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Prerak Prasang

अलख पुरुष की आरसी….


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से
संत कबीर से किसी ने पूछाः
“हम निर्गुण-निराकार परमात्मा को तो नहीं देख सकते, फिर भी देखे बिना न रह जायें ऐसा कोई उपाय बताइये।”
कबीर जी ने कहाः
अलख पुरुष की आरसी, साधु का ही देह।
लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में तू लख लेह।।
“परमात्मा को देखने के लिए ये चर्मचक्षु काम नहीं आते। फिर भी यदि तुम परमात्मा को देखना ही चाहते हो तो जिनके हृदय में परमात्माकार वृत्ति प्रकट हुई है, जिनके हृदय में समतारूपी परमात्मा प्रकट हुए हैं, जिनके हृदय में अद्वैतज्ञानरूपी परमात्मा प्रकट हुए हैं, ऐसे हृदय वाले किन्हीं महापुरुष को तुम देख सकते हो। उनको देखते ही तुम्हें परमात्मा की याद आ जायेगी। जिनके दिलों में ईश्वर निरावरण हुआ है, ऐसे संत-महापुरुषों को तुम देख सकते हो।”
साधु का ही देह एक ऐसा दर्पण है, जिसमें तुम उस अलख पुरुष परमात्मा के दर्शन कर सकते हो। अतः यदि अलख पुरुष को देखना चाहते हो तो ऐसे किन्हीं परमात्मा के प्यारे संतों के दर्शन करने चाहिए।
शुद्ध हृदय से, ईमानदारी से उन महापुरुषों का चिंतन करके हृदय को धन्यवाद से भरते जाओगे तो तुम्हारे हृदय में परमात्मा प्रकट होने में देर नहीं लगेगी। परमात्म-प्राप्ति इतनी सरल होने पर भी लोग उसका फायदा तो नहीं उठाते हैं, वरन् संतों के बाह्य व्यवहार को देखकर अपनी क्षुद्र मति से उन्हें तौलने लगते हैं और अपनी ही हानि कर बैठते हैं।
वशिष्ठ जी महाराज भी कहते हैं कि ‘शास्त्रकर्त्ता का और लक्षण न विचारना, पर शास्त्र की युक्ति विचार देखनी है। अज्ञानी जो कुछ मुझे कहते और हँसते हैं, सो मैं सब जानता हूँ, परंतु मेरा दया का स्वभाव है इससे मैं चाहता हूँ कि किसी प्रकार वे नरकरूप संसार से निकलें। इसी कारण मैं उपदेश करता हूँ।
जिनके श्रीचरणों में अयोध्या नरेश दशरथ शीश नवाकर अपने को सौभाग्यशाली मानते हैं और श्रीराम जिनके शिष्य हैं, ऐसे गुरुवर वशिष्ठजी के लिए भी कहने वालों ने क्या-क्या नहीं कहा ? अतः यदि कोई तुम्हारे लिए भी कुछ कह दे तो चिंता मत करना वरन् उसे धन्यवाद देना।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने। उस समय किसी विकृत मानसिकता वालों ने एक सस्ते अख़बार में उनके विषय में कुछ का कुछ छपवाना शुरु कर दिया कि ‘वे ऐसे हैं, वैसे हैं….।’ जो कुछ भी कचरा उसके मस्तिष्क से निकलता, उसे कलम द्वारा अख़बार में छपवाता और यदि कोई अख़बार न भी लेना चाहे तो उसे जबरदस्ती पकड़ाता, मुफ्त में बँटवाता।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के किसी प्रशंसक ने उन्हें वह अख़बार दिखाया, राजेन्द्र प्रसाद ने उसे फाड़कर फेंक दिया। दूसरा कोई व्यक्ति भी वह अख़बार लेकर आया तो उन्होंने उसे भी कचरा पेटी में डाल दिया। वह निंदक कुप्रचार करता ही रहा। आखिर राजेन्द्र प्रसाद के कुछ मित्रों ने कहाः
“यह व्यक्ति आपके विरूद्ध इतना कुछ लिख रहा है और आप कुछ नहीं करते ! अब तो आप राष्ट्रपति हैं, आपके पास क्या नहीं है ? आप चाहें तो उसके विरुद्ध कोई भी कदम उठा सकते हैं। आप उसे कुछ कहें, कुछ तो समझायें। न समझे तो फटकारें, परंतु कुछ तो करें।”
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मुस्कराते हुए बोलेः “वह मेरी बराबरी का होता तो मैं उसे जवाब देता। जो विकृत मस्तिष्क वाले होते हैं, उनके शत्रुओं की कमी नहीं होती। कभी उसकी मति भी ऐसी हो जायेगी कि उसे दूसरा कोई शत्रु मिल जायेगा और वे आपस में ही लड़ मरेंगे। लोहे से लोहा कट जायेगा।”
उन लोगों ने फिर कहाः “परन्तु वह आपके लिए इतना सारा लिखता रहता है, आपको कुछ तो जवाब देना ही चाहिए।”
डॉ. राजेन्द्र प्रसादः “इसकी कोई जरूरत नहीं है।”
राजेन्द्र प्रसाद पर तो उस निंदक के कार्यों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, किन्तु उनके परिचित और मित्र परेशान हो उठे। अतः पुनः बोलेः
“हम आपके पास आते जाते रहते हैं और आपकी बदनामी हो रही है तो उसका प्रभाव हमारे संबंधों पर भी पड़ रहा है। हमें भी लोग जैसा चाहे सुना देते हैं, अतः आपको कुछ तो करना ही चाहिए।”
तब राजेन्द्र प्रसाद ने एक दृष्टांत देते हुए कहाः “एक हाथी जा रहा था। उसके पीछे कुत्ते भौंकने लगे परंतु हाथी अपनी ही मस्ती में चलता रहा। हाथी हाथी से टक्कर ले तो अलग बात है। यदि हाथी कुत्तों को समझाने या चुप कराने लगे तो इसका अर्थ यह होगा कि वह कुत्तों के साथ अपनी तुलना करने लगा है और अपनी महिमा भूल गया है ! हाथी की अपनी महिमा है।”
कबीर जी ने कहा हैः
हाथी चलत है अपनी चाल में,
कुतिया भूँके वा को भूँकन दे।
मन ! तू राम सुमिरकर, जग बकवा दे।।
अपनी महिमा में मस्त रहने वाले, संत महापुरुष पर लोगों की अच्छी बुरी बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जो संतों का आदर-पूजन और सेवा करता है, वह अपना भाग्य बना लेता है तथा संतों के दैवी अनुभव में भी भागीदार हो जाता है। परंतु जो संतों की निंदा करता है, संतों को सताता है वह अपने भाग्य पर कुठाराघात करता है। संतों की नजर में तो कोई अच्छा-कोई बुरा, कोई काला-कोई गोरा, कोई माई-कोई भाई….. ऐसा नहीं होता। संतों की नज़र में तो केवल ‘एकमेवाद्वितियोऽहम्।’ होता है।
उनके प्रति जिसकी जैसी भावना, जैसी दृष्टि, जैसा प्रेम होता है, वैसा ही उसे हानि-लाभ होता है।
करनी आपो आपनी, के नेड़े के दूर।
अपने ही कर्मों से, अपने ही भावों से आप अपने-आपको सदगुरु और संतों के निकट अनुभव करते हो तथा अपने ही कर्मों और भावों से उनसे दूरी का अनुभव कराते हो। संतों के हृदय में तो कोई अपना या पराया नहीं होता। आजकल का, कलियुग का अल्प मति वाला मानव बुरी बातों को बहुत जल्दी स्वीकार कर लेता है, किंतु अच्छी बातों को स्वीकार नहीं करता। सच्चाई फैलानी हो तो जीवन पूरा हो जाता है पर कुछ गड़बड़ फैलानी हो तो फटाफट फैल जाती है। लोग तुरंत ही कुप्रचार के शिकार हो जाते हैं क्योंकि उनकी अल्पमति है। उनकी विचारशक्ति कुंठित हो गयी है।
नरसिंह मेहता गुजरात के प्रमुख संत हो गये। उनके लिए भी ईर्ष्यालु लोगों ने कई बार खूब अफवाहें फैलायी थीं। अफवाह फैलाने वाले, व्यर्थ के आरोप लगाने वाले, छापने-छपाने वाले किस नरक में पचते होंगे ? किस माता के गर्भ में लटकते होंगे ? वह हम और आप नहीं जानते, परंतु नरसिंह मेहता को तो आज भी हजारों-लाखों लोग जानते मानते हैं और उनका नाम बड़े-आदर व प्रेम से लेते हैं।
नरसिंह मेहता श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। वे प्रभुपद गाते-गाते इतने भाव-विभोर हो उठते थे कि अपने-आपको ही भूल जाते थे ! नरसिंह मेहता जब नरसिंहपना छोड़ देते तो श्रीकृष्ण अपना कृष्णपना कैसे रख सकते थे ? जब पुत्र अपना पुत्रपना भूल कर प्रेम से पिता के साथ बातें करने लगता है तो पिता भी पिताभाव कैसे रख सकता है ? पिता भी पुत्र के साथ तोतली भाषा में बोलने लग जाता है।
नरसिंह मेहता श्रीकृष्ण का चिंतन करते-करते इतने तन्मय हो जाते थे कि जो लोग उनके दर्शन करने आते, वे भी धन्य हो उठते ! कृतार्थ हो उठते ! वे लोग भी उनके साथ नाचने और झूमने लग जाते, कृष्ण-कन्हैया के भाव में आ जाते।
ऐसे नरसिंह मेहता के विषय में भी जब व्यर्थ के आरोप लगे, अफवाहें फैलने लगीं, तब कुछ भक्तों की मति भी कुप्रचार के कारण डाँवाडोल हो गयी और कुछ लोग तो कुप्रचार के शिकार हो कर वहाँ से खिसक भी गये।। निंदक कहने लगे कि ‘यदि नरसिंह मेहता में सच्चाई हो तो साबित करके दिखायें।’ परंतु नरसिंह मेहता के लिए फैलायी गयी अफवाहें हर बार गलत ही साबित हुईं। उनकी दृढ़ भक्ति के कारण चमत्कार होते तो चमत्कार के प्रेमी उनके पास एकत्रित होते रहते। वे चमत्कार के भक्त थे, नरसिंह मेहता के भक्त नहीं थे।
ऐसा कई संतों के साथ होता है। जब तक सब ठीक लगता है, वाहवाही होती है, तब लोग संतों के साथ होते हैं। परंतु जब दुरात्मा लोग संगठित होकर गड़बड़ पैदा कर देते हैं तो वे लोग खिसक जाते हैं। ऐसे लोग सुविधा और वाहवाही के भक्त होते है, संत के भक्त नहीं होते।
संत का भक्त तो वही है जो चाहे कैसी भी विपरीत परिस्थिति आये, पर अपना भक्तिभाव नहीं छोड़ता। सुविधा के भक्त तो कब उलझ जायें, कब भाग जायें, पता नहीं परंतु जो निःस्वार्थ भक्त होता है वह अडिग रहता है, कभी फरियाद नहीं करता और दुर्बुद्धि निंदकों के चक्कर में नहीं आता। सच्चे भक्त तो संत के दर्शन, सत्संग और उनकी महिमा का गुणगान करते-करते कभी थकते ही नहीं। परंतु संत का संतत्व न सबसे भी परे है। किसी की निंदा अथवा विरोध से उनकी कोई हानि नहीं होती और किसी के द्वारा प्रशंसा करने से उन्हें कोई लाभ नहीं होता।
सच्चे संतों का आदर-पूजन जिनसे सहन नहीं होता, ऐसे ईर्ष्यालु लोगों ने ही पूरी ताकत से संतों का कुप्रचार किया है। संतों के व्यवहार को पाखंड कहकर उन्होंने ही धर्म के प्रचार का ठेका लिया है। ऐसे धर्म का ठेका लेकर, धर्म की जय बुलवाने वालों को पता ही नहीं है कि वे क्या कर रहे हैं ?
जब कबीर जी आये तब पंडों ने कहाः “हम धर्म की जय कर रहे हैं।” जब सुकरात आये तब राजा और अन्य लोगों ने कहाः “हम धर्म की जय कर रहे हैं।” जब नानक जी आये तब विरोधियों ने उपद्रव कियाः “नानक जी को शहर से बाहर निकाल दिया जाय, क्योंकि वे पाखंड कर रहे हैं। धर्म की जय तो हम कर रहे हैं।”
अनादिकाल से यही होता आया है। भले कितनी ही मुसीबतें आयीं, कितनी ही प्रतिकूलताएँ आयीं, सच्चे भक्तों-श्रद्धालुओं ने संतों की शरण नहीं छोड़ी। कबीर जी के साथ सलूका-मलूका, नानक जी के साथ बाला-मरदाना ऐसे ही श्रद्धालु शिष्य थे, जिनके नाम इतिहास में अमर हो गये।
धन्य है ऐसे शिष्यों को कि जो अलख पुरुष की आरसी के समान ब्रह्मवेत्ता संतों को श्रद्धा-भक्ति से निहारते हैं और उनके साथ अंत तक निभा पाते हैं। वे धनभागी हैं जो निंदा अथवा कुप्रचार के शिकार होकर अपनी शांति का घात नहीं करते। उन्हीं के लिए यह कथन फलित होता हैः
अलख पुरुष की आरसी, साधु का ही देह।
लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में तू लख लेह।।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2002, पृष्ठ संख्या 8-10, अंक 117
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गुरुमन्त्रपरित्यागी….


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से
महाराष्ट्र में समर्थ रामदासजी महाराज प्रसिद्ध संत हो गये। वे छत्रपति शिवाजी के गुरु थे। उनके पास भीतर-बाहर दोनों प्रकार का वैभव था। जबकि तुकाराम जी सीधे-सादे, सरल संत थे। उनका नियम था कि कहीं भी कीर्तन करने जाते तो कीर्तन कराने वालों के घर का भी हलवा पूरी आदि कुछ भी नहीं लेते थे। जाने के लिए रथ आदि का उपयोग नहीं करते वरन् पैदल ही जाते थे। वे बड़ा संयमी और तपस्वी जीवन जीते थे।
संत तुकाराम जी की मण्डली के एक शिष्य ने देखा की समर्थ रामदास जी महाराज की मण्डली के लोग बड़े मजे से जीते हैं। वे अच्छे कपड़े पहनते हैं, हलवा-पूरी खाते हैं। समर्थ शिवाजी जैसे राजा के गुरु हैं, अतः उनके पास खूब अमन-चमन है और उनके शिष्यों को भी खूब मान मिलता है। जबकि हमारे गुरुदेव तुकाराम जी के पास तो कुछ भी नहीं है। न हलवा-पूरी, न गादी-तकिये…
संतों के पास सब प्रकार के लोग होते हैं क्योंकि सब संसार से ही तो आते हैं। आश्रम में आने वाले सब अच्छे ही होते हैं क्या ? इसका मतलब सब खराब हैं – ऐसी बात नहीं है और सब दूध के धोये हुए हैं – ऐसी बात भी नहीं है, फिर भी उन लोगों को धन्यवाद है कि वे संत के पास तो आ गये।
कभी-कभी राजसी-तामसी भक्तों को देखकर सात्त्विक भक्तों की श्रद्धा भी डगमगाने लगती है लेकिन उन्हें चाहिए के वे डगमगायें नहीं, वरन् अपने को समझायें-
वैरी भयंकर हैं विषय, कीड़ा न बन तू भोग का।
चंचलपना मन का मिटा, अभ्यास करके योग का।।
यह चित्त होता मुक्त है, सब ब्रह्म है यह जानकर।
कर दरश सबमें ब्रह्म का, सर्वात्म अनुसंधान कर।।
अपने भक्त का विवेक दृढ़ करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं-
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।
‘इस लोक और परलोक के संपूर्ण भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव, जन्म-मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना चाहिए।’ (गीताः 13.8)
‘तुकाराम जी के पास तो कोई सुविधा नहीं है’ –
ऐसा फरियादात्मक चिंतन करते-करते उस शिष्य को समर्थ रामदास की मण्डली के प्रति आकर्षण हुआ और तुकाराम जी का वह शिष्य समर्थ के पास गया और समर्थ को प्रणाम करके उसने कहाः
“महाराज ! हमें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लीजिये। हम आपकी मण्डली में रहेंगे, कीर्तन आदि करेंगे, सेवा करेंगे।”
समर्थः “तू पहले किसका शिष्य था ?”
“तुकाराम जी महाराज का।”
श्री समर्थ ने सोचा कि ‘जिनकी सत्य में प्रीति है, ऐसे तुकाराम जी जैसे गुरु का त्याग ! आत्म-साक्षात्कारी पुरुष जहाँ हैं वहाँ तो वैकुण्ठ है। ऐसे महापुरुष का त्याग करने की बात इसको कैसे सूझी ?’
समर्थः “तुकाराम जी का शिष्य होते हुए मैं तुझे मंत्र कैसे दे सकता हूँ ? अगर मुझसे मंत्र लेना है, मेरा शिष्य बनना है तो तुकाराम जी की कंठी तुकाराम जी को वापस कर दे और उनका दिया मंत्र भी उन्हें लौटा कर आ।”
समर्थ ने सत्य समझाने के लिए ऐसा कहा था। वह तो खुश हो गया कि ‘मैं अभी तुकाराम जी का त्याग करके आता हूँ और उनका दिया मंत्र और कंठी उनको लौटा देता हूँ।’
‘गुरुभक्तियोग’ में लिखा है कि ‘एक बार सदगुरु करने के बाद उनका कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए। ऐसा करे, इससे तो अच्छा है कि पहले से ही गुरु न करे, चौरासी का चक्कर खाता रहे। जन्म-मृत्यु में भटकता रहे।’
‘श्रीगुरुगीता’ में भगवान शिवजी कहते हैं-
गुरुत्यागाद् भवेन्मृत्युर्मन्त्रत्यागाद्दरिद्रता।
गुरुमन्त्रपरित्यागी रौरवं नरकं व्रजेत्।।
गुरु का त्याग करने से आध्यात्मिक मृत्यु होती है। मंत्र को छोड़ने से दरिद्रता आती है और गुरु तथा मंत्र दोनों का त्याग करने से रौरव नरक मिलता है।
वह शिष्य तुकाराम जी के पास जाकर बोलाः “महाराज ! अब मुझे आपका शिष्य नहीं रहना है।”
तुकाराम जी ने कहाः “मैंने तुझे शिष्य बनाया ही कब था ? तू अपने-आप बना था, भाई ! मैंने कहाँ तुझे चिट्ठी लिखी थी की आ जा। मैंने कहाँ तुझे जबरदस्ती कंठी पहनायी थी। कंठी तो तूने स्वयं अपने हाथों से बाँधी थी और मेरे गुरु ने जो मंत्र दिया है, वही मैंने तुझे सुना दिया था। इसमें मेरा तो कुछ भी नहीं है।”
कैसी निरभिमानिता ! कैसी करुणा !
“महाराज ! मुझे आपकी कंठी नहीं चाहिए।”
तुकाराम जीः “नहीं चाहिए तो तोड़ दे।”
उसने तुरंत कंठी तोड़ दी और बोलाः
“महाराज ! अब अपना मंत्र भी ले लो।”
तुकाराम जी “मंत्र मेरा नहीं है, मेरे गुरुदेव का मंत्र है। ‘आपा जी चैतन्य’ का प्रसाद है। मेरा तो कुछ नहीं है।”
“मुझे नहीं चाहिए आपका मंत्र, मुझे तो दूसरे गुरु करने हैं।”
तुकाराम जीः “मेरे सामने मंत्र बोलकर पत्थर पर थूक दे। मंत्र का त्याग हो जायेगा।”
उस अभागे ने गुरुमंत्र त्यागने के लिए मंत्र बोलकर पत्थर पर थूक दिया। इतने में क्या देखता है वह मंत्र पत्थर पर अंकित हो गया !
शिष्य के कल्याण हेतु तुकाराम जी के संकल्प ने काम किया तभी मंत्र पत्थर पर अंकित हुआ। कैसी होती है महापुरुषों की करुणा-कृपा ! शिष्य के कल्याण के लिए वे कैसी-कैसी युक्तियाँ आजमाते हैं ! फिर भी अभागे शिष्य समझ नहीं पाते।
वह समर्थ के पास गया और बोलाः “महाराज ! मैं मंत्र का त्याग करके आया और कंठी भी तोड़ दी। अब आप मुझे अपना शिष्य बना लीजिये।”
समर्थ ने पूछाः “मंत्र का त्याग किया उस समय क्या हुआ था ?”
“मंत्र पत्थर पर अंकित हो गया था।”
समर्थः “ऐसे महान गुरुदेव ! जिनका दिया हुआ मंत्र पत्थर पर अंकित हो गया ! पत्थर पर भी उनके दिये मंत्र का प्रभाव पड़ा किन्तु कमबख़्त ! तुझ पर कुछ असर नहीं हुआ तो मेरे मंत्र का भी क्या असर होगा ? तू तो पत्थर से भी गया-बीता है तो इधर क्या करेगा ? हलवा-पूरी खाने के लिए साधु बना है क्या ?”
“मैंने अपने गुरु का त्याग कर दिया और आपने भी मुझे लटकता रखा ?”
समर्थः “तेरे जैसे तो लटकते ही रहेंगे। तेरे लक्षण ही ऐसे हैं। तेरे जैसे गुरुद्रोही को मैं शिष्य बनाऊँगा क्या ? मुझे कहाँ अपराधी बनना है ?”
आत्मज्ञानी सदगुरु का दिया हुआ मंत्र त्यागने से मनुष्य दरिद्र हो जाता है। मंत्र त्यागने से मनुष्य हृदय का अंधा हो जाता है।
कहते हैं- ‘गुरु ने तुमको जो मार्ग बताया, उस मार्ग पर तुम बीसों साल चले, साधना की, फिर गुरु में अश्रद्धा और दोषदर्शन होने लगा तो वहीं पहुँच जाओगे, जहाँ से चलना शुरु किया था। बीसों साल की कमाई का नाश हो जायेगा।’
“महाराज ! मुझे स्वीकार करने की कृपा करें।”
समर्थः “नहीं, यह संभव नहीं है।”
वह शिष्य बहुत रोया-गिड़गिड़ाया। तब करुणा करके समर्थ ने कहाः “तुकाराम जी उदारात्मा हैं। उनसे जाकर मेरी तरफ से प्रार्थना करना कि ‘समर्थ ने प्रणाम कहा है’ और मुझे क्षमा करें।”
वह गया तुकाराम जी के पास और प्रार्थना करने लगा। तुकाराम जी ने सोचा कि समर्थ का भेजा हुआ है तो मैं कैसे इनकार करूँ ? बोलेः
“अच्छा, भाई ! तू आया था, तूने कंठी तोड़ दी। अब फिर से तू ही आया है तो फिर से दे देते हैं। समर्थ ने भेजा है तो चलो ठीक है। समर्थ की जय हो।”
संत-महापुरुष उदारात्मा होते हैं। ऐसे भटके हुए लोगों को थोड़ा सबक सिखाकर ठिकाने लगा देते है। साधक को गिरने से बचा लेते हैं। समर्थ ने समझाया तो समझ गया क्योंकि थोड़ी बहुत भक्ति की हुई थी। आखिर तो तुकाराम जी का शिष्य था, उसमें कुछ सत्त्व तो था ही।
जिसने जीवन में सत्त्व नहीं होता, गुरु का आदर नहीं होता वह कितना भी संसार की चीजों से बचा हुआ दिखे, फिर भी उसका कोई बचाव नहीं होता। उसको यमदूत घसीटकर ले जाते हैं फिर कभी बैल बनता है, कभी पेड़ बनता है, कभी शूकर-कूकर बनता है… बेचारा जीव न जाने कितने-कितने धक्के खाता है और जिसके जीवन में सत्त्व होता है, जो गुरुआज्ञा में चलता है वह फिसलते-फिसलते भी बच जाता है।
जिसे सदगुरु मिल जाते हैं और जो सदगुरु के चरणों में अपना जीवन न्योछावर कर देता है, वह चौरासी के चक्कर से अवश्य बच जाता है।
अनेक कष्ट सहकर भी यदि सदगुरु की प्राप्ति होती है तो सौदा सस्ता है। कबीर जी ने कहा भी हैः
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
सिर दीजे सदगुरु मिले, तो भी सस्ता जाना।।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2002, अंक 115, पृष्ठ संख्या 20-22
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जैसा खाओ अन्न….


बासमती चावल बेचने वाले एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी। सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लगा। सेठ को हुआ कि इतना पाप हो रहा है तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए।

एक दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा को आमंत्रित कर भोजन प्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की।

साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खायी। दोपहर का समय था। सेठ ने कहाः

“महाराज ! अभी आराम कीजिए। थोड़ी धूप कम हो जाय फिर पधारियेगा।”

साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली। सेठ ने 100-100 रूपये वाली 10 लाख जितनी रकम की गड्डियाँ उसी कमरे में चादर से ढँककर रख दी।

साधु बाबा आराम करने लगे। खीर थोड़ी हजम हुई। चोरी के चावल थे। साधु बाबा के मन में हुआ  कि इतनी सारी गड्डियाँ पड़ी हैं, एक-दो उठाकर झोले में रख लूँ तो किसको पता चलेगा ? साधु बाबा ने एक गड्डी उठाकर रख ली। शाम हुई तो सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े।

सेठ दूसरे दिन रूपये गिनने बैठा तो 1 गड्डी (दस हजार रुपये) कम निकली। सेठ ने सोचा कि महात्मा तो भगवत्पुरुष थे, वे क्यों लेंगे ? नौकरों की धुलाई-पिटाई चालू हो गयी। ऐसा करते-करते दोपहर हो गयी।

इतने में साधु बाबा आ पहुँचे तथा अपने झोले में से गड्डी निकाल कर सेठ को देते हुए बोलेः

“नौकरों को मत पीटना, गड्डी मैं ले गया था।”

सेठ ने कहाः “महाराज ! आप क्यों लेंगे ? जब यहाँ नौकरों से पूछताछ शुरु हुई तब कोई भय के मारे आपको दे गया होगा और आप नौकर को बचाने के उद्देश्य से ही वापस करने आये हैं क्योंकि साधु तो दयालु होते हैं।”

साधुः “यह दयालुता नहीं है। मैं सचमुच में तुम्हारी गड्डी चुराकर ले गया था। सेठ ! तुम सच बताओ कि तुम कल खीर किसकी और किसलिए बनायी थी ?”

सेठ ने सारी बात बता दी कि स्टेशन मास्टर से चोरी के चावल खरीदता हूँ, उसी चावल की खीर थी।

साधु बाबाः “चोरी के चावल की खीर थी इसलिए उसने मेरे मन में भी चोरी का भाव उत्पन्न कर दिया। सुबह जब पेट खाली हुआ, तेरी खीर का सफाया हो गया तब मेरी बुद्धि शुद्ध हुई कि ‘हे राम…. यह क्या हो गया ? मेरे कारण बेचारे नौकरों पर न जाने क्या बीत रही होगी। इसलिए तेरे पैसे लौटाने आ गया।”

इसीलिए कहते हैं किः

जैसा खाओ अन्न वैसा होवे मन। जैसा पीओ पानी वैसी होवे वाणी।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2002, पृष्ठ संख्या 17 अंक 114

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