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मन के जीते जीत….


संत श्री आसाराम बापू जी के सत्संग प्रवचन से

जैसे, सागर से लहरियाँ उठती हैं, ऐसे ही सच्चिदानंद परब्रह्म परमात्मारूपी सागर से आपका मन उभरता है। मन के दो छोर हैं- चैतन्यस्वरूप परमात्मा और संसार।

जैसे, एक पुल नदी के दो किनारों को जोड़ता है, ऐसे ही परमात्मा एवं जगत को जोड़ने वाले सेतु का नाम है मन। मन अगर शरीर एवं संसार को मैं-मेरा मानकर चलता है तो नश्वर संसार में ही जीवन खप जाता है लेकिन वही मन अगर परमात्मा को ही अपना वास्तविक स्वरूप मानकर उसे पाने का यत्न करता है तो शाश्वत अमर पद को पा लेता है।

किन्हीं महापुरुष ने ठीक ही कहा हैः

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।

मन से ही तो पाइये परब्रह्म की प्रीत।।

मन से मनुष्य संसार-बंधन में बँधता है एवं मन से ही इससे मुक्त होता है। शास्त्रों में भी कहा गया हैः

मनः एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः।

‘मन ही मनुष्यों के बंधन एवं मोक्ष का कारण है।’

मन है प्रकृति का और कल्पना होती है मन की। प्रकृति परिवर्तनशील है तो मन भी परिवर्तनशील है और मन परिवर्तनशील है तो कल्पना भी परिवर्तनशील है। इसलिए अपने मन को ऐसा बनाओ कि दुःख का प्रभाव न पड़े और सुख की गुलामी न रहे। मन को मन से जगाओ। जैसे, उधार के पैसों से तीर्थयात्रा करने वाला व्यक्ति यात्रा का गर्व नहीं करता, दूसरे के सहारे नदी पार करने वाला व्यक्ति तैरने का अभिमान नहीं करता, जन्मांध देखने का गर्व नहीं करता, विधवा सुहागिन होने का गर्व नहीं करती, ऐसे ही इस मन को किसी चीज का गर्व न होने दो क्योंकि परमात्मा के बिना वह कंगाल है, परमात्म-सत्ता के बिना वह विधवा जैसा। परमात्म-चेतना के बिना मन जन्मांध है। मन को परमात्मा की चेतना मिलती है, परमात्मा का सुहाग एवं ऐश्वर्य मिलता है ऐसी समझ से मन को समझदार बनाओ।

दुःखी होने का अभिमान न करो। ‘मैं दुःखी हूँ…’ यह अभिमान से होता है क्योंकि मन में ‘मैं हूँ’ की कल्पना है तो तभी तो ‘मैं दुःखी हूँ….’ यह महसूस होता है। ऐसे ही ‘मैं सुखी हूँ….’ यह भी अभिमान से होता है। लेकिन भगवान की सत्ता के बिना मन का ‘मैं पैदा नहीं हो सकता। जैसे पानी के बिना लहर पैदा नहीं हो सकती, मिट्टी के बिना मिट्टी के घड़े नहीं बन सकते, रुई के बिना सूती कपड़े नहीं बन सकते, ऐसे ही परमात्मा के बिना मन का ‘मैं’ पैदा नहीं हो सकता। जो कुछ मन में है, वह परमात्मा की सत्ता लेकर है। मन इस सत्ता को भूल जाता है और कल्पना में उलझ जाता है।

“क्या हाल है ?”

“मैं दुःखी हूँ…. मैं ठीक हूँ….”

‘मैं दुःखी हूँ…… मैं ठीक हूँ…’ यह भी परमात्मा की सत्ता से बोलता है। परमात्मा की सत्ता वही-की-वही है लेकिन मन जैसी-जैसी कल्पना या भावना करता है ऐसा उसे दिखता है और जैसा-जैसा देखने-सोचने का ढंग होता है ऐसी-ऐसी कल्पना या भावना बनती है। इसलिए देखने-सोचने का ढंग ऊँचा कर दो, अपनी नजर बदल दो।

 नजर बदली तो नजारे बदल गये।

किश्ती ने बदला रुख तो किनारे बदल गये।।

जो मन का रुख परमात्मा से मोड़कर संसार के भोग की तरफ ले जाते हैं, वस्तु-व्यक्ति से सुख लेने की तरफ ले जाते हैं, पाप की तरफ ले जाते हैं वे देर-सबेर पाप-ताप में तपते रहते हैं और जो प्रभु के ज्ञान ध्यान में ले जाते हैं वे देर-सबेर प्रभुमय हो जाते हैं। संसार की वस्तु संसारर के काम आये और अपना अंतरात्मा परमेश्वर अपने पर संतुष्ट रहे ऐसा यत्न करना चाहिए।

यज्ञ, तप, व्रत, दान आदि करने से जितना पुण्य होता है, उससे भी अधिक पुण्य शास्त्र-अध्ययन एवं सत्संग करने से और भगवान के ज्ञान-ध्यान का अनुसंधान करने से हो जाता है। मन को इसमें लगाये तो मनुष्य परमात्मा हो जाता है।

एक होते हैं पापात्मा, दूसरे होते हैं पुण्यात्मा और तीसरे होते हैं महात्मा। महात्मा भी तो मन से ही होते हैं। ‘महात्मा’ अर्थात् महान आत्मा। जिनको महान परमात्मा का ज्ञान, गुरु का प्रसाद पच गया है उन ब्रह्मज्ञानी संत के कर्म न पापात्मा की नाईं कर्त्ता होकर आते हैं और न पुण्यात्मा की नांईं कर्त्ता होकर आते हैं वरन् उनके कर्म आत्मज्ञानी होकर आते हैं इसलिए वे न पुण्यात्मा होते हैं, न पापात्मा होते हैं। ऐसे महात्मा स्वयं तो संसार के बंधनों एवं प्रभावों से छूट जाते हैं, साथ ही औरों को भी उनसे छूटने का उपाय बताकर उन्हें मुक्ति के पथ पर अग्रसर कर देते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2001, पृष्ठ संख्या 11,12 अंक 99

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भारतवासियों ! अब तो जागो….


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

मैं तो जापानियों को धन्यवाद दूँगा। वे अमेरिका में जाते हैं तो भी अपनी मातृभाषा में ही बातें करते हैं। ….और हम भारतवासी ! भारत में रहते हैं फिर भी अपनी हिन्दी, गुजराती आदि भाषा में अंग्रेजी के शब्द बोलने लगते हैं…. आदत पड़ गयी है। 50 वर्ष से अधिक हो गये आजादी के… बाहर की गुलामी की जंजीर तो छूटी लेकिन अंदर की गुलामी, दिमाग की गुलामी अभी तक नहीं गयी।

लॉर्ड मैकाले कहता थाः “मैं यहाँ कि शिक्षा पद्धति में  कुछ ऐसा डाल जाता हूँ कि आने वाले कुछ वर्षों में भारतवासी अपनी संस्कृति से घृणा करेंगे… मंदिर में जाना पसंद नहीं करेंगे…. माता पिता को प्रणाम करने में तौहीनी महसूस करेंगे… वे शरीर से तो भारत के होंगे लेकिन दिलो-दिमाग से हमारे ही गुलाम होंगे…. ऐसे संस्कार मैं अपनी इस शिक्षा-पद्धति में डाल जाता हूँ।”

शिक्षा-पद्धति में उसके द्वारा डाले गये संस्कारों का प्रभाव आज भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। हमारे देश के तथाकथित बुद्धिजीवी लोग जो उच्च शिक्षाप्राप्त नागरिक हैं, वे पाश्चात्य जगत की बातों को ज्यादा महत्त्व देते हैं। संत महापुरुष भारत में रहकर अध्यात्म का प्रसाद बाँटते हैं तो उनकी कोई कीमत नहीं, किन्तु परदेश से होकर आये तो उन्हें लोग ध्यान से सुनने लगते हैं। स्वामी विवेकानन्द यहाँ थे तो उनकी कोई कीमत न थी, लेकिन जब विदेश होकर आये तब उनका जय-जयकार होने लगा। स्वामी रामतीर्थ परदेश होकर आये तो लोग उनका सम्मान करने लगे। हम भी परदेश जाकर आये तो लोग ज्यादा सुनने लगे किन्तु हमारे महान गुरुदेव कको इतने सारे लोग पहचानते भी न थे।

हमारी अपेक्षा तो हमारे गुरुदेव अनंत गुना महान थे लेकिन उन्होंने प्रचार के साधनों का इतना उपयोग नहीं किया। वे 93 वर्ष तक भारत में भ्रमण करते रहे लेकिन कइयों को पता तक नहीं था कि पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी बापू जैसी हस्ती इस पृथ्वी पर है। अब भी मैं उनकी वंदना करता हूँ।

परदेश में कोई टोने-टोटके करता हो तो पूरे देश की मीडिया उसके पीछे-पीछे धूल चाटती है। यह बात कइयों को कठोर लगती होगी, अप्रिय लगती होगी परन्तु माफ करना, आपको मैं अपना समझकर कहता हूँ।

ऋषि दयानंद ऐसी बातें कहा करते थे इसीलिए लोग उनका खूब विरोध करते थे। उनको कोई हिन्दू अपनी धर्मशाला अथवा मंदिर में रहने भी नहीं देता था। फिर भी भारत के उन संत ने सत्य बोलना जारी रखा।

एक बार अलीगढ़ में वे एक मुसलमान के यहाँ ठहरे हुए थे। उसके घर में तो रहते लेकिन अपना भोजन स्वयं बनाकर खाते एवं शाम को ‘कुराने शरीफ’ पर प्रवचन करते। वे कहतेः ‘एक तरफ तो बोलते हो कि ‘ला इल्लाह इल्लिल्लाह…. अल्लाह के सिवाय कोई नहीं है। सबमें अल्लाह हैं, सारा जहाँ अल्लाह का है….’ और दूसरी तरफ बोलते हो कि ‘हिन्दुओं को मारो काटो…. वे काफिर हैं…..’ ये कैसी नालायकी के विचार हैं !” ऐसा करके मुसलमानों को सुना देते। तब मुसलमान भाई विचारते किः ‘ये हिन्दू बाबा हमारे ‘कुराने शरीफ’ की आयतें एवं इसके दृष्टांत देकर हमको ही ऐसा-वैसा सुना देते हैं ? ऐसा क्यों ? आखिर रहते कहाँ हैं ?’

जाँच की तो पता चला कि इन बाबा को हिन्दू लोग अपने यहाँ रखने से इन्कार करते हैं किन्तु इनका एक मुसलमान भक्त जिसे हिन्दू धर्म की महिमा का पता है उसके घर ये रहते हैं। तब गाँव के आगेवानों ने मिलकर कहाः

“स्वामी जी ! आपको अपने वाले अपनी धर्मशाला और मंदिरों में रहने तक नहीं देते हैं। आप एक मुसलमान के घर रहते हैं और मुसलमानों को ही सुनाते हैं। थोड़ा तो ख्याल करें !”

उन निर्भीक बाबा ने क्या कहा, जानते हो ?

उन्होंने कहाः “जिनके यहाँ रहता हूँ उनको अगर सत्य सुनाकर उनकी गलती नहीं  निकालूँगा तो फिर और किसको सत्य सुनाऊँगा ?”

उनके ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ देखना। अमुक पंथ में कोई साधु मर गया हो तो उसे कुएँ में डाल देते हैं और कहते हैं कि ‘उसे तो फलाने स्वामी ले गये।’ ऋषि दयानंद ने स्पष्ट लिखा  है किः “अमुक स्वामी (सहजानंद) ले गये-इस धूर्तता में फँसने की जरूरत नहीं है।”

ऐसा स्पष्ट सत्य सुनाने वाले संत को लोगों ने 22-22 बार जहर दिया ! उन्हीं महापुरुष को जब अंतिम बार जहर दिया गया तो उन्होंने जहर पिलाने वाले को कहाः “ये पैसे ले और भाग जा। भक्तों को पता चलेगा तो तुझे मार डालेंगे।”

ऐसे-ऐसे महापुरुष हो गये हैं हमारी संस्कृति में। उन्हें पोप जैसा सम्मान तो क्या मिला ? बल्कि निन्दक लोग उनका नाम गधे पर लिख कर उनका मखौल उड़ाते किः ‘ऋषि दयानन्द गधे हैं।’ उनके भक्त लोग आकर उन्हें बताते कि ‘आपके लिए कुछ लोग ऐसा वैसा लिखते हैं।’ तब दयानन्द जी कहतेः “हाँ, जो ढोंगी है वह गधा ही है। तुम घबराओ मत, विरोध न करो। तुम आगे बढ़ो।”

कितनी सहनशक्ति थी उन महापुरुष में !

वैष्णवजन तो तेने रे कहीए, जे पीड़ पराई जाणे रे।

परदुःखे उपकार करे तोय, मन अभिमान न आणे रे।।

बिल्खा में नथुराम शर्मा नाम के एक उच्च कोटि के आतमज्ञानी संत हो गये। लोगों को उनके बारे में कुछ पता ही नहीं था। उन्हीं की ‘पंचदशी’ मुझसे पढ़वाकर मेरे गुरुदेव ने मुझ पर संकल्प डाला एवं उस ‘पंचदशी’ का प्रसंग समझकर जीव-ब्रह्म की एकता का साक्षात्कार करवा दिया। ऐसे महापुरुषों को लोग पहचानते तक नहीं हैं। राष्ट्र के तो कई बड़े शहरों में लोगों को पता तक नहीं चल पाता कि ऐसे उच्च कोटि के संत-महात्मा आये हैं किन्तु जो अमुक के पास से पैसे ले-लेकर, अमुक को प्रलोभन दे-देकर धर्मान्तरण करवाते हैं उनके लिए चारों ओर जय-जयकार बुलवाया जाता है। फिर भी एक बात की मुझे प्रसन्नता है कि अभी तक भारतीय संस्कृति का ज्ञान, उनकी साधना-पद्धति लोगों को सुख-शांति देने का सामर्थ्य अपने भीतर संजोयी हुई है। उसकी गरिमा को समझकर हम पुनः भारत की प्राचीन महानता को प्राप्त कर सकते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2001, पृष्ठ संख्या 23,24,25 अंक 99

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संत सान्निध्य की महिमा


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

ʹश्रीयोगवाशिष्ठ महारामायणʹ में आता हैः

हे राम जी ! संत और भक्त में दोष देखना अपना विनाश करना है। साधु में एक भी गुण है तो उसको अंगीकार कीजिये। उनके अवगुण न सोचिये, न खोजिये।

अगर अवगुण देखना चाहोगे तो श्रीराम में भी दिख जायेंगे, श्री कृष्ण में भी दिख जायेंगे, बुद्ध, नानक और कबीर आदि में भी दिख जायेंगे। जैसे, बुद्ध एक नर्तकी के हाथ का बनाया हुआ भोजन करते थे… श्री कृष्ण गोपियों के साथ नाचते थे…. श्री रामजी ने सीता माता का त्याग कर दिया था…. लेकिन यह सब उनका बाह्य आचरण है। अगर इसे बाह्य दृष्टि से देखकर चलोगे तो आप गड्ढे में गिर जाओगे किन्तु यदि अन्तर्दृष्टि से उनके इन कार्यों को देखोगे तो आप तर जाओगे। बाह्य दृष्टि से ज्ञानी प्रारब्धवश व्यवहार में कुछ लेन-देन करते भले ही दिखें, परन्तु अन्तःकरण से वे कुछ नहीं करते वरन् सदा अपने-आप में तृप्त रहते हैं।

अगर ऐसे महापुरुषों को भी अवगुणी की नजर से देखोगे तो अवगुण खूब दिख जायेंगे और तुम्हारा चित्त भी अवगुणों का भण्डार हो जायेगा।

एक बार दुर्योधन के गुरुदेव द्रोणाचार्य ने दुर्योधन से कहाः “जाओ, देखकर आओ कि नगर में कितने सज्जन लोग हैं ?”

दुर्योधन गया, दिन भर घूमा और शाम को लौटकर अपने गुरुदेव से उसने कहाः

“नगर में सारे लोग दुर्जन ही हैं।”

फिर गुरुदेव ने युधिष्ठिर को उसी नगर में भेजते हुए कहाः “जाओ, तुम देखकर आओ कि नगर में कितने दुर्जन लोग हैं ?”

युधिष्ठिर गये, दिन भर घूमकर शाम को आये एवं बोलेः

“नगर में कोई दुर्जन नहीं है। सब सज्जन ही सज्जन हैं।”

युधिष्ठिर तो दुर्योधन को भी दुर्योधन नहीं सुयोधन बोलते थे एवं दुःशासन को भी सुशासन कहकर बुलाते थे। उनके चित्त में शांति रहती थी, आनंद रहता था।

आप भी यदि एक दूसरे को दोषमय देखोगे तो आपकी शक्तियों का ह्रास होगा। उनके वे दोष आपमें भी उत्पन्न होने लगेंगे। इसके विपरीत यदि अपने बेटे-बेटी, पुत्र-परिवार, मित्र आदि में भी दोष देखने के बजाये गुण देखोगे तो उनके भी गुण बढ़ेंगे और आप में भी उन गुणों का विकास होने लगेगा।

अतः दुर्योधन की नाँईं किसी व्यक्ति में दुर्गुण मत देखो अपितु युधिष्ठिर की नाँईं सदगुण देखो। हम तो कहते हैं कि युधिष्ठिर से भी आगे श्रीकृष्ण की नाँईं सब में अपने को देखो और अपने में सबको देखो। भोले बाबा कहते हैं-

सब प्राणियों में आपको, सब प्राणियों को आप में।

जो प्राज्ञ मुनि हैं जानता, कैसे फँसे फिर पाप में ?

अक्षय सुधा के पान में, जिस संत का मन लीन हो।

क्यों कामवश सो हो विकल, कैसे भला फिर दीन हो ?

ऐसे महापुरुषों को ही ʹसाधुʹ कहा गया है। मनुष्य को चाहिए कि वह यत्नपूर्वक साधु की संगत करे। साधु की संगत में अगर असाधु रहे तो वह भी साधु बन जाये लेकिन साधु अगर असाधु के प्रभाव में रहे तो वह भी असाधु हो जाये। ऐसे ही शिष्य अगर गुरु के कहने में चलता है तो एक दिन गुरु के अनुभव को वह अपना बना लेता है किन्तु गुरु यदि शिष्य के कहने में चलने लग जायें तो वे गुरु गुरु ही न रह जायें। इसीलिए असाधुओं को छोड़कर साधु का संग करना चाहिए। उनके साथ मिलकर सत्संग करना चाहिए। जो नित्य अपने-आप में तृप्त रहते हैं, मस्त रहते हैं तथा वही मस्ती सबको लुटाते रहते हैं ऐसे साधुपुरुषों का संग तो स्वयं संत भी चाहते हैं।

जो परम संत हों, साधु हों अगर उनमें एक भी गुण देखने को मिल जाये तो उसे स्वीकार कर लेना तथा अज्ञानी के, असाधु के हजार गुण भी दिखें, फिर भी उसकी धन-दौलत, मिथ्या पद-प्रतिष्ठा की वासना में नहीं पड़ना। साधु की सहजता एवं सरलता दिख जाये तो उसे यत्नपूर्वक अंगीकार करना चाहिए।

यदि आपने किसी को अमुक समय, अमुक स्थान पर मिलने का विचन दिया हो और पास में किसी ज्ञानी, संतपुरुष का सत्संग चल रहा हो तो आप उस व्यक्ति से मिलने मत जाना क्योंकि उस व्यक्ति से तो फिर कभी भी मिल सकते हो किन्तु संत पुरुष के दर्शन तथा सत्संग-सान्निध्य का लाभ बार-बार नहीं मिलता। ऐसे संत पुरुष कभी-कभी ही कहीं पर मिलते हैं अतः सब काम छोड़कर भी उनके श्रीचरणों में पहुँच जाना।

संसारी व्यक्ति दे-देकर भी क्या देगा ? संसारी तो आपको वासना पोसने की चीजें तथा वासना जगाने की बातें ही देगा, जिससे अभिमान, अहंकार पनपेगा जबकि ज्ञानवानों के संग से एवं उनके सत्संग में जाने से विवेक जगता है, वैराग्य उत्पन्न होता है, हृदय पवित्र एवं अहंकार गलित हो जाता है। उनके दर्शन मात्र से अमिट पुण्य की प्राप्ति होती है तथा मन को शांति मिलती है।

ऐसे ज्ञानवानों के लिए विरोधी, निंदक तथा कुप्रचारक कुछ का कुछ बोलते-लिखते रहते हैं किन्तु समझदार श्रद्धालु भक्त उनके इस जाल में नहीं फँसते, वरन् वे और भी अधिक दृढ़ता से अध्यात्म के मार्ग पर डट जाते हैं क्योंकि वे जानते हैं-

संत न होते संसार में, तो जल मरता संसार….

….किन्तु अभागे कुप्रचारक संतों की निन्दा करके अपने कीमती मानव जीवन को नरकगामी तो बना ही लेते हैं, साथ ही साथ अपने 21 कुलों को भी ले डूबते हैं जबकि भक्त तो भक्ति के मार्ग पर दिनोंदिन उन्नति करते हुए अपना जीवन सफल कर लेते हैं।

एक तो आज कल की पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण के युग में संत-भगवंत में श्रद्धा होना कठिन है और अगर थोड़ी बहुत श्रद्धा होती भी है तो कुप्रचारकों की बातें पढ़ सुनकर वह टूट जाती है। कुंठित मन-बुद्धिवाले लोग अनर्गल बातों के चलते ईश्वरतुल्य संत के दर्शन व सत्संग लाभ के लिए एक कदम भी नहीं चल पाते वरन् दूर ही भागते रहते हैं।

अगर भागना ही है तो जीवन को तबाह करने वाले जहरीले तथा जानलेवा व्यसनों से दूर भागो। विषय-विकारों में उलझाकर जीवन के ओज-तेज को नष्ट करने तथा शक्तिहीन-बुद्धिहीन बनाने वाली बुराइयों एवं चलचित्रों से दूर भागो। उन विषय विकारों का त्याग करो जो हमें अंधकार की खाई में ले जाते हैं। उस मोह माया को त्यागो जो हमें संत के द्वार तक पहुँचने से रोकती हैं। लेकिन आज के अच्छे-भले भारतवासी पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आकर अपनी सभ्यता व संस्कृति के आदर्शों एवं व्यवहारों को भूल गये हैं, संत-शरण थता उनके दर्शन व सत्संग के लाभ को भूल गये हैं और दुनिया के मिथ्या व्यवहार की ओर भागे जा रहे हैं।

श्रीकृष्ण जैसे श्रीकृष्ण और श्रीराम जैसे श्रीराम भी जब अवतार लेकर आये तो उन्होंने भी श्रद्धा व नम्रतापूर्वक सदगुरु एवं संत-महापुरुषों के श्रीचरणों में अपने मस्तक झुकाये, उनके आश्रम में रहकर सेवा-साधना की। परन्तु आज के मानव इन सब चीजों से दूर ही भागते फिर रहे हैं।

जो अति कामी हैं, विषयी-विलासी हैं, तुच्छ भोगों में आसक्त हैं वे दूसरे जन्म में को ई कीट-पतंग आदि नीची योनियों में, तो कोई शूकर – कूकर की योनि में पुण्य-पाप की तारतम्यता से कोई घोड़े-गधे आदि पशुओं की योनि में तो कोई वृक्ष आदि योनियों में जन्म लेकर बड़े कष्ट पाते हैं लेकिन जो संतों के श्रीचरणों में श्रद्धापूर्वक शीश झुकाते हैं, उनके बताये हुए मार्ग का अनुसरण कर सेवा-साधना करने लग जाते हैं, उनके वचनों को पचा लेते हैं वे देर-सबेर महान परमेश्वरीय भक्ति, महान् परमात्मज्ञान पाकर मुक्त हो जाते हैं एवं भक्त परमात्मधाम को पा लेते हैं।

कबीर जी ने कहा हैः

संत मिले यह सब मिटे, काल जाल जम चोट।

शीश नमावत ढही पड़े, सब पापन की पोट।।

अतः प्रयत्नपूर्वक संत महापुरुषों में एक भी दोष न देखते हुए, उनके गुणों को अंगीकार करते हुए मानव को अपने जीवन को सार्थक करने का यत्न अभी से शुरु कर देना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2001, पृष्ठ संख्या 9-11, अंक 98

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