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श्वासकला का महत्व


(श्वास के बिना जीवन सम्भव ही नहीं है। श्वास पर नियंत्रण करके मनुष्य अपनी आयु बढ़ा सकते हैं। सोनीपत (हरियाणा) की शिविर में इसी विषय पर प्रकाश डालते हुए पूज्य श्री कहते हैं-)

इज़राईल देश की बात हैः

एक ईसाई महिला पादरी के पास गयी। उसने कहाः

पादरी जी ! मैं मुसीबत में पड़ गयी हूँ। मैं अभी-अभी अखबार पढ़कर आपके पास आयी हूँ। मेरे पति को ईनाम में पाँच लाख डॉलर मिलने वाले हैं। उसने अपनी जिंदगी में कभी दस डॉलर भी साथ नहीं देखे हैं। वह यदि पाँच लाख डॉलर का ईनाम सुनेगा तो मर जायेगा। आप कृपा करिये।

पादरीः तुम फिकर मत करो। मैं तुम्हारे घर चलता हूँ। तुम्हारे पति नौकरी से कब लौटते हैं ?

महिलाः शाम को करीब 5.30 बजे।

पादरीः ठीक है, मैं 5.00 बजे तुम्हारे घर पहुँच जाऊँगा।

पादरी समय से उस महिला के घर पहुँच गया। उस महिला का पति आया। कुशलक्षेम पूछने के उपरांत पादरी ने कहाः

तुम्हें बधाई देने के लिए आया हूँ। तुम्हारी लाटरी लगी है।

पतिः कितने की लाटरी लगी है ?

पादरीः दस हजार डॉलर की।

पतिः अच्छा, दस हजार डॉलर ?

पादरी ने सोचा कि अब धीरे-धीरे अंक बढ़ाता जाऊँ। पादरी ने पुनः कहाः

नहीं, एक लाख डॉलर।

पतिः क्या सचमुच ?

पादरीः हाँ, सचमुच एक लाख डॉलर की लगी है।

पतिः यदि एक लाख डॉलर की लाटरी लगी है तो इसमें से पचास हजार डॉलर मैं आपको दे दूँगा।

पादरी को हुआ कि यह आधे डॉलर दान करने की बात कर रहा है तो क्यों न इसे असली रकम ही बता दूँ ? पादरी ने कहाः

नहीं, नहीं, वास्तव में तुम्हारी पाँच लाख डॉलर की लाटरी लगी है।

पतिः पाँ….च….ला…ख….डॉ….ल…..र….! इतना कहते ही उसका हार्टफेल हो गया।

संसार के विषयों में जीते-जीते हमारा अंतःकरण इतना दुर्बल हो जाता है कि हम न थोड़ा-सा दुःख झेल सकते हैं, न थोड़ा-सा सुख झेल सकते हैं। हर्ष से हृदय फैल जाता है और शोक से सिकुड़ जाता है। हृदय इतना आंदोलित हो जाता है कि जितना मानव को जीना चाहिए, उतना जी नहीं पाता और जल्दी मर जाता है, इसी को बोलते हैं-हार्टफेल।

तुम्हार हृदय जितना आंदोलित होता है उतनी तुम्हारी आयुष्य कम होती है। खरगोश और कबूतर एक मिनट में 38 श्वास खर्च करते हैं, वे अधिक से अधिक 8 साल जी सकते हैं। बंदर एक मिनट में 32 श्वास खर्च करता है, वह 10 वर्ष तक जी सकता है। कुत्ता एक मिनट में 29 श्वास खर्च करता है, वह भी 14 वर्ष तक जी सकता है। घोड़ा एक मिनट में 19 श्वास खर्च करता है, वह करीब 50 साल तक जी सकता है।

मनुष्य एक मिनट में 15 श्वास खर्च करे तो वह 100 साल तक जी सकता है। अगर आधि-व्याधि के कारण अधिक श्वास खर्च करता है तो उतनी जल्दी मरता है।

हाथी एक मिनट में 12 श्वास खर्च करता है, वह करीब 110 साल तक जीता है। सर्प एक मिनट में 8 श्वास खर्च करता है, वह 120 साल तक जी सकता है। कछुआ एक मिनट में केवल 5 श्वास खर्च करता है, वह 150 साल तक जी सकता है।

कहने का तात्पर्य यह है कि हम जितने श्वास कम खर्च करते हैं उतनी आयुष्य लम्बी होती है। आयुष्य वर्ष पर निर्धीरित नहीं होती है, श्वास पर निर्धारित होती है। तुम जितने भोग में, चिंता में या हर्ष में ज्यादा जीते हो तो उतनी तुम्हारे श्वास की गति विषम होती है और जितना तुम समता में जीते हो उतनी श्वास की गति सम होती है।

जब तुम क्रोध में होते हो तब श्वास की रिदम (तालबद्धता) एक प्रकार की होती है। जब तुम प्रेम में होते हो तब श्वास की रिदम दूसरे प्रकार की होती है। जब तुम राम में होते हो तो श्वास की रिदम शांत होती है और जब काम में होते हो तो श्वास की रिदम कुछ दूसरे प्रकार की होती है।

यदि तुम को श्वासकला आ जाय, प्राणायाम की विधि आ जाय तो काम, क्रोध, लोभ आदि के समय जो रिदम चलती है उसे तुम बदल सकते हो। काम के समय तुम राम में जा सकते हो क्रोध के समय तुम शांत हो सकते हो, ऐसी कुंजियाँ ऋषियों ने दे रखी हैं। जरूरत है, केवल उस कला को जानने की।

हम जो श्वास लेते हैं वह अलग-अलग काम करने के कारण पाँच प्रकार में बँट जाती हैः प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान। इनका कार्य है आपके श्वासोच्छवास को सुव्यवस्थित करना और शरीर के अंगों को सुचारूरूप से चलाना।

प्राणवायु का स्थान अनहात केन्द्र है और उसका रंग पीला है। यह हृदय की धड़कनों को चलाने में सहायक होती है। अपानवायु का स्थान है मूलाधार केन्द्र और उसका रंग है नारंगी। यह शरीर का कचरा बाहर निकालने में सहायक होती है। बालक का जन्म भी अपानवायु के धक्के से होता है। उदानवायु का स्थान है विशुद्धाख्या केन्द्र और रंग है बैंगनी। उसमें आकर्षणशक्ति, अन्न जल आदि ग्रहण करने की शक्ति होती है। व्यानवायु का स्थान है स्वाधिष्ठान केन्द्र और उसका रंग है गुलाबी। यह शरीर में रक्त का संचार करता है और सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है। समानवायु का स्थान मणिपुर केन्द्र है और उसका रंग सफेद है। यह सप्तधातुओं को ठीक रखता है और उन्हें परिपक्व करता है। इसीलिए जो रोगी होता है उसे मैं बताता हूँ कि सूर्य की किरणों में ऐसे बैठें कि किरणें नाभि पर पड़ें फिर श्वास लेकर भावना करें कि मैं निरोग हो रहा हूँ….। उसके बाद हरि ૐ…हरि ૐ…. का उच्चारण करें ताकि यह केन्द्र विकसित हो और सात रसों को ठीक से पचाये। इससे रोग के कीटाणु नष्ट होने में मदद मिलती है, नये कीटाणु नहीं बनते हैं और रोग मिट जाता है। इससे चमत्कारिक फायदा होता है।

सूर्य में जो सात रंग हैं वे ही रंग तुम्हारे केन्द्रों में काम करते हैं। जब तुम गहरे श्वास लेते हो तब बाकी के श्वास भी ठीक से काम करने की ऊर्जा पा लेते हैं। इससे स्वास्थ्य भी ठीक रहता है और मन भी ठीक रहता है।

कमजोर लोग या बूढ़े लोग बीमार पड़ते हैं तब चतुर व्यक्ति पूछता हैः आज कौन सी तिथि है ? अगर अमावस या पूनम निकट होती है तो वह कहता हैः अगर अमावस या पूनम निकाल ले तो बूढ़ा जी लेगा। क्योंकि एकम्, दूज, तीज को तुम्हारी प्राणशक्ति सूर्य की किरणों से और वातावरण से विशेष ऊर्जा ले आती है। ज्यो-ज्यों तिथियाँ आगे बढ़ती हैं त्यों-त्यों तुम्हारी प्राणशक्ति कम होती जाती है। श्मशान के रजिस्टर से भी पता चलता है कि बड़ी उम्र वाले उन्हीं दिनों में अधिक मरते हैं।

जिनकी उम्र ज्यादा हो, जिन्हें ऊर्जा ज्यादा न मिलती हो, वे लोग प्रातः पानी प्रयोग के साथ में यह प्रयोग करें- एक लहसुन के तीन टुकड़े कर दें। एक टुकड़े को कुचलकर एक गिलास पानी में डालकर पी लें, दूसरे टुकड़े को दूसरे गिलास पानी में एवं तीसरे टुकड़े को तीसरे गलास पानी में डाल कर पी लें। इससे कई बीमारियाँ मिटती हैं और ऊर्जा बनती है, किंतु लहसुन में एक घाटा है कि इसके सेवन से स्वभाव में क्रोध बढ़ जाता है। इसलिए औषधिरूप में अत्यंत कम मात्रा में सेवन करें।

कई बार श्वास की रिदम बदलने से भी लाभ होता है। चतुर माताएँ जानती हैं कि बच्चा जब रोता है और खिलौने अथवा मीठी गोली से भी चुप नहीं होता है तब माँ उसे खुली हवा में ले आती है और थोड़ा उछालती है, कुदवाती है, इससे बच्चे का रोना तुरन्त बन्द हो जाता है। इसका कारण क्या है कि बच्चे की श्वास की रिदम बदल जाती है, उसका मनोभाव बदल जाता है और वह सुखी हो जाता है।

तुम्हारे जीवन में भी कभी दुःख या अशांति आ जाय तब किसी जलाशय के पास चले जाओ, हाथ पैर और मुँह धो लो तथा पंजे के बल से थोड़ा कूद लो। इससे तुम्हारे प्राणों की रिदम बदलेगी और अशांत विचारों में परिवर्तन आ जायेगा। निराशा-हताशा भाग जायेगी। मन प्रसन्न होने लगेगा। एवं शांति बढ़ने लगेगी।

प्राण अगर तालबद्ध चलने लग जायें तो सूक्ष्म बनेंगे। श्वास अगर तालबद्ध होगा तो दोष  अपने-आप दूर हो जायेंगे। अशांति अपने आप दूर होने लगेगी।

इन्द्रियों का स्वामी मन है और मन का स्वामी प्राण है। योगियों का कहना है कि अगर प्राण पर पूरा प्रभुत्व आ जाय तो तुम चन्द्र और सूर्य को गेंद की तरह अपनी इच्छा के अनुसार चला सकते हो, नक्षत्रों को अपनी जगह से हिला सकते हो ! पूर्वकाल में सती शांडिली ने सूर्य की गति को रोक दिया था।

प्राण सूक्ष्म होते हैं, प्राणायाम के अभ्यास से। जिसने अभ्यास करके प्राणों पर नियंत्रण पाकर मन को जीत लिया है, उसने समझो सब कुछ जीत लिया है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 8-10, अंक 108

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शीत ऋतु में आहार-विहार


मुख्य रूप से तीन ऋतुएं हैं- शीत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु और वर्षा ऋतु। आयुर्वेद के मतानुसार छः ऋतुएँ मानी गयी हैं- वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त और शिशिर। महर्षि सुश्रुत ने वर्ष के 12 मास इन ऋतुओं में विभक्त कर दिये हैं।

शीत ऋतु विसर्गकाल और आदानकाल की संधिवाली ऋतु होती है। विसर्गकाल दक्षिणायन में और आदानकाल उत्तरायण में होता है।

आयुर्वेद-शास्त्र के अनुसार दक्षिणायन में वर्षा, शरद और हेमन्त ऋतुएँ होती हैं, इसे विसर्गकाल बोलते हैं। इस काल में चन्द्र का बल अधिक और सूर्य का बल क्षीण रहता है। इससे प्राणियों का रस पुष्ट होने से बल बढ़ता है।

उत्तरायण में शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म ऋतुएँ होती हैं। इस काल में सूर्य का बल अधिक होता है। अतः सूर्य की किरणें क्रमशः प्रखर और बलवान होती जाती हैं और सबका जलीय अंश खींच लेती हैं। इसे आदानकाल कहा है।

इस प्रकार शीतकाल आदानकाल और विसर्गकाल दोनों का सन्धिकाल होने से इनके गुणों का लाभ लिया जा सकता है क्योंकि विसर्गकाल की पोषक शक्ति हेमन्त ऋतु में हमारा साथ देती है, साथ ही शिशिर ऋतु में हमारा साथ देती है, साथ ही शिशिर ऋतु में आदानकाल शुरु हो जाता है लेकिन सूर्य की किरणें एकदम से इतनी प्रखर भी नहीं होती कि रस सुखाकर हम शोषण कर सकें। अपितु आदानकाल का प्रारम्भ होने से सूर्य की हल्की और प्रारम्भिक किरणें सुहावनी लगती हैं।

वैसे तो उचित आहार लेना प्रत्येक ऋतु में जरूरी होता है पर शीत ऋतु में अनिवार्य हो जाता है क्योंकि शीतकाल में जठराग्नि बहुत प्रबल रहती है। अतः, समय पर उसकी पाचक क्षमता के अनुरूप उचित मात्रा में आहार मिलना ही चाहिए अन्यथा शरीर को हानि होगी।

क्षेम कुतूहल शास्त्र में आता हैः

आहारान् पचतिशिखि दोषानाहारवर्जितः।

दोषक्षये पचेद्धातून प्राणान्धातुक्षये तथा।।

अर्थात् पाचक अग्नि आहार को पचाती है। यदि उचित समय पर, उचित मात्रा में आहार न मिले तो आहार के अभाव में शरीर में मौजूद दोषों के नष्ट हो जाने पर यह अग्नि शरीर की धातुओं को जला डालने के बाद, प्राणों को जला डालती है, यानी प्राणों का नाश कर देती है। जैसे, चूल्हे में खूब आग धधक उठे और उस पर आपने खाली बर्तन चढ़ाया तो बर्तन ही जलकर  काला पड़ जायेगा। यदि उसमें पदार्थ और जल की मात्रा कम होगी तो भी पदार्थ और जल, जलकर नष्ट हो जायेंगे। अतः पर्याप्त मात्रा में उचित समय पर पौष्टिक और बलवर्धक आहार न दिया जाय तो शरीर की धातुएँ ही जलकर क्षीण होने लगेंगी। यही कारण है कि भूख सहने वालों का शरीर क्षीण और दुर्बल होता जाता है क्योंकि भूख की आग उनके शरीर को ही जलाती रहती है।

अतः शीतकाल में जरूरी है कि समय पर नियमित रूप से अपनी पाचन शक्ति के अनुसार अनुकूल मात्रा में पोषक तत्वों से युक्त आहार खूब चबा-चबाकर खाना चाहिए। इस ऋतु में स्निग्ध (चिकने) पदार्थ, मौसमी फल व शाक, घी, दूध, शहद आदि के सेवन से शरीर को पुष्ट और बलवान बनाना चाहिए। कच्चे चने रात को भिगोकर प्रातः खूब चबा-चबाकर खाना, गुड़, गाजर, केला, शकरकंद, सिंघाड़े, आँवला आदि कम खर्च में सेवन किये जाने वाले पौष्टिक पदार्थ है।

इस ऋतु में तेलमालिश करना, प्रातः दौड़ लगाना, शुद्ध वायुसेवन हेतु भ्रमण करना, व्यायाम, योगासन करना, ताजे या कुनकुने जल से स्नान करना आदि करने योग्य उचित विहार हैं।

शीत ऋतु में ध्यान देने योग्य

इस ऋतु में कटु, तिक्त व कषाय रसयुक्त एवं वातवर्धक पदार्थ, हल्के रूखे एवं अति शीतल पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए। खटाई का अधिक प्रयोग न करें जिससे कफ का प्रकोप न हो और खाँसी, श्वास, दमा, नजला, जुकाम आदि व्याधियाँ न हों। ताजे दही, छाछ, नीँबू आदि का सेवन कर सकते हैं। भूख को मारना या समय पर भोजन न करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। आलस्य करना, दिन में सोना, देर रात तक जगना, अति ठंड सहन करना आदि शीत ऋतु में वर्जित हैं। बहुत ठंडे जल से स्नान नहीं करना चाहिए।

पूरे वर्ष में यही समय हमें मिलता है जब प्रकृति हमें स्वास्थ्य की रक्षा और वृद्धि करने में सहयोग देती है। अतः इस ऋतु में उचित आहार-विहार द्वारा अपने शरीर को पुष्ट और बलवान अवश्य बनाना चाहिए जिससे कि अन्य ऋतुओं में भी हमारा शरीर बलवान बना रह सके।

स्वास्थ्य की अनुपम कुंजियाँ

क्या आप जानते हैं कि,

किसी भी प्रकार के रोग में मौन रहना लाभदायक है। इससे स्वास्थ्य सुधार में मदद मिलती है। औषधि-सेवन के साथ मौन का अवलम्बन हितकारी है।

रात्रि 10 बजे से प्रातः 4 बजे तक की गाढ़ निद्रा से ही आधे रोग ठीक हो जाते हैं। ‘अर्धरोग हरि निद्रा’।

बिना भूख के खाना रोगों को आमंत्रित करना है। कोई कितना भी आग्रह करे या आतिथ्यवश खिलाना चाहे पर आप सावधान रहें। पेट पर अन्याय न करें। खिलाने वाला भले अविवेकपूर्वक या रागवश खिलाना चाहे पर ध्यान रहे की पेट आपका है। पचाना आपको है।

एक बार किया हुआ भोजन जब तक पूरी तरह पच न जाये एवं खुलकर भूख न लगे तब तक भोजन करें।

कोई भी पेय पीना हो तो इड़ा नाड़ी अर्थात् नाक का बाँया स्वर चालू होना चाहिए। यदि दाँया स्वर चालू हो और पेय पदार्थ पीना आवश्यक जान पड़े तो दाँया नथुना दबाकर बाँये नथुने से श्वास लेते हुए पीयें।

भोजन या कोई भी खाद्य पदार्थ सेवन करते समय पिंगला नाड़ी अर्थात् सूर्य स्वर चालू रहना हितकर है। यदि न हो तो थोड़ी देर दाँयी करवट लेटकर या कपड़े की छोटी पोटली बाँयीं काँख में दबाकर स्वर चालू किया जा सकता है।

चाय या कॉफी प्रातः खाली पेट कभी न पीयें। दुश्मन को भी न पिलायें।

एक सप्ताह से अधिक पुराने आटे का उपयोग स्वास्थ्य के लिए लाभदायक नहीं है।

सूर्योदय के बाद तक बिस्तर पर पड़े रहना अपने स्वास्थ्य की कब्र खोदना है।

प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाना, सुबह शाम खुली हवा में टहलना स्वास्थ्य की कुंजी है।

दीर्घायु व स्वस्थ जीवन के लिए प्रातः कम-से-कम 5 मिनट तक लगातार तेज दौड़ना या चलना तथा कम से कम 15 मिनट नियमित योगासन करना चाहिए।

भोजन कम-से-कम 20-25 मिनट तक खूब चबा-चबाकर एवं उत्तर या पूर्वाभिमुख होकर करें। जल्दी या अच्छी तरह चबाये बिना भोजन करने वाले चिड़चिड़े व क्रोधी स्वभाव के हो जाते हैं।

साँईं श्री लीलाशाह जी उपचार केन्द्र, सूरत।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 28,29 अंक 108

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लाल किलाः समृद्धशाली हिन्दू समाज का प्रतीक…..


भारत के प्राचीन समृद्धशाली समाज का ऐसा जीवंत उदाहरण जिसे देखने के लिए प्रतिदिन लोगों की भीड़ लगी रहती है, जहाँ से स्वतंत्रता एवं गणतंत्र दिवस जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पर्वों पर भारत के प्रधानमंत्री देश की जनता को संबोधित करते हैं, भारत की राजधानी में जिसने आज भी अपनी विशेष पहचान बना रखी है, वह ऐतिहासिक स्थल है ‘लाल-किला।’

लोग झुलसाती गर्मियों में भी अपने सूखों कंठों की चिन्ता किये बिना, अपने व्यस्त जीवन से समय निकालकर इस भव्य किले को देखने के लिए आते हैं परन्तु दुर्भाग्यवश उन्हें बेवकूफ ही बनाया जाता है। भारत की आजादी के 45 वर्ष बाद भी अंग्रेजों के भारत विरोधी सिद्धान्त एवं तथ्यविहीन व्यक्तिगत मान्यताओं को भारतीय इतिहास के नाम पर पढ़ाया जाता है।

‘लाल-किला’ के बारे में जानने की उत्सुकता रखने  वालों को यह झूठा किस्सा सुना दिया जाता है कि भव्य किले का निर्माण भारत के पाँचवें मुगल शासक शाहजहाँ ने करवाया।

सरकारी इतिहास के अनुसार शाहजहाँ सन् 1628 में राजगद्दी पर बैठा। उस समय तक मुगलों ने आगरा को अपनी राजधानी बना रखा था, परन्तु शाहजहाँ ने एक नया शहर ‘शाहजहाँबाद’ (पुरानी दिल्ली) बसाया तथा वहाँ अपनी राजधानी स्थानान्तरित कर दी। उस भव्य शहर के किले (लाल-किला) में उसने 1648 में यमुना नदी की ओर स्थित द्वार से प्रवेश किया और उसने दिल्ली में अपना पहला दरबार लालकिले के दीवाने आम में लगाया।

सर्वप्रथम तो हम शाहजहाँ-प्रेमियों से यह पूछना चाहते हैं कि जब ‘ताजमहल’ को हथियाने की बात चलती है तब आप शाहजहाँ-मुमताज की थोथी प्रेमकथा गढ़ देते हो। वहाँ आप कहते हो कि मुमताज के मरने के बाद शाहजहाँ उसकी कब्र के पास बैठकर आँसू बहाया करता था। कभी वह ताजमहल को आइने में देखते-देखते रोता रहता था।

इतिहासकारों के अनुसार मुमताज की मृत्यु लगभग सन् 1629 (संदेहास्पद) में हुई तथा ताजमहल उसके 19 साल बाद बनकर तैयार हुआ। अर्थात् सन 1648 में तो शाहजहाँ पागलों की तरह कभी मुमताज की कब्र पर तो कभी ताजमहल को आइने में देखकर रोता रहता था, उसने इतने बड़े नगर को बसाने की योजना कब और कैसे बना ली ?

आगरा जैसी प्राचीन नगरी, जहाँ उसने अपनी जान से भी प्यारी बेगम के लिए ‘ताजमहल’ जैसा भव्य मकबरा बनाया ही, ऐसे स्थान में अपनी प्रियतमा की कब्र को हमेशा के लिए सूनी छोड़कर वह दिल्ली क्यों आ धमका ?

सबसे बड़ी बात यह है कि शाहजहाँ ने न तो ‘शाहजहाँबाद’ नामक कोई नगर बसाया था और न ‘ताजमहल’ एवं ‘लाल-किला’ बनवाया। फिर भी बिना किसी खोजबीन एवं पुरातत्वीय जाँचपड़ताल के सिरफिरे अंग्रेजों के झूठे पुलिंदों को ‘पत्थर पर लकीर’ मानकर उस पर सरकारी मुहर लग जाती है, यह कितनी शर्मनाक बात है।

‘लाल-किला’ की पुरातत्वीय जाँच में अभी तक इस बात का एक भी ऐसा ठोस प्रमाण नहीं है जो यह सिद्ध कर दे कि इसे शाहजहाँ ने बनवाया था। हाँ, इस बात के ढेरों प्रमाण मिलते हैं कि यह किसी समृद्धशाली हिन्दू सम्राट द्वारा निर्मित ऐसा भव्य किला है जिस पर जबरन शाहजहाँ जैसे दुष्ट एवं गँवार शासक का नाम थोप दिया गया है।

इस विषय में हम किले के रंग को ही पहला प्रमाण मानते हैं। किले का भगवा रंग हिन्दुओं के लिए आदरणीय है। भगवा हिन्दू धर्म की पवित्र पहचान है। मुस्लिम धर्म में हरे रंग का महत्व है। एक पुरानी कहावत भी है कि जब मुगल भारत पर अधिपत्य जमा रहे थे, तब वे भगवा रंग को देखते ही हरे (जहरीले) हो जाया करते थे। (शाहजहाँ स्वयं भी एक धर्मान्ध व्यक्ति था।) उसके जीवन में धार्मिक सहिष्णुता जैसी कोई चीज नहीं थी। ऐसा धर्मान्ध व्यक्ति अपने किले पर अपने शत्रुओं  या शाहजहाँ की भाषा में कहें तो काफिरों का धार्मिक रंग क्यों लगवाता ? वह तो उसे हरा रखना ही बेहतर समझता।

किले के लगभग 80 बुर्ज अष्टकोणात्मक रचनाएँ हैं। हिन्दू धर्म में अष्टकोणों का विशेष महत्व है जबकि मुगलों का इससे कोई लेना-देना नहीं। इन बुर्जों पर बने छत्र भी अष्टकोणिय हैं तथा उनके गुम्बदीय शीर्षों पर शिखरों के नीचे पुष्प बने हुए हैं। इस प्रकार के पुष्पाच्छादित गुम्बद मुस्लिम निर्माण में नहीं होते (चाणक्यपुरी, दिल्ली स्थित पाकिस्तानी दूतावास का गुम्बद इस बात का जीवंत उदाहरण हैं।)

लालकिले की निर्माण शैली पर यदि सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाये तो पता चलता है कि इसका निर्माण हिन्दू वास्तुकला के सिद्धान्तों पर किया गया है। किले की पूर्व दिशा में बह रही यमुना नदी इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। हिन्दू घुटनों तक के जल में खड़े होकर प्रातःकाल के उदयीमान सूर्यनारायण को जल (अर्घ्य) चढ़ाकर उनकी अर्चना करते हैं। यमुना नदी का यह भाग इसीलिए ‘राजघाट’ कहलाता है क्योंकि यह राजाओं तथा राज परिवारों के लिए विशेष रूप से बनाया गया था। यदि शाहजहाँ ने लाल किला बनवाया होता तो शायद यह घाट होता ही नहीं और यदि होता भी तो ‘बादशाह घाट’ या ‘बेगम घाट’ ही कहलाता ‘राजघाट’ नहीं।

लालकिले की प्रत्येक मेहराब के दाएँ-बाएँ स्कन्धों पर सूर्यमुखी पुष्प बने हुए हैं। ये सूर्यमुखी पुष्प इस किले का सूर्यवन्शी हिन्दू राजाओं द्वारा निर्मित होने का प्रमाण देते हैं।

लालकिले के ‘खासमहल’ के भीतर बना हुआ प्राचीन हिन्दू राजवंशी राजचिन्ह आज भी लाल किला की सत्यता प्रकट कर रहा है। इस राजचिन्ह में एक कलश में कमलदण्डी खड़ी है। इस कमलदण्डी के ऊपरी छोर पर न्यायतुला झूल रही है। न्यायतुला के ऊपर जाज्वल्यमान सूर्यनारायण एवं दोनों ओर भगवान श्रीविष्णु के हाथ में शोभायमान होने वाला शंख है।

उपरोक्त चिन्ह की प्रत्येक वस्तु हिन्दू धर्म में अत्यन्त पवित्र मानी जाती है जबकि इस्लाम से इनका कोई संबंध नहीं है। ‘ताजमहल’, ‘पुरानी दिल्ली’, ‘लालकिला’ एवं जामा मस्जिद जैसी आश्चर्यजनक कृतियों को बनाने वाला शाहजहाँ क्या इतना बड़ा मूर्ख रहा होगा कि वह अपने निवास के एक महत्वपूर्ण स्थान पर जिसे खासमहल कहा जाता है वह उन काफिरों के धार्मिक चिन्ह बनवाये जिन्हें कुचलने के लिए वह सदा तत्पर रहता था ?

तथाकथित दीवाने-आम के चारों ओर का क्षेत्र आज भी गुलाल-बाड़ी के नाम से जाना जाता है। गुलाल या कुमकुम का लाल रंग हिन्दुओं के ललाटों पर तिलक के रूप में शोभायमान होता है। हिन्दुओं की सुहागिन नारियाँ अपने पति की दीर्घायु की कामना हेतु इससे अपनी माँग सजाती है। उनके लिए यह सबसे बड़ा सौभाग्यसूचक चिन्ह है, जबकि मुसलमानों में गुलाल का कोई विशेष महत्व नहीं है।

अतः शाहजहाँ द्वारा निर्मित लालकिले के उस क्षेत्र को घेरने वाला स्थान जहाँ उसने अपना पहला दरबार लगाया था, गुलालबाड़ी नहीं हो सकता। दीवाने आम की तरह उसका भी कोई अरबी नाम होना चाहिए था।

संदर्भ ग्रंथः ‘दिल्ली का लाल किला लाल कोट है’, ‘भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें एवं विश्व इतिहास के विलुप्त अध्याय।’ (लेखक पी.एन.ओक.)

संकलनकर्ताः मदन लखेड़ा, साहित्य विभाग, संत श्री आसारामजी आश्रम

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 25-27 अंक 108

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