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महाशिवरात्रि


लुप्त पुण्य भी होते हैं जागृत – पूज्य बापू जी

शिवरात्रि का जागरण अपने-आप में बड़ा महत्त्वपूर्ण है। जैसे एकादशी का व्रत नहीं करने से पाप लगता है, ऐसे ही शिवरात्रि का व्रत नहीं करने से पाप लगता है और करने से बड़ा भारी पुण्य होता है, ऐसा शास्त्र कहते हैं। भगवान राम, भगवान, कृष्ण, भगवान वामन, भगवान नरसिंह – इनकी जयंतियाँ और एकादशी व शिवरात्रि – ये सभी व्रत विशेष करने योग्य हैं। इनको करने से आदमी पूर्णता की तरफ बढ़ता है और इन व्रतों को ठुकराने वाला आदमी ठुकराया जाता है, चौरासी लाख योनियों में भटकाया जाता है।

इस पुण्यदायी शिवरात्रि का पूरा फायदा उठायें। शिवरात्रि का व्रत न करने से पाप लगता है लेकिन करने से ऐसी बुद्धि होती है जैसी सतयुग, त्रेता और द्वापर के लोगों की बुद्धि होती थी और वही पुण्यलाभ प्राप्त होता है जो उस काल में मिलता था क्योंकि काल के प्रभाव से जो पुण्य लुप्त हो गये हैं, वे शिवरात्रि के दिन पूर्णतः विद्यमान होते हैं। ब्रह्माजी और वसिष्ठजी ने शिवरात्रि के व्रत की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। सौ यज्ञों से भी अधिक पुण्य पंचाक्षर मंत्र से पूजन करने से होता है। और उससे भी अधिक पुण्यलाभ अंतरात्मा शिव का एकांत में चिंतन करने व ध्यानमग्न होने से होता है। यह जीव को ऐसी ऊँची दशा देता है कि जो कभी न मरे उस अकाल आत्मा में उसकी स्थिति हो जाती है।

शिवरात्रि व्रत-जागरण का अनुभव

शिवरात्रि के उपवास, मौन, शिवजी के मानसिक पूजन व ध्यान से तो मुझे बहुत फायदा हुआ, बहुत फायदा ! मैं हजार वर्ष अलग से तपस्या करूँ तो शायद इतना फायदा नहीं होता, जितना शिवरात्रि के एकांत, मौन प्रीतिपूर्वक ध्यान-धारणा से मुझे लाभ हुआ। उसके बाद ही मैंने साधुताई के रास्ते छलाँग मारी। नहीं तो ʹघर छोड़ के जायेंगे… क्या होगा, क्या होगा ?ʹ सोचते-सोचते थोड़ा चलते, फिर पीछे आता मन, फिर कभी चले जाते, फिर घरवाले पकड़ के ले आते। पर शिवरात्रि के एक जागरण से ऐसा शिवजी का प्रसाद मिला कि ऐ ! अलख बम-बम….!

शिवरात्रि का स्वास्थ्य लाभ

ʹबंʹ शिवजी का बीजमंत्र है। जिनको भी गठिया या वायुसंबंधी तकलीफ हो, वे शिवरात्रि पर ʹૐ बं बं….ʹ का सवा लाख जप करें। वायु संबंधी 80 प्रकार की तकलीफों से छुट्टी मिल जायेगी। इसका जप करने वाले ऐसे कई लोगों को मैंने चलते-फिरते अपनी इन्हीं आँखों से देखा, जिनको बिस्तर से उठना, बैठना, चलना मुश्किल था। जिनको वायु संबंधी तकलीफ हो, वे एक लीटर पानी में एक काली मिर्च और तीन बेल-पत्ते मसल के डालकर उसे पौना लीटर होने तक उबालें। वह पानी पीने लायक ठंडा हो जाये तो दिन में वही पियें। इससे भी वायु संबंधी तकलीफें कम हो जायेंगी।

शिवरात्रि का मधुमय संदेश

शिवरात्रि की एक रात पहले संकल्प करना कि ʹकल मैं ૐ नमः शिवायʹ का जप करूँगा, शांत होऊँगा।ʹ तीन बिल्वपत्र अगर मिल सकें तो शिवजी को चढ़ा दिये, उसी से शिवजी संतुष्ट हो जाते हैं। शिव की मूर्तिपूजा के लिए ʹૐ नमः शिवाय ʹ व शिवजी के लिंग या आत्मलिंग की पूजा के लिए ʹૐʹ मंत्र का प्रयोग किया जाता है।

बाह्य वासना मिटते-मिटते अंदर की शांति, माधुर्य, सुख, जो सारों का सार है उसमें विश्रांति पाने का पक्का इरादा करना। ૐ….ૐ….ૐ…. शिवरात्रि का फायदा लेना उपवास करके। एकांत में ૐकार का गुंजन करोगे तो अल्लाह कहो, गॉड कहो, शिव कहो, उसका बहुत कुछ आपको ऐसा मिलेगा कि फिर वहाँ शब्द नहीं हैं। दुनिया का लाभ वास्तव में लाभ है ही नहीं, दो कौड़ी का भी नहीं है। कर-करके छोड़ के मरो, फिर जन्मो-मरो…. हानि है, समय बर्बाद करता है। सच्चा लाभ तो आत्मशिव की प्राप्ति हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2013, पृष्ठ संख्या 2,6 अंक 242

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खानपान का विशेष ध्यान – वसंत ऋतु का है संदेश


वसंत ऋतुः 18 फरवरी 2013 से 18 अप्रैल 2013)

ऋतुराज वसंत शीत व उष्णता का संधिकाल है। इसमें शीत ऋतु का संचित कफफ सूर्य की संतप्त किरणों से पिघलने लगता है, जिससे जठराग्नि मंद हो जाती है और सर्दी खाँसी, उलटी दस्त आदि अनेक रोग उत्पन्न होने लगते हैं। अतः इस समय आहार विहार की विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

आहारः इस ऋतु में देर से पचने वाले शीतल पदार्थ, दिन में सोना, स्निग्ध अर्थात् घी-तेल में बने तथा अम्ल व मधुर रसप्रधान पदार्थों का सेवन न करें क्योंकि ये सभी कफवर्धक हैं। (अष्टांगहृदयः 3.26)

वसंत में मिठाई, सूखा मेवा, खट्टे मीठे फल, दही, आइसक्रीम तथा गरिष्ठ भोजन का सेवन वर्जित है। इन दिनों में शीघ्र पचने वाले, अल्प तेल व घी में बने, तीखे, कड़वे, कसैले, उष्ण पदार्थों जैसे – लाई, मुरमुरे, जौ, भुने हुए चने, पुराना गेहूँ, चना, मूँग, अदरक, सौंठ, अजवायन, हल्दी, पीपरामूल, काली मिर्च, हींग, सूरन, सहजन की फली, करेला, मेथी, ताजी मूली, तिल का तेल, शहद, गोमूत्र आदि कफनाशक पदार्थों का सेवन करें। भरपेट भोजन न करें। नमक का कम उपयोग तथा 15 दिनों में एक कड़क उपवास स्वास्थ्य के लिए हितकारी है। उपवास के नाम पर पेट में फलाहार ठूँसना बुद्धिमानी नहीं है।

विहारः ऋतु-परिवर्तन से शरीर में उत्पन्न भारीपन तथा आलस्य को दूर करने के लिए सूर्योदय से पूर्व उठना, व्यायाम, दौड़, तेज चलना, आसन तथा प्राणायाम (विशेषकर सूर्यभेदी) लाभदायी हैं। तिल के तेल से मालिश कर सप्तधान्य उबटन से स्नान करना स्वास्थ्य की कुंजी है।

वसंत ऋतु के विशेष प्रयोग

2 से 3 ग्राम हरड़ चूर्ण में समभाग शहद मिलाकर सुबह खाली पेट लेने से ʹरसायनʹ के लाभ प्राप्त होते हैं।

15-20 नीम के पत्ते तथा 2-3 काली मिर्च 15-20 दिन चबाकर खाने से वर्षभर चर्मरोग, ज्वर, रक्तविकार आदि रोगों से रक्षा होती है।

अदरक के छोटे-छोटे टुकड़े कर उसमें नींबू का रस और थोड़ा नमक मिला के सेवन करने से मंदाग्नि दूर होती है।

5 ग्राम रात को भिगोयी हुई मेथी सुबह चबाकर पानी पीने से पेट की गैस दूर होती है।

रीठे का छिलका पानी में पीसकर 2-2 बूँद नाक में टपकाने से आधासीसी का दर्द दूर होता है।

10 ग्राम घी में 15 ग्राम गुड़ मिलाकर लेने से सूखी खाँसी में राहत मिलती है।

10 ग्राम शहद, 2 ग्राम सौंठ व 1 ग्राम काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर सुबह शाम चाटने से बलगमी खाँसी दूर होती है।

सावधानीः मुँह में कफ आने पर उसे तुरंत बाहर निकाल दें। कफ की तकलीफ में अंग्रेजी दवाइयाँ लेने से कफ सूख जाता है, जो भविष्य में टी.बी., दमा, कैंसर जैसे गम्भीर रोग उत्पन्न कर सकता है। अतः कफ बढ़ने पर गजकरणी, जलनेति का प्रयोग करें (विस्तृत जानकारी के लिए आश्रम से प्रकाशित पुस्तक ʹयोगासनʹ पढ़ें।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2013, पृष्ठ संख्या 31, अंक 242

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हमारे महात्माओं की बातों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है


श्री अशोक सिंहल, मुख्य संरक्षक व पूर्व अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष, विश्व हिन्दू परिषद

इस भारतीय संस्कृति को मिटाने का बड़ा सुनियोजित षड्यंत्र चलाया जा रहा है। पूरे भारत देश में अमेरिका के एन.जी.ओस. (नॉन गवर्नमेंटल ऑर्गेनाइजेशन) काम करते हैं। अमेरिका की सभ्यता भारत में कैसे थोपी जाये इसके अनेक प्रयत्न किये जा रहे हैं और हमारे बड़े-बड़े महात्माओं एवं संगठनों के प्रमुखों को बदनाम करने के लिए उनकी बातों को तोड़-मरोड़ कर एवं गलत ढंग से पेश किया जा रहा है, जिससे उनके प्रति हमारी श्रद्धा समाप्त होने लग जाय।

मेरे मन को बड़ा कष्ट इसलिए होता है कि जो सबसे बड़े हैं – बापू, जिनका नाम पूरे देश में सबसे ऊपर दिखाई पड़ता है, उनके लिए षड्यंत्र चल रहा है कि ʹअब बापू को बदनाम करो, उनके प्रति लोगों की श्रद्धा समाप्त करो।ʹ तो क्या वे बापू जी के प्रति हमारी श्रद्धा नष्ट कर सकते हैं ? कदापि नहीं। श्रद्धा तो बढ़ती चली जा रही है, कौन रोक सकता है ?

अमेरिका और यूरोप की कम्पनियों का बड़ा भारी पैसा इस देश के भीतर संगठन चलाने के लिए आता है और वे हमारे महात्माओं को बदनाम करने के लिए लगे हुए हैं। इस देश के भीतर पश्चिम की संस्कृति ने ऐसी जकड़न पैदा की है कि न तो हमारा राम-जन्मभूमि का मंदिर बन पा रहा है और इस देश में हर साल एक करोड़ गौ-हत्या होती रहती है, कोई रोक नहीं पा रहा है। गंगा को नष्ट करने का बड़ा भारी प्रयास चल रहा है।

बापूजी ! आप तो महाशक्ति हैं, भगवतशक्ति आपके साथ है। अतः आपके श्रीचरणों में यही निवेदन करना चाहता हूँ कि किसी प्रकार से हमारी संस्कृति फले-फूले। संस्कृति के आधार पर और धर्म की रक्षा करते हुए इस देश का विकास हो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2013, पृष्ठ संख्या 13, अंक 242

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