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निःस्वार्थ सेवा


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में हमारे शास्त्र कहते हैं कि जब भगवान नारायण के नाभिकमल से ब्रह्माजी का प्रागट्य हुआ तब ब्रह्माजी दिग्मूढ़ की स्थिति में पड़ गये। वे समझ नहीं पा रहे थे किः ʹमेरा प्रादुर्भाव क्यों हुआ ? मुझे क्या करना है ?ʹ तभी आकाशवाणी हुईः तप कर…. तप… तप कर…

तत्पश्चात ब्रह्माजी समाधि में स्थित हुए। उससे सामर्थ्य प्राप्त करके उन्होंने अपने संकल्प से इस सृष्टि की रचना की। अर्थात् हमारी सृष्टि की उत्पत्ति तप से हुई है। इसका मूल स्थान तप है।

हमारे सत्शास्त्रों में अनेक प्रकार के तप बताये गये हैं। उनमें से एक महत्त्वपूर्ण तप है निष्काम कर्म, सेवा, परोपकार। इसी तप को भगवान श्री कृष्ण ने गीता में ʹकर्मयोगʹ कहा तथा ज्ञान, भक्ति और योग की भाँति इस साधना को भी भगवत्प्राप्ति, मोक्षप्राप्ति में समर्थ बताया।

व्यक्ति अपने तथा अपने परिवार के प्रति तो उदार रहता है परन्तु दूसरों की उपेक्षा करता है। वह स्वयं को दूसरों से भिन्न मानता है। इसी का नाम अज्ञान, माया है। जन्म-मरण का, शोक-कष्ट का, उत्पीड़न व भ्रष्टाचार आदि पापों का यही मूल कारण है। भेदभाव और द्वेष ही मृत्यु है तथा अभेद, अनेकता में एकता, सबमें एक को देखना, सबकी उन्नति चाहना ही जीवन है।

समस्त बुराइयों का मूल है स्वार्थ और स्वार्थ अज्ञान से पैदा होता है। स्वार्थी मनुष्य जीवन की वास्तविक उन्नति एवं ईश्वरीय शांति से बहुत दूर होता है। न तो उसमें श्रेष्ठ समझ होती है और न ही उत्तम चरित्र। वह धन और प्रतिष्ठा पाने की ही योजनाएँ बनाया करता है।

मनुष्य के वास्तविक कल्याण में स्वार्थ बहुत बड़ी बाधा है। इस बाधा को निःस्वार्थ सेवा एवं सत्संग के द्वारा निर्मूल किया जाता है। स्वार्थ में यह दुर्गुण है कि वह मन को संकीर्ण तथा हृदय में ʹमैं और मेरेʹ की लघुग्रंथि होती है तब तक सर्वव्यापक सत्ता की असीम सुख-शांति नहीं मिलती और हम अदभुत पवित्र प्रेरणा प्राप्त नहीं कर पाते। इसके लिए हृदय का व्यापक होना आवश्यक है। इसमें निःस्वार्थ सेवा एक अत्यन्त उपयोगी साधन है।

निष्काम कर्म जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करने की पहली सीढ़ी है। इसके अभ्यास से चित्त की शुद्धि होती है तथा भेदभाव मिटता है। सबमें ईश्वर की भावना दृढ़ होते ही ʹअहंʹ की लघुग्रन्थि टूट जाती है और सर्वत्र व्याप्त ईश्वरीय सत्ता से जीव का एकत्व हो जाता है। भगवद् भाव से सबकी सेवा करना यह एक बहुत बड़ा तप है।

ʹईशावास्योपनिषद्ʹ में आता हैः

ईशावास्यमिदंसर्वं यत् किं च जगत्यां जगत्।

तेन त्यक्तेन भुंजीथाः मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।।

ʹअखिल ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी जड़-चेतनरूप जगत है वह ईश्वर से व्याप्त है। उस ईश्वर को साथ रखते हुए इसे त्यागपूर्वक भोगो। किसी भी धन अथवा भोग्य पदार्थ में आसक्त मत होओ।ʹ

यहाँ पर ʹत्यागʹ पहले है और ʹभोगʹ बाद में। यदि व्यक्ति अपने परिवार में ही आसक्त रहे तो वह विश्वप्रेम विकसित नहीं कर सकेगा, विश्वभ्रातृत्व नहीं पनपा सकेगा। सभी के बच्चे अपने बच्चों के समान नहीं लगेंगे। व्यक्ति का प्रेम, जो व्यापक ईश्वर सत्ता को अपने हृदय में प्रगट कर सकता है वह प्रेम नश्वर परिवार के मोह में ही फँसकर रह जायेगा।

परमार्थ को साधने के लिए, कलह, अशांति तथा सामाजिक दोषों को निर्मूल करने के लिए विश्वप्रेम को विकसित करना होगा। संकुचितता को छोड़कर हृदय को फैलाना होगा। सुषुप्त शक्तियों को प्रगट करने का यही सबसे सरल उपाय है।

जिसका प्रेम विश्वव्यापी हो गया है उसके लिए सभी समान हैं। समस्त ब्रह्माण्ड उसका घर होता है। उसके पास जो कुछ है, सबके साथ बाँटकर उसका उपयोग करता है। दूसरों के हित के लिए अपना हित त्याग देता है। कितना भव्य व्यक्तित्व है उस महामानव का ! वह तो धरती पर साक्षात् भगवान है।

सरिताएँ सबको ताजा जल दे रही हैं। वृक्ष छाया, फल तथा प्राणवायु दे रहे हैं। सूर्य प्रकाश, ऊर्जा एवं जीवनीशक्ति प्रदान करता है।  पृथ्वी सभी को शरण तथा धन-धान्य देती है। पुष्प सुगंध देते हैं। गायें पौष्टिक दूध देती हैं। प्रकृति के मूल में त्याग की भावना निहित है।

निःस्वार्थ सेवा के द्वारा अद्वैत की भावना पैदा होती है। दुःखियों के प्रति शाब्दिक सहानुभूति दिखाने वालों से तो दुनिया भरी पड़ी है परन्तु जो दुःखी को अपने हिस्से में से दे दे ऐसे कोमलहृदय लोग विरल ही होते हैं।

निःस्वार्थ सेवा चित्त के दोषों को दूर करती है, विश्वचैतन्य के साथ एकरूपता की ओर ले जाती है। जिसका चित्त शुद्ध नहीं है, वह भले ही शास्त्रों में पारंगत हो, वेदान्त का विद्वान हो, उसे वेदान्तिक शांति नहीं मिल सकती।

सेवा का हेतु क्या है ? चित्त की शुद्धि… अहंकार, द्वेष, ईर्ष्या, घृणा आदि कुभावों की निवृत्ति…. भेदभाव की समाप्ति। इससे जीवन का दृष्टिकोण एवं कर्मक्षेत्र विशाल होगा, हृदय उदार होगा, सुषुप्त शक्तियाँ जागृत होंगी, विश्वात्मा के प्रति एकता के आनंद की झलकें मिलने लगेंगीं। ʹसबमें एक और एक में सब…ʹ की अऩुभूति होगी। इसी भावना के विकास से राष्ट्रों में एकता आ सकती है, समाजों को जोड़ा जा सकता है, भ्रष्टाचा की विशाल दीवार को गिराया जा सकता है, हृदय की विशालता द्वारा वैश्विक एकता को स्थापित किया जा सकता है तथा अखूट आनंद के असीम राज्य में प्रवेश पाकर मनुष्य जन्म सार्थक किया जा सकता है

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2000, पृष्ठ संख्या  13,14 अंक 90

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ध्यान का रहस्य


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

ध्यान माने क्या ? हमारा मन नेत्रों के द्वारा जगत में जाता है, सबको निहारता  है तब जाग्रतावस्था होती है, ʹहिताʹ नाम की नाड़ी में निहारता है तब स्वप्नावस्था होती है और जब हृदय में विश्रांति करता है तब सुषुप्तावस्था होती है। ध्यानावस्था न जाग्रतावस्था है, न स्वप्नावस्था है और सुषुप्तावस्था है वरन् ध्यान चित्त की सूक्ष्म वृत्ति का नाम है। सूक्ष्म वृत्ति हो जाने पर शरीर से ʹमैं पनाʹ हट जाता है।

इसका मतलब यह नहीं कि जब ध्यान करते हो तब जड़ हो जाते हो या तुमको कुछ पता नहीं चलता। तुम नाचते हो, गाते हो, रोते हो… उसका ऊपर-ऊपर से पता नहीं चलता है लेकिन अंदर से सब पता चलता है। तुम्हारी ताल से विपरीत कोई ताल देता है तो ध्यान का ताल टूट भी जाता है। ध्यान करने वाला ध्यानावस्था में जड़ नहीं होता है, बेवकूफ नहीं रहता है वरन् उसकी चित्त की वृत्ति सूक्ष्म और आनंद-प्रेमप्रधान हो जाती है। वही वृत्ति जब जाग्रत में आ जाती है तो जाग्रत के व्यवहार में भी ठीक से सँभलकर रहती है।

परमात्म-ध्यान से अंतरात्मा की शक्ति जागृत होती है एवं स्मृतिशक्ति बढ़ती है। ध्यान करने से दुर्गुण दूर होते हैं एवं सदगुण बढ़ते हैं। ध्यान करने से पाप नष्ट होते हैं, निर्भयता बढ़ने लगती है, परमात्मा का सुख उभरता है, परमात्मा का ज्ञान निखरता है। ध्यान करने से परमात्मा का आनन्द आता है और ध्यान दृढ़ होने से  परमात्मा स्वयं प्रगट हो जाते हैं।

चंचल-दुर्बल रहने से भगवान नहीं मिलते, न ही बड़े छोटे होने से भगवान मिलते है। चिंता करने से भी भगवान नहीं मिलते, न ही ʹहा-हा…ही-ही….ʹ करने से भगवान मिलते हैं। भगवान तो मिलते हैं जप-ध्यान से, भक्ति-ज्ञान से।

हम जैसे रोज-रोज खाते हैं, रोज-रोज सोते उठते हैं, रोज-रोज जगत का व्यवहार करते हैं वैसे ही रोज-रोज परमात्मा का ध्यान भी करना चाहिए। रोज-रोज परमात्मा का जप सुमिरन करना चाहिए। रोज-रोज सत्संग-स्वाध्याय करना चाहिए एवं अपने आपको अंतर्मुख करने का यत्न करना चाहिए।

कई लोग ध्यान के समय आँखें खोलकर इधर-उधर देखते रहते हैं, वे उस समय चूक जाते हैं। आँखें खोलकर इधर-उधर निहारने से वृत्ति बहिर्मुख रहती है।

जिसकी वृत्ति अंतर्मुख हो गयी है उसको जप से क्या लेना-देना ? जिसकी वृत्ति शांत हो गयी है, उसको स्वाध्याय के लिए भी वृत्ति को बाहर लाने की जरूरत नहीं है। स्वाध्याय और जप, वृत्ति को अंतर्मुख करने के लिए हैं। कीर्तन भी वृत्ति को अंतर्मुख करने के लिए  है।

जब स्वरूप में निष्ठा हो जाये तो फिर खुली आँख भी समाधि है। जब तक स्वरूप में निष्ठा नहीं हुई, तब तक इष्ट में, भाव में, प्रेम में निष्ठा करके अंतर्मुख होना चाहिए। इष्ट में, भाव में, प्रेम में निष्ठा करके अंतर्मुख हुआ जाता है तो अंतर्मुखता में जो आनंद आता है, वही आत्मा का आनंद है।

ऐसा नहीं है कि भगवान बाद में मिलेंगे। जब-जब मन अंतर्मुख हो जाता है तब-तब आत्मा में लीन हो जाता है, आनंद आता है। जब आनंद आये तो समझो आत्मा के नजदीक हो किन्तु मनोराज हो गया, निद्रा आने लगे तब चित्त को सावधान करना चाहिए। मनोराज, निद्रा या तंद्रा में चित्त न जाये इसके लिए स्वाध्याय, जप, कीर्तन करो एवं आत्मारामी सच्चे महापुरुषों के सान्निध्य में बैठकर ध्यान करो।

चित्त को अंतर्मुख करने के लिए निष्ठा की जरूरत है। छोटे-मोटे विघ्न तो आयेंगे-जायेंगे। फिर चाहे हिमालय की गुफा में जाकर ही क्यों न बैठो ? जीव-जन्तु, पशु आदि तो वहाँ भी तंग करेंगे ही, किन्तु उनकी वजह से हलचल करोगे तो फिर चित्त को शांत कब करोगे ? अतः एकनिष्ठ होकर बैठना चाहिए और एकनिष्ठ भी बोझ बनकर नहीं कि ʹमैं शांत बैठा हूँ।ʹ

कोई आया तो क्या ? कोई गया तो क्या ? किसको कब  तक निहारते रहोगे ? ….और बाहर जो दिखेगा उसका अर्थ तुम अपनी समझ के अनुसार लगाओगे। सही देखना है, सच्चा देखना है तो एकनिष्ठ होकर अंतर्मुख होना चाहिए।

हम जितने अंतर्मुख होते हैं उतनी शक्ति बढ़ती है। जितने संकल्प कम होते हैं उतना सामर्थ्य बढ़ता है। जैसे, जितने बादल हट जाते हैं उतना सूर्य का प्रभाव दिखता है। जितने बादल अधिक आ जाते हैं उतन सूर्य का प्रभाव कम हो जाता है। ऐसे ही आत्मसूर्य है। जितने स्पंदन ज्यादा हैं बादलों की नाईं, उतना आत्मसूर्य का प्रभाव कम दिखता है और जितने संकल्प कम होते हैं उतना प्रभाव ज्यादा दिखता है। वास्तव में आत्मा का तेज घटता बढ़ता नहीं है लेकिन संकल्पों के कारण घटता हुआ लगता है। अतः एकनिष्ठ होकर ध्यानस्थ होना चाहिए।

चाहे भक्ति हो, योग हो या ज्ञान हो, आपकी निष्ठा आपके काम आयेगी। यदि निष्ठा नहीं होगी तो भक्त की भक्ति अधूरी रह जायेगी, योगी का योग अधूरा एवं ज्ञानी का ज्ञान अधूरा रह जायेगा। एकनिष्ठा…. जैसे पतिव्रता स्त्री की पति में निष्ठा होती है वैसे ही साधक की अपने साधन में निष्ठा होनी चाहिए, नहीं तो संसार की माया ऐसी है कि फँसा देती है। भगवान से भी बढ़कर भगवत्प्रीति के साधन में आदरबुद्धि होनी चाहिए। आदरबुद्धि के अभाव में ही साधन में रुचि नहीं होती।

चातक मीन पतंग जब, पिय बिन नहीं रह पाय।

साध्य को पाये बिना, साधक क्यों रह जाय ?

ध्यान का आस्वादन भी वही ले सकता है जिसकी निष्ठा दृढ़ हो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2000, पृष्ठ संख्या 5,6 अंक 90

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अहंकार का स्वरूप


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग प्रवचन से

ʹश्री योगवाशिष्ठ महारामायणʹ मैं आता हैः ʹसंसार में जितने भी दुःख हैं वे सब अहंकार के कारण ही उत्पन्न होते हैं। अहंकार के कारण ही जीव का जन्म-मरण होता है और अहंकार के कारण ही राग-द्वेष होता है। अहंकार के त्याग से सब दुःखों का त्याग हो जाता है एवं जीव को परम पद की प्राप्ति होती है। अतः अहंकार का त्याग करना चाहिए।

वशिष्ठजी महाराज के ऐसा कहने पर रामजी ने पूछाः “यदि अहंकार का त्याग कर देंगे तो खायेंगे और पियेंगे कैसे ? मनुष्य में ʹमैं हूँʹ का भाव है तभी तो उसमें कर्तव्य पालन की आकांक्षा होती है, जीवन में कुछ माँग होती है, कुछ भूतकाल की चिंता होती है और भविष्यकाल के लिए चिंतन होता है। यदि यह अहंकार ही चला जाये त वह खायेगा-पियेगा और जियेगा कैसे ?”

वशिष्ठजी महाराज ने कहाः “हे राम जी ! अहंकार के तीन स्वरूप होते हैं- 1.क्षुद्र (स्थूल) अहं 2. मध्यम (सूक्ष्म अहं) 3. वास्तविक अहं।

क्षुद्र माने तुच्छ। स्थूल शरीर के साथ जुड़कर मनुष्य जो बोलता है उसे क्षुद्र अहं कहा जाता है। ʹमैं फलानि जाति का हूँ… मेरी इतनी उम्र है… मैं यह कर सकता हूँ….ʹ यह अहं जनसाधारण में, अल्प मति के लोगों में भी होता है एवं विद्वानों में भी होता है।

शरीर में है ही क्या ? कुछ सीधी हड्डियाँ, कुछ आड़ी हड्डियाँ, मांस, रक्त, वात, पित्त, कफ, मल-मूत्र, थूक आदि और ऊपर से चमड़े का आवरण…. फिर भी क्षुद्र अहं के साथ जुड़कर मनुष्य बोलता है कि ʹमैं मोटा हूँ…. मैं पतला हूँ… मैं काला हूँ…. मैं गोरा हूँ….. मैं ब्राह्मण हूँ… मै क्षत्रिय हूँ… मैं फलाने गाँव का हूँ… मैं फलाने देश का हूँ….ʹ इस शरीर के साथ जुड़कर बहने वाला जो स्फुरण है उसी को क्षुद्र अहं कहते हैं। अहं ही सर्व दुःखों की जड़ है।

कोई कितना ही बुद्धिमान हो, विद्वान हो, अपने को अक्लवाला समझता हो लेकिन शरीर के साथ जब तक अहं जुड़ा रहेगा तब तक संसार के भोगों की वासनाएँ बनी रहेंगी और वासना ही तो जीव के जन्म-मरण का कारण है।

क्षुद्र अहं के साथ जुड़ा हुआ जीव वासना के अनुसार ही काम करता है। उसका मन विषय-भोगों में ही भटकता रहता है। इस अहंकार ने त्रिलोकी को वासना के जाल में बाँध रखा है। क्षुद्र अहंकारवाला मनुष्य मंदिर में रहते हुए भी बंधन में रहते हुए भी बंधन में है और घर में रहते हुए भी बंधन में है। एक ऊँचे पद पर बैठा हुआ मनुष्य भी अपने को स्वतंत्र नहीं मान सकता।

यदि कोई स्वस्थ एवं धनवान मनुष्य कहे कि ʹमेरा कोई कर्त्तव्य नहीं है, मुझे नौकरी धंधे की कोई चिंता नहीं है क्योंकि बैंक में मेरा ʹफिक्स-डिपॉजिटʹ (स्थायी जमा-पूँजी) है। हर महीने ब्याज आता है। मैं आराम से खाता पीता हूँ। मैं बड़ा सुखी हूँ।ʹ

….लेकिन उस व्यक्ति की गहराई में देखोगे तो वह भी अंदर से सुखी नहीं मिलेगा। ʹमैं सुखी हूँ….ʹ वह इस शरीररूपी ढाँचे को लेकर बोलता है। उस ढाँचे को अगर जरा सी ग्रमी लगे या जरा सा मच्छर काट ले तो वह दुःखी हो जायेगा क्योंकि क्षुद्र अहं में बैठा है बेचारा।

इस क्षुद्र अहं ने सारे विश्व को ढाँक रखा है। कोई-कोई विरला होता है जो इस क्षुद्र अहं से हटकर मध्यम अहं में आता है। मध्यम अहं अर्थात् सूक्ष्म अहं। जप-तप, सुमिरन, पूजा-अर्चना, सत्संग, सेवा आदि करने से समझ में आ जाता है कि ʹजीवात्मा अमर है और शरीर नश्वर। यह शरीर पहले नहीं था, बाद में भी नहीं रहेगा और अभी भी नहीं की ओर जा रहा है। मौत शरीर की होगी। मरने के बाद हम भगवान के पास जायेंगे।

मध्यम अहं वाले को यह पक्का हो जाता है कि शरीर यहीं पड़ा रहेगा। शरीर भगवान के पास नहीं जायेगा लेकिन सूक्ष्म शरीर में अहं होता है कि हम भगवान के पास जायेंगे। सूक्ष्म शरीर में अहं होने से भोग की वासना शांत होती है लेकिन विचारों में अपनी बात मनाने की वासना बनी रहती है।

स्थूल शरीर में अहं होने से मनुष्य संसार की भोग वासना में जकड़ा रहता है और सूक्ष्म शरीर में अहं होने से लोक-लोकांतर की इच्छा में उलझा रहता है। ʹअपना प्रिय भगवान अभी नहीं मिला, इसलिए मरने के बाद किसी लोक-लोकान्तर में मिलेगा…..ʹ सूक्ष्म अहंवाले का ऐसा भाव होता है। क्षुद्र अहंवाले से सूक्ष्म अहं वाला अच्छा है क्योंकि क्षुद्र(स्थूल) अहंवाला भगवान की प्राप्ति के लिए जप-तप-यज्ञादि करने में लग जाता है। उसको कम  परिश्रम करने पर भी ज्यादा सुख मिलता है।

सूक्ष्म अहं में जीने वाला व्यक्ति क्रियाजन्य सुख से ऊपर उठता है एवं भावजन्य सुख से सुखी होने लगता है। क्रियाजन्य सुख में परिश्रम ज्यादा होता है और सुख कम मिलता है। भावजन्य सुख में परिश्रम कम होता है और सुख ज्यादा मिलता है, भावना का सुख मिलता है।

भावना का सुख भारत के ऋषि-मुनियों की देन है। भगवद् भक्ति से भाव को विकसित करके, ईश्वर और गुरु की शरण लेने से स्थूल अहं लीन होता है। वेदान्त का श्रवण करके उसका मनन एवं निदिध्यासन करने से सूक्ष्म अहं  बाधित हो जाता है एवं इन दोनों को सत्ता देने वाला जो वास्तविक अहं है, वह प्रकट हो जाता है। उसी को कहा जाता है – अहं ब्रह्मास्मि। वही जीव का वास्तविक स्वरूप है। उस वास्तविक स्वरूप को पाये हुए किन्हीं महापुरुष ने ही कहा हैः

जन्म-मृत्यु मेरे धर्म नहीं हैं।

पाप-पुण्य कुछ कर्म नहीं हैं।।

अज निर्लेपीरूप, कोई कोई जाने रे…..

वह चैतन्य परमात्मा अजर-अमर है, निर्लेप है और सबका वास्तविक स्वरूप है। ऐसे उस वास्तविक स्वरूप को कोई विरला ही जानता है।

ʹमैं फलाना भाई हूँ….ʹ यह स्थूल अहं है। ʹमैं भगवान का भक्त हूँ….ʹ यह सूक्ष्म अहं है। जहाँ से वास्तविक अहं का, शुद्ध अहं का जब तक बोध नहीं होता तब तक जीव बेचारा परिस्थितिजन्य सुख-दुःख, क्रियाजन्य सुख-दुःख एवं भावजन्य सुख-दुःख में धक्के खाता रहता है।

जब तक स्थूल और सूक्ष्म अहं में जीवन होगा तब तक चाहे किचना भी ऊँचा जीवन होगा, उसमें शुद्ध सुख का पता नहीं चलेगा। निर्धनों के आगे धनवान अपने को सुखी मानता है, निर्बलों के आगे बलवान् अपने को सुखी मानता है, अल्प मतिवालों के आगे विद्वान अपने को सुखी मानता है लेकिन इस स्थूल और सूक्ष्म अहं का सुख वास्तविक सुख नहीं है। ऐसे कई सुख आते हैं और चले जाते हैं। ʹजब मौत आकर सामने खड़ी होती है तब स्थूल और सूक्ष्म अहं से जुड़कर जो भी किया, वह सब छोड़कर जाना पड़ता है….ʹ यह सोचकर मनुष्य बेचारा दुःखी हो जाता है क्योंकि उसने अभी तक अपने वास्तविक ʹमैंʹ को नहीं जाना है।

जब तक वास्तविक ʹमैंʹ का पता नहीं चलता तब तक चाहे दुनिया की नजर में बड़ा प्रसिद्ध व्यक्ति हो, बड़ा सुंदर व्यक्ति हो, बड़ा दाता हो, बड़ा बुद्धिमान हो लेकिन तत्त्वज्ञान की दुनिया में वह मूढ़ ही है। जिसने उस वास्तविक ʹमैंʹ को जान लिया वह दुनिया की तो क्या, देवताओं-यक्षों-गंधर्वों की ही नहीं अपितु ब्रह्मा-विष्णु-महेश की नजरों में भी आदरणीय हो जाता है।

वास्तविक ʹमैंʹ में जागने के लिए जब तक ब्रह्मवेत्ता सदगुरु की छत्रछाया नहीं मिलती, तब तक अनेक प्रकार की साधनाएँ करनी पड़ती हैं। जब ब्रह्मवेत्ता सदगुरु मिल जाते हैं और उऩके बताये हुए मार्ग पर साधक चल पड़ता है, उनके निर्देशानुसार ब्रह्मचिंतन एवं ब्रह्मज्ञान के अभ्यास में लग जाता है तो उसकी सारी साधनाएँ पूरी हो जाती हैं। फिर उसे अलग से किसी साधना की जरूरत नहीं पड़ती है। साधक अपने लाखों जन्मों के संस्कार एक ही जन्म में मिटा सकता है। अगर मनुष्य जन्म पाकर भी वह सावधान न हो  लाखों जन्म लेने के संस्कार भर भी सकता है।

यदि जीवन में सावधानी नहीं है तो जिससे सुख मिलेगा उसके प्रति राग हो जायेगा और जिससे दुःख मिलेगा उसके प्रति द्वेष हो जायेगा। इससे अनजाने ही चित्त में संस्कार जमा होते जायेंगे एवं वे ही संस्कार जन्म-मरण का कारण बन जायेंगे। वैर लेने के लिए किसी का शत्रु होकर एवं प्रेम (राग) के कारण किसी का पुत्र, मित्र, भाई आदि बनकर जन्म लेना पड़ेगा। जब तक वास्तविक ʹमैंʹ का ज्ञान नहीं होगा तब तक यह क्रम चलता ही रहेगा। वास्तविक ʹमैंʹ का ज्ञान होने पर राग-द्वेष बाधित हो जाते हैं और जन्म-मरण का चक्र सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

जितना-जितना मनुष्य स्थूल अहं को छोड़कर सूक्ष्म अहं में जाता है उतनी-उतनी उसकी गुरु या भगवान को समझने की शक्ति बढ़ती है। ब्रह्मवेत्ता गुरु द्वारा बताये गये निर्देशों का सच्चाई एवं तत्परता से पालन करने पर वह सूक्ष्म अहं को त्यागकर वास्तविक ʹअहंʹ को जानने में भी सक्षम हो जाता है।

आपका वास्तविक ʹमैंʹ ही आपकी असलियत है। उस वास्तविक ʹमैंʹ में अगर आप जग गये तो आपका बेड़ा पार हो जायेगा। फिर तो आपकी मीठी नजर जिन पर पड़ेगी वे भी निहाल हो जायेंगे। आपके दीदार करने वालों को भी बहुत लाभ होगा, आप ऐसे महान हो जाओगे !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2000, पृष्ठ संख्या 3-5 अंक 90

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