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कृतघ्न, निंदक बनता है अपने ही विनाश का कारण


महाभारत में एक कथा आती है। भीष्म पितामह युधिष्ठिर से बोलेः “किसी निर्जन वन में एक जितेन्द्रिय महर्षि रहते थे। वे सिद्धि से सम्पन्न, सदा सत्त्वगुण में स्थित, सभी प्राणियों की बोली एवं मनोभाव को जानने वाले थे। महर्षि के पास क्रूर स्वभाव वाले सिंह, बाघ, चीते, भालू तथा हाथी आदि भी आते थे। वे हिंसक जानवर भी ऋषि के शिष्य की भाँति उनके पास बैठते थे। एक कुत्ता उन मुनि में ऐसा अनुरक्त था कि उनको छोड़कर कहीं नहीं जाता था।
एक दिन चीता उस कुत्ते को खाने के लिए आया। कुत्ते ने महर्षि से कहाः “भगवन् ! यह चीता मुझे मार डालना चाहता है। आप ऐसा करें जिससे मुझे इस चीते से भय न हो।”
मुनिः “बेटा ! इस चीते से तुम्हें भयभीत नहीं होना चाहिए। लो, मैं तुम्हें अभी चीता ही बना देता हूँ।” मुनि ने उसे चीता बना दिया। उसे देख दूसरे चीते का विरोधी भाव दूर हो गया।
एक दिन भूखे बाघ ने उस चीते का पीछा किया। वह पुनः ऋषि की शरण में आया। इस बार महर्षि ने उसे बाघ बना दिया तो जंगली बाघ उसे मार न सका।
एक दिन उस बाघ ने अपनी तरफ आते हुए मदोन्मत्त हाथी को देखा। वह भयभीत हो के फिर ऋषि की शरण में गया। मुनि ने उसे हाथी बना दिया तो जंगली हाथी भाग गया।
कुछ दिन बाद वहाँ एक केसरी सिंह आया। उसे देख वह हाथी भय से पीड़ित हो ऋषि के पास गया। मुनि ने उसे सिंह बना दिया। उसे देखकर जंगली सिंह स्वयं ही डर गया।
एक दिन वहाँ समस्त प्राणियों का हिंसक एक शरभ आया, जिसके आठ पैर और ऊपर की ओर नेत्र थे। शरभ को आते देख सिंह भय से व्याकुल हो मुनि की शरण में आया। मुनि ने उसे शरभ बना दिया। जंगली शरभ उससे भयभीत हो के तुरंत भाग गया।
मुनि के पास शरभ सुख से रहने लगा। एक दिन उसने सोचा कि ‘महर्षि के केवल कह देने मात्र से मैंने दुर्लभ शरभ का शरीर पा लिया। दूसरे भी बहुत से मृग और पक्षी हैं जो अन्य भयानक जानवरों से भयभीत रहते हैं। ये मुनि उन्हें भी शरभ का शरीर प्रदान कर दें तो ? किसी दूसरे जीव पर ये प्रसन्न हों और उसे भी ऐसा ही बल दें उसके पहले मैं महर्षि का वध कर डालूँगा।’
उस कृतघ्न शरभ का मनोभाव जान महाज्ञानी मुनीश्वर बोलेः “यद्यपि तू नीच कुल में पैदा हुआ था तो भी मैंने स्नेहवश तेरा परित्याग नहीं किया। और अब हे पापी ! तू इस प्रकार मेरी ही हत्या करना चाहता है, अतः तू पुनः कुत्ता हो जा !”
महर्षि के श्राप देते ही वह मुनिजनद्रोही दुष्टात्मा नीच शरभ में से फिर कुत्ता बन गया। ऋषि ने हुंकार करके उस पापी को तपोवन से बाहर निकाल दिया।”
उस कुत्ते की तरह ही कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जो महापुरुष उनको ऊपर उठाते हैं, जिनकी कृपा से उनके जीवन में सुख, शांति समृद्धि आती है और जो उनके वास्तविक हितैषी होते हैं, उन्हीं का बुरा सोचने और करने का जघन्य अपराध करते हैं।
संत तो दयालु होते हैं, वे ऐसे पापियों के अनेक अपराध क्षमा कर देते हैं पर नीच लोग अपनी दुष्टता नहीं छोड़ते। कृतघ्न, गुणचोर, निंदक अथवा वैरभाव रखने वाला व्यक्ति अपने ही विनाश का कारण बन जाता है।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2015, पृष्ठ संख्या 25, अंक 276
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स्वास्थ्यरक्षक पुष्टिवर्धक मालिश


मालिश हमारे स्वास्थ्य व सौंदर्य में वृद्धि करती है, साथ में यह अनेक रोगों का सफल उपचार भी है। शीतकाल में मालिश विशेष लाभकारी है।
नियमित मालिश के लाभ
त्वचा निरोग, झुर्रियों से रहित, स्निग्ध, कांतिपूर्ण और स्वच्छ रहती है। सभी अवयवों में लचीलापन रहता है और शरीर का विकास एवं सुरक्षा भली प्रकार होते हैं।
शरीर में स्फूर्ति और शक्ति बनी रहती है, थकावट दूर होती है।
पाचक अंगों को शक्ति व ओज मिलता है। यकृत, छोटी आँत आदि ठीक से अपना कार्य करते रहते हैं और पेट ठीक से साफ होता है।
शरीर दुबला हो तो पुष्ट व सुडौल होता है। यदि मोटा हो तो मोटापा कम होता है।
अनिद्रा, शारीरिक दर्द, हाथ-पैरों का कम्पन और वातरोग आदि व्याधियों में लाभ होता है।
मालिश के द्वारा रोग निवारण
मालिश द्वारा शरीर का रक्त प्रवाह बेहतर हो जाता है। यह शरीर के रोगों की निवृत्ति में सहायक होती है। मालिश से शरीर के चयापचयजन्य (metabolic) त्याज्य द्रव्य तथा विषाक्त द्रव्य पसीने, पेशाब, मल, श्वास आद के द्वारा बाहर निकल जाते हैं। यह शरीर की कार्यप्रणाली को सक्रिय बनाती है।
मांसपेशियों को अपना कार्य भलीभाँति करने के लिए शक्ति प्राप्त होती है। जोड़ लचीले और स्नायु (Ligaments) दृढ़ हो जाते हैं। रक्त का एक स्थान पर जमाव व चिपकाव दूर होता है। स्नायु-जाल को बहुत लाभ होता है।
भिन्न-भिन्न रोगों में मालिश का प्रयोग अलग-अलग तरीकों से शरीर के विभिन्न अंगों पर किया जाता है। उचित मालिश द्वारा जोड़ों का दर्द, सिरदर्द, मोच और किसी अंग की पीड़ा बड़ी बीमारी में भी यह बहुत लाभ करती है।
मालिश का तेल
मालिश के लिए काले तिल का तेल उत्तम है।
मालिश में ध्यान रखने योग्य बातें
जमीन पर चटाई बिछाकर बैठ के मालिश करें, खड़े-खड़े या चलते फिरते नहीं।
मालिश करने के लिए हाथ नीचे से ऊपर को चलायें। इसका तात्पर्य यह है कि हृदय की तरफ रक्त का प्रवाह हो ऐसा प्रयास करना।
मालिश के समय पेट खाली होना चाहिए। इसलिए सुबह शौच के बाद और स्नान से पहले मालिश करना सर्वश्रेष्ठ होता है। मालिश के 20-30 मिनट बाद सप्तधान्य उबटन या बेसन अथवा मुलतानी मिट्टी (शीत ऋतु के अलावा) लगाकर गुनगुने पानी से स्नान करें। स्नान कर तौलिये से खूब रगड़-रगड़ के शरीर को पोंछ लें।
प्रतिदिन पूरे शरीर की मालिश सम्भव न हो तो नियमित सिर व पैर के तलवों की मालिश करें व नाभि में तेल डालें। 2-3 दिन में कान में शुद्ध सरसों या तिल का तेल डालना चाहिए।
मालिश धीरे-धीरे और हलके दबाव के साथ करनी चाहिए। मालिश करते समय ऐसी मनोभावना बनायें कि उक्त अंग को बल मिल रहा है, इससे विशेष लाभ होता है।
सावधानियाँ
भोजन के तुरंत बाद कभी भी मालिश नहीं करनी चाहिए। मालिश शीघ्रता से न करें अन्यथा यह थकान पैदा करती है।
मालिश के बाद ठंडी हवा में न घूमें।
बुखार, कब्ज, अजीर्ण, आमदोष, तरूण ज्वर, कफ से पीड़ित तथा उपवास या अधिक रात्रि तक जागरण किये हुए एवं बहुत थके हुए व्यक्ति को तेल मालिश नहीं करनी चाहिए।
रोग दूर करने के लिए किसी अंग की मालिश करनी हो तो मालिश के जानकार, वैद्य आदि से समझकर ही मालिश करनी चाहिए।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2015, पृष्ठ संख्या 30-31, अंक 276
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खजूर खायें, शरीर को हृष्ट-पुष्ट व निरोगी बनायें


खजूर मधुर, शीतल, पौष्टिक व सेवन करने के बाद तुरंत शक्ति-स्फूर्ति देने वाला है। यह विशेषतः रक्त, मांस व वीर्य की वृद्धि करता है। यह हृदय व मस्तिष्क को शक्ति देता है, वायु व कफ का शमन करता है तथा मल व मूत्र साफ लाता है। खजूर में कार्बोहाइड्रेटस, प्रोटीन्स, लौह, मैग्नेशियम, फॉस्फोरस आदि भरपूर मात्रा में पाये जाते हैं। इसके नियमित सेवन से मांस की वृद्धि होकर शरीर पुष्ट हो जाता है। गाय के घी अथवा दूध के साथ खजूर लेने से शुक्राणुओं की वृद्धि होती है।
पाचक व पौष्टिक खजूर चटनी
खजूर में नींबू का रस, अदरक, काली मिर्च, सेंधा नमक आदि मिलाकर चटनी बनायें। इसको खाने से भूख खुलकर लगती है, पाचन ठीक से होता है, गैस की तकलीफ व अरुचि दूर होती है। यह चटनी पौष्टिक और बलप्रद भी है।
बलप्रद अवलेह
खजूर, द्राक्ष, मिश्री व घी – प्रत्येक 100 ग्राम व 10 ग्राम पीपर को अच्छे से मिलाकर रखें। अवलेह तैयार हो गया। प्रतिदिन 20-30 ग्राम सेवन करने से क्षय (टी.बी.), क्षयजनित खाँसी, दमा और स्वरभेद (आवाज बदल जाना, रूखी-तीखी आवाज) में अच्छा लाभ होता है। बालकों के लिए भी यह स्वादिष्ट, रुचिकर और बलप्रद है।
खजूर के विविध प्रयोग
वीर्यवर्धकः 5-7 खजूर तथा 25-30 किशमिश प्रतिदिन सेवन करने से रक्त की वृद्धि होती है। दुर्बल शरीर मन वाले एवं जिनका वीर्य क्षीण हो गया है, ऐसे लोगों के लिए प्रतिदिन प्रातः इनका सेवन लाभदायक है।
5-7 खजूर व रात को भिगोकर छिलके उतारे हुए 5 बादाम सुबह दूध के साथ कुछ महीने सेवन करने से वीर्य की वृद्धि होती है और शीघ्रपतन की विकृति नष्ट होती है।
रक्ताल्पताः घीयुक्त, दूध के साथ रोज 5-7 खजूर का उपयोग करने से खून की कमी दूर होती है।
शारीरिक निर्बलताः 500 ग्राम बीज निकला हुआ खजूर कूटें। उसमें बादाम, पिस्ता चिरौंजी, मिश्री व घी – प्रत्येक 50 ग्राम मिलाकर उसके 50-50 ग्राम के लड्डू बना के रखें। प्रतिदिन 1 लड्डू खाकर ऊपर से दूध पीने से शारीरिक निर्बलता दूर होती है।
दूध में 5 खजूर व 2 ग्राम अश्वगंधा चूर्ण मिलाकर सेवन करें।
नपुंसकताः खजूर में 1 ग्राम व दालचीनी का चूर्ण मिलाकर सुबह गुनगुने दूध के साथ सेवन करने से नपुंसकता में लाभ होता है।
मात्राः 5 से 7 खजूर अच्छी तरह धोकर रात को भिगो को सुबह खायें। बच्चों के लिए 2-4 खजूर पर्याप्त हैं। दूध या घी में मिलाकर खाना विशेष लाभदायी है। होली के बाद खजूर खाना हितकारी नहीं है।
प्राप्ति स्थान
सभी संत श्री आशाराम जी आश्रम। सम्पर्कः 079-3987773
स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2015, पृष्ठ संख्या 31, अंक 76
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