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अभी न किया तो कब करोगे ? – पूज्य बापू जी


तुम जितनी देर शांत बैठते हो, निःसंकल्प बैठते हो उतनी तुम्हारी आत्मिक ऊर्जा, आत्मिक आभा, परमात्मिक शक्ति संचित होती है, तुम्हारा सामर्थ्य बढ़ता है।

एक संत से किसी ने कहाः “हम तो गृहस्थी हैं, संसारी हैं। हम तो एकांत में नहीं रह सकते, शक्तिसम्पन्न नहीं हो सकते।”

संत ने कहाः “आप एक लोटे दूध को सरोवर में अथवा पानी के बड़े बर्तन में डाल दो तो आपका दूध व्यर्थ हो  जायेगा लेकिन उस दूध में थोड़ा-सा दही डालकर उसे जमाओ, थोड़ा एकांत दो, बाद में मथो और पानी से भरे हुए घड़े या सरोवर में वह मक्खन डालो तो तैरेगा।

ऐसे ही थोड़े समय भी तुम साधन भजन करके अपने आनंदस्वरूप आत्मा का सुख लो तो फिर संसार के घड़े में व्यवहार करोगे तो भी नाचते-खेलते आनंद से सफल हो जाओगे, नहीं तो संसार आपको डुबा देगा। चिंता व विकारों में, राग-द्वेष में, भय और रोग में डुबा देगा और अंत में जन्म-मरण के चक्कर में भी डुबा देगा।”

ʹक्या करें ? हम तो संसारी हैंʹ – ऐसा करके अपना आयुष्य नष्ट नहीं करना। तुम सचमुच परिश्रम से कमाते हो और बहुत मितव्ययिता से जीते हो तो तुम्हारा अधिकार है परम सुख पाने का। मनुष्य चोले से श्रेष्ठतर कुछ भी नहीं है। ऐसा मनुष्य-जीवन पाकर आपने अगर ऊँचाइयों को नहीं छुआ तो फिर कब छुओगे ? जो भूतकाल में हो गया सो हो गया। अभी से तुम शक्ति का संचय करो, आत्मानंद में वृद्धि करो, बढ़ाओ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2013, पृष्ठ संख्या 15, अंक 249

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विद्या वही जो बंधनों से मुक्त करे – पूज्य बापूजी


जो भगवान के शुद्ध ज्ञान में शांत रहना सीखता है, मिले हुए सामर्थ्य का सदुपयोग करता है उसके जीवन में शक्तियाँ आती हैं और निर्भयता आती हैं। ऐसा नहीं कि मिली हुई सुविधा का उपयोग मोबाइल में गंदे गाने भरकर करे, यह तो लोफरों का काम है। जीवन को महकाने के समय मोबाइल फोन में गंदे गाने, गंदी शायरियाँ, गंदी फिल्मों के चित्र, प्रेमी-प्रेमिकाओं की बातें रखने से आज के युवक-युवतियों की दुर्दशा हो रही है।

रामसुखदासजी महाराज बोलते थे कि ʹआजकल तो स्कूल कालेज में बेवकूफी पढ़ाई जा रही है। ऐसा पढ़ूँ, ऐसा बनूँ…. दूसरे को ठगकर भी माल-मिल्कियत इकट्ठी करो, दूसरे को नीचा दिखाकर भी बड़े बनो… ऐसी निरी मूर्खता भरी जा रही है !ʹ

इसीलिए गुरु की बड़ी भारी महिमा है ! गुरु ज्ञान की बड़ी भारी महिमा है ! श्रीरामचन्द्रजी गुरुकुल में पढ़ते थे तो ऐसी सुंदर पढ़ाई थी कि रामचंद्रजी लक्ष्मण को संकेत करते थे कि सामने वाला पक्ष हारने की कगार पर है। लक्ष्मण समझ जाते थे इशारे से, तो जान-बूझकर लक्ष्मण हारते, राम जी हारते, उनके साथी हारते और सामने वाला जीत लेता। इनको संतोष होता कि हम हारकर भी उनको प्रसन्न कर रहे हैं, आत्मशांति है ! दोनों पक्षों में प्रसन्नता होती और आजकल क्या है ? कुछ भी करो, झठ कपट करके भी सामने वाले को हराओ और पुरस्कार ले लो। हारने वाले भी दुःखी, जीतने वालों में निरी मूढ़ता बढ़ायी जाती है। इससे तो तनाव बढ़ेगा, अशांति बढ़ेगी, भ्रष्टाचार बढ़ेगा, घमंड और अहंकार बढ़ेगा। मनुष्य मनुष्य  सताने वाला हो जायेगा। ऐसी विद्या अंग्रेजों की परम्परा से हमारे देश में चल पड़ी है।

पहले ऋषि-मुनियों की बहुत ऊँची विद्या पढ़ायी जाती थी। सभी लोग सुख-शांति से जीते थे। घर में ताला नहीं लगाना पड़ता था। अभी तो ताला लगाओ, ताले के  ऊपर दूसरा ताला लगाओ फिर भी सुरक्षा नहीं। बैंक में खाता खुलवाओ फिर भी नकली हस्ताक्षर से कुछ-का-कुछ हो जाता है। यह विद्या ऐसी है कि बोफोर्स घोटाला करो, हवाला कांड करो, 2जी घोटाला करो, कोयला घोटाला करो लेकिन अपने को कड़ा बनाओ। बड़े ठग बन जाते हैं, बड़े शोषक बन जाते हैं और कितना भी धन और बड़ा पद पा लिया किंतु भूख नहीं मिटती। एक दूसरे को गिराते, लड़ते-लड़ते बूढ़े होकर मर जाते हैं फिर प्रेत होकर भटकते रहते हैं। मूर्खता ही तो है !

सा विद्या या विमुक्तये।

असली विद्या तो वह है जो आपको विकारों से, दुःखों से, चिंताओं से, जन्म मरण से, शोक से रहित करके आत्मा-परमात्मा से एकाकार करे।

दुर्लभो मानुषो देहो देहीनां क्षणभंगुरः।

तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम्।।

ʹमनुष्यदेह मिलना दुर्लभ है। वह मिल जाय तो भी क्षणभंगुर है। ऐसी क्षणभंगुर मनुष्य देह में भी भगवान के प्रिय संतजनों का दर्शन तो उससे भी अधिक दुर्लभ है।ʹ

मनुष्य जीवन बड़ी मुश्किल से मिला है। इसे ʹहा-हा, ही-हीʹ डायलागबाजी या फिल्मबाजी में तबाह नहीं करना है। कब मर जायें, कहाँ मौत हो जाये कोई पता नहीं। उससे भी ज्यादा दुर्लभ है परमात्मा के प्यारे संतों का दर्शन-सत्संग। संतों के दर्शन-सत्संग के बाद भी अगर डायलाग और फिल्म अच्छी लगती है तो डूब मरो ! बिल्कुल देर ही मत करो। विवेक में डूबो। पानी में डूबेंगे तो फिर मछली बनेंगे, मेढक बनेंगे। इसीलिए ज्ञान में डूबो, भगवान की पुकार में डूबो, भगवान की शरण में डूबो।

ʹभविष्य में मेरा क्या होगा ?ʹ इसकी चिंता न करो। चिंता करनी है तो इस बात की करो कि ʹसुख-दुःख से हम अप्रभावित कैसे रहें ? सादगी से कैसे जियें ? सच्चाई और स्नेह से सम्पन्न कैसे हों ? बिना वस्तुओं, व्यक्तियों व सुविधाओं के स्वनिर्भर कैसे रहें ? और अपने स्व से, ʹमैंʹ स्वरूप परमात्मा से कैसे मिलें ?ʹ ऐसा प्रयत्न करना चाहिए अन्यथा ʹही-ही, हू-हूʹ करते हुए जवानी चली जायेगी। इसीलिए अब घमंड करके मत जियो। अपनी गलती को खोज-खोज के निकालो और भगवान को अपना मानो। अगर गलती नहीं निकलती है तो उसे पुकारोः ʹहे भगवान ! मेरे मन में यह गलती है, आप कृपा करो।ʹ

अपना भाव, कर्म और ज्ञान शुद्ध होना चाहिए। ज्ञान शुद्ध होगा तो लोफर-लोफरियों के चित्र अच्छे नहीं लगेंगे। लौकिक ज्ञान भ्रामक स्थिति में उलझा सकता है। आधिदैविक ज्ञान आधिदैविक आकर्षणों में फँसा सकता है। लेकिन आत्मा-परमात्मा का ज्ञान व भाव और आत्मा-परमात्मा की प्रीति के लिए किए हुए कर्म आपको नैष्कर्म्य सिद्धि (निष्कर्म, निर्लिप्त परमात्म-तत्त्व) में, भगवदभाव में स्थित कर देंगे और ʹभगवान का आत्मा और मेरा आत्मा एक हैʹ ऐसा आपमें ईश्वरीय संकल्प ला देंगे, बिल्कुल पक्की बात है !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2013, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 248

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स्त्रियों के भूषण सात सदगुण – पूज्य बापू जी


जिस स्त्री में सात दिव्य गुण होते हैं, उसमें साक्षात भगवान का ओज तेज निवास करता है। एक है ʹकीर्तिʹ अर्थात् आसपास के लोगों का आपके ऊपर विश्वास हो। अड़ोस-पड़ोस के लोग आप में विश्वास करें, ऐसी आप सदाचारिणी हो जाओ। यह भगवान की कीर्ति का गुण है। लोगों का विश्वास हो कि ʹयह महिला बदचलन नहीं है, झूठ-कपट करके ठगेगी नहीं।ʹ आप बोलें तो आपकी बात पर लोग विश्वास करें। कीर्ति में ईश्वर का वास होता है।

दूसरा ʹश्रीʹ माने सच्चरित्रता का सौंदर्य हो। चरित्र की पवित्रता हर कार्य में सफल बनाती है। जिसका जीवन संयमी है, सच्चरित्रता से परिपूर्ण है उसकी गाथा इतिहास के पन्नों पर गायी जाती है। व्यक्तित्व का निर्माण चरित्र से ही होता है। बाह्यरूप से व्यक्ति भले ही सुंदर हो, निपुण गायक हो, बड़े-से-बड़ा कवि हो, चमक-दमक व फैशन वाले कपड़े पहनता हो परंतु यदि वह चरित्रवान नहीं है तो समाज में उसे सम्मानित स्थान नहीं मिल सकता। उसे तो हर जगह अपमान, अनादर ही मिलता है। चरित्रहीन व्यक्ति आत्मसंतोष और आत्मसुख से वंचित रहता है। अतः अपना चरित्र पवित्र होना चाहिए।

स्वयं अमानी और दूसरों को मान देने वाली वाणी बोलो। यह ʹमधुर वाणीʹ रूपी तीसरा गुण है। कम बोलें, सच बोलें, प्रिय बोलें, सारगर्भित बोलें, हितकर बोलें।

ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय।

औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय।।

चौथा गुण है ʹस्मृतिʹजो काम करना है वह भूल गये या जरा-जरा बात में ʹमैं भूल गयी…ʹ नहीं। आपका स्मृति का सदगुण विकसित हो इसलिए मैं ૐઽઽઽઽ का प्रयोग करवाता हूँ। इससे स्मृति में भगवान का ओज व समता रहती है।

पाँचवा गुण है ʹमेधाʹ अर्थात् अचानक प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो सारभूत निर्णय लेने की ताकत।

छठा गुण है ʹधैर्यʹ अर्थात् इन्द्रियों को धारण करने की, नियंत्रित करने की शक्ति। ऐसा नहीं कि कहीं कुछ देखा, खरीद लिया। बढ़िया दिखा, खा लिया। नाक बोलती है, ʹजरा परफ्यूम सूँघ लो।ʹ पैर बोलते हैं, ʹजरा फिल्म में ले जाओ।ʹ नहीं, संयम से। किधर पैरों को जाने देना, किधर आँख को जाने देना, इस बारे में धैर्य से, नियम से रहें। जरा-जरा बात में उत्तेजित-आकर्षित नहीं हो जाना।

सातवाँ गुण है ʹक्षमाʹक्षमा स्त्री की सुंदरता, हृदय की सुंदरता है। अपराधी को सजा देने के ताकत है फिर भी उसका मंगल सोचते हुए क्षमा करने का यह ईश्वरीय गुण आपके जीवन में हो। कभी सासु से अपराध हुआ, कभी बहू, पति या पड़ोसी से हुआ तो कभी किसी से अपराध हुआ, उसके अपराध को याद कर-करके अपना दिल दुखाओ नहीं व उसको भी बार-बार उसके अपराध की याद दिलाकर दुःखी मत करो। अपराधी को भी उसके मंगल की भावना से क्षमा कर दो। अगर उसको दंड देकर उसका मंगल होता है तो दंड दो लेकिन क्षमा के, मंगल के भाव से ! गंगाजी तिनका बहाने में देर करें परंतु तुम क्षमा करने में देर मत करो।

अश्वत्थामा ने द्रौपदी के बेटों को मार दिया। अर्जुन उसे पकड़कर ले आये और बोलेः “अब इसका सिर काट देते हैं। इसके सिर पर पैर रखकर तू स्नान कर। अपने बेटों को मारने वाले को दंड देकर तू अपना शोक मिटा।”

द्रौपदीः “नहीं-नहीं, मुच्यतां मुच्यतामेष…. छोड दो, इसे छोड़ दोष अभी एक माँ रोती है अपने बेटे के शोक में। यह भी तो किसी का बेटा है। फिर दो माताएँ रोयेंगी। नहीं-नहीं, क्षमा !”

इन सात सदगुणों में भगवान का सामर्थ्य होता है। ये सदगुण सत्संग और मंत्रजप वाले के जीवन में सहज में आ जाते हैं। इन्हें सभी अपने जीवन में ला सकते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2013, पृष्ठ संख्या 20,21 अंक 248

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