Tag Archives: Tatva Gyan

Tatva Gyan

‘तत्त्वमसि’ – वही तुम हो, विभु-व्याप्त


सभी वस्तुएँ नश्वर एवं छायामात्र हैं अतः निर्भय रहो। समस्त दृश्य पदार्थ परिवर्तनशील हैं। परिवर्तने नस् धातु स्यात्। परिवर्तनशील को नाशवान कहा जाता है। वास्तव में तत्त्वरूप से किसी का नाश नहीं होता। जैसे सागर में लहरें, बुदबुदे नष्ट होते दिखते हैं पर वास्तविक दृष्टि से, जलरूप से उनका नाश नहीं होता, ऐसे ही दृश्य पदार्थों में परिवर्तन होता दिखता है पर तत्त्वरूप से तुम वह सत्य हो जिसमें किसी प्रकार का परिवर्तन सम्भव नहीं है। तुम स्पंदनरहित (आत्मा) हो।

तुम्हारा रूप (शरीर) एक स्वप्न है। इसको जानो और संतुष्ट रहो। ईश्वर के अरूपत्व में तुम्हारा वास्तविक स्वरूप स्थित है।

अपने मन को आत्मप्रकाश का अनुगमन करने दो। वासनाएँ प्रेरित करती हैं, सीमा की दीवार खड़ी है परंतु तुम मन नहीं हो, वासनाएँ तुम्हारा स्पर्श तक नहीं कर सकती। एकमात्र तुम्हीं विद्यमान हो, कोई सीमा नहीं है।

तुम्हारी स्थिति सर्वज्ञता और सर्वव्यापकता में है। याद रखो, जीवन एक खेल है। तुम अपना हिस्सा खेलो, अवश्य खेलो – ऐसा ही नियम है। फिर भी न तो तुम खिलाड़ी हो, न खेल है, न नियम हैं। स्वयं जीवन भी तुम्हें सीमित नहीं कर सकता। जीवन स्वप्न के तत्त्वों से बना है। तुम स्वप्न नहीं हो। तुम स्वप्नरहित हो तथा असत्य के स्पर्श से परे हो। इसको जानो…. तुम स्वतंत्र हो।

जीवन बहुत छोटा है, वासनाएँ प्रबल हैं। ईश्वर के लिए कुछ न कुछ समय अवश्य दो। वह बहुत कम चाहता है – केवल इतना ही कि तुम स्वयं को, अपने आपको जानो क्योंकि वस्तुतः अपने को जानते हुए तुम उसे जान पाओगे।

परमात्मा और आत्मा एक ही हैं। कुछ कहते हैं कि ‘हे मनुष्य ! याद रख, तू मिट्टी है।’ यह शरीर के लिए सत्य है किंतु अधिक उन्नत, शक्तिशाली परम सत्य और परम पवित्र अनुभव बतलाता है कि ‘हे मनुष्य ! याद रख तू आत्मा है।’ परमात्मा कहता है कि ‘केवल तू ही अविनाशी है, और सब नश्वर है।’ कितना ही बड़ा रूप हो, उसका नाश हो जाता है। समस्त रूपों के साथ मृत्यु और नाश लगे हुए हैं। विचार परिवर्तनशील हैं। व्यक्तित्व नाम रूप से ओत-प्रोत हैं। जीवात्मन् ! इसलिए इनसे दूर हो। याद रखो कि तुम नाम-रूप से परे आत्मा हो। केवल इसी में तुम शुद्ध और पवित्र हो।

स्वामी बनने का प्रयत्न मत करो, तुम्ही स्वामी हो। तुम्हारे लिए ‘बनना’ नहीं है। उन्नति करने का ढंग चाहे जितना ऊँचा हो परंतु समय आयेगा तब तुम जानोगे कि उन्नति समय के अंत में है ( अर्थात् तीनों कालों का अभाव है और एकमात्र अकाल तत्त्व का ही अस्तित्व है यह जान लेने पर पूर्णता का अनुभव होगा)। तुम समय के नहीं, अनंत के हो। यदि परमात्मा है तो ‘तत्त्वमसि’ – वही तुम हो, विभु-व्याप्त। तुम्हारे अंदर जो सबसे महान है, उसको जानो। सबसे महान की उपासना करो। सबसे उन्नत उपासना का रूप वह ज्ञान है जो बतलाता है कि ‘तुम और वह (सबसे महान) एक ही हैं।’ सबसे महान क्या है ?

हे जीव ! उसे तुम परमात्मा कहते हो। समस्त सपनों को विस्मरण की अवस्था में डाल दो। यह सुनकर कि परमात्मा तुम्हारे अंदर है और वही तुम हो….।’ इसे समझो। समझकर देखो। देखकर जानो। जानकर अनुभव करो। तब ‘तत्त्वमसि’ – वही तुम हो, विभु-व्याप्त।

संसार से असंग हो जाओ। यह स्वप्न है। यह संसार और शरीर-वस्तुतः ये दोनों ही इस घोर स्वप्न के आधार हैं। क्या तुम स्वप्न देखते ही रहोगे ? क्या तुम इस स्वप्न के विकट बंधन में बँधे ही रहोगे ? उठो और जागो, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाये, रुको मत।

विषय वासना, विकारों में फँसो मत। ‘सोऽहं…. शिवोऽहं….’ के अमृतमय अनुभव में जगते हुए शांति, मस्ती बढ़ाते रहो। हलके विचारों, वासनाओं से दीन हीन हो गया है जीवन। उत्त्म विचार और ‘सोऽहम्’ स्वरूप की समझ और स्थिति से अपने आत्मवैभव को पा लो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2018, पृष्ठ संख्या 4,6 अंक 301

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

हम सर्वस्व लगाकर भी इस संस्कृति का फायदा विश्व-मानव तक पहुँचायेंगे-पूज्य बापू जी


सनातन धर्म की स्थापना किन्हीं ऋषि-मुनि या पीर-पैगम्बर ने नहीं की बल्कि श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसी विभूतियाँ सनातन धर्म में प्रकट हुई हैं। सनातन धर्म तो उनके पूर्व भी था।

यह धर्म कहता हैः सङ्गच्छद्वं…. हम सब कदम-से-कदम मिलाकर चलें। सं वदध्वं…. हम दिल से दिल, विचार से विचार मिलाकर चलें। अगर हमारे विचार नहीं मिलते हैं तो हमें स्वतंत्र विचार रखने का अधिकार  है, सामने वाले को भी है। क्यों लड़ मरें, क्यों खप मरें ? परस्परदेवो भव। तुममें मुझमें जो चैतन्य देव है, उसके नाते हमारा मिलना जुलना हो और उसी में हम सभी विश्रांति पायें।

गीता उपनिषदों से निकला अमृत है और उपनिषदें वेदों के उभरा अमृत है। इसलिए हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी – कोई भी गीता को तटस्थता से पढ़ता है तो सिर-आँखों लगाता है, चाहे महात्मा थोरो हो, चाहे अमेरिका का तत्त्वचिंतक एमर्सन हो, जिन्होंने भी गीता, उपनिषदों का अध्ययन किया है उन्होंने भारतीय संस्कृति की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

तुझमें राम मुझमें राम सबमें राम समाया है।

कर लो सभी से स्नेह जगत में कोई नहीं पराया है।।

हाँ, फिर भी पराये दिखते हैं। गंगा का कोई घाट ऋषिकेश का है तो कोई हरिद्वार का है… घाट भिन्न-भिन्न हैं, गंगा तो वही की वही। सागर के किनारे भिन्न भिन्न हैं, सागर वही का वही। जैसे सागर में सतह पर लहरें, बुलबुले भिन्न भिन्न होते हुए भी गहराई में केवल शांत जल है, ऐसे ही सबके मन की तरंगें, भाव और मान्यताएँ भिन्न भिन्न हैं पर गहराई में केवल शांत, सच्चिदानंद परब्रह्म परमात्मा है। उसमें विश्रांति पाना ही आगे बढ़ना है।

समाज आत्मज्ञान से जितना दूर जाता है उतना ही कलह, अशांति, संघर्ष और आपसी वैमनस्य बढ़ता जाता है, जिससे शक्तियों का ह्रास होता है। सजातीय में समझौता होने पर विजातीय पर विजय पाने का सामर्थ्य जुटता है। विजातीय से धर्मयुक्त व्यवहार करने से प्रकृति कि सिद्धियों पर आसक्त न होकर प्रकृति के मूल के प्रति प्रेम करने से परब्रह्म-परमात्मा प्रकट होता है और जीवात्मा परमात्मा का साक्षात्कार करके परब्रह्ममय हो जाता है।

सनातन भारतीय संस्कृति संसार में सत्य की, परमात्मा की राह दिखाने वाली संस्कृति है। हमारे देश की संस्कृति या इष्टदेव के लिए कोई कुछ बोल दे और हम ‘हीं हीं’…. कर दें, चुप रहें….. नहीं ! हमारी अपनी जहाँ तक योग्यता है वहाँ तक पूरा तन-मन, जीवन को लगाकर भी इस संस्कृति की महानता का विश्व मानव को फायदा मिले ऐसा हमें यत्न करना चाहिए और हम करेंगे। ॐ…ॐ….ॐ…..

सबका मंगल सबका भला।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2017, पृष्ठ संख्या 11 अंक 300

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

 

संत संग से सधते हैं सब योग-पूज्य बापू जी


सत्पुरुषों का सान्निध्य बड़े भाग्य से मिलता है। कद्र करें न, तो तर जायें। कद्र तो करते हैं लेकिन फिर महापुरुषों से मनचाहा कराना चाहते हैं। मनचाहा नहीं कराना चाहिए, उनके अनुभव में, मार्गदर्शन में स्वयं चलने को तैयार होना चाहिए। मन तो अपने कोई कई जन्मों से भटका रहा है। उसके अनुसार हो तब सुखी होना-इसमें तो कुत्ता भी राज़ी हो जाता है, इसमें क्या बड़ी बात है ! सात साल (डीसा निवास के दौरान) कैसा-कैसा हमारे मन के विपरीत हुआ तब भी हम डटे रहे। ….तो मन से पार होना है न !

संतों के संग से कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग – तीनों योग हो जाते हैं। संतों के चरणों में रहने से सेवा मिल जायेगी… कर्मयोग हो गया, संतों के प्रति सद्भाव होगा… भक्तियोग हो गया और संतों के पास रहेंगे तो सत्संग स्वाभाविक, मुफ्त में मिल जाता है…. ज्ञानयोग हो गया।

साचा संतोने1 वंदन प्रेमथी रे2 …।

3 तो जगमां4 चालता5 छे भगवान।।

  1. संत को 2. प्रेम से 3. ये 4. जग में 5. चलते फिरते

भगवान का साकार रूप संत ही होते हैं। निराकार ब्रह्म तो नित्य विद्यमान है लेकिन उसे देखना हो तो वह संतों के रूप में होता है।

श्री योगवासिष्ठ में वसिष्ठ जी महाराज कहते हैं- “हे राम जी ! जो संतजनों का संग करता है, सत्शास्त्र और ब्रह्मविद्या को बारम्बार विचारता है, उसकी बुद्धि संतजनों के संग से बढ़ती जाती है। जैसे शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की कला दिन-प्रतिदिन बढ़ती है, वैसे ही उसकी बुद्धि बढ़ती है और विषयों से उपरत होती है।

संतों के वचनों का निषेध करना मुक्तिफल का नाश करने वाला और अहंतारूपी पिशाच को उपजाने वाला है। इसलिए संतों की शरण में जाओ और अहंता को दूर करो।”

संतों की बात काटना, उनमें दोष देखना, उनके संकेत को अन्यथा लेना मुक्तिफल और पुण्यों का नाश कर देता है और उनके वचनों का आदर सदगति देने वाला है। इसलिए ब्रह्मनिष्ठ संतों की शरण जाओ, अहंता दूर करो। देह में अहं है और वस्तुओं में मम (मेरा पन) है। अहंता दूर हुई तो ममता हट जायेगी।

मैं अरु मोर तोर की माया।

शरीर को मैं और चीज वस्तुओं को मेरा मानता है…. असली मैं से दूर हो गया। असली मैं की तरफ आना है तो थोड़ा समय एकांत में जा के असली मैं में चले गये। एक बार असली मैं को जान लिया तो फिर नकली मैं का व्यवहार चलेगा, कोई फर्क नहीं पड़ता। संत संग करते-करते पहले की हल्की बुद्धि हटती है, दिव्य बुद्धि बनती जाती है। जैसे लौकिक विद्या से अनजान विद्यार्थी पढ़ाई करते-करते स्नातक हो जाता है, ऐसे ही अध्यात्म-विद्या में भी है।

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा….. पहले व्यक्ति आत्मवेत्ता महापुरुषों से वेदांत ज्ञान सुनता है, उसका विचार करता है फिर ध्यान करता है, सत्कर्म करता है। धीरे-धीरे वह ज्ञान अनुभव में आता है तो विज्ञान (आत्मानुभव) बन जाता है और फिर आत्मतृप्ति होने लगती है। हर लाख लोगों में एक पुरुष भी आत्मतृप्त हो जाय तो संसार 5 मिनट में स्वर्ग हो जाय। जो दिव्य संस्कार लाख-दो लाख में नहीं मिलते है, करोड़ों में नहीं मिलते हैं, वे दिव्य संस्कार देते हैं आत्मसाक्षात्कारी महापुरुष। जो लोग ऐसे महापुरुषों से वह ज्ञान पाते हैं उनके कुटुम्ब का, खानदान का तथा वातावरण व समाज का कितना भला होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद दिसम्बर 2017, पृष्ठ संख्या 25 अंक 300

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ