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Tatva Gyan

गुणों के चक्र से परे हैं आप !


पराशरजी अपने जिज्ञासु शिष्य मैत्रेय को संसार-चक्र से निकलने की सरल युक्ति बताते हुए कहते हैं- “हे शिष्य ! जैसे आकाश में सप्त ऋषियों से लेकर सूर्य, चन्द्र आदि नक्षत्र तथा तारामंडल का चक्र दिन रात घूमता रहता है परंतु ध्रुव तारा अचल, एकरस रहता है। यदि अन्य तारों की तरह ध्रुव भी चलायमान होता तो उसका नाम ध्रुव नहीं, अध्रुव होता। उसी प्रकार माया व अज्ञानरूप आकाश में नक्षत्र व तारों के समान देह आदि पदार्थों का चक्र निरंतर घूमता रहता है परंतु आत्मा एकरस, अचल है।

जैसे अनेक बार जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति अवस्थाएँ होती हैं और मिट जाती हैं, वैसे ही बाल-युवा-वृद्ध अवस्थाएँ अनेक शरीरों में अनेक बार प्राप्त हुई तथा मिट गयीं। उसी प्रकार भविष्यकाल वर्तमान काल हो जाता है, वही वर्तमानकाल भूतकाल हो जाता है और पुनः पुनः भूत, भविष्य और वर्तमान होता रहता है। दिन रात, ग्रहण-त्याग का चक्र निरंतर चलता रहता है।

ऐसे ही सत्त्व आदि गुणों का अदल-बदल होता रहता है अर्थात् कभी दैवी गुण तो कभी आसुरी गुणों का चक्र निरंतर चलता रहता है। ऐसे ही काम, क्रोध, लोभ, मोह, शांति आदि का चक्र भी घूमता रहता है। सब अदल-बदल होता रहता है परंतु ये सभी चक्र मिथ्या है और जिससे ये सभी चक्र घूमते तथा अदल-बदल होते सिद्ध होते हैं, वह चैतन्य निर्विकार, निर्विकल्प, अचल, असंग आत्मा तुम्हारा स्वरूप है। यदि आत्मा भी इन्हीं चक्रों की नाई चलायमान होता तो अनित्य हो जाता लेकिन वह तो नित्य, अचल है। वह तुम हो। (आध्यात्मिक विष्णु पुराण से)

आध्यात्मिक विष्णु पुराण कहता हैः ʹवह तुम हो जहाँ से ʹमैं-मैंʹ स्फुरित होता है। वही तुम्हारा ʹमैंʹ जीव बन जाता है, वही तुम्हारा ʹमैंʹ ईश्वर भी बन जाता है। सबसे प्यारा, सबका प्यारा अपना आत्मा है। दूर नहीं, दुर्लभ नहीं, परे नहीं, पराया नहीं। ૐ…ૐ…ૐ….

सबके रूपों में वही है अनंत ! अनेक दिखते हुए भी अद्वितीय। अनंत दो नहीं होते। अनंत दो या एक होगा तो अनंत कैसे रहेगा ? सारे दुःखों व मुसीबतों का मूल है सच्चे अनंत अपने-आपको भूलना और मिथ्या द्वैत को सच्चा मानना।ʹ

चांदणा कुल जहान का तू,

तेरे आसरे होये व्यवहार सारा।

तू सब दी आँख में चमकदा है,

हाय चांदणा तुझे सूझता अँधियारा।।

जागना सोना नित ख्वाब तीनों,

होवे तेरे आगे कई बारा।

बुल्लाशाह प्रकाश स्वरूप है,

इक तेरा घट वध न होवे यारा।।

प्रकाशस्वरूप तेरा अऩंत एकरस आत्मा है। खोज ले ब्रह्मज्ञानियों की शरण, जो जगा दें परब्रह्म स्वभाव में ! श्रीकृष्ण कहते हैं-

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।

ʹउस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ। उनको भलीभाँति दंडवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने और कपट छोड़कर सरलता पूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म-तत्त्व को भलीभाँति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे।ʹ (गीताः 4.34)

स्रोतः ऋषि प्रसाद मई 2013, पृष्ठ संख्या 28, अंक 245

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अपना वास्तविक स्वरूप जानो !


महर्षि पराशर अपने शिष्य मैत्रेय को जीव के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान देते हुए कहते हैं- “हे शिष्य ! सुख-दुःख, हर्ष-शोक, धर्म-अधर्म का जो ज्ञाता है, जिससे ग्रहण-त्याग दोनों सिद्ध होते हैं तथा स्थूल, सूक्ष्म व कारण तीनों शरीर और उनके धर्म जिसके द्वारा प्रकाशित नहीं कर सकता, वह चैतन्य स्वयं ज्योति तुम्हारा स्वरूप है। तात्पर्य-बुद्धि, आकाश, काल, दिशा आदि अति सूक्ष्म सभी अनात्म पदार्थों को तथा पृथ्वी, जल, तेज, वायु और उनके कार्य देह, पर्वत आदि अति स्थूल पदार्थों को आत्मा समान ही प्रकाशता है। जैसे हम लोगों की दृष्टि से परमाणु अति सूक्ष्म है और देह, पर्वत आदि अति स्थूल हैं परंतु सूर्य की दृष्टि से परमाणु सूक्ष्म नहीं और देह, पर्वत आदि स्थूल नहीं है क्योंकि सूर्य परमाणु आदि पदार्थों तथा पर्वत आदि पदार्थों को एक समान ही प्रकाशता है। तू ʹअस्ति, भाति, प्रियʹ रूप सामान्य चैतन्य स्वमहिमा में स्थित है (अस्ति-है, भाति-जानने में आता है)।

जो बुद्धि आदि सर्व अनात्म दृश्य-पदार्थों को मापने वाला है और जो उऩ अनात्म पदार्थों से मापा नहीं जाता, वही तुम्हारा स्वरूप है। द्रष्टा ही दृश्य को मापता है, दृश्य से द्रष्टा मापा नहीं जाता। जो सब देश, काल, वस्तु में ʹअस्ति, भाति, प्रियʹ स्वरूप से उन देश, काल आदि का आधार, सर्वदा हाजिर-हजूर है तथा जो मन के चिंतन में नहीं आता अपितु मन का द्रष्टा है, उसी को तुम अपना स्वरूप ब्रह्म जानो। जो मन, वाणी के चिंतन, कथन में आता है उसे अज्ञान, माया व उनका कार्य प्रपंच जानो। वह तुम्हारा स्वरूप ब्रह्म नहीं, वह संसारी माया का स्वरूप है।”

(ʹआध्यात्मिक विष्णु पुराणʹ से)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2013, पृष्ठ संख्या 17, अंक 241

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वाह यार ! तेरी लीला…. – पूज्य बापू जी


मैं 17 दिसम्बर (2012) की रात्रि को हरिद्वार आश्रम में जल्दी सो गया था तो दो बजे आँख खुली। जोरों की बरसात हो गयी थी। मैं कुटिया के चारों तरफ घूमने निकला। एक मकड़ी ने ऐसा जाला बुना था कि मैंने कहाः ʹदेख लो, कैसा कलाकार बैठा है ! कैसा कौशल भरा हुआ है !ʹ मकड़ी की खोपड़ी में यह कौशल कहाँ से आया ? कैसी रचना ! बड़े-बड़े वास्तुकार उसके आगे झक मारते रह जायें। मकड़ी अपने शरीर से तंतु निकाले, ताना बुने – यूँ घुमाये, यूँ घुमाये… कैसा सुंदर ! और फिर बीचों बीच में वह खुद स्थित हो गयी। जब मैंने धीरे से उसको स्पर्श किया तो थोड़ा वह सावधान हो गयी। फिर दूसरी बार जरा हल्की सी उँगली लगायी तो वह और थोड़ा सिकुड़ी। फिर दो तीन बार जरा ज्यादा उँगली लगायी तो उसने देखा कि अब छोड़ो, यहाँ से भागो। मुआ जाला जाय तो जाय, अपनी जान तो बचाओ ! वहाँ जिस तंतु से वह जुड़ी थी, उसके द्वारा ऊपर चढ़ गयी। और मेरी भी टार्च तेज थी, मैंने देखा कि वह पत्ते के बीच घुस के सुरक्षित बैठ गयी है। मैंने कहाः “अच्छा, आ जाओ प्रभु ! अपनी जगह में आ जाओ।” अपन चलते बने।

यह गीता का, उपनिषदों का, वेदों का ज्ञान है तो मकड़ी और जाले में भी भगवान का आनंद आता है। भगवान-ही-भगवान दिखते हैं सब जगह।

जिधर देखता हूँ खुदा ही खुदा है।

खुदा से नहीं चीज कोई जुदा है।।

जब अव्वल व आखिर खुदा-ही-खुदा है।

तो अब भी वही, कौन इसके सिवा है।।

है आगाजो1-अंजाम2 जेवर3 का जर4 में।

मियां5 में न हरगिज6 वह गैरअज तिला7 है।।

जिसे तुम समझते हो दुनिया ऐ गाफिल8

यह कुल हक9 ही हक, नै जुदा नै मिला है।।

1 आरम्भ, आदि 2 अंत, 3 भूषण, 4 स्वर्ण

5 बीच में, 6 कदापि, 7 स्वर्ण से भिन्न

8 अज्ञानी, 9 सत्यस्वरूप परमात्मा

क्या आनंदमय ब्रह्म बरस रहा है ! क्या पत्ते-पत्ते में उसका कला कौशल है। क्या मकड़ी के जाले बनाने में उसकी कला कुशलता है ! वह देख-देख के आनंद लें। सबसे सुहृदता करके अपने आत्मस्वभाव को जगाओ। जो भगवान का स्वभाव है, उसका अंश तुम्हारे में छुपा है। उसे छोड़कर तामसी-राजसी अंश में क्यों उलझते हो ? झगड़ा-लड़ाई, निंदा – ये राजसी-तामसी दुर्गुर्ण हैं, प्रकृति के हैं। परमात्मा का तो अपना स्वभाव है।

ब्रह्मदेवताओं को यह सारा जगत ब्रह्ममय दिखेगा – वासुदेवः सर्वमिति…. ʹसब वासुदेव हैʹ और जिज्ञासुओं को यह माया का विलास दिखेगा और जो रागी-द्वेषी हैं उनके लिए यह संसार काटता, डँसता, राग-द्वेष की आग में तपाता हुआ, नेत्रों के आकर्षण से ठुस्स करता हुआ, वाहवाही के आकर्षण से फुस्स करता हुआ नरकालय हो जाता है। यह संसार नरकालय भी हो जाता है और भगवान की लीलास्थली भी हो जाता है और वासुदेवः सर्वम् भी हैं। सब भगवान ही भगवान हैं… ऐसा कोई कण नहीं और ऐसा कोई क्षण नहीं जिसमें भगवत्सत्ता न हो।

हर रोज खुशी, हर दम खुशी, हर हाल खुशी।

जब आशिक मस्त प्रभु का हुआ,

तो फिर क्या दिलगिरी बाबा।।

यूँ भी वाह, वाह ! यूँ भी वाह, वाह ! आनंद हुआ, वाह ! वाह !! हे हरि ! हे हरि !! ૐ….ૐ….

सूरज को ढूँढने पर भी अँधेरा नहीं मिलेगा, ऐसे ही जिसको पराभक्ति मिल गयी उस प्यारे की, उसको ढूँढने पर भी दुःख नहीं मिलेगा।

मुझे फाल्सी मलेरिया हो गया था। हीमोग्लोबिन 7gm% हो गया और अंग्रेजी दवाओं के रिएक्शन ने भी आर-पार की लड़ाई दिखा दी। चिड़िया ʹचेंʹ करे तो मानो एक तलवार लग गयी, ऐसी पीड़ा कि न बैठ सकें, न खड़े रहने में अच्छा लगे न लेटने में, बस क्या बेचैनी-बेचैनी….! शरीर की तो दुर्दशा थी ! तब मैं कहता, ʹयह किसको हो रहा है ?ʹ तो बड़ी हँसी आती। तो दुःख पीड़ा, आपत्ति भगवान के आगे कोई मायना नहीं रखतीं। पीड़ा तो ऐसी थी कि भगवान…. प्रसूति की पीड़ा कुछ भी नहीं है। माइग्रेन से भी ज्यादा होती है, ʹट्राइजेमिनल न्यूराल्जियाʹ (Trigeminal neuralgia) बोलते हैं। आधुनिक चिकित्सक बताते हैं कि इससे बड़ी कोई पीड़ा नहीं होती। लेकिन ऐसी बड़ी पीड़ा में भी जरा सा  याद करता कि ʹकिसको हो रही है ?ʹ तो भीतर से आवाज आती, ʹऐ महाराज ! शरीर को हो रही है, हम तो उससे न्यारे हैं।ʹ कितना गीता का दिव्य ज्ञान ! कितना दिव्य ज्ञान ! कितना मनुष्य की महानता का खजाना खोल रखा है शास्त्रों ने !

अच्युत की सम्पूर्ण आराधना कैसे हो ?

ʹविष्णु पुराणʹ (1,17,90) में आता हैः समत्वमाराधनमच्युतस्य। ʹसमता ही अच्युत की वास्तविक आराधना है।ʹ कोई भी परिस्थिति आये-जाये, वाह-वाह !

संसारी के लिए संसार दुःख का विलास है। कभी बेटी का दुःख, कभी प्रसूति का दुःख, कभी पति का दुःख, कभी किसी को पत्नी का दुःख, कभी कर (टैक्स) का दुःख… संसार से सुख लेने के लिए जो संसार को चाहता है उसके लिए संसार दुःखविलास है। जिज्ञासु के लिए, विरक्त के लिए माया का विलास है और जिनको परमात्मा अपनी पराभक्ति दे दे उनके लिए ब्रह्म का विलास है। उनके सत्संग में बैठना भी ब्रह्मविलास है। सभी आनंदित हो जाते हैं। ब्रह्मविलास !…..

स्रोतः ऋषि प्रसाद, पृष्ठ संख्या 5,6 अंक 240

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