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अपना जन्म-कर्म दिव्य बनाओ – पूज्य बापू जी


(विश्ववंदनीय पूज्य संत श्री आशारामजी बापू का 74वाँ अवतरण दिवसः 1मई)

भगवान व भगवान को पाये हुए संत करूणा से अवतरित होते हैं इसलिए उनका जन्म दिव्य होता है। सामान्य आदमी स्वार्थ से कर्म करता है और भगवान व संत लोगों के मंगल की, हित की भावना से कर्म करते हैं। वे कर्म करने की ऐसी कला सिखाते हैं कि कर्म करने का राम मिट जाय, भगवदरस आ जाय, मुक्ति मिल जाय। अपने कर्म और जन्म को दिव्य बनाने के लिए ही भगवान व महापुरुषों का जन्मदिवस मनाया जाता है।

वासना मिटने से, निर्वासनिक होने से जन्म-मरण से मुक्ति हो जाती है। फिर वासना से प्रेरित होकर नहीं, करूणा से भरकर कर्म होते हैं। वह जन्म-कर्म की दिव्यतावाला हो जाता है, साधक सिद्ध हो जाता है। भगवान कहते हैं-

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोर्जुन।।

ʹहे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं- इस प्रकार जो मनुष्य तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता किंतु मुझे ही प्राप्त होता है।ʹ (गीताः 4.9)

तुम अज हो, तुम्हारा जन्म नहीं होता, शरीर का जन्म होता है। अपने को अजरूप, नित्य शाश्वत ऐसा जो जानता है, उसके जन्म और कर्म दिव्य हो जाते हैं।

जन्म मरण व कर्मबंधन कैसे होता है ?

पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि – 17 तत्त्वों का यह सूक्ष्म शरीर, उसमें जो चैतन्य आया और उस सूक्ष्म शरीर ने स्थूल शरीर धारण किया तो जन्म हो गया और स्थूल शरीर से विदा हो गया तो मृत्यु हो गयी। स्थूल शरीर धारण करता है तो कर्मबंधन होते हैं वासना से। लेकिन जो भगवान के जन्म व कर्म को दिव्य जानेगा वह भगवान को पा लेगा।

अपने जन्म-कर्म दिव्य कैसे बनायें ?

साधारण मनुष्य अपने को शरीर मानता है और कर्म करके उसके फल से सुखी होना चाहता है लेकिन भगवान अपने को शरीर नहीं मानते, शरीरी मानते हैं। शरीरी अर्थात् शरीरवाला। जैसे गाड़ी और गाड़ी का चालक अलग हैं, ऐसे ही शरीर और शरीरी अलग हैं। तो वास्तव में हम शरीरी हैं। शरीर हमारा बदलता है, हम शरीरी अबदल हैं। हमारा मन बदलता है, सूक्ष्म शरीर बदलता है। जो बदलाहट को जानता है, वह बदलाहट से अलग है। इस प्रकार जो सत्संग, गुरुमंत्र, ईश्वर के ध्यान-चिंतन के द्वारा भगवान के जन्म और कर्म को दिव्य रूप में समझ लेता है, उसकी भ्रांति दूर होकर वह जान जाता है कि ʹजन्म-मृत्यु मेरा धर्म नहीं है।ʹ

स्नानगृह में स्नान करके आप स्वच्छ नहीं होते हैं, शरीर होता है। भगवन्नाम सहित ध्यान, ध्यानसहित भगवत्प्रेम आपको स्वच्छ बना देगा। आपका अंतःकरण वासना-विनिर्मुक्त हो जायेगा। आपके कर्म दिव्य हो जायेंगे और आपका जन्म दिव्य हो जायेगा।

ૐकार मंत्र् उच्चारण करें और ૐकार या भगवान या गुरु के श्रीचित्र को अथवा आकाश या किसी पेड़-पौधे को एकटक देखते जायें। इससे आपके संकल्प-विकल्पों की भीड़ कम होगी। मन शांत होने से बुद्धि में विश्रांति मिलेगी और ૐकार भगवान का नाम है तो भगवान में प्रीति होने से भगवान बुद्धि में योग दे देंगे।

बुद्धियोग किसको बोलते हैं ? कि जिससे सुख-दुःख में बहने से बच जाओगे। संसारी सुख में जो बहते हैं, वे वासनाओं में गिरते जाते हैं। उनका जन्म-कर्म तुच्छ हो जाता है। दुःख में जो बहते हैं, वे दुःखों में गिरते जाते हैं। आप न सुख में बहोगे, न दुःख में बहोगे। सुख-दुःख आपके आगे से बह-बह के चले जायेंगे। सुख बह रहे हों तो उनको बहुतों के हित में लगा दो और दुःख बह रहे हों तो उनको बहुतों के हित में लगा दो और दुःख बह रहे हों तो उनको विवेक-वैराग्य को पुष्ट करने में लगा दो। दुःख को दुःखहारी हरि की तरफ मोड़ दिया जाय तो वह सदा के लिए भाग जाता है और सुख को ʹबहुजनहितायʹ की दिशा दे दी जाती है तो वह परमानंद के रूप में बदल जाता है। इस प्रकार आप सुख-दुःख के साथ नहीं बहोगे तो आपका जन्म और कर्म दिव्य हो जायेगा।

जब व्यक्ति अपनी देह में सीमित होता है तो बहुत क्षुद्र होता है। जब परिवार में सीमित होता है तब उसकी क्षुद्रता कुछ कम होकर व्यापकता थोड़ी बढ़ती है लेकिन जो विश्वव्यापी मानवता का, प्राणिमात्र का मंगल चाहता है, उसका जन्म और कर्म दिव्य हो जाता है। गांधी जी के पास क्या था ? नन्हीं सी लकड़ी व छोटी सी धोती लेकिन बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय लग गये तो महात्मा गाँधी हो गये। संत कबीर जी, समर्थ रामदास और भगवत्पाद साँईं लीलाशाहजी के पास क्या था ? ʹबहुजनहिताय-बहुजनसुखायʹ लग गये तो लाखों-करोड़ों के पूजनीय हो गये। सिकंदर और रावण के पास कितना सारा था लेकिन जन्म-कर्म तुच्छ हो गये।

दिव्य जीवन उसी का होता है जो अपने को आत्मा मानता है, ʹशरीर की बीमारी नहीं है। मन का दुःख मेरा दुःख नहीं है। चित्त की चिंता मेरी चिंता नहीं है। मैं उनको जानने वाला हूँ, मैं चैतन्य ૐस्वरूप हूँ।ʹ

भगवान बोलते हैं- जन्म कर्म च मे दिव्यं…. ʹमेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं।ʹ वासना से जो जन्म लेते हैं, उनका जन्म तुच्छ है। वासना से जो कर्म करते हैं, उनके कर्म तुच्छ हैं। लेकिन निर्वासनिक नारायणस्वरूप को जो ʹमैंʹ मानते हैं और लोक-मांगल्य के लिए जो लोगों को भगवान के रास्ते लगाते हैं, उनका जन्म और कर्म दिव्य हो जाता है।

सदगुरु की कृपा नहीं है, ʹगीताʹ का ज्ञान नहीं है तो सोने की लंका मिलने पर भी रावण का जन्म-कर्म तुच्छ रह जाता है। हर बारह महीने बाद दे दियासिलाई लेकिन शबरी भीलन को मतंग ऋषि मिलते हैं तो उसका जन्म-कर्म ऐसा दिव्य हो जाता है कि रामजी उसके जूठे बेर खाते हैं।

मंगल संदेश

मैं चाहूँगा कि आप सभी का जन्म और कर्म दिव्य हो जाय। जब मेरा हो सकता है तो आपका क्यों नहीं हो सकता ? अपने कर्मों को देह व परिवार की सीमा में फँसाओ मत बल्कि ईश्वरप्रीति के लिए बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय लगाकर कर्म को कर्मयोग बनाओ। शरीर को ʹमैंʹ, मन को ʹमेराʹ तथा परिस्थितियों को सच्ची मानकर अपने को परेशानियों में झोंको मत। ʹशरीर बदलता है, मन बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, उनको मैं जान रहा हूँ। मैं हूँ अपना-आप, सब परिस्थितियों का बाप ! परिस्थितियाँ आती हैं – जाती हैं, मैं नित्य हूँ। दुःख-सुख आते जाते हैं, मैं नित्य हूँ। जो नित्य तत्त्व है, वह शाश्वत है और जो अनित्य है, वह प्रकृति का है।ʹ

तो देशवासियों को, विश्ववासियों को यह मंगल संदेश है कि तुम अपने जन्म-कर्म को दिव्य बनाओ। अपने को आत्मा मानो और जानो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2013, पृष्ठ संख्या 9,10 अंक 244

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अक्षय फलदायी अक्षय तृतीया


वैशाख शुक्ल तृतिया की महिमा मत्स्य, स्कंद, भविष्य, नारद पुराणों व महाभारत आदि ग्रंथों में है। इस दिन किये गये पुण्यकर्म अक्षय (जिसका क्षय न हो) व अनंत फलदायी होते हैं, अतः इसे ʹअक्षय तृतीयाʹ कहते हैं। यह सर्व सौभाग्यप्रद है।

यह युगादि तिथि यानी सतयुग व त्रेता युग की प्रारम्भ तिथि है। श्रीविष्णु का नर-नारायण, हयग्रीव और परशुरामजी के रूप में अवतरण व महाभारत युद्ध का अंत इसी तिथि को हुआ था।

इस दिन बिना कोई शुभ मुहूर्त देखे कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ या सम्पन्न किया जा सकता है। जैसे – विवाह, गृह-प्रवेश या वस्त्र-आभूषण, घर, वाहन, भूखंड आदि की खरीददारी, कृषिकार्य का प्रारम्भ आदि सुख-समृद्धि प्रदायक है।

प्रातःस्नान, पूजन, हवन का महत्त्व

इस दिन गंगा-स्नान करने से सारे तीर्थ करने का फल मिलता है। गंगाजी का सुमिरन  एंव जल में आवाहन करके ब्राह्ममुहूर्त में पुण्यस्नान तो सभी कर सकते हैं। स्नान के पश्चात प्रार्थना करें-

माधवे मेषगे भानौ मुरारे मधुसूदन।

प्रातः स्नानेन मे नाथ फलदः पापहा भव।।

ʹहे मुरारे ! हे मधुसूदन ! वैशाख मास में मेष के सूर्य में हे नाथ ! इस प्रातः स्नान से मुझे फल देने वाले हो जाओ और पापों का नाश करो।ʹ

सप्तधान्य उबटन व गोझरण मिश्रित जल से स्नान पुण्यदायी है। पुष्प, धूप-दीप, चंदन, अक्षत (साबुत चावल) आदि से लक्ष्मी नारायण का पूजन व अक्षत से हवन अक्षय फलदायी है।

जप उपवास व दान का महत्त्व

इस दिन किया गया उपवास, जप, ध्यान, स्वाध्याय भी अक्षय फलदायी होता है। एक बार हलका भोजन करके भी उपवास कर सकते हैं। ʹभविष्य पुराणʹ में आता है कि इस दिन दिया गया दान अक्षय हो जाता है। इस दिन पानी के घड़े, पंखे, ओले (खाँड के लड्डू), पादत्राण (जूते-चप्पल), छाता, जौ, गेहूँ, चावल, गौ,  वस्त्र आदि का दान पुण्यदायी है। परंतु दान सुपात्र को ही देना चाहिए। पूज्य बापू जी के शिष्य पूज्यश्री के अवतरण दिवस से समाज सेवा के अभायानों में नये वर्ष का नया संकल्प लेते हैं। अक्षय तृतीया के दिन तक ये अभिय़ान बहार में आ जाते हैं, जिससे उन्हें अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

पितृ-तर्पण का महत्त्व व विधि

इस दिन पितृ तर्पण करना अक्षय फलदायी है। पितरों के तृप्त होने पर घर में सुख-शांति-समृद्धि व दिव्य संतानें आती हैं।

विधिः इस दिन तिल एवं अक्षत में श्रीविष्णु एवं ब्रह्माजी को तत्त्वरूप से पधारने की प्रार्थना करें। फिर पूर्वजों का मानसिक आवाहन करने की भावना करते हुए धीरे से सामग्री किसी पात्र में छोड़ दें तथा भगवान दत्तात्रेय, ब्रह्माजी व विष्णु जी से पूर्वजों की सदगति हेतु प्रार्थना करें।

आशीर्वाद पाने का दिन

इस दिन माता-पिता, गुरुजनों की सेवा कर उनकी विशेष प्रसन्नता, संतुष्टि व आशीर्वाद प्राप्त करें। इसका फल भी अक्षय होता है।

अक्षय तृतीया का तात्त्विक संदेश

ʹअक्षयʹ यानी जिसका कभी नाश न हो। शरीर एवं संसार की समस्त वस्तुएँ नाशवान हैं, अविनाशी तो केवल परमात्मा ही है। यह दिन हमें आत्मविवेचन की प्रेरणा देता है। अक्षय आत्मतत्त्व पर दृष्टि रखने का दृष्टिकोण देता है। महापुरुषों व धर्म के प्रति हमारी श्रद्धा और परमात्मप्राप्ति का हमारा संकल्प अटूट व अक्षय हो – यही अक्षय तृतीया का संदेश मान सकते हो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2013, पृष्ठ संख्या 23, अंक 244

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तीर्थ में पालने योग्य 12 नियम – पूज्य बापू जी


अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च।

लक्षं प्रदक्षिणा भूमेः कुम्भस्नानेतत्फलम्।।

ʹहजारों अश्वमेध यज्ञ, सैंकड़ों वाजपेय यज्ञ और लाखों बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो फल होता है, वही फल एक बार कुम्भ स्नान करने से प्राप्त हो जाता है।ʹ

तीर्थ में 12 नियम अगर कोई पालता है तो उसे तीर्थ का पूरा फायदा होता हैः

हाथों का संयमः गंगा में गोता भी मारा और अनधिकार किसी की वस्तु ले ली या ऐसी-वैसी कोई चीज उठाकर मुँह में डाल ली तो पुण्य प्राप्ति का आनंद नहीं होगा।

पैरों का संयमः कहीं भी चले गये मौज-मजा मारने के लिए…. नहीं, अनिचत जगह पर न जायें।

मन को दूषित विचारों व चिंतन करने से बचाकर भगवच्चिंतन करना।

सत्संग व वेदांत शास्त्र का आश्रय लेनाः ऐसा नहीं कि शरीर में बुखार है और दे मारा गोता। पुण्यलाभ करें और फिर हो गया बुखार या न्यूमोनिया और आदमी मर गया, ऐसा नहीं करना चाहिए। देश काल और शरीर की अवस्था देखनी चाहिए।

तपस्या।

भगवान की कीर्ति, भगवान के गुणों का गान कुम्भ-स्थान पर करना चाहिए।

परिग्रह का त्यागः कोई कुछ चीज दे तो तीर्थ में दान नहीं लेना चाहिए। तीर्थ में दूसरों की सुविधाओं का उपयोग करके अपने ऊपर बोझा न चढ़ायें। दान का खाना, अशुद्ध खाना, प्रसाद में धोखेबाजी करके बार-बार लेना…. अशुद्ध व्यवहार पुण्य क्षीण और हृदय को मलिन करता है। एक तरफ पुण्य कमा रहे हैं, दूसरी तरफ बोझा चढ़ा रहे हैं। यह न करें।

जैसी भी परिस्थिति हो, आत्मसंतोष होना चाहिए। हाय रे ! धक्का-धक्की है, बस नहीं मिली…. ऐसा करके चित्त नहीं बिगाड़ना। ʹहरे-हरे ! वाह ! यार की मौज ! तेरी मर्जी पूरण हो ! – इस प्रकार अपने चित्त को संतुष्ट रखें।

किसी प्रकार के अहंकार को न पोसें- ʹमैं तो तीन बजे उठा था, तो मैं इतने मील पैदल गया और मैंने तो 10 डुबकियाँ लगायीं…ʹ ऐसा अहंकार पुण्य को क्षीण कर देता है। भगवान की कृपा है जो पुण्यकर्म हुआ, उसको छुपाकर रखो।

यह करूँगा, यह भोगूँगा, इधर जाऊँगा, उधर जाऊँगा…ʹ इसका चिंतन न करें। ʹमैं कौन हूँ ? जन्म के पहले मैं कौन था, अभी कौन हूँ और बाद में कौन रहूँगा ? तो मैं वही चैतन्य आत्मा हूँ। मैं जन्म के पहले था, अभी हूँ और बाद में भी रहूँगा।ʹ – इस प्रकार अपने स्वभाव में आने का प्रयत्न करें।

दम्भ, दिखावा न करें।

इन्द्रिय लोलुपता नहीं। कुछ भी खा लिया कि मजा आता है, कहीं भी चले गये… तो मौज-मजा मारने के लिए कुम्भ-स्नान नहीं है। सच्चाई, सत्कर्म और प्रभु स्नेह से तपस्या करके अंतरात्मा का माधुर्य जगाने के लिए और हृदय को प्रसन्नता दिलाने के लिए तथा सत्संग के रहस्य का प्रसाद पाने के लिए कुम्भ-स्नान है।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2013, पृष्ठ संख्या 26, अंक 242

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