर विचारो को सुन रही है बिना पुरूषार्थ के न किसी इस युग ना किसी दूसरे युग मे ना ईश्वर को पाया है और ना ही पा सकता है। दिवारो की तरह मत सुनो, मनुष्य बनकर सुनो और सुनाते भी इसलिए हैं कि उसके अनुरूप पुरूषार्थ करो।

जिज्ञासु ने कहा मैने सुना है आप आत्मदर्शन की शिक्षा दीक्षा देते हैं परंतु मै किसी आत्मशक्ति को नही मानता। मेरे हिसाब से तो मांस मज्जा रक्त से बना यह शरीर ही सब कुछ है हमारी पहचान है।

महर्षि जी बोले यदि मै यहाँ उपस्थित लोगो को कहूँ कि वे आपको दफना दे तो जिज्ञासु ने कहा कि यह कैसा भद्दा मजाक है? भला कभी जीते जागते इंसान को भी दफनाया जाता है यदि आप ऐसा कहेंगे तो कुछ कहेंगे तो मै उसका डटकर विरोध करूंगा। आपने कहा कि जीते जागते इंसान को दफनाया नही जाता यानि कि मरे हुए इंसान को दफनाया जाता है, है ना।

जिज्ञासु ने कहा हां बिल्कुल पर आप मरा हुआ किसे कहते है मांस मज्जा रक्त से बना शरीर तो ज्यो का त्यो ही होता है फिर भी आप उस शरीर को मृतक क्यो घोषित कर देते है आपका शरीर कब्र से उठकर विरोध क्यो नही करता?

जिज्ञासु ने कहा कि उसमे अब वह प्राण शक्ति नही रही बस इसी प्राण शक्ति की आधारभूत सत्ता को आत्मा कहते है, इस आत्मा का आत्मज्ञान या आत्म विद्या द्वारा जाना जा सकता है, उसका स्पष्ट दर्शन किया जा सकता है दुसरे जिज्ञासु ने कहा भगवन मै इस संसार से उब चुका हूं, जीने की कोई इच्छा नही रही मन करता है कि आत्म हत्या कर लूँ।

महर्षि जी बोले सामने देख रहे हो कुछ शिष्य दिन के लंगर के लिए पत्तले बना रहे है जाओ जाकर उनकी पत्तलो को कुङेदान मे जाकर फेंक आओ पर ऐसा करना तो ठीक नही है। गुरुवर क्यो? क्यो ठीक नही है? क्यो कि तुम जानते हो कि पत्तल बनाना आसान नही होता। पहले अच्छे साफ सुथरे बङे बङे पत्तल छाटने पङते है फिर सीखें इक्कठी करनी पङती है फिर बङी सावधानी द्वारा इन सीखों को एक दूसरे से जोडना पङता है तब कहीं जाकर भोजन करने के लिए पत्तल तैयार होती है ।

अब यदि बिना उपयोग किये हुए इस पत्तल को फेंक दें तो सही नही है ना। ठीक इसी तरह ईश्वर ने बङे पुरूषार्थ से यह मानव शरीर रचा है और तुमने भी कई जन्मो कई योनियो मे भटकने के बाद इस शरीर को पाया है यदि तुम इसका उपयोग करने से पहले ही यानि आत्मउन्नति किये बिना ही इसे फेंक दो अर्थात आत्महत्या कर लोगे तो यह कहाँ की समझदारी है?

जिज्ञासु ने कहा गुरुवर मुझे साधना मे पहले बहुत सिद्ध रूपो के दर्शन हुआ करते थे परंतु अब नही होते। क्या मुझसे भुल हो गयी है? ना ऐसा क्यो सोचते हो? बात बस इतनी है कि छोटे बच्चो की किताबो मे चित्र दिये जाते है बङे बच्चो की किताबो मे नही होते। अब तु भी बङा हो गया है इसलिए बिना चित्र वाली साधना करना सिख ले।

जिज्ञासु ने कहा गुरूवर आदि शंकराचार्य जी देश के कोने-कोने मे गये और लोगो को ज्ञान का उपदेश दिया लेकिन आप तो इस आश्रम के बाहर जाते ही नही। ऐसा क्यो?

महर्षि जी बोले यदि तुम पंखे को कहो कि वह प्रकाश देने लगे तो क्या वह देगा? इसी तरह तुम बल्ब को कहो कि वह हवा देने लगे तो क्या वह संभव है नही ना ठीक ऐसे ही हर युग मे आये संत महापुरुष का व्यवहार कार्य करने का तरीका अलग अलग होता है परंतु जैसे पंखे और बल्ब को चलायमान करने वाली विद्युत ऊर्जा एक ही है ऐसे ही हर महापुरुष को चलायमान करने वाला लक्ष्य एक ही होता है और वह है जन जन को जागृत कर ब्रह्मज्ञान का उपदेश देना।

जिज्ञासु ने कहा भगवन आप से ज्ञान लिये हुए और इस मार्ग पर चलते हुए मुझे कई वर्ष हो गये परंतु कई बार ऐसा लगता है कि मै वहीं का वहीं खङा हूं मैने कोई उन्नति नही की।

महर्षि जी बोले जो यात्री ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डब्बे (first class coach) मे सफर करते है वे रात को बार बार जागकर यह नही देखते कि कहीं उनका स्टेशन तो नही आया। वे तो डिब्बे की खिड़की दरवाजे बंद कर निश्चिंतता से सोते है क्योंकि उनके स्टेशन पर उन्हे उतारने की जिम्मेदारी उस डिब्बे के गार्ड की होती है। तुम भी प्रथम श्रेणी के डिब्बे मे सफर कर रहे हो और मै तुम्हारा गार्ड हूं, गुरु गार्ड होते है जिसने ज्ञानी महापुरुषो से दीक्षा ले ली वह फर्स्ट क्लास मे यात्रा कर रहा है इसलिए तुम्हे यह चिंता करने की जरूरत नही कि तुम कहां तक पहुंचे हो?

तुम्हे मंजिल तक ले जाना जिम्मेदारी मेरी है। बस तुम इस ट्रेन मे बैठे रहना उतर गये तो गङबङ हो जाएगी यानि अध्यात्म मार्ग पर सद्गुरु द्वारा चलाई गई ट्रेन मे बैठकर हर शिष्य अपनी मंजिल पर पहुंचता ही है इसलिए स्वयं को गुरु को समर्पित कर शिष्य को चिंता रहित हो जाना चाहिए

 जिज्ञासु ने कहा गुरूवर हम अपने अगले जन्म मे आपको कैसे ढुढ़ पायेंगे? आप तक कैसे पहुंचेगे।

महर्षि जी बोले क्या इस जन्म मे तुने मुझे ढुढ़ लिया क्या? क्या इस जन्म मे तुम खुद मुझ तक पहुंचे हो? नही ना। जैसे एक चरवाहा अपनी भेङो को इकठ्ठा करता है ऐसे ही एक सद्गुरु जब धरा पर आते हैं तो सबसे पहले अपनी भक्त आत्माओ को इकठ्ठा करते हैं यह उनका कार्य है वे खुद एक एक को ढुढ़ते है और उसे अपने तक ले आते हैं।

क्या तुम महाराष्ट्र के उस अध्यापक से नही मिले वह सबको बताता फिरता है कि वह कैसे यहाँ अरूणाचल मे मुझ तक पहुंचा?

कहता है कि एक रात मै उसे सपने मे दिखाई दिया था।

मैने उसे कहा तुम मेरे पास क्यो नही आते?

अध्यापक ने कहा कि तुम हो कौन?

महर्षि रमण।

पर मैने तो आपके बारे मे कभी नही सुना। मुझे यह भी नही पता कि आप कहाँ रहते हैं?

तुम अरूणाचल आ जाओ। तुम मेरे बारे मे पूछना लोग तुम्हे मुझ तक पहुंचने तक का रास्ता बता देंगे

पर मैं तो बहुत गरीब हूं। महाराष्ट्र से अरूणाचल आने तक पैसे नही है मेरे पास,

तुम फला फला स्थान पर जाओ। वहाँ एक सुनार की दुकान है सुनार से कहना कि मैने तुम्हे भेजा है वह किराये के पैसे दे देगा

अगली सुबह अध्यापक उस सुनार के पास पहुंचा और उसे पिछली रात का सपना कह सुनाया। सपना सुनने के बाद बिना कुछ कहे उस सुनार ने किराये की रकम निकाली और अध्यापक को थमा ली और वह मुझ तक पहुंच गया और मैने उसे दीक्षित कर दिया । वह मेरा पुराना शिष्य है कई जन्मो से इस मार्ग पर चल रहा है उसे मंजिल तक लेकर जाना मेरा दायित्व है ।

इसी तरह तुम सब भी मेरे अपने हो तुम सबका दायित्व भी मुझ पर है इसलिए तुम निश्चिंत हो इस मार्ग पर चलो, तुम्हारे हर जन्म मे मै तुम्हे स्वयं खोज लुंगा।

जिज्ञासु ने कहा भगवान आपकी इस अनन्त कृपा का मोल तो हम चुका नही सकते परंतु हम फिर भी गुरु दक्षिणा स्वरूप कुछ देना चाहते है। क्या अर्पित करें? यदि कुछ देना चाहते हो तो एक वचन दो कि तुम अडीगता से इस अध्यात्म मार्ग पर चलते रहोगे। आत्मउन्नति के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहोगे। अज्ञानता के अंधकार से डूबे इस समाज को ज्ञान के दीप से आलोकित करोगे यही मेरी गुरु दक्षिणा होगी।