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महासंकल्प और वर्तमान संकल्प


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनषज्जते।

सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते।।

ʹजिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है उस काल में सर्व संकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है।ʹ

(श्रीमद् भगवद् गीताः 6-4)

इस श्लोक के द्वारा भगवान स्वयं आपने भगवद-अनुभव की बात बता रहे हैं। भगवान ही भगवत्तत्त्व की बात बता रहे हैं। ʹयह मिले तो सुखी होऊँ….. वह छोड़ूँ तो सुखी होऊँ….ʹ आदि झंझटों से जब मनुष्य छूट जाता है तब वह योगारूढ़ कहा जाता है। कुछ करके सुखी होना यह रजोगुण है, कुछ न करके भी सुख की चाह करना यह तमोगुण है लेकिन ईश्वर के संकल्प में अपना संकल्प मिला देने से संकल्प-विकल्प की भीड़ शांत होने लगती है एवं साधक योगारूढ़ होने में समर्थ हो जाता है। कुछ पाने, देखने, भोगने, करने या न करने के सकंल्पों की पकड़ छूटते ही उसका मन निःसंकल्प नारायण में शांत होने लगता है।

संकल्प दो प्रकार के होते हैं-

महा संकल्प और वर्तमान संकल्प।

मनुष्य का महासंकल्प यह होता है किः ʹमैं कभी दुःखी न रहूँ….. सदा सुखी रहूँ… ऐसी चीज पा लूँ कि फिर पतन न हो….ʹ मानव मन की गहराई में यह महासंकल्प छुपा रहता है। इस महासंकल्प को साकार करने के लिए ही ध्यान, भजन, सत्संग, पूजन, धर्म, कर्म इत्यादि होते हैं।

वर्तमान (तात्कालिक) संकल्प क्या है ? कमा लिया, खा लिया…. इधर गये, उधर गये। यह दो प्रकार का कल होता है। धर्म के अनुकूल और मन के अनुकूल।

जो धर्मानुकूल तात्कालिक संकल्प के अनुसार जीते हैं, उनको महा संकल्प की पूर्ति में मदद मिलती है। जो धर्म-कर्म का आश्रय नहीं लेते और मन में जैसा आये वैसा ही करते हैं उनका महासंकल्प पूरा नहीं होता। वे महासंकल्प की तरफ चलने की इच्छा तो करते हैं किन्तु पहुँच नहीं पाते।

चली चलो सब कोउ कहे, विरला पहुँचा कोय।

एक कंचन एक कामिनी, बीचे घाटी दोये।।

कोई थोड़ा ईश्वर के रास्ते चला, सफलता मिली, धन बढ़ा तो और अधिक दुकान-फैक्टरियाँ बढ़ाने में लग जायेगा या विषय-सुख में फँस जायेगा। इन दो घाटियों – कंचन (धन) एवं कामिनी (स्त्री) को पार कर गये तो फिर दूसरी घाटियाँ सामने आयेंगी।

माया तजना सहज है, सहज नारी का नेह।

मान-बड़ाई ईर्ष्या, दुर्लभ तजना एह।।

मान बड़ाई और ईर्ष्या भी महासंकल्प की पूर्ति में विघ्न डालते हैं। यदि मान बड़ाई परेशान करें तो याद रखें-

अभिमानं सुरापानं गौरवं रौरवस्तथा।

प्रतिष्ठा शूकरी विष्ठा त्रीणि त्यक्त्वा सुखी भवेत्।।

ʹअभिमान मदिरापान के समान, गौरव, रौरव नर्क के समान एवं प्रतिष्ठा सुअर की विष्ठा के समान है। अतः तीनों को त्यागकर सुखी हो जायें।ʹ

यदि आपके मन में किसी के प्रति ईर्ष्या होती है तो उसके पास जाकर कह दें किः ʹमुझे माफ करो। मुझे आपको देखकर ईर्ष्या होती है। आप भी प्रार्थना करें और मैं भी प्रार्थना करूँ ताकि आपके प्रति मेरी ईर्ष्या मिट जाये।ʹ

अगर मान बड़ाई, ईर्ष्या – ये छूट गये तो महासंकल्प पूर्ण हो जायेगा। ब्रह्मज्ञानियों का महासंकल्प था तभी तो उन्हें ब्रह्मज्ञान हुआ। भगवान का महासंकल्प है तभी तो वे पने भगवदस्वभाव को जानते हैं। ऐसे ही जब अपना भी महासंकल्प पूरा होगा तो फिर सब दुःखों से सदा के लिए निवृत्ति और परमानंद की प्राप्ति हो जायेगी।

अकाल पुरुष का साक्षात्कार करना यह महासंकल्प है। महासंकल्प क्यों कहा ? सब चाहते हैं कि ʹहम सदा सुखी होंʹ। यह महासंकल्प तभी पूरा होता है जब महान परमात्मा का ज्ञान प्राप्त होता है, इसीलिए इसे महासंकल्प कहा। अतः आप भी महासंकल्प पूरा करने के  लिए तत्पर हो जायें। उन्हीं तात्कालिक संकल्पों को पूरा करें जो कि धर्म एवं शास्त्र के अनुकूल और मर्यादित हों। मान-बड़ाई, ईर्ष्या, काम, क्रोध, लोभ आदि के संकल्पों को कभी भी सहयोग न दें।

ईर्ष्या और संसार के छोटे-मोटे दुःखों से प्रभावित होने के कारण मति मारी जाती है और जब मति मारी जाती है तब तात्कालिक संकल्प और भी तुच्छ होने लगते हैं। महासंकल्प पूरा होने की तो गुंजाइश ही नहीं रहती है अपितु तात्कालिक संकल्प भी तुच्छ होने लगते हैं। अतः सावधानी रखें  कि तुच्छ संकल्प, हल्के संकल्प न उठें। अगर उठ भी जायें तो उन्हें तुच्छ समझकर आप सावधान हो जायें।

प्रतिदिन संकल्प करें किः ʹमेरे तात्कालिक संकल्प ऐसे ही बनें कि मेरा महासंकल्प पूरा हो।ʹ ध्यान रखें कि) ʹमान-बड़ाई में कहीं हम खप तो नहीं रहे ? ईर्ष्या से हमारे हृदय का परमात्मरस नष्ट तो नहीं हो रहा  ? विषय-विकारों में कहीं हम अपना जीवन बरबाद तो नहीं कर रहे ?ʹ इसके लिए अपने ऊपर कड़ी निगरानी रखें, सतत सावधानी रखें, सदैव सजाग रहें।

व्यर्थ के संकल्प न करें। व्यर्थ के संकल्पों से बचने के लिए ʹहरि ૐ….ʹ के गुंजन का भी प्रयोग किया जा सकता है। ʹहरि ૐ…..ʹ के गुंजन में एक विलक्षण विशेषता है कि उससे फालतू संकल्प-विकल्पों की भीड़ कम हो जाती है। ध्यान के समय भी ʹहरि ૐ….ʹ का गुंजन करें फिर शांत हो जायें। मन इधर-उधर भागे फिर गुंजन करें। यह व्यर्थ संकल्पों को हटायेगा एवं महासंकल्प की पूर्ति में मददरूप होगा।

तात्कालिक संकल्पों में भी व्यर्थ संकल्पों की बड़ी भीड़ होती है। व्यर्थ स्फुरणाएँ ही संकल्प बन जाती हैं। फिर कुछ तात्कालिक संकल्प धर्म के अनुकूल होते हैं, कुछ वासना के वेगवाले संकल्प होते हैं। उनमें जरा सावधान रहना पड़ेगा। धर्मानुकूल संकल्पों की पूर्ति महासंकल्प की पूर्ति में सहायक होगी किन्तु वासनायुक्त संकल्पों की पूर्ति में लगे तो महासंकल्प पूर्ण न कर पायेंगे।

अपने दोषों को निकालने का प्रयत्न आपको स्वयं ही करना पड़ेगा। यदि आप स्वयं निकालने में तत्पर नहीं होंगे तो गुरुदेव भी नहीं निकाल सकेंगे। बच्चा यदि अपनी लापरवाही का दोष खुद न निकाले तो शिक्षक कितना भी बढ़िया हो, उसका विकास कैसे होगा ?

शास्त्रकारों ने कहा हैः

मूरख हृदय न चेत, यद्यपि गुरु मिलहिं बिरंचि सम।

ईर्ष्या, मान-बड़ाई आदि से युक्त होकर जिसकी बुद्धि मारी गयी है ऐसे व्यक्ति को यदि ब्रह्माजी भी गुरु के रूप में मिलें तो वह लाभ नहीं ले पायेगा। इसलिए तात्कालिक संकल्प भी शुभ हों, ज्ञानसंयुक्त संकल्प हों, शास्त्रसम्मत संकल्प हों और महासंकल्प की पूर्ति करने वाले हों इसका ध्यान रखें।

प्रतिदिन संकल्प करें किः ʹकुछ भी हो जाये, आज मैं मान और अपमान को पचा लूँगा…. कुछ भी हो जाये, आज मैं विकारों के आवेग में नहीं गिरूँगा… कुछ भी हो जाये, आज मैं ईर्ष्या से संतप्त नहीं होऊँगा… मेरा जो महासंकल्प है उसकी पूर्ति में लगूँगा…. मैं गुरु का शिष्य हूँ, भगवान का भक्त हूँ…. कुछ भी हो जाये, व्यर्थ संकल्पों में आज का दिन बरबाद नहीं करूँगा।ʹ

एक महासंकल्प हो गया तो बाकी के अवांतर संकल्प भी उसी रूप में होते हैं। जैसे, ʹमुझे परमात्मा को पाना है…ʹ यह महासंकल्प हो गया तो बाकी के छोटे-मोटे अवांतर संकल्प उसी के अनुरूप बनेंगे और फालतू संकल्प कम हो जायेंगे। इसलिए प्रतिदिन इस महासंकल्प को पोषण दें किः ʹमुझे तो इसी जन्म में परमात्मा को पाना है, ब्रह्मज्ञान पाना है, ईश्वर का दर्शन करना है, संसारी आकर्षणों से पार होकर समत्वयोग में जागना है….ʹ

महासंकल्प की पूर्ति होने पर अंतःकरण में महान सुख उत्पन्न होता है और संसार से मजे लेकर सुखी होने की भ्रांति चली जाती है। ऐसे महासंकल्प की पूर्ति करने में जो महापुरुष सफल हो जाते हैं, वे सुख लेने के लिए इधर-उधर भटकते नहीं हैं अपितु उनके अंतःकरण से ज्ञान और सुख का दरिया ऐसा छलकता है कि उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी सुख शांति का एहसास करने लगते हैं। वे स्वयं तो तृप्त रहते ही हैं, दूसरों को भी तृप्त करते हैं। वे स्वयं तो तर जाते हैं, दूसरों को भी तारते हैं। स तरति लोकान् तारयति।

………और यह महासंकल्प सबके अंतःकरण में दबा हुआ है। जिसके अंतःकरण में पुण्यों के प्रताप से उस महासंकल्प को पूरा करने का उत्साह जागा होता है, दृढ़ता जागी होती है, वही भगवान का भक्त अथवा सदगुरु का सत्शिष्य योगारूढ़ बन पाता है।

महासंकल्प माना महान सुख, जिसे मौत का बाप भी नहीं छिन सकता। निंदक निंदा कर ले, प्रशंसक प्रशंसा कर ले फिर भी जिसका चित्त महासंकल्प के सुख से परिपूर्ण है वह कभी विचलित नहीं होता। वही जीते जी मुक्तात्मा है, महात्मा है।

महासंकल्प को जितना ज्यादा महत्त्व देंगे, उतना ही साधारण संकल्प का महत्त्व क्षीण होता जायेगा। मान लो, आपने दृढ़ संकल्प कर लिया किः ʹमुझे आश्रम जाना है….ʹ अन्य व्यर्थ संकल्प नहीं फुरेंगे बल्कि अवांतर संकल्प होने लगेंगे किः ʹबस में जाना है… रिक्शा में जाना है…. मोपेड पर जाना है….ʹ ऐसे ही महासंकल्प हो जाये किः ʹमुझे ईश्वर को पाना है….ʹ फिर उसके लिए ʹजप करना है… ध्यान करना है…. संयम से रहना है…. सत्संग करना है…..ʹ ऐसे अनुकूल अवांतर सकंल्प फुरने लगेंगे।

महासंकल्प को महत्त्व देंगे तो अवांतर संकल्प सात्त्विक होंगे, अच्छे होंगे। महासंकल्प का पता नहीं तो मन तात्कालिक संकल्प-विकल्पों में, फिर कुसंकल्पों में चला जायेगा किः ʹइसका बदला लेना है….. इसकी खबर लेनी है…..ʹ आदि। जिनके जीवन में महासंकल्प नहीं जागा, उनके सारे संकल्प व्यर्थ होते हैं। जिनको महासंकल्प का ज्ञान है वे व्यर्थ संकल्पों से यत्नपूर्वक बच जाते हैं। वे व्यर्थ का नहीं खाते, व्यर्थ का नहीं भोगते, व्यर्थ का नहीं सोचते क्योंकि उनका एक महासंकल्प है। फिर उसे महा संकल्प कह दें, ईश्वर प्राप्ति कह दें, ज्ञान प्राप्ति कह दें या योग की पराकाष्ठा कह दें अथवा योगारूढ़ होना कह दें…. एक ही बात है।

एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि महासंकल्प केवल मनुष्य ही कर सकता है। गाय, भैंस आदि पशु, पक्षी तो कभी सोच भी नहीं सकते किः ʹहम सदा के लिए सुखी रहें।ʹ हालाँकि सुख तो भैंस भी चाहती है। प्रतिकूलता से वह भी भागती है लेकिन सदा सुखी रहने की मति उसके पास नहीं होती। केवल मनुष्य ही चाहता है किः ʹमैं सदा सुखी रहूँ।ʹ

मान लो, मैं अपने गुरुदेव की तरफ से कह दूँ किः ʹभगवान करें आप एक साल के लिए बहुत सुखी हें और बाद में आपके पास मुसीबतें आयें !ʹ ….तो आपको अच्छा लगेगा क्या ? ʹपाँच साल तक आप बहुत सुखी रहें, बाद में आप पर दुःख-मुसीबत आये !ʹ…. तो गहरे मन से आप नहीं चाहेंगे कि पाँच साल के बाद आपके जीवन में ऐसा हो। मैं कह दूँ किः ʹभगवान करें कि जीवन भर आप सुखी रहें किन्तु मरने के बाद आप घोर नरक में जायें !ʹ नहीं, आपको यह भी अच्छा नहीं लगेगा। ….तो यह महासंकल्प है कि आप जीते-जी भी सुख चाहते हैं और मरने के बाद भी सुख चाहते हैं, दुःख नहीं चाहते। आप परम सुख और सदा रहने वाला सुख चाहते हैं। यही महासंकल्प है।

गर्मी लग रही है और पंखा चला दिया तो तात्कालिक दुःख निवृत्त हुआ। भूख लगी और रोटी खायी तो तात्कालिक भूख निवृत्त हुई लेकिन सदा के लिए तृप्ति नहीं होगी। ऐसे ही तुच्छ तात्कालिक संकल्पों की पूर्ति में समय न गँवाएँ। उन पर नियंत्रण रखें। धर्मानुकूल तात्कालिक संकल्पों की ही पूर्ति करें। तात्कालिक संकल्प अधिक होंगे तो महासंकल्प के लिए जो योग्यता चाहिए, वह नहीं आयेगी।

जप, ध्यान, उपासना, सत्संग आदि से तात्कालिक संकल्पों में तो सामर्थ्य आयेगा ही, महासंकल्प की पूर्ति में भी मदद मिलेगी। ʹहम सदा सुखी रहें….ʹ यह महासंकल्प तो समझ लिया लेकिन इस दिशा में यात्रा करने के लिए आप सजग रहना ताकि आपके संकल्प का बल बढ़े। जिनके संकल्प में बल हैं तो वे एक महापुरुष अपने संकल्प के बल से हजारों लाखों व्यक्तियों को अपनी बात समझा सकते हैं, मनवा सकते हैं। जिनके संकल्प में बल नहीं, उनकी बातें श्रद्धा से कौन सुनेगा ? उनकी बात कौन मानेगा ? जिन्होंने अपना महा संकल्प पूर्ण कर लिया है फिर बल तो उनका स्वभाव बन जाता है। महासंकल्प की पूर्ति होने पर योगी का योग सिद्ध हो जाता है, भक्त की भक्ति सफल हो जाती है और ज्ञानी को ज्ञान की पराकाष्ठा मिल जाती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2001, पृष्ठ संख्या 8-11, अंक 97

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शीत ऋतु का सूखा मेवाः अंजीर


अञ्जीर की लाल, काली, सफेद और पीली ये चार प्रकार की जातियाँ पायी जाती हैं। इसके कच्चे फलों की सब्जी बनती है। पके अंजीर का मुरब्बा बनता है। अधिक मात्रा में अंजीर खाने से यकृत(Liver) एवं जठर को नुकसान होता है। बादाम खाने से अञ्जीर के दोषों का शमन होता है।

गुण-धर्मः पके, ताजे अञ्जीर गुण में शीतल, स्वाद में मधुर, स्वादिष्ट एवं पचने में भारी होते हैं। ये वायु एवं पित्तदोष का शमन करते हैं एवं रक्त की वृद्धि करते हैं। ये रस एवं विपाक में मधुर एवं शीतवीर्य होते हैं। भारी होने के कारण कफ एवं आमवात के रोगों की वृद्धि करते हैं एवं मंदाग्नि करते हैं। ये कृमि, हृदयपीड़ा, रक्त-पित्त, दाह एवं रक्तविकारनाशक हैं। ठंडे होने के कारण नकसीर फूटने में, पित्त रोगों में एवं मस्तक के रोगों में विशेष लाभप्रद होते हैं।

सूखे अंजीर में उपरोक्त गुणों के अलावा शरीर को स्निग्ध करने, वायु की गति को ठीक करने एवं श्वास रोग का नाश करने के गुण भी विद्यमान होते हैं।

सभी सूखे मेवों में देह को सबसे ज्यादा पोषण देने वाला मेवा अंजीर है। इसके अलावा यह देह की कांति तथा सौन्दर्य बढ़ाने वाला है, पसीना उत्पन्न करता है एवं गरमी का शमन करता है।

अंजीर को बादाम एवं पिस्ता के साथ खाने से बुद्धि बढ़ती है और अखरोट के साथ खाने से विष-विकार दूर होते हैं।

आधुनिक विज्ञत्रान के मतानुसार अंजीर बालकों की कब्जियत मिटाने के लिए विशेष उपयोगी है। कब्जियत के कारण जब मल आँतों में सड़ने लगता है, तब उसके जहरीले तत्त्व रक्त में मिल जाते हैं और रक्तवाही धमनियों में रूकावट डालते हैं जिससे शरीर के सभी अंगों में रक्त नहीं पहुँचता। इसके फलस्वरूप शरीर कमजोर हो जाता है एवं दिमाग, नेत्र, हृदय, जठर, बड़ी आँत आदि अंगों में रोग उत्पन्न हो जाते हैं। शरीर दुबला-पतला होकर जवानी में ही वृद्धत्व नज़र आने लगता है। ऐसी स्थिति में अंजीर का उपयोग अत्यंत लाभदायी होता है। यह आँतों की शुद्धि करके रक्त बढ़ाता है एवं रक्त परिभ्रमण को सामान्य बनाता है।

किसी बालक ने काँच, पत्थर अथवा ऐसी अन्य कोई अखाद्य ठोस वस्तु निगल ली हो तो उसे रोज एक से दो अंजीर खिलायें। इससे वह वस्तु मल के साथ बाहर निकल जायेगी। अंजीर चबाकर खाना चाहिए।

अंजीर में विटामिन ʹएʹ पाया जाता है। इस कारण यह आँख के प्राकृतिक गीलेपन को बनाये रखता है।

औषधि प्रयोग

रक्तशुद्धि के लिएः 3-4 पके हुए अंजीर को छीलकर आमने-सामने दो चीरे लगा दें और उसमें मिश्री का चूर्ण भर दें एवं रात्रि को खुले आकाश में ओस से तर  होने के लिए कहीं रख दें। प्रातःकाल उसका सेवन करें। इस प्रयोग से रक्त की गर्मी नष्ट होगी एवं रक्त शुद्ध होगा।

रक्तवृद्धिः 4 अंजीर एवं 11 सूखी काली द्राक्ष को 100 से 200 मि.ली. गाय के दूध में उबालें। एक उबाल आने पर वह दूध पी लें एवं अंजीर तथा द्राक्ष को चबाकर खा जायें। इससे कब्जियत दूर होती है, आँतों को बल मिलता है, भूख बढ़ती है एवं रक्त शुद्ध होता है। एक से दो महीने तक यह प्रयोग करें।

रक्तस्रावः शरीर के किसी भी भाग से रक्तस्राव होता हो तो 2 से 6 अंजीर को 50 मि.ली. पानी में भिगोकर पीस लें। इसके बाद उसमें 20 ग्राम दुर्वा घास का रस एवं 10 ग्राम मिश्री मिलाकर सुबह शाम पियें। ज्यादा रक्तस्राव हो तो खस एवं धनिया के पाउडर को पानी में पीसकर ललाट पर एवं हाथ-पैर के तलुओं में लेप करें। इससे लाभ होता है।

मंदाग्नि एवं उदररोगः जिनकी पाचनशक्ति मंद हो, दूध न पचता हो उन्हें 2 से 4 अंजीर रात्रि में पानी में भिगोकर सुबह चबाकर खाना चाहिए एवं वह पानी पी  लेना चाहिए।

कब्जियतः प्रतिदिन 5 से 6 अंजीर को उसके टुकड़े करके 250 मि.ली. पानी में भिगो दें। सुबह उस पानी को उबालकर आधा कर दें और पी जायें। पीने के बाद अंजीर चबाकर खायें तो थोड़े ही दिनों में कब्जियत दूर होकर पाचनशक्ति बलवान होगी। बच्चों के लिए 1 से 3 अंजीर पर्याप्त हैं।

बवासीरः 2 से 4 अंजीर रात को पानी में भिगोकर सुबह खायें और सुबह भिगोकर शाम को खायें। इस प्रकार प्रतिदिन करने से खूनी बवासीर में लाभ होता है। अथवा, अंजीर, काली द्राक्ष (सूखी), हरड़ एवं मिश्री को समान मात्रा में लेकर उसे कूटकर सुपारी जितनी बड़ी गोली बना लें। प्रतिदिन सुबह-शाम एक-एक गोली का सेवन करने से भी लाभ होता है।

बहुमूत्रताः जिन्हें बार-बार ज्यादा मात्रा में ठंडी एवं सफेद रंग की पेशाब आती हो, कंठ सूखता हो, शरीर दुर्बल होती जा रही हो तो रोज प्रातःकाल 2 से 4 अंजीर खाने के बाद ऊपर से 10 से 15 ग्राम काला तिल चबा कर खायें। इससे आराम मिलता है।

मूत्रकृच्छता(मूत्राल्पता)- 1 या 2 अंजीर में 1 या 2 ग्राम कलमी सोडा मिलाकर प्रतिदिन सुबह खाने से मूत्राल्पता में लाभ होता है।

श्वास (गर्मी का दमा)- 6 ग्राम अंजीर एवं 3 ग्राम गोरख इमली का चूर्ण सुबह शाम खाने से इसमें लाभ होता है। श्वास के साथ खाँसी भी हो तो उसमें 2 ग्राम जीरे का चूर्ण मिलाकर लेने से ज्यादा लाभ होगा।

शीत ऋतु में देहपुष्टि हेतु अंजीरपाक

50 ग्राम सूखे अंजीर लेकर उसके 6-8 छोटे टुकड़े कर लें। 500 ग्राम देशी घी गर्म करके उसमें अंजीर के वे टुकड़े डालकर 200 ग्राम मिश्री का चूर्ण मिला दें। इसके पश्चात उसमें बड़ी इलायची 5 ग्राम, चारोली, बलदाणा एवं पिस्ता 10-10 ग्राम तथा 20 ग्राम बादाम के छोटे-छोटे टुकड़ों को ठीक ढंग से मिश्रित कर काँच की बर्नी में भर लें। अंजीर के टुकड़े घी में डुबे रहने चाहिए। घी कम लगे तो उसमें और ज्यादा घी डाल सकते हैं।

यह मिश्रण आठ दिन तक बर्नी में पड़े रहने से अंजीरपाक तैयार हो जाता है। इस अंजीरपाक को प्रतिदिन सुबह 10 से 20 ग्राम की मात्रा में खाली पेट खायें। शीत ऋतु में शक्ति संचय के लिए यह अत्यंत पौष्टिक पाक है। यह अशक्त एवं कमजोर व्यक्ति का रक्त बढ़ाकर धातु को पुष्ट करता है।

अश्वगंधा

अश्वगंधा एक बलवर्धक व पुष्टिदायक श्रेष्ठ रसायन है। यह मधुर व स्निग्ध होने के कारण  वात का शमन करने वाली एवं रस, रक्त आदि सप्त धातुओं का पोषण करने वाली है। इससे विशेषतः मांस व शुक्रधातु की वृद्धि होती है।

इसमें कैल्शियम व लौह तत्त्व भी प्रचुर मात्रा में होते हैं। अतः कुपोषण के कारण बालकों में होने वाले सूखा रोग, मांसपेशियों व बुढ़ापे की कमजोरी, थकान, रोगों के बाद की कृशता आदि में यह अत्यंत उपयुक्त औषधि है। इसके निरन्तर उपयोग से शरीर का समग्र रूप से शोधन होता है एवं जीवनी शक्ति बढ़ती है। नित्य प्रातः 1 से 3 ग्राम चूर्ण दूध में मिलाकर लेने से शरीर में लाल रक्तकणों की वृद्धि होती है।

कुपोषण के कारण बालकों में होने वाले सूखा रोग में यह अत्यन्त लाभदायी औषधि है। इसका 1 से 3 ग्राम चूर्ण एक माह तक दूध, घी या पानी के साथ लेने से बालक का शरीर उसी प्रकार पुष्ट हो जाता है जैसे वर्षा होने पर फसल लहलहा उठते हैं।

क्षयरोग व पक्षाघात में अन्य औषधियों के साथ बल्य के रूप में इसे गोघृत और मिश्री के साथ लिया जा सकता है। अश्वगंधा अत्यंत वाजीकारक अर्थात् शुक्रधातु की त्वरित वृद्धि करने वाला रसायन है। इसके 2 ग्राम चूर्ण को घी व मिश्री के साथ लेने से शुक्राणुओं की वृद्धि होती है एवं वीर्यदोष दूर होते हैं।

एक ग्राम चूर्ण दूध व मिश्री के साथ लेने पर नींद अच्छी आती है। मानसिक या शारीरिक थकान के कारण नींद न आने पर इसका उपयोग किया जा सकता है।

अश्वगंधा, ब्राह्मी तथा जटामांसी समान मात्रा में मिलाकर इसका 1 से 3 ग्राम चूर्ण शहद के साथ लेने से उच्च रक्तचाप कम होने लगता है। इस प्रयोग से नींद भी अच्छी आती है। आहार में नमक कम लें।

गर्भाधारण के बाद चौथे, पाँचवें तथा छठें महीने में अश्वगंधा और शतावरी का एक-एक चम्मच चूर्ण समान मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम गाय के दूध के साथ लेने से बालक का पोषण अच्छी तरह से होता है। प्रसूति के बाद भी वह प्रयोग चालू रखें। इससे बालक के पोषणार्थ आवश्यक कैल्शियम एवं लौह तत्त्व की पूर्ति होती है।

सभी लोग इस पौष्टिक वनस्पति का फायदा ले सकते हैं। हजारों-लाखों रूपयों की विदेशी औषधियाँ शरीर को उतना निर्दोष फायदा नहीं पहुँचातीं, उतना पोषण नहीं देतीं, जितना पोषण अश्वगंधा देती है। अश्वगंधा कम दाम पर सबी साधकों तक पहुँच सके ऐसी आज्ञा बापू जी ने औषध निर्माण केन्द्र व समितियों को दी है। बाजार में यह 28 रूपये का 80 ग्राम मिलता है लेकिन अपना औषध निर्माण केन्द्र 20 रूपये में 100 ग्राम देता है। यह अश्वगंधा बल-वीर्यवर्धक है, तमाम गुणों से युक्त है। मेथीपाक अथवा अन्य किसी भी पाक में डालकर इसका उपयोग कर सकते हैं।

सर्दी के लिए पौष्टिक किसी भी एक कि.ग्रा. पाक में 50 से 100 ग्राम अश्वगंधा डाल सकते हैं। इससे उस पाक की पौष्टिकता में कई गुना वृद्धि हो जायेगी।

(साँईं श्री लीलाशाह जी उपचार केन्द्र, जहाँगीरपुरा, वरियाव रोड, सूरत)

क्या आप जानते हैं साबूदाने की असलियत को ?

आमतौर पर साबूदाना शाकाहारी कहा जाता है तथा व्रत-उपवास में इसका काफी प्रयोग होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि साबूदाना शाकाहार होने पर भी पवित्र नहीं है ?

यह सच है कि साबूदाना (Tapioca) ʹकसावाʹ के गूदे से बनाया जाता है परन्तु इसकी निर्माणविधि इतनी अपवित्र है कि इसे शाकाहार एवं स्वास्थ्यप्रद नहीं कहा जा सकता।

साबूदाना बनाने के लिए सबसे पहले कसावा को खुले मैदान में बनी कुण्डियों में डाला जाता है तथा रसायनों की सहायता से उन्हें लम्बे समय तक सड़ाया जाता है। इस प्रकार सड़ने से तैयार हुआ गूदा महीनों तक खुले आसमान के नीचे पड़ा रहता है। रात में कुण्डियों को गर्मी देने के लिए उनके आस-पास बड़े-बड़े बल्ब जलाये जाते हैं। इससे बल्ब के आसपास उड़ने वाले कई छोटे-छोटे जहरीले जीव भी इन कुण्डियों में गिरकर मर जाते हैं।

दूसरी ओर इस गूदे में पानी डाला जाता है जिससे उसमें सफेद रंग के करोड़ों लम्बे कृमि पैदा हो जाते हैं। इसके बाद उस गूदे को मजदूरों के पैरों के रौंदया जाता है। इस प्रक्रिया में गूदे में गिर हुए कीट पतंग तथा सफेद कृमि भी उसी में समा जाते हैं। यह प्रक्रिया कई बार दोहरायी जाती है।

इसके बाद कई मशीनों में डाला जाता है और मोती जैसे चमकीले दाने बनाकर साबूदाना का नाम-रूप दिया जाता है परन्तु इस चमक में अपवित्रता छिपी होती है जो सभी को नहीं दिखायी देती।

(संकलित)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2000, पृष्ठ संख्या 27-30 अंक 95

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भक्ति की महिमा


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

श्रीकृष्ण कहते हैं-

न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।

न स्वाध्यायस्तपस्तयागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता।।

ʹउद्धव ! योग-साधन, ज्ञान-विज्ञान, धर्मानुष्ठान, जप-पाठ और तप-त्याग मुझे प्राप्त कराने में उतने समर्थ नहीं हैं जितनी दिनों-दिन बढ़ने  वाली अनन्य प्रेममयी मेरी भक्ति।ʹ (श्रीमद् भागवतः 11.14.20(

भले ही कोई धन-दौलत के अंबार पर खड़ा हो, बड़ा सत्ताधीश हो उसका हृदय तो तपता ही रहता है लेकिन जिसको भगवान की भक्ति का छोटा-सा भी सूत्र मिल जाता है, उसके हृदय में शांति होती है, शीतलता होती है, तृप्ति होती है।

अधिक धन मिलने से, बड़ी सत्ता मिलने से, अधिक अधिकार मिलने से कोई व्यक्ति सुखी हो जाये ऐसी बात नहीं है। धन, सत्ता व अधिकार के बिना भी यदि हृदय में भगवद् प्रीति हो, संतों के लिए प्रेम हो, सत्कर्म में रूचि हो और परमेश्वर को पाने की ललक हो तो वह व्यक्ति तो धन्य है ही, उसके माता-पिता धन्य हैं, उसका कुल धन्य है और वह जिस घऱ में रहता है वह धरती भी धन्य मानी जाती है।

भक्ति के बिना मनुष्य पशु से भी बदतर है। पशु को बेटे-बेटी की शादी की कोई चिंता नहीं होती, महँगाई की कोई चिंता नहीं होती, तबादले का कोई तनाव नहीं होता। ʹनो इन्कमटैक्सʹ…. ʹनो सेल्सटैक्सʹ… ʹनो सरचार्जʹ…. ʹनो अदर चार्जʹ…. उसे कोई चिन्ता नहीं होती, जबकि मनुष्य को ये सब चिंताएँ होती हैं।

गाय कभी गाली नहीं देती, हाथी कभी झूठ नहीं बोलता, पहाड़ कभी चोरी नहीं करता फिर वे वही के वहीं हैं। जबकि मनुष्य गाली भी देता है, झूठ भी बोलता है, चोरी भी करता है फिर भी सभी से ऊँचा माना जाता है क्योंकि वह चाहे तो जप-तप करके, साधन-भजन करके, सत्संग-स्वाध्याय करके महान भी बन सकता है।

मनुष्य के गिरने की नौबत आ जाती है लेकिन उसे सत्संग मिल जाये, संत-सान्निध्य मिल जाये तो वह इतना ऊँचा उठ जाता है कि भगवान का सखा बन जाता है, मित्र बन जाता है, सत्पुरुष भी बन जाता है। अरे ! भगवान का माई-बाप भी बन जाता है।

शास्त्र में आता हैः भजनस्य किं लक्षणम् ? भजन का लक्षण क्या है ?

भजनस्यं लक्षणम् रसनम्। अंतरात्मा का रस जिससे उभरे, उसका नाम है भजन।

वस्तु, व्यक्ति, भोग-सामग्री के बिना भी हृदय में जो आनंद आता है, रस आता है वह भजन का रस है। वस्तु के बिना, व्यक्ति के बिना, विशेष परिस्थिति के बिना ही आपके हृदय में अपने अंतर्यामी आत्मदेव का रस आने लगे तो समझना कि भजन हो रहा है।

ताल-लय के साथ राग अलापने का नाम भजन नहीं है, माला घुमाने का नाम भजन नहीं है लेकिन हृदय में अंतरात्मा का रस प्रगट हो जाये तो समझना कि भजन हो रहा है। फिर चाहे शबरी भीलन की भाँति प्रभु के लिए बुहारी करते हो तो भजन है, शिवाजी की तरह गुरुआज्ञा मानकर शत्रुओं से भिड़ते हो तो भी भजन है और हनुमान जी की नाँई प्रभुसेवा में लंका जला देते हो तो भी भजन है। बस, अंतःकरण से शुद्ध रस प्रगट हो जाये तो समझना कि हो गया भजन।

मनु महाराज कहते हैं किः “मनुष्य को तब तब सत्कर्म और निष्काम कर्म खोज-खोजकर करने चाहिए जब तक आत्मसंतोष न हो, आत्मरस न प्रगटे।”

जब आत्मरस प्रगट होता है तो भजन अपने आप हो जाता है, भक्त भगवद्-कृपा का अधिकारी हो जाता है। भगवान की कृपा के आगे दुनिया का पाप क्या महत्त्व रखता है ? ऐसा कौन-सा अपराध है जो भगवान की कृपा से बड़ा हो ? ऐसा कौन सा रोग है जो परमात्मा से बड़ा हो ? भगवान कहते हैं-

यथाग्निः सुसमृद्धार्चिः करोत्येधांसि भस्मसात्।

तथा मद्विषया भक्तिरूद्धवैनांसि कृत्स्नशः।।

ʹउद्धव ! जैसे धधकती हुई आग लकड़ियों के बड़े ढेर को जलाकर खाक कर देती है, वैसे ही मेरी भक्ति भी समस्त पाप-राशि को पूर्णतया जला डालती है।ʹ (श्रीमद् भागवतः 11.14.19)

भक्ति फलरूपा भी है, रसरूपा भी है। भक्ति रस भी देती है और मुक्ति का फल भी देती है। भक्ति करते समय भी रस आता है और अंत में फल भी भगवत्प्राप्ति का मिलता है।

कर्म में प्रतिवाद आये तो प्रायश्चित करना पड़ता है लेकिन भक्ति में प्रतिवाद का प्रायश्चित नहीं करना पड़ता है क्योंकि भगवान समझते हैं किः ʹबच्चा है, कोई बात नहीं। मुझे प्रेम करता है न !ʹ प्रेम में कोई नियम नहीं होता। बच्चे की नाक बहती है, वह गंदगी कर देता है फिर भी माँ समझती है कि ʹबच्चा है, अपना है।ʹ उसे प्रेम से उठाकर उसकी गंदगी साफ कर देती है। ऐसे ही भगवान के होकर जीते हैं तो भगवान भी कहते हैं- ʹचलो जाने दो अपना ही बालक है।ʹ

जिसके जीवन में क्रूरता नहीं है, हिंसा नहीं है, असहिष्णुता नहीं है, द्वेष नहीं है एवं भगवान के लिए प्रीति है, जो भगवान के प्रभाव को, दयालुता को, सर्वव्यापकता को जानता है और भगवान के अटल-अविनाशी नियम को मानता है उसके हृदय में स्वाभाविक ही प्रसन्नता, निःस्वार्थता, नम्रता, सरलता, परदुःखकातरता आदि सदगुण आ जाते हैं।

फलरूपा और रसरूपा भक्ति भगवदर ले आती है और जब भगवदरस आता है तब भगवान के गुण भी स्वाभाविक ही आ जाते हैं। जैसे, सूर्योदय से पहले आकाश में लालिमा छा जाती है फिर सूर्य उदय होता है, ऐसे ही भगवददर्शन के पहले हृदय में भक्ति आती है और भगवान के गुण भी आ जाते हैं। भक्त के जीवन में अमानीत्व आ जाता है। ऑफिस में चाहे कोई कितना भी बड़ा साहब होकर, कुर्सी पर बैठकर कार्य करे लेकिन संतों की सभा में जाकर वह भी सरलता से जमीन पर बैठता है। अमानीत्व, अदांभित्व, सरलता, विनम्रता, परदुःखकातरता आदि सदगुण सहज ही भक्त के जीवन में आ जाते हैं और इन सदगुणों का रस भी उसके जीवन में आ जाता है।

कबीरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोई।

ʹआप ठगे सुख उपजे, और ठगे दुःख होई।।

भक्त को बाहर से भले थोड़ा घाटा पड़े, फिर भी वह भीतर से दूसरे का हित करता है। ऐसा करने से बाहर की वस्तु भले थोड़ी कम हो जाये लेकिन भीतर की जो खुशी मिलती है, भीतर का जो बल बढ़ता है और भीतर का जो आनंद आता है उसे भक्त ही जानता है।

जो भक्ति के रास्ते चलते हैं उऩकी कुटिलता हटती जाती है, सरलता बढ़ती जाती है, हिंसात्मक वृत्ति मिटती जाती है। अहिंसात्मक वृत्ति बढ़ती जाती है। हिंसा करना तमोगुण है, प्रतिहिंसा करना रजोगुण है, अहिंसा सत्त्वगुण है। भक्ति करने से सत्त्व गुण बढ़ता है।

भक्त कभी कभार जरूरत पड़ने पर प्रतिक्रिया करता भी है लेकिन हिंसा की वृत्ति से नहीं, वरन् सामने वाले की भलाई के लिए करता है ताकि उसकी गलती दूर हो और वह सत्य की ओर चल पड़े।

भक्ति में यह ताकत है कि वह जीव को संसारी विषय-विकारों के सुख में नहीं, वरन् आत्मा परमात्मा के सुख में पहुँचा देती है, परम सुखस्वरूप, परम रसस्वरूप परमात्मा के अनुभव में जगा देती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2000, पृष्ठ संख्या 5,6 अंक 95

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