Articles

ब्रह्मज्ञान की महिमा


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।

छिन्नद्वेधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।

‘जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गये हैं, जो संपूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शान्त ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। (गीताः 5.25)

संसार स्वप्न जैसा है। जन्म से लेकर जीवनभर मजदूरी करो लेकिन कुछ हाथ नहीं लगता है, जैसे भूसी को छडने से कुछ हाथ नहीं लगता है। संसार की बातें करना भूसी छड़ना है। माया से पार होने की बातें करना धान छड़ना है और ब्रह्म-परमात्मा की बातें करना चावल छड़ना है। जो ब्रह्म-परमात्मा को पाये हुए हैं उनके लिए संसार एक खेलमात्र है।

तुलसी पूर्व के पाप से हरिचर्चा न सुहाय।

जैसे  ज्वर के जोर से भूख विदा हो जाय।।

जिनके पाप जोर करते हैं उनको हरि चर्चा, ब्रह्म परमात्मा की चर्चा नहीं सुहाती है, उनके मन में तो माया के (भूसी छड़ने के) विचार घूमते हैं। जिनके सब पाप निवृत्त हो गये हैं वे माया में रहते हुए भी माया के विचारों से लेपायमान नहीं होते हैं। ज्ञान के द्वारा जिनके सब संशय निवृत्त हो गये हैं ऐसे पुण्यात्मा को अपने स्वरूप के विषय में कोई संशय नहीं रहता है।

जगत सत्य है या मिथ्या ? आत्मा सत्य है कि परमात्मा सत्य है ? आत्मा और परमात्मा भिन्न हैं कि अभिन्न हैं ? जीते जी मुक्ति मिलती है कि मरने के बाद मिलती है ? जीव ब्रह्म में भिन्नता है कि अभिन्नता ? इस विषय में उनके संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो जाते हैं। मैं जन्मने मरने वाला तुच्छ जीव नहीं हूँ किन्तु सर्वव्यापक ब्रह्म हूँ… मैं व्यक्ति विशेष परिच्छिन्न नहीं हूँ किन्तु अखण्ड ब्रह्माण्ड में व्यापक परब्रह्म हूँ…. इसमें उनको कोई संदेह नहीं होता है क्योंकि उन्होंने अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान पा लिया है।

जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत रहते हैं, वे ज्ञानी महापुरुष हैं। हर प्राणी का अपना-अपना प्रारब्ध होता है, अपना-अपना स्वभाव होता है, अपनी-अपनी पकड़ होती है और अपनी-अपनी मान्यता होती है। ज्ञानी महापुरुष सबमें स्थित परमात्मा में विश्रांति पाते हैं। अतः अपने स्वरूप में विश्रांति पाये हुए ऐसे महात्मा को देखकर सब प्रसन्न होते हैं और उनको स्नेह करते हैं। पशु पक्षियों पर भी यदि ज्ञानवान की दृष्टि जाती है वे उनमें भी अपनी आत्मा को निहारते हैं। दूसरों में आत्मस्वरूप निहारना यह भी उनका हित करने का बड़ा साधन है। जैसे ‘एक्स रे’ मशीन अपनी जगह पर होते हुए भी हड्डियों तक की फोटो ले लेती है वैसे ही ज्ञानी महापुरुषों की ब्रह्मभावपूर्ण निगाहें हम पर पड़ती हैं तो हमारे लिए भी अपने स्वरूप तक पहुँचने का मार्ग सरल हो जाता है।

शास्त्र में तो यहाँ तक कहा गया है कि लकड़ी पत्थर इत्यादि जड़ वस्तुओं को यदि ज्ञानी छूते हैं यह उन पर उनकी दृष्टि पड़ती है, स्पर्श मिलता है तो देर-सवेर उनका भी उद्धार हो जाता है तो चेतन जीवों का कल्याण हो जाये इसमें क्या आश्चर्य है ? इसीलिए ज्ञानी ‘सर्वभूतहिते रताः’ कहे गये हैं।

‘सर्वभूतहिते रताः का अर्थ यह नहीं है कि सब प्राणी अपना जैसा हित चाहते हैं वैसा हित। बच्चा अपनी बुद्धि के अनुसार अपना हित चाहता है, कामी अपनी बुद्धि के अनुसार अपना हित चाहता है, लोभी अपनी बुद्धि के अनुसार अपना हित चाहता है, अहंकारी अपनी बुद्धि के अनुसार अपना हित चाहता है। वास्तव में उनका उसमें हित नहीं है लेकिन ज्ञानी उनमें ब्रह्मदृष्टि की निगाह डालते हैं और उसी में सबका हित निहित है। इसी दृष्टि से कहा गया है कि ज्ञानी महापुरुष सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत रहते हैं।

आत्मज्ञान के पश्चात ज्ञानी महापुरुष का शेष जीवन लोगों को आत्मज्ञान पाने के प्रति जागृत करने में बीतता है। यह आत्म-जागृति का कार्य भी उनका स्वनिर्मित विनोद है। जो विनोदमय कार्य होता है उसमें थकान नहीं लगती है और उसमें कर्तापन का भाव भी नहीं होता है। जो थोपा जाता है वह थकान लाता है और जो किया जाता है वह कर्तापन लाता है लेकिन जो विनोद से होता है उसमें न कर्तापन होता है न थकान।

विनोदमात्र व्यवहार जेना ब्रह्मनिष्ठ प्रमाण।

ऐसे महापुरुषों का प्रत्येक व्यवहार विनोदमात्र होता है। उनका राज्य करना भी विनोदमात्र और भिक्षा माँगना भी विनोदमात्र…. उनका युद्ध करना भी विनोदमात्र और ‘रणछोड़राय’ कहलाकर भाग जाना भी विनोदमात्र। उनके लिए तो सब विनोदमात्र है लेकिन सामने वाले का जीवन बदल जाता है। सूर्य के लिए प्रकाश देना तो स्वाभाविक है लेकिन सारी वसुन्धरा के लिए जीवनदान हो जाता है। ऐसे ही ज्ञानी महापुरुषों की तो स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है लेकिन हम लोगों के हृदय में आनंद और उल्लास छा जाता है, हमारे जीवन में ताजगी और स्फूर्ति छा जाती है, सदप्रेरणा, सदप्रवृत्ति सत्स्वरूप परमात्म-प्रीति जागृत हो जाती है। हमारे जीवन में एक नई रोशनी छा जाती है, समझ आ जाती है। वे ही बताते हैं-

ऐ तालबेमंजिले तू मंजिल किधर देखता है ?

दिल ही तेरी मंजिल है, तू अपने दिल की ओर देख।

ऐ सुख के तलबगार ! ऐ सुख को ढूँढने वाले !

तू सुख को कहाँ खोजता है ?

सुखस्वरूप तेरा अपना-आपा है, उसी में तू देख।

लुत्फ कुछ भी नहीं जहाँ में, लेकिन दुनिया जान दे देती है।

बंदे को अगर खुद की खुदाई का पता होता, न जाने क्या कर देता ?

तू सुख को कहाँ खोजता है ?

अपना आनंद, अपनी खुशी, अपना ज्ञान, अपना आत्मिक खजाना अगर समझ में आ जाये तो बंदा कितना धन्य धन्य हो जाये !

यह ब्रह्मविद्या अदभुतत चमत्कार करती है। शरीर का ढाँचा वही का वही, नाम वही का वही, लेकिन गुरुदेव थोड़ी समझ बदल देते हैं तो दुनिया कुछ और ही  निगाहों से दिखने लगती है। यह ब्रह्मविद्या ही है, जिससे सब शोक, चिंताएँ, क्लेश, दुःख नष्ट हो जाते हैं।

छिन्नद्वेधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।

ब्रह्मवेत्ता महापुरुष की दृष्टि जहाँ तक पड़ती है एवं जहाँ तक उनकी वाणी जाती है वहाँ तक के जीवों को तो शांति मिलती ही है लेकिन जब वे मौन होते हैं, एकांत में होते हैं तो ब्रह्मलोक तक के जीवों को मदद मिलती है और उन्हें पता भी नहीं होता है कि मैंने किस-किस को मदद की है। जैसे सूर्य नारायण सदा अपनी महिमा में स्थित रहते हैं। उनके प्रकाश से कितने जीवों ने जीवन पाया-क्या वे इसकी गिनती रखते होंगे ? नहीं। सूर्यदेव अपनी जगह पर स्थित होते हुए भी, ब्रह्माकार वृत्ति से ब्रह्माण्डों को छूते हुए भी सबसे अलिप्त रहते हैं। सचमुच में बढ़िया से बढ़िया काम, बढ़िया से बढ़िया सेवा तो ब्रह्मवेत्ता ही कर सकते हैं। उनकी सेवा के आगे हमारी सेवा की तो कोई कीमत ही नहीं है। ऐसे ही आत्मसाक्षात्कारी पुरुष ‘सर्वभूतहिते रताः हैं।

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणं…. जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

मन को जीतने के हजार-हजार उपाय किये जायें लेकिन जब तक मन को भीतर का रस ठीक से नहीं मिलता तब तक वह ठीक से जीता नहीं जा सकता। तुलसीदासजी महाराज कहते हैं-

निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा।

‘निज का सुख, अपने आत्मस्वरूप का सुख जब तक नहीं मिला तब तक मन स्थिर नहीं होता है।’

व्रत-उपवास करने से, एकांत जगह में रहने से कुछ समय के लिए मन शांत हो जाता है लेकिन फिर से बहिर्मुख हो जाता है। जैसे ठण्ड के दिनों में प्रभातकाल की ठण्डी से साँप ठिठुर जाता है एवं चुपचाप पड़ा रहता है लेकिन ज्यों ही सूर्य की किरणें मिलीं कि वह अपनी चाल चलने लगता है। ऐसे ही व्रत-उपवास, एकांतसेवन करने से थोड़ी देर के लिए तो मन स्थिर होता है लेकिन ज्यों ही भोग-सामग्री सामने आती है त्यों ही मन उसमें आसक्त हो जाता है क्योंकि उसे भीतर का रस नहीं मिला है। जिन्होंने भीतर के रस को पा लिया है उनका मन तो शांत होता ही है, साथ ही ऐसे महापुरुषों के सम्पर्क में आने वालों का मन भी शांत होने लगता है।

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः….

जिनके कल्मष दूर हो गये हैं, पाप दूर हो गये हैं वे ऋषि ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होते हैं।

बड़े में बड़ा पा है जगत के भोगों को सच्चा मानकर जगदीश्वर को भूलना। जो जगत को सत्य मानकर व्यवहार करता है वह चौरासी के चक्कर में ही घूमता रहता है लेकिन जो जगत को मिथ्या मानकर जगदीश्वर में मन लगाता है, संयम सदाचार को अपनाता है वह देर-सवेर जगदीश्वर तत्त्व का अनुभव पाने में भी सफल हो जाता है।

इसीलिए भगवान कहते हैं-

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।

छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2001, पृष्ठ संख्या 2-4, अंक 101

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

ठीक अभ्यास करें


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

अभ्यासयोगेनयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।

परमं पुरुषं दिव्यं याति  पार्थानुचिन्तयन्।।

‘हे पार्थ ! परमेश्वर के ध्यान के अभ्यासरूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाशरूप दिव्य पुरुष को अर्थात् परमेश्वर को ही प्राप्त होता है।’ (गीताः 8.8)

अभ्यास तो सब करते हैं लेकिन भगवान कहते हैं कि आप अपने अभ्यास को योग बना लो। ऐसा अभ्यास करो कि निरन्तर उस परमेश्वर का ही चिन्तन हो।

जो जिसका चिन्तन करता है उसके गुण सहज ही उसमें आने लगते हैं। ईश्वर के गुण जीव में छुपे हुए ही हैं लेकिन फालतू चिन्तन से जो परतें चढ़ गयी हैं उन परतों को हटाने के लिए ईश्वर के चिन्तन की जरूरत पड़ती है। व्यर्थ का चिन्तन हटाने के लिए सार्थक चिन्तन करना पड़ता है। व्यर्थ का चिन्तन हट जाये तो सार्थक चिन्तन करने की जरूरत नहीं पड़ती, स्वतः होने लगता है। व्यर्थ का अभ्यास मिट जाये तो सार्थक अभ्यास करना नहीं पड़ता, सार्थक स्वभाव प्रगट हो जाता है।

जैसे, पार्वती जी जाना चाहती थीं अपने पिता के यज्ञ में और शिवजी ने कहा कि यह उचित नहीं है। लेकिन पार्वती जी को ऐसा था किः ‘माँ एवं बहनों से जरा मिल लूँगी।’ वे चली गयीं तो शिवजी ने क्या किया ? व्यर्थ का चिन्तन नहीं किया वरन् ….

संकर सहज सरूपु सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा।।

शिवजी ने ऐसा नहीं कहा किः ‘मैं तलाक दे दूँगा… दूसरी ले आऊँगा….’ नहीं। शिवजी अपने स्वरूप में स्थित हो गये, उनकी अखंड समाधि लग गयी।

ऐसे ही आपका भी वही सहज स्वरूप है जो शिवजी का है लेकिन अभ्यासयोगे न होने के कारण मन इधर-उधर की फालतू बातों में जाता है और दुःख बनाता है। इसीलिए भगवान कहते हैं-

अभ्यासयोगेनयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।

अभ्यास तो सब करते हैं। जैसे, रोटी बनाने, पढ़ाई करने, ड्राइविंग करने, मिट्टी का काम करने का अभ्यास… लेकिन ये अभ्यास प्रकृतिजन्य चीजों में उलझाने वाले होते हैं। अभ्यास तो ऐसा करो कि उस परमात्मा से, प्रकृति के स्वामी से आपका योग हो जाये। वास्तव में तो उसके साथ स्वतः योग सदा ही है। गलत अभ्यास के कारण उससे वियोग हो रहा है। उस वियोग के संस्कार हट जायें तो ईश्वर के साथ आपका नित्य संयोग हो जाये। फिर आपका चित्त कहीं और जायेगा ही नहीं।

फिर दिखेगी तो गाय लेकिन गहराई में चिन्तन होगा कि ‘गाय के अन्दर देखने एवं दूध बनाने की सत्ता भी परमात्मा की है….’ दिखेगा कोई व्यक्ति लेकिन उस व्यक्ति की गहराई में वही परमात्मा है…. दिखेगी तो रोटी और मक्खन लेकिन वह भी तो तू ही है… कैसे ? रोटी और मक्खन इसी धरती से उत्पन्न हुए। रोटी गेहुँ से बनी और गेहूँ धरती से उत्पन्न हुए। धरती का अधिष्ठान जल, जल का तेज, तेज का वायु, वायु का आकाश और आकाश का अधिष्ठान प्रकृति है। प्रकृति का भी अधिष्ठान है परमात्मा अर्थात् सर्वाधार परमात्मा से ही सब उत्पन्न हुआ है।

नहीं तो यूँ कह दो कि धरती, जल, हवा, प्रकाश और किसान की काम करने की चेतना यह सब भगवान का है। इससे गेहूँ उत्पन्न हुए एवं गेहूँ से रोटी बनी तो वह भी तो भगवन्मय है। ‘तेरी सत्ता से ही सब दिखता है…तेरी सत्ता से ही खाया-पिया जाता है… तू ही तू है। प्रभु ! तेरी जय हो….’

सब कुछ तू ही है  लेकिन बीच में  उल्टा अभ्यास हो गया ‘मैं’ का। देखती हैं आँखें लेकिन अहं बोलता है कि ‘मैं देखता हूँ…’ सोचता है मन किन्तु अहं बोलता है कि ‘मैं सोचता हूँ….’ निर्णय करती है बुद्धि लेकिन अहं बोलता है कि ‘मेरा निर्णय है….’ इस उल्टे अभ्यास को निकालने के लिए सुलटा अभ्यास करना पड़ता है।

जैसे केले के वृक्ष का तना बड़ा ठोस दिखता है लेकिन पत्तियाँ हटाओ तो कुछ भी नहीं… केवल परतें इकट्ठी हो गयी हैं तो ठोस लगता है। प्याज देखने में बड़ा ठोस लगता है, छिलके हटाओ तो कुछ नहीं। ऐसे ही इस अहं की परतें हटाते जाओ तो ‘अहं’ जैसी कोई चीज नहीं है। केवल वही परमात्मा है लेकिन बेवकूफी से अहं ने परेशान कर रखा है।

नुक्ते की हेरफेर से खुदा से जुदा हुआ।

नुक्ता अगर ऊपर रखो तो जुदा से खुदा हुआ।।

जहाँ सचमुच में ‘मैं’ है वहाँ मन जाता नहीं और जो ‘यह’ है उसे ‘मैं’ मान बैठे हैं… यही उल्टा अभ्यास पड़ गया है। ‘यह सिर… यह मुँह…. यह हाथ…. यह पैर…. यह पेट…’ कहते तो हैं लेकिन किडनी खराब हुई तो कहेंगेः ‘मैं बीमार हूँ….’ फिर आयुर्वेदिक रीति से ठीक हुई और कोई पूछे किः ‘कैसे हो ?’ ….तो जवाब मिलेगाः ‘मैं ठीक हूँ।’

वास्तव में आप बीमार भी नहीं होते और ठीक भी नहीं होते। बीमार होता है शरीर… ठीक होता है शरीर… मरता है शरीर…. आप तो ज्यो-के-त्यों हैं। लेकिन आप अपने असली ‘मैं’ को नहीं जानते बल्कि इस शरीर को ‘मैं’ मानते हैं इसीलिए दुःखी, चिंतित और परेशान होते रहते हैं। अगर शरीर को ‘मैं’ न मानें एवं वास्तविक ‘मैं’ का ज्ञान हो जाय तो सारी खटपटें सदा के लिए दूर हो जायें।

शास्त्र में दो प्रकार की युक्तियाँ आती हैं- विधेयात्मक एवं निषेधात्मक। संतों-महापुरुषों का यह अनुभव है कि विधेयात्मक की अपेक्षा निषेधात्मक युक्ति ज्यादा कारगर सिद्ध होती है। विधेयात्मक युक्ति से इतना शीघ्र तत्त्वज्ञान नहीं होता, जितना निषेधात्मक युक्ति से होता है।

जैसे, अहं ब्रह्माsमि। ‘मैं ब्रह्म हूँ… मैं चैतन्य हूँ… मैं शुद्ध-बुद्ध सच्चिदानन्द हूँ…. मैं अमर हूँ… मैं मुक्त हूँ….’ बात तो बिल्कुल सत्य है लेकिन साधारण आदमी ऐसा सोचे एवं सावधान न रहे, संयमी न रहे तो उसके लिए खतरा पैदा हो सकता है। ‘मैं ब्रह्म हूँ…’ इसमें ‘मैं’ पर जोर है कि ‘ब्रह्म’ पर जोर है यह देखना  पड़ता है। आदमी सावधान न रहे तो ‘अहं ब्रह्माsस्मि’ करके उसमें अहंकार भी आ जाता है अथवा वासनाओं की पूर्ति के लिए खुलेआम रास्ता भी बना लेता है।

इसकी अपेक्षा तो निषेधात्मक विधि सरल है किः ‘यह शरीर मैं नहीं हूँ… मन मैं नहीं हूँ… बुद्धि मैं नहीं हूँ….’ आदि आदि।

‘यह हाथ है।’ ….तो जो ‘यह’ है वह ‘मैं’ नहीं हूँ। जो ‘इदं’ है वह ‘अहं’ नहीं हो सकता और जो वास्तव में ‘अहं’ है वह कभी मिट नहीं सकता। ‘यह’ तो बदलता रहता है लेकिन ‘मैं’ वही-का-वही रहता है। ‘यह’ मर जाता है लेकिन ‘मैं’ नहीं मरता। वास्तविक अहं अमर आत्मा है…. आत्मा-परमात्मा का सनातन संबंध है। ॐ आनंद….ॐ माधुर्य… ॐ शांति…

स्वामी रामतीर्थ अमेरिका में किसी बगीचे में बैठे हुए थे। संन्यासी वेश था उनका…. नंगे पैर, मुंडन किया हुआ सिर और काषाय वस्त्र। उन लोगों ने पहले कभी किसी भारतीय संन्यासी को इस प्रकार देखा नहीं होगा। कुछ लोग यह कहकर उनकी मखौल उड़ाने लगेः “होयsss…. होयsss …. रेड मंकी….”

स्वामी रामतीर्थ यह सुन नाचने लगे और वे भी कहने लगेः होयsss…. होयsss… रेड मंकी…..”

स्वामी रामतीर्थ को भी ऐसा कहते देख उन लोगों ने कहाः “हम तुम्हीं को बोल रहे हैं।”

स्वामी रामतीर्थः “हाँ हाँ…….. मैं भी इसी को बोल रहा हूँ।”

उनको तो यह और पागलपन लगा। बोलेः

“अरे ! इसको बोल रहा हूँ’ का क्या मतलब ? यही तो तुम हो।”

स्वामी रामतीर्थः “नहीं, मैं यह नहीं हूँ। यह तो ‘रेड मंकी’ है। मैं तो ब्रह्म हूँ। ॐ…..ॐ….ॐ….”

लोगों को आश्चर्य हुआ कि कैसा विचित्र व्यक्ति है ! उन्होंने और चिढ़ाया लेकिन स्वामी रामतीर्थ बड़े प्रसन्न… इतने में कोई सज्जन वहाँ पहुँचे। उन्होंने देखा किः ‘ये तो भारत के कोई पहुँचे हुए महापुरुष लगते हैं। जीसस के लिए तो केवल सुना हैः ‘King of God…. King of Kings….’ लेकिन ये महापुरुष तो सचमुच में राजाओं के राजा लगते हैं। शरीर में होते हुए भी अपने को शरीर से परे मानते हैं इसलिए इन पर अपमान का कोई असर नहीं हो रहा है।’

उन्होंने स्वामी रामतीर्थ को प्रणाम किया और जहाँ उन्हें जाना था वहाँ पहुँचा दिया।

जिस घर में स्वामी रामतीर्थ ठहरे हुए थे उस घर के लोगों ने आज स्वामी जी को ज्यादा प्रसन्न देखकर पूछाः

“स्वामी जी ! आज आप ज्यादा प्रसन्न दिखाई दे रहे हैं… क्या बात है ?”

स्वामी रामतीर्थः “आज हमने ‘इसका’ मजा लिया। इस ‘रेड मंकी’ को देखकर लोग भी खुश हो रहे थे और मैं भी खुश हो रहा था।”

“कहाँ है रेड मंकी ?”

“यह है रेड मंकी….” अपने शरीर की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा।

“नहीं नहीं। यह तो शरीर है और हर सात साल में इसकी हड्डियों तक के सब कण बदल जाते हैं। लोग इसका मजाक उड़ा रहे थे तो हम भी मजा ले रहे थे।”

तब उनको महसूस हुआ कि अपने को शरीर से पृथक मानकर ही स्वामी जी ऐसा कह रहे हैं।

‘यह’ को ‘मैं-मेरा’ मानना – यही सारे दुःखों, पापों, अपराधों एवं राग-द्वेष की जड़ है। ‘यह’ शरीर है, मन है, बुद्धि है। ‘शरीर बदलता है और उसे देखने वाला मैं हूँ… मन बदलता है और उसे देखने वाला मैं हूँ… बुद्धि बदलती है और उसे देखने वाला मैं हूँ…..’

नानकजी ने ठीक ही कहा हैः

मन तू ज्योतिस्वरूप, अपना मूल पिछान।

मनुष्य ‘यह’ को ‘मैं-मेरा’ मानकर अपने में योग्यताएँ देखता है तो अहंकार आता है और दुर्गुण देखता है तो विषाद होता है। ‘कुछ करके, कुछ छोड़कर या कुछ पाकर बढ़िया बनूँ….’ यह सब फुरने ‘यह’ को ‘मैं’ मानने से ही उपजते हैं। ‘यह’ को ‘मैं-मेरा’ मानने से गलतियाँ भी ज्यादा होती हैं और दुःख भी बढ़ता है।

‘यह’ को ‘यह’ मानें और ‘मैं’ को ‘मैं’ मानें तो कोई दुःख नहीं होता। इस अभ्यास से सारे दुर्गुण निकलने लगते हैं, सदगुण आने लगते हैं और आध्यात्मिक बल बढ़ने लगता है।

जैसे, सूरज के उदय होते ही वातावरण में जो होना चाहिए वह होने लगता है। पृथ्वी से अंधकार विदा हो जाता है, हानिकारक जीवाणु नष्ट होने लगते हैं, पेड़ पौधों का पोषण होने लगता है, ऑक्सीजन बढ़ने लगता है आदि-आदि। इसके लिए सूरज को कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती। ऐसे ही आप ‘यह’ को ‘यह’ और ‘मैं’ को ‘मैं’ जान लेंगे तो आपसे जो होना चाहिए वह होने लगेगा और जो नहीं होना चाहिए वह मिटने लगेगा। इसके लिए आपको कोई मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। सब स्वाभाविक ही होने लगेगा।

अतः हिम्मत करके अपने सत्य स्वरूप को पाने में लग जायें। मन-बुद्धि व व्यवहार में जितनी सच्चाई होगी उतना ही सत्यस्वरूप परमात्मा अपने आत्मबल में प्रगट होने लगेगा। परमात्म-आनंद व नित्य नवीन रस अपने सहज स्वरूप को संभालते ही प्राप्त होने लगेगा। यह बहुत ऊँची  स्थिति है। इसके लिए सच्चाई से अवश्य लगना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2001, पृष्ठ संख्या 6-8, अंक 100

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

समय बड़ा बलवान….


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

श्रीकृष्ण के स्वधामगमन के बाद अर्जुन उनकी आज्ञा के अनुसार द्वारिका से यदुवंश की स्त्रियों, वृद्धों एवं बच्चों को लेकर इन्द्रप्रस्थ की ओर चल पड़े। चलते-चलते बुद्धिमान एवं सामर्थ्यशाली अर्जुन ने अत्यंत समृद्धशाली पंचनद देश (पंजाब) में पहुँचकर पड़ाव डाला।

एकमात्र अर्जुन के संरक्षण में ले जायी जाती हुई इतनी अनाथ स्त्रियों को देखकर वहाँ रहने वाले लुटेरों के मन में लोभ पैदा हुआ। आपस में चर्चा करके उन्होंने अर्जुन के साथ आये हुए लोगों पर धावा बोल दिया। यह देखकर अर्जुन अपने गांडीव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने लगे। बड़ी मुश्किल से गांडीव पर प्रत्यंचा चढ़ी परन्तु जब वे अपने अस्त्र-शस्त्रों का, मंत्रों का चिंतन करने लगे तब उनकी याद बिल्कुल नहीं आयी। वे बड़े लज्जित हुए। लुटेरे यदुवंशी स्त्रियों को ले चले।

समय बड़ा बलवान है, मनुज नहीं बलवान।

काबे अर्जुन लूटिया, वही धनुष वे ही बाण।।

जिस गांडीव से अर्जुन ने अनेक महारथियों को परास्त किया था, उसी गांडीव से आज वे यदुवंश की स्त्रियों की रक्षा तक न कर सके। लुटेरों से वे परास्त हो गये। अर्जुन के देखते ही देखते लुटेरे स्त्रियों को ले गये। कुछ स्त्रियों को वे जबरन ले जा रहे थे तो कुछ स्त्रियाँ उनके आतंक के भय से चुपचाप स्वयं ही उनके साथ चली गयीं।

अर्जुन ने अपहरण से बची हुई कुछ स्त्रियों को जहाँ-तहाँ बसा दिया तथा कुछ वृद्धों, बालकों एवं स्त्रियों को लेकर वे इन्द्रप्रस्थ आये। इस प्रकार सबकी समयोचित व्यवस्था करके अर्जुन आँसू बहाते हुए महर्षि व्यासजी के आश्रम पर गये एवं वहाँ उनके दर्शन किये।

अर्जुन ने वेदव्यासजी को प्रणाम किया। वेदव्यासजी ने उनकी तेजोहीन अवस्था देखकर पूछाः “पार्थ ! क्या तुमने रजस्वला स्त्री से समागम किया है या किसी ब्राह्मण का वध कर दिया है ? कहीं तुम युद्ध में परास्त तो नहीं हो गये क्योंकि तुम श्रीहीन से दिखाई देते हो ? भरतश्रेष्ठ ! तुम कभी पराजित हुए हो – यह मैं नहीं जानता, फिर तुम्हारी ऐसी दशा क्यों है ? पार्थ ! यदि मेरे सुनने योग्य हो तो अपनी इस मलिनता का कारण मुझे शीघ्र बताओ।”

तब अर्जुन ने कहाः “भगवन् ! भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला समेट ली है। हम उनके दर्शन करते थे, तब हमारे बाणों में बल था। हमारे कई असंभव से कार्य भी श्रीकृष्ण की कृपा से सफल हो जाते थे। श्रीकृष्ण मुझे छोड़कर चले गये। मैं इस संसार में उनके बिना नहीं रहना चाहता। इसके सिवा जो दूसरी घटना घटित हुई है, वह इससे भी अधिक कष्टदायक है। आप इसे सुनिये।

जब मैं इस घटना का चिंतन करता हूँ, तब मेरा हृदय बारंबार विदीर्ण होने लगता है। ब्रह्मन् ! पंजाब में लुटेरों ने मुझसे युद्ध ठानकर मेरे देखते-देखते यदुवंश की हजारों स्त्रियों का अपहरण कर लिया। मैंने अपने गांडीव धनुष से उनका सामना करना चाहा परन्तु उन्हें परास्त न कर सका। मेरी भुजाओं में पहले जैसा बल था, वैसा अब नहीं रहा। महामुने ! नाना प्रकार के अस्त्रों का जो मुझे ज्ञान था वह अब विलुप्त हो गया है। मेरे सभी बाण सब ओर जाकर क्षण भर में नष्ट हो गये। मेरा पराक्रम नष्ट हो गया।”

वेदव्यासजी बोलेः “कुन्तीकुमार ! वे समस्त यदुवंशी देवताओं के अंश थे। वे देवाधिदेव श्रीकृष्ण के साथ ही यहाँ आये थे और साथ ही चले गये। यही कालचक्र का प्रभाव है।

समय-समय की बात है। वह भी समय था जब तुम विजयी होते थे और शत्रु हारते थे। यह भी समय का ही प्रभाव है  साधारण लोगों से तुम हार गये।

यदवंशीजन ब्राह्मणों के शाप से दग्ध होकर नष्ट हुए हैं। अतः तुम उनके लिए शोक न करो। उन महामनस्वी वीरों की भवितव्यता ही ऐसी थी। तुम्हारे देखते-देखते स्त्रियों का जो अपहरण हुआ है उसमें भी एक रहस्य है।

वे स्त्रियाँ पूर्वजन्म में अप्सराएँ थीं। एक बार आत्मज्ञानी अष्टावक्र मुनि जल में खड़े-खड़े अपने ब्रह्मानंद में विश्रांति पा रहे थे। मुनि के सिर पर केवल जटाओं का ही भार था, शेष पूरा शरीर जलाशय में था। ये अप्सराएँ वहाँ से गुजरीं और उन्होंने मुनि की स्तुति करके उन्हें प्रसन्न किया।

मुनि ने कहाः ‘तुम्हारी स्तुति से मैं प्रसन्न हूँ। जो तुम्हें चाहिए, माँग लो।’

उर्वशी ने कहाः ‘हमने आपकी प्रसन्नता प्राप्त कर ली, अब और क्या माँगना ? हमें तो सब  मिल गया।’

….लेकिन दूसरी अप्सराओं ने कहाः ‘हम यही वरदान चाहती हैं कि हम श्रीहरि के साथ क्रीड़ा करें। हमारे पति वासुदेव हों।’

अष्टावक्र मुनिः ‘अच्छा….ऐसा ही होगा।’

ऐसा कहकर जब वे जल से बाहर निकले तो उनके शरीर के टेढ़े मेढ़े अंग देखकर अप्सराओं को हँसी आ गयी। मुनीश्वर को पता चल गया कि मेरी देह को देखकर इन्हें हँसी आ रही है। वे बोलेः

‘श्रीकृष्ण को तुम वरोगी लेकिन अंत में तुम्हारी दुर्गति होगी। तुमको दस्यु ले जायेंगे।’

मुनि ने शाप दे दिया। अप्सराओं ने क्षमायाचना की तो प्रसन्न होकर मुनि ने कहाः

‘अच्छा… उसके बाद तुम्हारा देहत्याग होगा और तुम पुनः स्वर्ग में पहुँच जाओगी।’

मुनि के शापवश वे  लुटेरों (दस्युओं) के हाथों पड़ीं। इसीलिए अर्जुन ! तुम्हारे बल का क्षय हुआ ताकि वे शाप से छुटकारा पा जायें। अब वे अपना पूर्व रूप और स्थान पा चुकी हैं अतः उनके लिए भी शोक करने की आवश्यकता नहीं है।

जो स्नेहवश तुम्हारे रथ के आगे चलते थे, सारथि का काम करते थे तो वे वासुदेव कोई साधारण पुरुष नहीं अपितु साक्षात चक्र-गदाधारी पुरातन ऋषि चतुर्भुज नारायण थे। वे विशाल नेत्रों वाले श्रीकृष्ण इस पृथ्वी का भार उतार कर शरीर त्याग करके अपने उत्तम परम धाम को जा पहुँचे हैं।

पुरुषप्रवर ! महाबाहो ! तुमने भी भीमसेन और नकुल-सहदेव की सहायता से देवताओं का महान कार्य सिद्ध किया है। कुरुश्रेष्ठ ! मैं समझता हूँ कि अब तुम लोगों ने अपना कर्तव्य पूर्ण कर लिया है। तुम्हें सब प्रकार से सफलता प्राप्त हो चुकी है। अब तुम्हारे परलोकगमन का समय आया है और यही तुम लोगों के लिए श्रेय़स्कर है।

भरतनंदन ! जब उदभव का समय आता है तब इसी प्रकार मनुष्य की बुद्धि, तेज और ज्ञान का विकास होता है और जब विपरीत समय उपस्थित होता है, तब इन सबका नाश हो जाता है।

कालमूलमिदं सर्वं जगद्वीजं धनंजय।

काल एव समादत्ते पुनरेव यदृच्छया।।

‘धनंजय ! काल ही इन सबकी जड़ है। संसार की उत्पत्ति का बीज भी काल है और काल ही फिर अकस्मात सबका संहार कर देता है।’

(श्रीमहाभारत, कौसल पर्वः 8.33,34)

काल का प्रभाव सब पर पड़ता ही है अतः मनुष्य को चाहिए कि वह कालातीत श्रीहरि के तत्त्व में विश्रांति पा ले।”

श्रीहरि के तत्त्व में विश्रांति पा लें तो फिर उतारर-चढ़ाव की तकलीफें नहीं सहनी पड़तीं।

वेदव्यास जी कहते हैं- “अर्जुन ! अब तुम भी अपने भाइयों समेत परम गति को प्राप्त हो जाओ। हिमालय में जाकर तप करो। इन्द्रियों को मन में, मन को बुद्धि में और बुद्धि को अपने परब्रह्म परमात्मा में लीन करो तभी तुम्हें शांति मिलेगी। इसी में तुम्हारा परम कल्याण निहित है।”

जिसके साथ श्रीकृष्ण थे ऐसे अर्जुन को भी इन्द्रियों को समेटकर मन में, मन को बुद्धि में और बुद्धि को अपने वास्तविक स्वरूप में लाना पड़ता है। यही बात अगर हमें अभी समझ में आ जाये तो हमारा भी बेड़ा पार हो जाये।

इसके लिए समय बचाकर अन्तर्मुख होना चाहिए। अन्तर्मुख नहीं हुए तो महाराज ! समय बड़ा बलवान…. वही बात। समय के फेर से कभी कोई ऊँचा तो कभी कोई नीचा, कभी कोई धनवान तो कभी निर्धन, कभी कोई राजा तो कभी रंक हो जाता है। कभी कोई व्यक्ति कुटुम्बियों से पूजा जाता है तो कभी कोई उन्हीं से धिक्कारा जाता है।

वही व्यक्ति जो दुकान पर था, कमाता था, बच्चों के लिए परिश्रम करता था, मकान बनवाता था तो सबको प्रिय लगता था। अब बूढ़ा हो गया, दुकान चलाने के लायक न रहा तो घर में अपने ही बेटों से दुतकारा जाता है।

वही व्यक्ति था जो सप्ताह भर के लिए एकान्त में, मौनमंदिर जाना चाहता था तो घरवाली रोती थी, बच्चे रोते थे…. जब बूढा हो जाता है तो लोग मनौतियाँ मानते हैं कि ‘काका का कुछ हो जाये ! (यह बूढ़ा मर जाये तो अच्छा।)’ समय बड़ा बलवान्….

इसीलिए ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाया तो अंत में पछताना ही पड़ता है, रोना ही पड़ता है।

अभी जो मित्र दिखते हैं वे ही समय पाकर पराये हो जाते हैं और जो पराये दिखते हैं वे अपने हो जाते हैं। अपना-पराया यह मन और बुद्धि का धोखा है। वास्तव में अपने आत्मा-परमात्मा के सिवाय कोई अपना नहीं है।

जैसे नदी की धारा में सब बह जाता है, ऐसे ही समय की धारा में सब प्रवाहित हो जाता है। नदी दो पहाड़ियों के बीच से बह रही है…. लकड़ियाँ गिरी, नदी के बहाव में मिलीं, थोड़ी दूर पर फिर दूसरी मिलीं, कोई किसी किनारे रूकी तो कोई किसी किनारे रूकी और कोई सागर में चली गयीं…. ऐसे ही शादी ब्याह हुआ, पति पत्नी मिले, संतति हुई, समय चलता रहा….. आखिर में कोई किसी किनारे पर गया तो कोई किसी किनारे पर गया….. यही तो संसार है। और क्या है ? ऐसे ही मित्र मिले, पड़ोसी मिले… फिर बिछुड़े। जैसे, बहती गंगा की धारा में बालू के कण मिलते हैं, पत्थर-कंकड़ मिलते हैं फिर बिछुड़ते हैं ऐसे ही काल की धारा में कोई मिलता है तो कोई बिछुड़ता है… सब सपना हो जाता है। शिवजी कहते हैं-

उमा कहउँ मैं अनुभव अपना।

सत हरि भजन जगत सब सपना।।

(श्रीरामचरित.)

इस संसार में केवल ईश्वर भजन ही सार है।

कोई कहे कि हरि के जाने के बाद उनके कुल की स्त्रियों को ही लुटेरे ले गये, उनका धन छीनकर ले गये तो ऐसे हरि का भजन करके हमें क्या फायदा होगा ? नहीं…. ऐसी बात नहीं है। श्री हरि का विग्रह माया में लीन हो सकता है लेकिन श्रीहरि का तत्त्व तो सदैव, सर्वत्र सब दिलों में विद्यमान है। उन श्रीहरि का चिन्तन ध्यान करने से मन-बुद्धि की चंचलता एवं बेवकूफी दूर होती है, जीव के कल्मष दूर होने लगते हैं तथा वह अपने हरि-स्वरूप के निकट आने लगता है। उन श्रीहरि को सत्य समझकर अंतर्मुख होने से जीव का वास्तविक कल्याण हो जाता है। बाकी तो समय के फेर से महारथी अर्जुन जैसे भी दस्युओं से हार गये। कभी धनी निर्धन हो जाते हैं, अमीर गरीब हो जाते हैं, गरीब अमीर हो जाते हैं।

श्री वशिष्ठजी महाराज कहते हैं- “हे राम जी ! यह कालचक्र बड़ा विलक्षण है। जो धन मिला सो मिला, जो गया सो गया। जो मान मिला सो मिला, जो अपमान हुआ सो हुआ। जो सुखद अवस्थाएँ आयीं सो आयी और जो दुःखद अवस्थाएँ गयीं सो गयीं। समय की धारा में सब बीता जा रहा है।” अतः हे साधक ! बीते हुए पर शोक न कर। आने वाले भविष्य में बाह्य जगत में कुछ विशेष बनने की वासना न कर। वर्त्तमान में अपने परमात्म-स्वभाव में, साक्षी सच्चिदानंद ईश्वर में स्थित होना ही सब सारों का सार है। उसी के सुमिरन, उसी के आनंद, उसी के चिंतन में लगे रहो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, पृष्ठ संख्या 15-18, अंक 100

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ