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राष्ट्रभाषाः देश का स्वाभिमान, संस्कृति की पहचान


राष्ट्रभाषा दिवसः 14 सितम्बर

भारतीय सभ्यता में विभिन्नताओं के बावजूद हमारा आचार-विचार, व्यवहार सभी एक मूल धारा से जुड़ा है और उसी का नाम है संस्कृति, जिसकी संहिता है संस्कृत भाषा में। देश की तमाम भाषाएँ संस्कृत भाषा कि पुत्रियाँ मानी जाती हैं, जिनमें पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोये रखने का महान कार्य करने वाली ज्येष्ठ पुत्री है हमारी राष्ट्रभाषा ʹहिन्दीʹ। देश की अन्य भाषाएँ उसकी सहयोगी बहने हैं, जो एकता में अनेकता व अनेकता में एकता का आदर्श प्रस्तुत करती हैं। प्राचीन काल में संस्कृत भाषा के विशाल साहित्य के माध्यम से जीवन-निर्माण की नींव रखी गयी थी। उसी से प्रेरित और उसी का युग-अनुरूप सुविकसित मधुर फल है राष्ट्रभाषा हिन्दी का साहित्य। आज भी इस विशाल साहित्य के माध्यम से नीतिमत्ता के निर्देश, ईश्वर के आदेश, ऋषियों के आदेश, ऋषियों के उपदेश और महापुरुषों के संदेश हमारे जीवन की बगिया को सुविकसित करते हुए महकता उपवन बना रहे हैं।

अंग्रेजी शासन से पूर्व हमारे देश में सभी कार्य हिन्दी में किये जाते थे। मैकाले की शिक्षा-पद्धति विद्यालयों में आयी और विद्यार्थियों को अंग्रेजी में पढ़ाया जाने लगा, उसी में भावों को अभिव्यक्त करने के लिए मजबूर किया जाने लगा। हिन्दी को केवल एक भाषा विषय की जंजीरों में बाँध दिया गया, जिसके दुष्परिणाम सामने हैं।

अंग्रेजी भाषा के दुष्परिणाम

गांधी जी कहते थेः “विदेशी भाषा के माध्यम ने बच्चों के दिमाग को शिथिल कर दिया है। उनके स्नायुओं पर अनावश्यक जोर डाला है, उन्हें रट्टू और नकलची बना दिया है तथा मौलिक कार्यों और विचारों के लिए सर्वथा अयोग्य बना दिया है। इसकी वजह से वे अपनी शिक्षा का सार अपने परिवार के लोगों तथा आम जनता तक पहुँचाने में असमर्थ हो गये हैं। यह वर्तमान शिक्षा प्रणाली का सबसे बड़ा करूण पहलू है। विदेशी माध्यम ने हमारी भाषाओँ की प्रगति और विकास को रोक दिया है। कोई भी देश नकलचियों की जाति पैदा करके राष्ट्र नहीं बन सकता।”

लौहपुरुष सरदार पटेल कहा कहते थेः “विदेशी भाषा के माध्यम द्वारा शिक्षा देने के तरीके से हमारे युवकों की बुद्धि के विकास में बड़ी कठिनाई पैदा होती है। उनका बहुत-सा समय उस भाषा को सीखने में ही चला जाता है और इतने समय के बावजूद यह कहना कठिन होता है कि उन्हें शब्दों का ठीक-ठाक अर्थ कितना आ गया।”

भ्रांतियों से सत्यता की ओर…..

मैकाले की शिक्षा पद्धति के गुलाम आज के व्यक्तियों द्वारा हमारी भोली-भाली युवा पीढ़ी को भ्रमित करने के लिए अंग्रेजी के पक्ष में कई तर्क दिये जाते हैं, जिनका सच्चाई से कोई संबंध नहीं होता। जैसे – वे कहते हैं कि ʹअंग्रेजी बहुत समृद्ध भाषा है।ʹ परंतु किसी भी भाषा की समृद्धि इस बात से तय होती है कि उसमें कितने मूल शब्द हैं। अंग्रेजी में सिर्फ 12000 मूल शब्द हैं। बाकी के सारे शब्द चोरी के हैं अर्थात् लैटिन, फ्रैंच, ग्रीक भाषाओं के हैं। इस भाषा की गरीबी तो इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाती है कि अंग्रेजी में चाचा, मामा, फूफा, ताऊ सबको ʹअंकलʹ और चाची, मामी, बुआ, ताई सबको ʹआँटीʹ कहते हैं। जबकि हिन्दी में 70000 मूल शब्द हैं। इस प्रकार भाषा के क्षेत्र में अंग्रेजी कंगाल है।

मैकाले की शिक्षा पद्धति के गुलाम कहते हैं कि ʹअंग्रेजी नहीं होगी तो विज्ञान व तकनीक की पढ़ाई नहीं हो सकतीʹ परंतु जापान एवं फ्रांस में विज्ञान व तकनीक की पढ़ाई बिना अंग्रेजी के बड़ी उच्चतर रीति से पढ़ायी जाती है। पूरे जापान में इंजीनियरिंग तथा चिकित्सा के जितने भी महाविद्यालय व विश्वविद्यालय हैं, सबमें जापानी भाषा में पढ़ाई होती है। जापान के लोग विदेश भी जाते हैं तो आपस में जापानी में ही बात करते हैं। जापान ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपनी भाषा में ही अध्ययन करके उन्नति की है, जिसका लोहा पूरा विश्व मानता है। इसी तरह फ्रांस में बचपन से लेकर उच्च शिक्षा तक पूरी शिक्षा फ्रेंच भाषा में दी जाती है।

इसके विपरीत हमारे देश में अंग्रेजी भाषा के प्रशिक्षण को राष्ट्रीय एवं राजकीय कोषों से आर्थिक सहायता द्वारा प्रोत्साहन दिया जा रहा है। संसद, न्यायपालिका आदि महत्त्वपूर्ण प्रणालियों में भी अंग्रेजी को प्रधानता मिल रही है। इससे केवल उच्च वर्ग ही इनका लाभ ले पा रहा है। ʹअंग्रेजी युवा पीढ़ी की माँग हैʹ – ऐसा बहाना बनाकर विज्ञापनों के माध्यम से भाषा की तोड़-मरोड़ करके अपनी ही राष्ट्रभाषा का घोर तिरस्कार किया जा रहा है। उसका सुंदर, विशुद्ध स्वरूप विकृत कर उसमें अंग्रेजी के शब्दों की मिलावट करके टीवी धारावाहिकों, चलचित्रों आदि के माध्यम से सबको सम्मोहित किया जा रहा है।

अंग्रेजी का दुष्परिणाम  इतना बढ़ गया है कि बच्चों के लिए अपनी माँ को ʹमाता श्रीʹ कहना तो दूर ʹमाँʹ कहना भी दूभर होता जा रहा है। जिस भाषा में वात्सल्यमयी माँ को ʹमम्मीʹ (मसाला लगाकर रखी हुई लाश) और जीवित पिता को ʹडैडीʹ (डेड यानी मुर्दा) कहना सिखाया जाता है, उसी भाषा को बढ़ावा देने के लिए हमारे संस्कार प्रधान देश की जनता के खून-पसीने की कमाई को खर्च किया जाना कहाँ तक उचित है ?

बुराई का तुरन्त इलाज होना चाहिए

गांधी जी कहते थेः “अंग्रेजी सीखने के लिए हमारा जो विचारहीन मोह है, उससे खुद मुक्त होकर और समाज को मुक्त करके हम भारतीय जनता की एक बड़ी-से-बड़ी सेवा कर सकते हैं। अगर मेरे हाथों में तानाशाही सत्ता हो तो मैं आज से ही विदेशी माध्यम के जरिये दी जाने वाली शिक्षा बंद कर दूँ और सारे शिक्षकों व प्राध्यापकों से यह माध्यम तुरंत बदलवा दूँ या उन्हें बरखास्त करा दूँ। मैं पाठ्यपुस्तकों की तैयारी का इंतजार नहीं करूँगा। वे तो माध्यम के परिवर्तन के पीछे-पीछे अपने-आप चली आयेंगी। यह एक ऐसी बुराई है, जिसका तुरंत इलाज होना चाहिए।”

मातृभाषा हो शिक्षा का माध्यम

बच्चा जिस परिवेश में पलता है, जिस भाषा को सुनता है, जिसमें बोलना सीखता है उसके उसका घनिष्ठ संबंध व अपनत्व हो जाता है। और यदि वही भाषा उसकी शिक्षा का माध्यम बनती है तो वह विद्यालय में आत्मीयता का अनुभव करने लगता है। उसे किसी भी विषय को समझने के लिए अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती। दूसरी भाषा को सीखने-समझने में लगने वाला समय उसका बच जाता है। इस विषय़ में गांधी जी कहते हैं- “राष्ट्रीयता टिकाये रखने के लिए किसी भी देश के बच्चों को नीची या ऊँची – सारी शिक्षा उनकी मातृभाषा के जरिये ही मिलनी चाहिए। यह स्वयं सिद्ध बात है कि जब तक किसी देश के नौजवान ऐसी भाषा में शिक्षा पाकर उसे पचा न लें जिसे प्रजा समझ सके, तब तक वे अपने देश की जनता के साथ न तो जीता-जागता संबंध पैदा कर सकते हैं और न उसे कायम रख सकते हैं।

हमारी पहली और बड़ी-से-बड़ी समाजसेवा यह होगी की हम अपनी प्रांतीय भाषाओं का उपयोग शुरु करें और हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में उसका स्वाभाविक स्थान दें। प्रांतीय कामकाज प्रांतीय भाषाओं में करें और राष्टीय कामकाज हिन्दी में करें। जब तक हमारे विद्यालय और महाविद्यालय प्रांतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षण देना शुरु नहीं करते, तब तक हमें इस दिशा में लगातार कोशिश करनी चाहिए।”

तो आइये, हम सब भी गांधी जी की चाह में अपना सहयोग प्रदान करें। हे देशप्रेमियो ! अपनी मातृभाषा एवं राष्ट्रभाषा का विशुद्ध रूप से प्रयोग करें और करने के लिए दूसरों को प्रोत्साहित करें। हे आज के स्वतंत्रता-संग्रामियो ! अब देश को अंग्रेजी की मानसिक गुलामी से भी मुक्त कीजिये। क्रान्तिवीरो ! पूरे देश में अपनी इन भाषाओं में ही शिक्षा और कामकाज की माँग बुलन्द कीजिये। आपके व्यक्तिगत एवं संगठित सुप्रयास शीघ्र ही रंग लायेंगे और सिद्ध कर देंगे कि हमें अपने देश से प्रेम है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2013, पृष्ठ संख्या 18,19,20 अंक 248

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प्रेम में माँग नहीं होती – पूज्य बापू जी


नृसिंह भगवान ने जब हिरण्यकशिपु को मारा तब वे बड़े कोप में थे। लक्ष्मी जी भी उन्हें शांत न कर सकीं, ऐसा उग्र रूप था। ब्रह्माजी ने प्रह्लाद से कहाः “बेटा ! अब तुम्हीं भगवान के पास जाकर उन्हें शांत करो।”

प्रह्लाद ने पास में जाकर भगवान की स्तुति की। प्रह्लाद को देखते ही भगवान वात्सल्यभाव से भर गये। माथा सूँघने लगे, स्नेह करने लगे। नृसिंह भगवान कहते हैं- “प्रह्लाद ! मैं तुम पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो।”

प्रह्लाद क्या बोलता हैः “प्रभु ! आपसे कुछ माँगने के लिए मैंने आपको नहीं चाहा था। आपसे कुछ माँगूँ तो माँगी हुई चीज बड़ी हो गयी, आप छोटे हो गये। उस चीज की महत्ता हो गयी।”

जो गुरु से कुछ माँगता ह तो गुरु से स्नेह नहीं करता, अपनी वासना को माँगता है। भगवान से माँगता है तो भगवान को स्नेह नहीं करता अपनी ख्वाहिश का गुलाम है।

प्रह्लाद बोलता हैः “प्रभु ! आपसे बढ़कर क्या है जो माँगूँ ? अगर फिर भी आप देना चाहते हो तो इतनी कृपा कर दीजिये कि मेरे हृदय में किसी कामना का बीज अंकुरित ही न हो।” भगवान ने प्रह्लाद को हृदय से लगा लिया।

इच्छा बहुत गंदी होती है। माँगे आदमी को तुच्छ बना देती हैं। गहरी नींद में कोई माँग नहीं रहती है तो कितनी शांति रहती है ! सुबह उठते हैं, जब तक माँग शुरु नहीं हुई तब तक बड़ी शांति रहती है। जितनी गहरी और ज्यादा माँग, उतना आदमी तुच्छ, धोखेबाज, कूड़-कपटी !

सभी माँगों को हटाने के लिए भगवान को पाने की माँग रख दो बस। जब सब माँगें हट जायेंगी तो भगवान की माँग भी हट जायेगी क्योंकि भगवान स्वतः बेपर्दा हो जायेंगे।

सूरदास अकेले कहीं जा रहे थे। रास्ते का ज्ञान नहीं था। भीतर कोई माँग नहीं थी। तेरी मर्जी पूरण हो…. तो श्री कृष्ण आये और सूरदास का हाथ पकड़ लिया।

बोलेः “चलो, मैं दिखाता हूँ रास्ता।”

कृष्ण ने हाथ पकड़ा तो सूरदास समझ गये। बाहर की आँखें तो नहीं थीं लेकिन समझ गये कि ये हाथ कोई साधारण हाथ नहीं हैं। जो सबमें रम रहा है, सबको आकर्षित करता है, कभी कृष्ण बनता है, कभी राम बनता है, कभी अंतरात्मा हो के प्रेरणा देता है, वही है।

सूरदास का हाथ कृष्ण ने पकड़ा था और वे अपना हाथ छुड़ाकर कृष्ण को पकड़ने जा रहे थे। भगवान बोलेः “तुम मेरे को क्यों पकड़ते हो, मैं तुमको पकड़ता हूँ।” कृष्ण अपने मायाबल से छूट गये।

सूरदास ने चुनौती दे दी कि “मुझे दुर्बल जानकर अपना हाथ छुड़ाकर जाते हो लेकिन सबल तो आपको तब मानूँगा जब मेरे हृदय में से निकलकर जा सको।” माँग नहीं है तो भगवान को चुनौती दे दी।

जो किसी के भरोसे सुखी होना चाहता है वह इच्छाओं का गुलाम है और जो केवल ईश्वर के भरोसे रहना चाहता है, रामरस में तृप्त रहना चाहता है वह आशाओं का स्वामी है। आशाओं का जो स्वामी हो जाता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2013, पृष्ठ संख्या 11 अंक 248

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परिप्रश्नेन


प्रश्नः हमें बार-बार भगवान की महिमा सुनने को मिलती है, बार-बार सत्संग सुनते हैं फिर भी ईश्वरप्राप्ति का लक्ष्य अभी निर्धारित नहीं हो पाया, निश्चय नहीं कर पाया, इसका क्या कारण है ?

पूज्य बापू जीः ʹईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाया तो अंत में रोना ही पड़ेगा।ʹमन को समझाया करो। ʹईश्वर की ओर पुस्तकʹ पढ़ा करो। ʹश्री योग वाशिष्ठ महारामायणʹ पढ़ने को मिल जाये तो अपने-आप लक्ष्य निर्धारित हो जायेगा। लक्ष्य निर्धारित किये बिना उन्नति का रास्ता नहीं खुलता। कभी-कभी श्मशान में जाओ और अपने मन को बताओ कि ʹआखिर यहीं आना है।ʹ मैं ऐसे ही करता था। मेरे पिता जी का शरीर छूट गया था न, मैं लगभग दस साल का था। कंधा देकर श्मशान में ले गया, फिर अपने मन को समझाया कि ʹइतने बड़े होकर, बूढ़े हो के मरेंगे तो ऐसे…. और अभी मर जायें तो ?” उसने बच्चों का श्मशान दिखाया कि यहाँ दफना देते हैं उनको। तो फिर जो बच्चों का श्मशान था, उधर जाकर बैठता था। अपने मन को बोलता था, ʹअभी मरेगा तो इधर, बाद में मरेगा तो जहाँ पिता जी जलाये गये….ʹ – आखिर यह है संसार !

तो संसार की नश्वरता और आत्मा की अमरता को याद करके अपना ईश्वरप्राप्ति का लक्ष्य बना लेना चाहिए, मजबूत कर लेना चाहिए। संतों का जीवन-चरित्र पढ़ने को मिले, श्मशान में जाने को मिले तो अच्छा है। माइयाँ तो नहीं जायें, अपशकुन होता है। आप ईश्वर की ओर पुस्तक पढ़ो तो उसमें श्मशान यात्रा का वर्णन है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2013, पृष्ठ संख्या 12, अंक 248

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