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Prerak Prasang

ब्राह्मण पुत्र मेधावी


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।

विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि।।

ʹमुझ परमेश्वर में अनन्य योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति करके एकांत देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्य के समुदाय में प्रेम का न होना….(यह ज्ञान है, मोक्ष का मार्ग है।) भगवदगीताः 13.10)

इन्द्रियों एवं मन को तुच्छ वृत्तियों को संतुष्ट करने में लगना, आत्मानंद को पाने के बजाय अपने को विषय विकारों के कीचड़ में गिराना-इसे व्यभिचार कहते हैं। मनुष्य जन्म के मुख्य लक्ष्य परमतत्त्व को पाने के लिए कोशिश न करके संसार में आसक्त होकर जन्म गँवा देना ही व्यभिचार कहा गया है।

प्रतिकूलता में ईश्वर को याद किया, साधन-भजन के मार्ग पर थोड़ी यात्रा की, परंतु जैसे ही प्रतिकूलता कम हुई कि फिर से भोगों में लंपट हो गये… या फिर, संसार में अनुकूलता है, सुख सुविधाएँ हैं तो ईश्वर को पाने के लिए तत्परता दिखाई परंतु जैसे ही अनुकूलता कम हुई, असुविधाएँ आयीं तो ईश्वर को भुला दिया और संसार को ठीक करने में लग गये। इसे व्यभिचारिणी भक्ति कहा गया है। अनुकूलता आये चाहे प्रतिकूलता आये-दोनों ही अवस्था में जो परमतत्त्व को पाने के लिए तत्पर रहता है, संसार में चाहे सुख-सुविधा मिले चाहे दुःख मिले, साधन-भजन के मार्ग पर जो यात्रा जारी रखता है ऐसा भक्त अव्यभिचारिणी भक्ति करता है।

व्यभिचारिणी भक्ति करने वाला साधक थोड़ी-सी अनुकूलता या प्रतिकूलता आने पर साधन छोड़कर संसार में गिर जाता है या तो साधन के प्रकार बदलता रहता है। किन्तु अव्यभिचारिणी भक्ति करने वाला साधक बाह्य परिस्थिति से, सुख-दुःख के प्रसंग से चलायमान नहीं होता। व्यभिचारिणी भक्ति से थोड़ी पुण्याई बढ़ती है, थोड़ा सुख मिलता है परंतु मनुष्य को परम सुख की प्राप्ति तो अव्यभिचारिणी भक्ति से ही होती है। भगवान कहते हैं-

मयि चानन्ययोगेन….

भगवान के साथ अनन्य योग करें, अन्य-अन्य योग नहीं। कई लोग ईश्वर की भक्ति तो करते हैं लेकिन चिंता करते रहते हैं कि ʹमेरा क्या होगा ? मेरे परिवार का क्या होगा ?ʹ इसका नाम अनन्य भक्ति नहीं है, भगवान को संपूर्णरूप से समर्पित हो जाना अनन्य भक्ति है। भगवान में अनन्य भाव है तो फिर यह सोचना शेष नहीं रहता कि ʹमेरा क्या होगा ?ʹ जब सब कुछ उसी को सौंप दिया फिर चिंता कैसी ? अतः अनन्य भाव से अव्यभिचारिणी भक्ति करते हुए विविक्त देश का सेवन करें अर्थात् विषयी-विकारी पुरुषों के संग से किनारा कर लें और जहाँ साधन-भजन हो ऐसी जगह पर रहें। भगवद् ध्यान में, भगवद् ज्ञान में रमण करने वाले महापुरुषों के सान्निध्य में रहें। शंकराचार्यजी ने कहाः

एकांतवासो लघुभोजनादौ….

एकांतवास, लघुभोजन अर्थात् इऩ्द्रियों का अल्प भोजन यानी देखना, सुनना, सूँघना, चखना, स्पर्श करना आदि के नियंत्रण से मन की चंचलता का नाश होकर बुद्धि में आत्मप्रकाश होता है। फिर मन की वृत्तियाँ सूक्ष्म होती हैं, वृत्तियाँ सूक्ष्म होने से हम परमतत्त्व के करीब पहुँचते हैं।

साधन ऐसा होना चाहिए कि शीघ्र ही भगवान का साक्षात्कार हो जाय। विषय़ी-विकारी लोगों के प्रभाव में आये बिना भक्ति में तदाकार होने से मनुष्य निष्पाप होता जाता है। निष्पाप होने से विवेक जागता है, संसार से वैराग्य आता है। निर्दोष होने से उसे संसार की असारता, परमात्मा की महत्ता का पता चलता है।

संसार पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा और अभी भी नहीं की तरफ, विनाश की तरफ जा रहा है। ऐसे परिवर्तनशील संसार में, नश्वर-भोग पदार्थों में आसक्ति का अभाव तथा भोगसामग्री का औषधिवत् उपयोग ही बुद्धिमानी है।

नाशवान संसार से विरक्त होकर एक बार युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह के आगे अपनी मनोदशा का वर्णन कियाः

“पितामह ! काल के चक्र में हमें कभी सुख मिला तो कभी दुःख मिला। हम कभी वन में भटके तो कभी सिंहासन पर बैठे। काल अपनी गति से चल रहा है और आयुष्य क्षीण होता जा रहा है। कभी शत्रुओं के तो कभी मित्रों के, कभी भोग-पदार्थ के चिंतन में तो कभी आलस्य-प्रमाद में जीवन पानी की तरह बह रहा है। हे पितामह ! दिन प्रतिदिन मौत नजदीक आती जा रही है। मौत हमें मार दे उसके पहले अमर आत्मा में विश्रांति कैसे पायें ?”

वक्ताओं में श्रेष्ठ, व्रतधारियों में दृढ़ ऐसे भीष्म पितामह युधिष्ठिर को उपदेश देते हैं- “हे य़ुधिष्ठिर ! तुमने अपने विवेक को जागृत करके उत्तम प्रश्न पूछा है। तुम्हारे प्रश्न से बंगदेश के ब्राह्मण की कथा स्मरण में आती है।

बंगदेश में एक ब्राह्मण जप-तप, होम-हवन, व्रत-उपवास आदि कर्मकांड करते हुए ईश्वर के मार्ग पर चल रहा था। तपोनिधि ब्राह्मण की पुण्याई से उसके घर एक मेधावी बालक का जन्म हुआ। ʹमेधाʹ अर्थात् प्रज्ञा। बालक जन्म से ही अत्यधिक प्रज्ञावान, बुद्धिमान होने के कारण उसका नाम भी ʹमेधावीʹ रखा गया।

मेधावी 5 साल का हुआ तब अपने तपोनिधि पिता से उसने प्रश्न कियाः “पिताजी ! मनुष्य का कर्त्तव्य क्या है ?”

पिता ने उत्तर देते हुए कहाः “मनुष्य का कर्तव्य है कि 25 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य का पालन करके गुरुद्वार पर रहे, विद्याभ्यास करे, तत्पश्चात दूसरे 25 साल अर्थात् 50 वर्ष की आयु तक गृहस्थाश्रम में रहकर संसार निर्वाह करे। तदनन्तर 25 साल तक अर्थात् गृहस्थाश्रम से निवृत्त होकर वानप्रस्थ जीवन गुजारे और आखिर मोक्षप्राप्ति हेतु संन्यास ले ले।”

आत्मज्ञान में तपोधन ब्राह्मण की गति नहीं थी इसलिए मनुष्य जीवन के सर्वसाधारण शास्त्रोक्त नियम बता दिये लेकिन 5 साल के मेधावी को पिता जी की ये बातें जचीं नहीं। उसने पूछाः

“मनुष्य 25 साल ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करके गुरुद्वार पर रहकर विद्याभ्यास करे, फिर 25 से 50 वर्ष की उम्र तक संसारी विषयों में, विकारों में रहे, उसके बाद मुनि-तपस्वी का जीवन बिताने से क्या लाभ होगा ? पिता जी ! भोगवासना के दलदल में फँसा मनुष्य फिर उससे बाहर नहीं निकल पाता है। समझने पर भी वह फिसलता ही जाता है। शपथ भी खाता है फिर भी फिसल जाता है। इसलिए भोग-सामग्री का अनुभव करके फिर मुक्ति के लिए पुरुषार्थ करना उचित नहीं लगता। भोग तो सूअर और कुत्ते की योनि में भी मिलते हैं। मनुष्य शरीर मिला है तो उसकी उपयोगिता क्या ? पशु योनि की तरह इसे भी व्यर्थ गँवा देना चाहिए क्या ? इससे अच्छा  तो यह होगा कि आरंभ से ही संसार में फँसे बिना ईश्वर के मार्ग पर चल दें।”

ब्राह्मणः “संसार में प्रवेश करने से, पुत्रप्राप्ति होने से पितृओं का ऋण चुकाया जाता है। पुत्र पितृओं का कल्याण करता है।”

ब्राह्मण पुत्र मेधावी की बुद्धि सूक्ष्म थी। छोटे बच्चे को चॉकलेट देकर पटाया जाता है इस तरह पिताजी ने अपनी बातों से उसे समझाना चाहा, परन्तु इन बातों से समझ जाए ऐसा वह नहीं था। उसने तर्क करते हुए कहाः “पुत्र से ही यदि कल्याण हो जाता हो तो कई ऐसे पुत्र होते हैं जो पिता के नाम को तो क्या पूरे कुल-खानदान को भी बदनाम और बरबाद करने वाले कर्म करते हैं। ऐसे पुत्रों से पितृओं का क्या कल्याण हो सकता है ? संसार में कितने ही लोगों को पुत्रप्राप्ति हुई है फिर भी उनका अकल्याण होना क्यों दिखाई दे रहा है ?”

मनुष्य पुत्र के सहारे, पत्नी के सहारे, धन या सत्ता के सहारे अपना कल्याण चाहता है तो यह उसकी बुद्धि का दोष है।

प्रज्ञापराधो मूलं सर्वरोगाणाम्।

प्रज्ञापराधो मूलं सर्वदुःखानाम्।।

सारे रोगों का मूल, सारे दुःखों का मूल है प्रज्ञा का अपराध। मंद बुद्धि के कारण ही मनुष्य सौन्दर्य, सत्ता धन आदि का सहारा लेकर सुख पाने की इच्छा रखता है। वह यहाँ है तो सुख पाने की अंधी दौड़ में मर जाता है, जीवनभर झूठ-कपट, बेईमानी, धोखेबाजी करता रहता है तो मरने के बाद भी नरकों में जाकर पचता है।

भीष्म पितामह युधिष्ठिर से कहते हैं-

“हे य़ुधिष्ठिर ! बालक मेधावी अपने ब्राह्मण पिता से कहता हैः “पिता जी ! मुझे यह बात समझ में नहीं आती है कि भोग भोगकर, संसार के अनुभव से गुजरकर फिर मोक्षमार्ग पर चलें उसके बदले पहले से ही विवेक जागृत करके, दूसरों के अनुभव से सावधान होकर हम आरंभ से ही संसार में न फँसें और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर हो जाएँ  कितना अच्छा ! पिता जी ! आप ही मुझे बताइये कि ऐसा कौन सा मार्ग है जिससे शीघ्र मोक्षप्राप्ति हो। पिता जी ! मुझे लग रहा है कि कोई दिन-रात मेरे पीछे पड़ा है और मुझे मार रहा है।”

पिताः “तू ऐसी बातें क्यों करता है ? तू खुद डरा हुआ है और मुझे भी डरा रहा है।”

मेधावीः “पिताजी ! मैं डरा हुआ नहीं हूँ। मैं सच कहता हूँ। आप होम-हवन, जप-तप आदि करके स्वर्ग का सुख पाना चाहते हैं लेकिन मैंने तो सुना है कि वह सुख सच्चा सुख नहीं है, सदा टिकने वाला नहीं है। काल डंडा लेकर सबके पीछे पड़ा है, सबको मार रहा है। ऐसी दशा में 25 साल निर्वाह में गँवा देने की बात अनुचित समझता हूँ। कौन कब मृत्यु की झपेट में आ जाए, कोई पता नहीं है। जीवन का कोई भरोसा नहीं है अतः भोगों का अनुभव लेने के बजाये अपने कल्याण की बात सोचनी चाहिए। ऐसा कौन सा भोग है कि जिसे भोगने के बाद रोग न मिला हो ? सांसारिक भोग से या स्वर्गादि के सुखों के भोग से शक्तिहीनता, जड़ता, पराधीनता ही मिलती है। इसलिए मैं सोचता हूँ कि भोग की अपेक्षा योग का मार्ग लेना ही कल्याणकारी साबित होगा।”

तपोधन ब्राह्मण सोचता है कि आज तक जिंदगी के कई साल व्यर्थ भोग-पदार्थों की प्राप्ति की दौड़ में गँवा दिये लेकिन इस बच्चे ने तो मेरी आँखें खोल दीं। वे बोलेः “मेधावी ! तू सच कहता है। मैंने कर्मकांड करके अपनी वासनाओं को तृप्त करना चाहा मगर उससे शांति नहीं मिली, अंतर में तृप्ति नहीं मिली। वरन् कामनाएँ गहरी उतरती गई। मृत्यु कब आकर गला दबोच ले, कोई पता नहीं है। जैसे चूहे को कहीं से मिठाई मिले और वह आराम से खाने लगा हो और अचानक बिल्ली आकर उसे झपेट ले…… ऐसी हालत संसार के भोगों में रत मनुष्य की होती है। मुझे भी कब मृत्यु आकर झपेट लेगी, कोई पता नहीं है।

जिस शरीर को खिलाया-पिलाया, घुमाया-फिराया, आखिर में वह अग्नि में जलकर खाक हो जायेगा। वह खाक हो जाये उससे पहले अपने शिवस्वरूप को, आत्मा को जानने का उपाय खोजना चाहिए।”

भीष्म पितामह अपनी बात को आगे चलाते हुए कहते हैं- “हे बुद्धिमान युधिष्ठिर ! मनुष्य के जीवन के चार पुरुषार्थ हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन चारों पुरुषार्थ में से बुद्धिमान मनुष्य को चौथा पुरुषार्थ मोक्ष पाने में ही सार लगता है। जिनके चित्त में मोक्षप्राप्ति की इच्छा है वे धर्म के अनुकूल रहकर अर्थ और काम भोगते हैं। वे सजाग रहकर संसार के व्यवहार को चलाते हैं। इससे विवेक-वैराग्य की प्राप्ति होती है और वे परम पुरुषार्थ मोक्ष के मार्ग पर चल पड़ते हैं।

जिन्हें अपने कल्याण के लिए पुरुषार्थ करना हो उन्हें अपने स्थूल शरीर को परहित के कार्य में और सूक्ष्म शरीर यानी मन को भगवन्नाम के जप, ध्यान, आत्मचिंतन में लगाना चाहिए। निष्काम कर्म से अंतःकरण की शुद्धि होती है और भोग-वासनाएँ क्षीण होती हैं। योग से सामर्थ्य आता है। परमात्मा की अव्यभिचारिणी भक्ति करने से अंतःकरण दिव्य होता है और दिव्य रस की प्राप्ति होती है। जीवन के चार पुरुषार्थ में से अर्थ और काम तो शरीर के लिए हैं। धर्म के आचरण से मन ईश्वर की ओर चलता है जबकि मोक्ष परम पद को दिलाने वाला है। हे कुरुनंदन युधिष्ठिर ! यदि किसी बुद्धिमान के मन में प्रतिशोध की आग भड़कती रहती है तो वह धर्म का सहारा लेकर अपने मन को समझाता है, शांत रखता है। जो धर्म के अनुकूल व्यवहार करता है, वह अंत में भगवान की शरण जाता है लेकिन जो अधर्म का सहारा लेता है वह दुर्बुद्धि दुर्योधन की नाईं अपने को और अपने साथवालों को दुर्गति की खाई में डालता है।

ऐसे लोगों को चाहिए कि निष्काम भाव से कर्म करें जिससे अंतःकरण शुद्ध हो। शुद्ध अंतःकरण वाले मनुष्य को ही परमात्म-ध्यान, परमात्म-प्रेम के दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है। ऐसा मानव उस ब्राह्मणपुत्र मेधावी की तरह अपना विवेक जगाकर परम पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 1997, पृष्ठ संख्या 20,21,22,23 अंक 52

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श्रद्धा सब धर्मों में जरूरी


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

ʹनारद पुराणʹ में आता है कि श्रद्धा से ही भगवान संतुष्ट होते हैं।

श्रद्धापूर्णाः सर्वधर्मा मनोरथफलप्रदाः।

श्रद्धया साध्यते सर्वं श्रद्धया तुष्यते हरिः।।

ʹनारद ! श्रद्धापूर्वक आचरण में लाये हुए ही सब धर्म मनोवांछित फल देने वाले होते हैं। श्रद्धा से ही सब कुछ सिद्ध होता है और श्रद्धा से भगवान श्रीहरि संतुष्ट होते हैं।ʹ

नेता को भी ʹमैं जीत जाऊँगा…ʹ यह श्रद्धा होती है तभी वह चुनाव में तत्पर होता है और सफल होता है। दुकानदार को भी श्रद्धा होती है कि ʹदुकान चलाने में लाभ होगा…. धंधा चलेगा…..ʹ भी वह पगड़ी देकर दुकान खरीदता है और सफल होता है। विद्यार्थी को भी श्रद्धा होती है कि ʹमैं पढ़ूँगा और पास होऊँगा….।ʹ हालाँकि सब विद्यार्थी पास नहीं होते हैं – 100 प्रतिशत विद्यार्थी पास नहीं होते हैं। कहीं 70 तो कहीं 80 प्रतिशत पास होते हैं तो 20 या 30 प्रतिशत फेल भी होते हैं। अगर हजार विद्यार्थी परीक्षा में बैठें तो आठसौ पास होंगे लेकिन अगर आठसौ बैठें तो आठसौ पास नहीं होंगे। किन्तु हजार के हजार विद्यार्थी सोचते हैं कि ʹहम तो पास हो जायेंगेʹ तभी 700-800 पास हो पायेंगे।

परीक्षा में भी जो फेल होते हैं उन्हें कुछ  तो ज्ञान मिलता ही है। ऐसे ही जो श्रद्धा से ईश्वर के रास्ते पर चल पड़ता है उसे पूर्णता की प्राप्ति होती है किन्तु कभी-कभार अगर इस जन्म में न भी हुई फिर भी उस साधक की साधना व्यर्थ नहीं जाती। स्वर्ग या ब्रह्मलोक का सुख-वैभव  उसे मुफ्त में मिल ही जाता है और वह उस सुख का उपभोग करके पुनः किसी श्रीमान के घर, किसी योगी के घर जन्म लेता है। बचपन से ही भोग-सामग्री के बीच होते हुए भी, पूर्वकाल की श्रद्धा के बल से किया हुआ भजन, दान-पुण्य एवं सत्कर्म उसके हृदय को उठाता जाता है और वह परम पद की, पूर्णता की प्राप्ति कर लेता है।

जिसके जीवन में श्रद्धा नहीं है, उसका जीवन रसहीन हो जायेगा। फिर वह इन्जेक्शनों एवं गोलियों से तन्दुरुस्ती माँगता फिरेगा, डिस्को और वाइन, सिगरेट, पान-मसाले (गुटखा) से प्रसन्नता माँगता फिरेगा और इधर-उधर के छोटे-मोटे अखबारों, नॉवेल-उपन्यास आदि में ज्ञान खोजता फिरेगा लेकिन जिसके जीवन में श्रद्धा है उसके अंतर में आत्मज्ञान प्रगटेगा, उसकी अंतरात्मा से आत्मसुख प्रगटेगा, उसकी अंतरात्मा से आरोग्यता के कण प्रगटेंगे और देर-सबेर अंतरात्मा की यात्रा करके वह परमात्म पथ की यात्रा में भी सफल हो जायेगा।

जिसके जीवन में श्रद्धा नहीं होती वह तत्पर नहीं होगा, संयमी भी नहीं होगा, स्नेहवान भी नहीं होगा। जिसके जीवन में श्रद्धा है उसके जीवन में तत्परता होगी, संयम होगा, रस होगा। जो लोग श्रद्धावान का मजाक उड़ाते हैं, उनके लिए आचार्य विनोबा भावे कहते हैं “श्रद्धावान को अंधश्रद्धालु कहना यह भी  अंधश्रद्धा है।”

अपने बाप पर भी तो श्रद्धा रखनी पड़ती है। जो श्रद्धावान का मजाक उड़ाते हैं वे भी तो श्रद्धावान हैं। ʹयह मेरा बाप…. यह मेरी जाति….ʹ यह श्रद्धा से ही तो मानते हैं। पायलट पर, बसड्राईवर पर भी तो श्रद्धा रखनी पड़ती है। हालाँकि कई बार दुर्घटना भी हो जाती है।

यहाँ भगवान कहते हैं- श्रद्धापूर्णाः सर्वधर्मा… सब धर्मों को श्रद्धा पूर्ण करती है, चाहे स्त्रीधर्म हो – जो स्त्री, पुरुष में साक्षात नारायण का वास समझकर उसकी सेवा करती है, अपनी इच्छा-वासनाओं को महत्त्व न देते हुए पति के संतोष में अपना संतोष मान लेती है, उस स्त्री के पातिव्रत्य धर्म में इतना सामर्थ्य आ जाता है जितना उसके पति में भी शायद न हो और यह सामर्थ्य आता है उसकी श्रद्धा से। विद्यार्थी का धर्म भी श्रद्धा से संपन्न होता है और चिकित्सक आदि का धर्म भी श्रद्धा से संपन्न होता है। यदि नकारात्मक विचार रखकर चिकित्सक इलाज करे या मरीज करवाये तो दोनों को हानि होगी। अतः श्रद्धा, तत्परता सब धर्मों में चाहिए, सब कर्मों में चाहिए।

श्रद्धापूर्णाः सर्वधर्मा मनोरथफलप्रदाः।

श्रद्धया साध्यते सर्वं श्रद्धया तुष्यते हरिः।।

ʹनारद ! श्रद्धापूर्वक आचरण में लाये हुए ही सब धर्म मनोवांछित फल देने वाले होते हैं। श्रद्धा से सब कुछ सिद्ध होता है और श्रद्धा से ही भगवान श्रीहरि संतुष्ट होते हैं।ʹ

श्रद्धा से साधक में तत्परता आती है, श्रद्धा से ही मन-इन्द्रियों पर संयम किया जाता है और श्रद्धा से ही परमात्मस्वरूप की प्राप्ति होती है। श्रद्धा से उत्तम गुण उत्पन्न होते हैं और श्रद्धा से ही उत्तम रस की प्राप्ति होती है।

राजा द्रुपद ने संतान-प्राप्ति के लिए श्रद्धा से भगवान शिव की आराधना की। शिव की आराधना का फल हुआ कि राजा द्रुपद को संतान तो प्राप्त हुई किन्त कन्या के रूप में।

तब राजा द्रुपद ने पुनः आराधना की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रगट हुए। तब राजा ने प्रार्थना कीः “भगवन्, ! मैंने तो संतान अर्थात् पुत्र की प्राप्ति के लिए आराधना की थी लेकिन यह तो कन्या है।”

शिवजीः “हमारी दी हुई वस्तु को तुम प्रसाद समझकर स्वीकार करो। यह दिखती तो कन्या है लेकिन तुम इसे पुत्र ही समझो।”

राजा द्रुपद ने भगवान के वचनों पर श्रद्धा की। उस कन्या का कन्यापरक नाम नहीं रखा परंतु पुत्रपरक नाम-शिखण्डी रखा। उसके संस्कार भी पुत्र के अऩुसार एत। जब वह युवती हुई तब उसे युवक मानकर किसी कन्या से उसकी शादी करवा दी। श्रद्धा के बल से वह कन्या पुत्र के रूप में बदल गयी, शिखण्डी पुरुष हो गया। आज भी कभी-कभी आप सुनते हैं कि लड़की में से लड़का हो गया।

यह सब परिणाम है दृढ़ श्रद्धा का। दृढ़ श्रद्धा असंभव को भी संभव करने में सक्षम है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 1997, पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 51

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कुप्रचार से हानि संतों को नहीं, समाज को है…..


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

किसी व्यक्ति ने एक महात्मा के पास जाकर कहाः

“बाबा जी ! सनातन धर्म के प्रति कुप्रचार करने वाले लोग कहते हैं कि ʹरामायण सच्ची नहीं है।ʹ वे लोग अपना उल्लू सीधा करते हैं यह तो हम जानते हैं लेकिन बाबाजी ! जब हम बार-बार सुनते हैं तो कभी-कभी लगता है कि यह बात सच्ची है क्या ?”

वे एक सुलझे हुए महात्मा थे। वे बोलेः “मैं यह तो नहीं जानता कि रामायण सही है या गलत लेकिन इससे मेरा जीवन सही हो गया है और जो इसका अध्ययन करता है उसका जीवन सही होता है। यही प्रमाण सच्चा है। रामायण के अनुकरण से मेरे कुटुम्ब में स्नेह बढ़ गया है, भाई-भाई में, पति-पत्नी में, पिता-पुत्र में मर्यादा और स्नेह बढ़ गया है। अतः रामायण के विषय में ʹवह सही है या गलतʹ – यह सोचना ही बेवकूफी है।”

अगर दोषदृष्टि से ही देखना हो तो भगवान श्रीकृष्ण में दुर्गुण दिख जायेंगे पापी को और राम में भी दोष दिख जायेंगे, संत-महापुरुषों में भी दोष दिख जायेंगे निगुरों को। अगर निंदा ही करनी हो तो कोई भी निमित्त उत्पन्न करके आरोपर लगाने लगेंगे निंदक…..

कवि गेटे एक सज्जन व्यक्ति थे। उनकी एक पुस्तक सज्जनों को तो बहुत अच्छी लगी किन्तु जरूरी नहीं है कि अच्छी बात सभी को अच्छी लगे। अतः कुछ निंदकों ने कवि गेटे पर ऐसे-ऐसे आरोप लगाने शुरु किये, जिसे सुनकर गेटे के प्रशंसकों को आघात लगा कि ʹइतने महान् कवि के लिए यह क्या अनर्गल बोला जा रहा है ?ʹ अतः कुछ सज्जन लोग मिलकर कवि गेटे के पास आये और बोलेः

“आपकी पुस्तक अत्यंत बढ़िया है फिर भी आरोपियों ने उसकी धज्जियाँ उड़ाई हैं। उनकी नीच प्रवृत्ति आपके श्रेष्ठ कार्य को नहीं देख सकती अतः अगर आप संकेत करें  हम उनके आरोपों का मुँहतोड़ जवाब दे देवें।”

तब गेटे ने कहाः “जिन लोगों को मेरे प्रति प्रेम है और जो मेरे स्वभाव को जानते मानते हैं, वे लोग यदि ऐसे कुप्रचार करने वाले हजार लोग और भी बढ़ जायें, तब भी विचलित होने वाले नहीं हैं। जिसने मुझे नजदीक से देखा है, उसकी मेरे प्रति श्रद्धा, कितना भी कुप्रचार होने पर भी कम नहीं होगी। वह कुप्रचार का शिकार नहीं बनेगा। बैठो, मैं आप लोगों को एक कविता सुनाता हूँ।”

कवि गेटे ने उनको टॉलस्टाय की एक कविता सुनायी, जिसका आशय थाः ʹजब कोई तुम्हारी कड़ी आलोचना करता है, तब तुम्हें यह स्मरण रखना चाहिए कि तुम्हारा फूल सुविकसित है इसीलिए भौंरे डंक मारने आ रहे हैं। इसी प्रकार जब तुम्हें निंदकों के डंक लगने लगें यह समझ लेना कि तुम्हारा कार्य सुविकसित हुआ है। अर्धविकसित फूल पर भ्रमर  कहाँ बैठता है ?ʹ

इसलिए जब आलोचक अऩाप-शऩाप आलोचना करने लगें तब तुम्हें संतोष मानना चाहिए कि तुम्हारा पुरुषार्थ और सेवाकार्यरूपी पुष्प इतना सुविकसित हुआ है कि उन बेचारों को तकलीफ हो रही है…. हालाँकि तुम्हारा इरादा उऩ्हें तकलीफ देने का नहीं है।

लेकिन हाँ, तुम सावधान जरूर रहना। श्रद्धाहीन व्यक्तियों के चक्कर में आकर अपनी श्रद्धा को कभी ढीला म करना, सत्संग मत छोड़ना, ध्यान-भजन, जप-स्वाध्यायादि का त्याग मत करना। जैसे दमा, टी.बी. आदि से ग्रस्त मरीज की हम सेवा तो करते हैं लेकिन उसके कीटाणु हमें न लगें इस बात की सावधानी भी रखते हैं। ऐसे ही जो अश्रद्धा के कीटाणु से ग्रस्त हों रहे हों, ऐसे लोगों के बीच रहे, उऩकी ʹहाँʹ में हाँ मिलाते रहें तो फिर तुम्हारी श्रद्धा को भी आँच आने लगेगी और ध्यान-भजन में रूचि कम होती जायेगी।

उन व्यक्तियों से, उन वस्तुओं से, उन परिस्थितियों से, उन बातों से और संसर्ग से बचो जो तुम्हारी श्रद्धा, भक्ति और प्रेमरस को सुखाते हों। उन्हीं व्यक्तियों, वस्तुओं और परिस्थितियों का अवलंबन लो जिनसे तुम्हारे हृदय में श्रद्धा, भक्ति और प्रेम का स्रोत प्रगट होने में मदद मिले। श्रीकृष्ण कहते हैं-

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।

ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।

श्रद्धालु ही उस परम ज्ञान को पाता है और ज्ञान से परम शांति का अनुभव यहीं कर लेता है।

सुधन्वा के पिता, चम्पकपुरी के नरेश हंसध्वज ने एक बार अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को पकड़कर बाँध दिया तथा राजगुरु शंख एवं लिखित की आज्ञा से यह घोषणा कर दी गयी कि नियत समय तक सब योद्धा रणक्षेत्र में उपस्थित हो जायें। जो ठीक समय पर नहीं पहुँचेगा, उसे उबलते हुए तेल के कढ़ाहे में डाल दिया जायेगा।

आदेश का पालन करते हुए बाकी के सब योद्धा एवं अन्य राजकुमार तो निश्चित समय पर पहुँच गये, किन्तु सबसे छोटे राजकुमार सुधन्वा किसी कारणवश नहीं पहुँच सके। भक्त सुधन्वा को थोड़ी देर हो गयी अतः आज्ञा के मुताबिक सुधन्वा को खौलते कढ़ाहे में डाला गया, किन्तु हरिचिंतन के प्रभाव से सुधन्वा का बाल तक बाँका न हुआ।

सुधन्वा जान गये थे कि ʹमेरे पिता को चढ़ाने-भढ़काने वाले दो मंत्री हैं- शंख और लिखित। इन दोनों के कारण मेरे पिता को इतना क्रोध आ गया है।ʹ सुधन्वा भगवदभक्त तो थे ही, प्रभु पर उनकी अनन्य श्रद्धा थी अतः उन्होंने प्रार्थना कीः ʹयदि मैं निष्कपट भाव से हरि को अपना और अपने को हरि का मानता हूँ तो हरि सर्वत्र हैं, वे ही मेरी सहायता करें….ʹ

सुधन्वा के लिए तेल शीतल हो गया और उनका एक रोम तक न झुलसा ! लोगों को आश्चर्य हुआ कि यहाँ कोई षडयंत्र तो नहीं है। तब कढ़ाहे में नारियल फैंका गया और ज्यों ही नारियल कढ़ाहे में गिरा, त्यों ही दो टुकड़े होकर इतने जोर से उछला कि एक टुकड़ा दूर खड़े शंख के सिर पर और दूसरा टुकड़ा लिखित के सिर पर जा गिरा।

दोनों को परिचय मिल गया कि श्रद्धावान भक्तों के जीवन में हस्तक्षेप करने का परिणाम बड़ा खतरनाक होता है।

संत सताये तीनों जाये तेज बल और वंश।

ऐड़ा ऐड़ा कई गया रावण कौरव केरो कंस।।

हो सके  तो भगवान के भक्तों की सेवा करो अन्यथा किनारे रहो, किन्तु उऩ्हें सताओ मत। यदि तुम सताओगे तो तुम्हारा सताना वे तो थोड़ा सह लेंगे लेकिन श्रीहरि की प्रकृति जब करवट लेगी  तो बहु-बहुत भारी पड़ जायेगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 1997, पृष्ठ संख्या 19,20,25 अंक 51

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