व्रत से जीवन में दृढ़ता आती है।
व्रतेन दीक्षामाप्नोति…..
अव्रती व्यक्ति काम करते हुए ऊब जायेगा, पलायन कर जायेगा, दूसरे को दोष देगा परंतु व्रती आदमी दूसरे को दोष नहीं देगा। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों व्रत-कार्य साफल्य ले आयेगा।
गांधी जी के आश्रम का नियम था कि भोजन की हर पंगत के लिए दो घंटियाँ बजने के बाद रसोई घर का दरवाजा बन्द कर दिया जाता था। दूसरी घंटी बजने के बाद आने वाले व्यक्तियों को अगली पंगत के लिए इंतजार करना पड़ता था।
गांधी जी हमेशा तो सही समय पर रसोई घर पहुँच जाते थे किंतु एक दिन उन्हें पहुँचने में थोड़ी देर हो गयी, दरवाजा बन्द हो चुका था। गांधी जी मानते थे कि ‘आश्रम का बनाया नियम सबके लिए समान है।’ अतः वे बाहर ही अगली पंगत का इंतजार करते रहे। यदि वे जाना चाहते तो उन्हें कौन रोक सकता था परंतु गांधी जी में छोटे से नियम के प्रति भी दृढ़ता थी। इस प्रकार नियम पालन से ही उनमें आत्मबल, सहनशीलता आदि गुणों का विकास हुआ, जिनके प्रभाव से वे स्वतंत्रता-संग्राम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा पाये।
नियम भले ही छोटा सा ही क्यों न हो, अगर उसका दृढ़ता पूर्वक पालन किया जाय तो, संकल्पशक्ति बढ़ती है, आत्मविश्वास जागता है, मन वश होता है तथा दोषों व कुसंस्कारों से छुटकारा पाने का बल मिलता है। ‘ऋग्वेद’ (9.61.24) में आता हैः व्रतेषु जागृहि। ‘आप अपने व्रत नियमों के प्रति सदा जागृत रहें।’
पूज्य बापू जी के आश्रमों में भी पूज्य श्री के निर्देशानुसार बनाये गये शास्त्रोचित खान-पान, रहन सहन, साधना-सेवा आदि के नियमों व व्रतों का पालन होता है, जिससे यहाँ आने वाले साधक सहज में शीघ्र उन्नति कर अलौकिक अऩुभवों के धनी बन जाते हैं।
पूज्य बापू जी कहते हैं- “अपने चित्त में परमात्मा को पाने के लिए दिव्य, पवित्र, आत्मसाक्षात्कार में सीधे साथ दें ऐसे व्रत-नियम डाल दें। जरा-जरा बात में सुख के लालच में, दुःख के भय में फिसल पड़ते हैं। नहीं….. जैसे गांधी जी ने अपने जीवन में व्रत रख दिये थे-सप्ताह में एक दिन न बोलने का व्रत, ब्रह्मचर्य का, सत्य का, प्रार्थना का व्रत…. ऐसा ही कोई व्रत अपने जीवन में, अपने चित्त में रख दें जिससे अपने लक्ष्य की तरफ दृढ़ता से चल सकें और अपना ईश्वरीय अंश विकसित कर सकें।”
महापुरुषों के जीवन को निहारा जाय तो उसमें किसी न किसी व्रत नियम का प्रकाश अवश्य मिलेगा। श्री रमण महर्षि का मौन-व्रत, पितामह भीष्म, आद्य शंकराचार्य जी आदि का ब्रह्मचर्य-व्रत तथा कणाद, पिप्पलाद आदि ऋषियों के आहारसंबंधी व्रत इतिहास प्रसिद्ध हैं। ब्रह्मनिष्ठ पूज्य बापू जी की भी नियमनिष्ठा सभी के लिए प्रकाशस्तम्भ है। पूज्य श्री आत्मसाक्षात्कार जैसी पराकाष्ठा पर पहुँचने के बाद भी आज भी अपना नियम किये बिना कुछ नहीं सेवन करते। प्रतिदिन सत्संग करना भी पूज्यश्री के जीवन का एक अभिन्न अंग है। वर्ष में एक दिन भी पूज्य श्री बिना सत्संग के नहीं रहते। आज कारागृह में भी अपनी सत्संग की कुंजियों द्वारा कैदियों तथा कर्मचारियों का जीवन उन्नत कर रहे हैं। कैसी है महाराजश्री के जीवन में नियमनिष्ठा की सुवास, जो सर्व-मांगल्य के भाव से ओतप्रोत है ! वास्तव में नियम पालन ब्रह्मज्ञानप्राप्ति का महत्त्वपूर्ण साधन है। जीवन्मुक्त महापुरुषों के लिए नियमों का बंधन नहीं है परंतु समाज को सही दिशा देने के उद्देश्य से वे आत्मारामी महापुरुष भी नियमों को स्वीकार कर लेते हैं, यह उनकी कितनी करूणा-कृपा है !
स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2015, पृष्ठ संख्या 18, अंक 266
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
Articles
जीव को ब्रह्म बनाने का विश्वविद्यालय
भगवत्पाद सदगुरुदेव साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज की आज्ञा से पूज्य बापू जी ने संवत् 2028 में गुरुपूर्णिमा अर्थात् 8 जुलाई 1971 को अहमदाबाद की धरती पर चरण रखे। आश्रम स्थापना के बारे में पूज्य श्री बताते हैं- “हम वाड़ज (अहमदाबाद) में सत्संग करने के लिए आये थे। शहरी माहौल से हमारा चित्त ऊब गया था, इसलिए इधर घूमने के लिए आये थे। यहाँ आते ही हमारे चित्त में कुछ विलक्षण एहसास हुआ। हमने समितिवालों से कहा कि ‘यहाँ एक कुटिया बना दें तो कैसा रहेगा ?’
उन्होंने कहाः “बापू जी ! जरूर बननी चाहिए।” मोक्ष कुटीर बनाने के कार्य में मजदूरों के साथ हम भी लगे थे। लगभग 15 साल तो हम मोक्ष कुटीर में रहे।”
‘मौनी अमावस्या’ के दिन संवत् 2028 अर्थात् सन् 1972 में मोक्ष कुटीर तैयार हुआ था। इस आश्रम की महत्ता बताते हुए पूज्य बापू जी कहते हैं- “यहाँ पूर्वकाल में जाबल्य ऋषि ने तपस्या की थी। यहाँ पिछले 43 साल से ध्यान-भजन चल रहा है। कितना भी अशांत व्यक्ति इधर आश्रम के माहौल में आता है तो उसके चित्त में यहाँ की आध्यात्मिक आभा का, ध्यानयोग का, भक्तियोग का कुछ-न-कुछ सात्त्विक एहसास होने लगता है। इस भूमि में आत्मसुख को जगाने की आभा है।”
करीब 30-35 वर्ष पूर्व कुछ पर्यटक अहमदाबाद आश्रम में आये थे। आश्रम के एकांत और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण वातावरण से प्रभावित हुए बिना वे नहीं रह सके। उन्होंने पूज्य बापू जी से पूछाः “यहाँ क्या प्रवृत्ति होती है ?” पूज्य श्री बोलेः “त्रिकाल संध्या होती है। ध्यान-भजन होता है।”
उन्होंने आश्चर्य से पूछाः “इतनी सुंदर जगह ! क्या यहाँ कुछ प्रवृत्ति नहीं होती ?”
तब पूज्य श्री ने कहाः “यहाँ जीव को अपने ब्रह्मस्वभाव में जगाने का विश्वविद्यालय चलता है !”
पूज्य बापू जी के कल्याणकारक मार्गदर्शन में आश्रम द्वारा लोक-कल्याण की अनेकानेक सत्प्रवृत्तियाँ चलायी जा रही हैं, जिनसे समाज के विभिन्न वर्गों के असंख्य लोग लाभान्वित हो रहे हैं। इस आश्रमरूपी विशाल वटवृक्ष की शाखाएँ भारत के शहरो-गाँवों तक ही नहीं, केवल विदेशों तक ही नहीं बल्कि करोड़ों हृदयों तक फैल चुकी हैं।
इस महान तपोभूमि, तीर्थभूमि के 43वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में 20 जनवरी को अहमदाबाद आश्रम म् ‘श्री आशारामायण’ का सामूहिक पाठ, पादुका-पूजन, पूज्य श्री के दुर्लभ सत्संग, भजन-कीर्तन, प्रार्थना आदि कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। 40-45 वर्षों से पूज्य श्री के सान्निध्य से लाभान्वित हो रहे साधकों ने अपने अनुभव बताये। सभी साधकों ने पूज्य बापू जी से करूण भाव से प्रार्थना कीः ‘हे गुरुवर ! आपके बिना सब सूना है। हम बच्चों के लिए ही सही, अब तो आश्रम जल्दी आ जाइये !’
स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2015, पृष्ठ संख्या 27, अंक 266
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
गुरु का बंधन परम स्वतन्त्रता है – पूज्य बापू जी
गुरु और भगवान का बंधन, बंधन नहीं है, वह तो प्रेम से, धर्म से, स्वयं अपनी मर्जी से स्वीकारा गया ज्ञान-प्रकाशदायी अनुशासन है। विकारों के बंधन से छूटने के लिए शास्त्र, गुरु और भगवान के बंधन में रहना हजारों स्वतंत्रताओं से ज्यादा हितकारी है।
मैं गुरु के बंधन में रहा। दाढ़ी बाल तब छँटवाता जब गुरु जी की आज्ञा आती, ऐसा बंधन मैंने स्वयं स्वीकार क्या था। सत्य का बंधन स्वीकार किया, वह बाँधता नहीं मुक्त कर देता है। अगर गुरु जी की कृपा का बंधन मैं स्वीकार नहीं करता और उनकी आज्ञा का उल्लंघन कर देता तो मैं विकारों के बंधन में आ जाता लेकिन उनका आज्ञा का पालन किया तो करोड़ो लोगों की सेवा करने में गुरु महाराज मुझे सफल कर रहे हैं, निमित्त बना रहे हैं। यह प्रत्यक्ष है।
मैंने बंधन स्वीकार किया लेकिन बंधन रहा नहीं, हृदय में मुक्तात्मा गुरु प्रकट हो गये। तो गुरु की आज्ञा पालना यह बंधन नहीं है, सारे बंधनों से मुक्त करने वाला तोहफा है। गुरु की अधीनता को छोड़कर चल दिये तो वे स्वतंत्र नहीं हैं, महापराधीन हैं, मन व इन्द्रियों के विकारों के अधीन हो जाते हैं। जिन्हें सदगुरु मिले हैं वे परम स्वतंत्रता का राजमार्ग पा चुके हैं, उन्हें बधाई हो !
स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2015, पृष्ठ संख्या 26, अंक 266
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ