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Tatva Gyan

एक शक्ति जो मनुष्य की अपेक्षा उच्चतर है


श्री रमण महर्षि

गुरु का अनुग्रह तुमको जल से बाहर निकालने के लिए सहायता हेतु बढ़ाये गये हाथ के समान है अथवा वह अविद्या को दूर करने के लिए तुम्हारे (ईश्वर प्राप्ति के) मार्ग को सरल कर देता है। गुरु, अनुग्रह, ईश्वर आदि की यह सब चर्चा क्या है ? क्या गुरु तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हारे कान में धीरे से कुछ कह देते हैं ? तुम उसका अनुमान अपने जैसा ही कर लेते हो चूँकि तुम एक देह के साथ हो, तुम सोचते हो कि तुम्हारे लिए कुछ निश्चित कार्य करने के लिए वे भी एक देह है। उनका कार्य आंतरिक है।

गुरु की प्राप्ति किस प्रकार होती है ? परमात्मा, जो सर्वव्यापी है, अपने अनुग्रह में अपने प्रिय भक्त पर करुणा करता है और भक्त के मापदंड के अनुसार अपने-आपको प्राणी के रूप में प्रकट करता है। भक्त सोचता है कि वे मनुष्य हैं और देहों के मध्य जैसे संबंध होते हैं वैसे संबंध की आशा करता है परंतु गुरु, जो कि ईश्वर अथवा आत्मा के अवतार हैं, अंदर से कार्य करते हैं। व्यक्ति की उसके मार्ग की भूलों को देखने में सहायता करते हैं और जब तक उसे अंदर आत्मा का साक्षात नहीं हो जाय, तब तक सन्मार्ग पर चलने के लिए उसका मार्गदर्शन करते हैं। ऐसे साक्षात्कार के पश्चात शिष्य को अनुभव होता है, ‘पहले मैं चिंतित रहता था, आज मैं वही पूर्ववत् आत्मा ही हूँ पर किसी भी वस्तु से प्रभावित नहीं हूँ। जो दुःखी था, वह कहाँ है ? वह कहीं भी नहीं दिखता।’

अब हमारा क्या कर्तव्य है ? केवल गुरु के वचनों का पालन करो, अंदर प्रयत्न करो। गुरु अंदर भी है और बाहर भी। इस प्रकार वे तुम्हारे लिए अंदर अग्रसर होने की परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं और तुम्हें केन्द्र तक खींचने के लिए अंतरंग को उद्यत करते हैं। इस प्रकार गुरु बाहर से धक्का देते हैं और अंदर से खींचते हैं, जिससे तुम केन्द्र पर स्थिर हो सको।

सुषुप्ति में तुम अंदर केन्द्रित होते हो। जाग्रत होने के साथ ही तुम्हारा मन बहिर्मुख होता है एवं इस, उस तथा अन्य समस्त वस्तुओं पर विचार करने लगता है। इसका निरोध आवश्यक है। यह उसी शक्ति के द्वारा सम्भव हो सकता है जो अंदर तथा बाहर दोनों ओर कार्य कर सकती है। क्या उसका एक देह से तादात्म्य किया जा सकता है ? हम सोचते हैं कि ‘हम अपने प्रयास से जगत पर विजय पा सकते हैं।’ जब हम बाहर से हताश हो जाते हैं और अंतर्मुख होते हैं तो हमें लगता है, ‘ओह ! ओह ! एक शक्ति है जो मनुष्य की अपेक्षा उच्चतर है।’ उच्चतर शक्ति का अस्तित्व स्वीकृत एवं मान्य करना ही होगा। अहंकार अत्यंत शक्तिशाली हाथी है तथा इसे सिंह से कम कोई भी वश नहीं कर सकता, जो इस उदाहरण में गुरु के अतिरिक्त कोई अन्य नहीं है, जिनका दर्शनमात्र हाथी को कम्पित कर खत्म कर देता है। समय आने पर ही हमें यह मालूम होगा कि जब हम नहीं होते हैं तभी हमारा ऐश्वर्य (महानता, सामर्थ्य) होता है। उस अवस्था को प्राप्त करने हेतु मनुष्य को अपने-आपको समर्पित करते हुए कहना होगा, ‘प्रभु ! आप मेरे आश्रयदाता हैं !’ तब गुरु देखते हैं कि ‘यह व्यक्ति कृपापात्र है’ और कृपा करते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2016, पृष्ठ संख्या 24 अंक 278

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मूर्त से अमूर्त की ओर


(श्री रामकृष्ण परमहंस जयंतीः 10 मार्च 2016)

श्री रामकृष्ण परमहंस के साधनकाल में दो व्यक्तियों ने उनकी बहुत सेवा की थी। एक उनके भानजे हृदय ने और दूसरे कलकत्ते (वर्तमान कोलकाता) की प्रसिद्ध रईस रानी रासमणी के दामाद मथुरबाबू ने।

विजयदशमी का दिन था। संध्या के समय माँ दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन होना था। सबको यह सोचकर बुरा लग रहा था कि ‘देवी के चले जाने पर यह आनंद-उत्सव नहीं रहेगा।’ पुरोहित ने मथुरबाबू को संदेश भेजा कि “विसर्जन होने के पहले आकर देवी को प्रणाम कर लें।”

मथुरबाबू को धक्का लगा कि ‘आज माँ का विसर्जन करना होगा ! पर क्यों ? माँ और रामकृष्णदेव की कृपा से मुझे किसी बात की कमी नहीं है, फिर माँ का विसर्जन क्यों ?’ ऐसा सोचते हुए वे चुपचाप बैठे रहे।

समय हो रहा था, पुरोहित ने पुनः समाचार भेजा। मथुरबाबू ने कहला भेजा कि “माँ का विसर्जन नहीं किया जायेगा। इतने दिन तक जैसे पूजा चल रही थी, वैसे ही चलती रहेगी। यदि मेरे मत के विरुद्ध किसी ने किया तो ठीक न होगा ! माँ की कृपा से जब मुझमें उनकी नित्य पूजा करने का सामर्थ्य है तो मैं क्यों विसर्जन करूँ !”

मथुरबाबू के हठी स्वभाव के आगे सभी हार मान गये। उनकी सम्मति के विरुद्ध विसर्जन करना सम्भव नहीं था। अंत में रामकृष्ण जी से प्रार्थना की गयी। परमहंस जी उनके पास गये तो वे बोलेः “बाबा ! चाहे कुछ भी हो, मैं अपने जीवित रहते माँ का विसर्जन नहीं होने दूँगा। मैं माँ को छोड़कर कैसे रह सकता हूँ !”

रामकृष्ण जी ने उनकी छाती पर हाथ रख कर कहाः “ओह ! तुम्हें इसी बात का डर है ? तुम्हें माँ को छोड़कर रहने को कौन कह रहा है और यदि तुमने विसर्जन कर भी दिया तो वे कहाँ चली जायेंगी ? इतने दिन माँ ने तुम्हारे पूजन-मंडप में पूजा ग्रहण की पर आज से वे और भी अधिक समीप रहकर प्रत्यक्ष तुम्हारे हृदय में विराजित हो के पूजा ग्रहण करेंगी, तब तो ठीक है न ?”

रामकृष्ण जी के स्पर्श से मथुरबाबू के हृदय में जो अनुभूति हुई, उससे उनका बाह्य पूजन का आग्रह अपने-आप हट गया।

आत्मानुभवी संत अपने भक्तों को आत्मानंद की ओर ले जाने के लिए अंदर की आत्मिक दिव्यता की अनुभूति कराते हैं। पूज्य बापू जी के सान्निध्य में होने वाले ध्यानयोग शक्तिपात साधना शिविरों में लाखों-लाखों लोग ऐसी दिव्य अनुभूतियों का लाभ लेते हैं।

पूज्य बापू जी सबसे सरल तथा सर्वोच्च फल प्रदान करे ऐसा अंतर्यामी आत्मदेव का पूजन बताते हुए कहते हैं- “उस आत्मदेव का पूजन न चंदन, केसर, कस्तूरी से होता है न धूप-दीप, अगरबत्ती से होता है और हर जगह पर, हर परिस्थिति में, हर क्षण में हो सकता है। उसका पूजन यही है कि ‘हे चिदानंद ! हे चैतन्य ! हे शांतस्वरूप ! आनन्दस्वरूप ! ये सारे भाव जहाँ से उठते हैं, वह सब भावों का साक्षी, आधारस्वरूप तू है। जय हो सच्चिदानंद !’ ऐसा चिन्तन हृदय करता है तो उसका पूजन हो ही गया। पूजन में बस चित्त की वृत्तियाँ शांत होने लगें। उसी के परम चिंतन से तुम्हारा चित्त शुद्ध होता जायेगा, उसीमय होता जायेगा। बस, कितना आसान और ऊँचा पूजन है !”

ऐसा ही आत्मदेव का पूजन भगवान शिवजी ने वसिष्ठजी को बताया था, जिसका वर्णन ‘योगवासिष्ठ महारामायण’ में आता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2016, पृष्ठ संख्या 21, अंक 278

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विचार की बलिहारी


‘नारद पुराण’ में आता है कि रैवत मन्वंतर में वेदमालि नामक एक प्रसिद्ध ब्राह्मण रहता था। विद्वान व शास्त्रज्ञ होने पर भी उसने अनेक उपायों से यत्नपूर्वक धन एकत्र किया। अपने व्रत, तप, पाठ आदि को भी दक्षिणा लेकर दूसरों के लिए संकल्प करके दे देता तथा शास्त्रनिषिद्ध व्यक्तियों से भी दान लेने में संकोच नहीं करता था।
‘मेरे पास कितना धन है’ यह जानने के लिए एक दिन उसने अपने धन को गिनना प्रारम्भ किया। उसका धन संख्या में बहुत ही अधिक था। धन की गणना करके वह हर्ष से फूल उठा। उस धनराशि को देखकर भगवान की कृपा से उसके चित्त में विचार का उदय हुआ, ‘मैंने नीच पुरुषों से दान ले के, न बेचने योग्य वस्तुओं का विक्रय करके तथा तपस्या आदि को बेच के यह प्रचुर धन एकत्र किया है। किंतु मेरी अत्यंत दुःसह तृष्णा अब भी शांत नहीं हुई। अहो ! मैं तो समझता हूँ, यह तृष्णा बहुत बड़ा कष्ट है। समस्त क्लेशों का कारण भी यही है। इसके कारण मनुष्य यदि समस्त कामनाओं को प्राप्त कर ले तो भी पुनः दूसरी वस्तुओं की अभिलाषा करने लगता है। बुढ़ापे में मनुष्य के केश पक जाते हैं, दाँत गल जाते हैं, आँख और कान भी जीर्ण हो जाते हैं किंतु यह तृष्णा शांत नहीं होती। मेरी सारी इन्द्रियाँ शिथिल हो रही हैं, बुढ़ापे ने मेरे बल को भी नष्ट कर दिया। किंतु तृष्णा तरुणी हो के और भी प्रबल हो उठी है। जिसके मन में कष्टदायिनी तृष्णा है, वह विद्वान होने पर भी मूर्ख हो जाता है, अत्यंत शांत होने पर भी महाक्रोधी हो जाता है और बुद्धिमान होने पर भी अत्यंत मूढ़बुद्धि हो जाता है।’
पश्चाताप करके वेदमालि ने अपने उद्धार के लिए हृदयपूर्वक भगवान से प्रार्थना की। उसने निश्चय किया कि ‘शेष जीवन संतों की सेवा, भगवद्-ध्यान, भगवद्-ज्ञान व भगवद्-सुमिरन में लगाऊँगा।’ अपने धन को उसने सरोवर, प्याउएँ, गौशालाएँ बनवाने, अन्नदान करने आदि में लगा दिया और किसी आत्मतृप्त संत-महात्मा की खोज एवं तपस्या के लिए नर-नारायण ऋषि के आश्रम बदरीवन की ओर चल पड़ा। वहाँ उसे मुनिश्रेष्ठ जानंति मिले।
वेदमालि ने हाथ जोड़कर विनय से कहाः “भगवन् ! आपके दर्शन से मैं कृतकृत्य हो गया। अब ज्ञान देकर मेरा उद्धार कीजिये।”
मुनिश्रेष्ठ जानंति बोलेः “महामते ! दूसरे की निंदा, चुगली तथा ईर्ष्या, दोषदृष्टि भूलकर भी न करो। सदा परोपकार में लगे रहो। मूर्खों से मिलना-जुलना छोड़ दो। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य छोड़कर लोक (जगत) को अपने आत्मा के समान देखो, इससे तुम्हें शांति मिलेगी। पाखंडपूर्ण आचार, अहंकार और क्रूरता का सर्वथा त्याग करो। सब प्राणियों पर दया तथा साधु पुरुषों की सेवा करते रहो। वेदांत का स्वाध्याय करते रहो। ऐसा करने पर तुम्हें परम उत्तम ज्ञान प्राप्त होगा। ज्ञान से समस्त पापों का निश्चय ही निवारण एवं मोक्ष हो जाता है।”
मुनि के उपदेशानुसार बुद्धिमान वेदमालि ज्ञान के साधन में लगे रहे। ‘मैं ही उपाधिरहित, स्वयं प्रकाश, निर्मल ब्रह्म हूँ’ – ऐसा निश्चय करने पर उन्हें परम शांति प्राप्त हो गयी। इस प्रकार गुरुकृपा से वे आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2016, पृष्ठ संख्या 13, अंक 277
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