Tag Archives: Tatva Gyan

Tatva Gyan

परमात्मा का स्वभाव, स्वरूप और गुण क्या ? – (पूज्य बापू जी)


आप परमात्मा का स्वभाव जान लो, स्वरूप जान लो। बाप-रे-बाप ! क्या मंगल समाचार है ! क्या ऊँची खबर है ! भगवान के गुणों का ज्ञान उपासना में काम आता है। भगवान के स्वभाव का ज्ञान शरणागति में काम आता है और भगवान के स्वरूप का ज्ञान भगवान से एकाकार होने में काम आता है। भगवान का वास्तविक स्वरूप क्या है यह जानोगे तो फिर आप भगवान से अलग नहीं रह पाओगे। भगवान का स्वभाव जानोगे तो आप उनकी शरण हुए बिना रूक नहीं सकते। भगवान के गुणों का ध्यान सुन लोगे, जान लोगे तो आप उनकी उपासना किये बिना नहीं रह सकते। अदभुत हैं भगवान के गुण ! अदभुत है भगवान का सामर्थ्य ! अदभुत है भगवान की दूरदर्शिता और अदभुत है भगवान की सुवव्यवस्था ! छोटी मति से भले कभी कभार कहें कि ‘यह अन्याय हो गया, यह जुल्म हो गया, यह अच्छा नहीं हुआ’ लेकिन जब भगवान की वह लीला और संविधान देखते हैं तो कह उठते हैं कि ‘वाह-रे-वाह प्रभु ! क्या आपकी व्यवस्था है ! करूणा-वरूणा के साथ सबकी उन्नति के कारण का क्या आपका स्वभाव है !’

अजब राज है मौहब्बत के फसाने का।

जिसको जितना आता है,

उतना ही गाये चला जाता है।।

एक आसाराम के शरीर में हजार-हजार जिह्वाएँ हों और ऐसे हजार-हजार शरीर मिल जायें, फिर भी आपके गुणों का, स्वभाव का, सामर्थ्य का वर्णन नहीं कर पायेंगे, नहीं कर सकते। जितना थोड़ा कुछ करते हैं उसी में आपकी करूणा-वरूणा और रस तथा प्रकाश पाकर तृप्त हो जाते हैं। प्रभु जी ! प्यारे जी ! मेरे जी !…..

भगवान कैसे ? आप जैसा चाहते हो वैसे ! भगवान की अपनी कोई जाति नहीं। भगवान का अपना कोई रूप रंग नहीं। जिस रूप रंग से आप चाहते हो, उसी रूप-रंग से वे समर्थ प्रकट हो जाते हैं। अहं भक्तपराधीनः। ॐ….. ॐ… शांति ! बोलोगे तो शांति भरे देंगे। ‘अच्युत, आनंद….!’ तो आनंद उभार देंगे। ‘अच्युत, गोविंद….’ – इन नामों से पावन होते जाओगे। भगवान का स्वरूप क्या है ! भगवान के स्वरूप का वर्णन तो भगवान भी नहीं कर सकते तो हम तुम क्या कर सकते हैं ! फिर भी थोड़ा-थोड़ा वर्णन करके काम बना लेते हैं हम।

भगवान का स्वरूप क्या है ? बोलेः ‘सोने का स्वरूप क्या है ?’ सोने का कंगन ले आये, अँगूठी ले आये, हार ले आये, चूड़ियाँ ले आये। ये तो गहने हैं लेकिन इनकी मूल धातु सोना है। मूल धातु को समझ लो। गहने अनेक प्रकार के लेकिन मूल धातु एक ही। सत्स्वरूप, चेतनस्वरूप, आनंदस्वरूप चिदघन सारे ब्रह्माण्डों में ठसाठस भरपूर – यह भगवान का स्वरूप है। भगवान का स्वभाव क्या है ? भगवान का स्वभाव है जो जिस रूप में पुकारे, जिस रूप में प्रेम करे, जिस रूप में चाहे उस रूप में उसके आगे प्रकट हो जाते हैं। भक्तवत्सलता भगवान का स्वभाव है। भक्तपराधीनता भगवान का स्वभाव है। अपने को बेचकर भी भक्त का काम करते हैं। अपने को बँधवाकर भी भक्त को खुशी देते हैं। घोड़ागाड़ी चलाकर भी भक्त का काम होता है तो कर लेंगे। भक्त के घोड़ों की मालिशक करनी होती है तो भी कर लेंगे। भक्तानी के जूठे बेर खाकर भी उसका मंगल होता है तो वे कर लेते हैं और ताड़का वध करने से भी गुरू की सेवा हो जाती है तो वह भी कर लेंगे ! ‘हाय सीते ! कहाँ गयी ? हाय सीते !….’ – ऐसा करने से भी भक्तों की सूझबूझ बढ़ती है तो वे कर  लेंगे।

यह किस चीज का पेड़ है ? मोसम्बी मिली तो बोलेः ‘मोसम्बी का पेड़ है।’ आम मिले तो बोलेः ‘आम का पेड़ है।’ पपीता मिला, नारियल मिला, जो फल मिला, बोलेः ‘इसी का पेड़ है।’ लेकिन कोई ऐसा पेड़ कि जो जैसा फल माँगे वैसा फल उसे दे तो उसको क्या बोलोगे ? आम का बोलोगे, चीकू का बोलोगे, नारियल का बोलोगे, पपीते का बोलोगे कि अनार का बोलोगे ? उसको कल्पतरू बोलोगे। जो जैसी कल्पना करे उसी प्रकार का फल दे दे, उसे ‘कल्पतरू’ कहते हैं। तो भगवान कैसे हैं ? भगवान का स्वभाव क्या है ? भक्तवत्सल, कल्पतरू ! भगवान का स्वरूप क्या है ? सर्वेश्वर, सत्-चित्-आनंद, चिदघन, सर्व ब्रह्माण्डों में ओतप्रोत-भरपूर ! जैसे सूत के चित्र में सूत की ही माला, सूत के ही दाने और चप्पल भी सूत की, पैर भी सूत के, वक्षस्थल भी सूत का तो जो कपड़े पहने हैं वे भी सूत के। शक्कर के खिलौनों में लाट साहब भी शक्कर का तो चपरासी भी शक्कर का। हाथी भी शक्कर का तो उस पर बैठा राजा भी शक्कर का। अब कहीं राजा दिखता है, कहीं चपरासी दिखता है तो कहीं प्रजा दिखती है लेकिन है शक्कर-ही-शक्कर। ऐसे ही भगवान का स्वरूप क्या है ? बोलेः सत्-चित्-आनंद, चिदघन, विभु, व्याप्त, सर्वत्र। भगवान का स्वभाव क्या है ? भक्तवत्सल। भक्त जिस रूप में जिस भाव में उन्हें पुकारे वे प्रकट हो जाते हैं क्योंकि वे कल्पतरू हैं।

भगवान का गुण क्या है ? भगवान का गुण हैः सुहृदता। मित्र तो बदले में कुछ पाने के भाव से हमारी मदद करेगा लेकिन भगवान कोई बदले की भावना से नहीं करते। प्राणिमात्र के परम सुहृद परमात्मा हैं। सुहृदता भगवान का गुण है। सुहृदं सर्वभूतानाम्। ‘मैं प्राणिमात्र का सुहृद हूँ।’ ज्ञात्वा मां शांतिमृच्छति। ‘ऐसा मुझे जाननेवाला शांति को पाता है।’ और शांति से बड़ा कोई सुख नहीं। अशांतस्य कुतः सुखम्। अशांत को सुख कहाँ ! और शांतात्मा को दुःख कहाँ ! आप सुबह उठिये और मन-ही-मन कहियेः ‘भगवान ! आपका स्वरूप है सर्वव्यापक। सारी इन्द्रियाँ, सारे मन आप ही में आराम पाते हैं और उनको आप ही पालते हो, आप गोपाल भी हो। आप राधारमण हो। ‘राधा’…. उलटा दो तो ‘धारा’। चित्त का फुरना, चित्त की कलना जिसकी सत्ता से रमण करती है, वह आप राधारमण भी हो। आप अच्युत भी हो। सारे पद च्युत हो जाते हैं, सारे शरीर च्युत हो जाते हैं, स्वर्गलोक भी च्युत हो जाता है, ब्रह्मलोक भी च्युत हो जाता है, आकृतियाँ च्युत हो जाती हैं फिर भी हे प्रभु ! आप च्युत नहीं होते हो – आप अच्युत हो। आप केशव हो। ‘क’ माने ब्रह्मा का आत्मा आप ही हो। ‘श’ माने शिव का आत्मा भी आप हो। ‘व’ माने विष्णु का आत्मा भी आप लो और मेरा आत्मा भी आप हो। आपका स्वरूप तो थोड़ा-थोड़ा जानते हैं। प्रभु ! आप ऐसे हो और मेरे अपने अंतर्यामी होकर बैठे हो। आपका स्वभाव भक्तवत्सल है। जिसने जिस भाव से पुकारा… भावग्रही जनार्दनः। ‘भाव को ही ग्रहण करने वाले हो जनार्दन !’ ‘ॐ….ॐ…. आनंद !’ बोलेंगे तो आनंद दोगे। ‘ॐ….ॐ…. शांति !’ तो शांति दोगे। ‘ॐ….ॐ…. दुश्मन का ऐसा हो, वैसा हो….’ खुराफात बोलेंगे तो खुराफात दोगे और प्रेमस्वरूप बोलेंगे तो प्रेम दोगे। आपका स्वभाव है भक्तवत्सल, कल्पतरू।’ और महिलाएँ हैं तो प्रभु को कामधेनु मान लो। कल्पतरू के आगे जो कल्पना करो वह पूरी होती है। कामधेनु के आगे जो कामना करो वह देती है। ‘आप कल्पतरू भी हो, कामधेनु भी हो, गुरूरूप भी हो, साधकरूप भी हो, सुहृदरूप भी हो, मित्ररूप भी हो – सभी रूपों में आप हो सारे रूपों के बाद भी आप ही रह जाते हो, अच्युत हो। ॐ आनंद ! ॐ अच्युत ! ॐ गोविंद !’ – इस प्रकार का सुबह आरम्भिक मधुमय चिंतन करो तो आपका सारा दिन मधुमय होने लगेगा।

‘आपका गुण क्या है ? मित्र देकर उत्साह देते हो और शत्रु, विरोधी देकर अहंकार को मिटाते हो, सावधानी बढ़ाते हो, आसक्ति मिटाते हो। प्राणिमात्र के सुहृद हो। हो न !’ – एक हाथ अपना और एक ठाकुरजी का मानकर अपने ही दायें हाथ से बायाँ हाथ मिलाओ। भगवान की सुहृदता, भगवान की भक्तवत्सलता और भगवान का विभु स्वभाव याद करो तो फिर देर-सवेर पता चलेगा कि भगवान आपके आत्मा होकर बैठे हैं।

जो ठाकुरू सद सदा हजूरे।

ता कउ अंधा जानत दूरे।।

‘आप दूर नहीं, दुर्लभ नहीं। जय जगदीश हरे…. जगत के ईश आप। भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करें। आपके स्वभाव का, आपके स्वरूप का, आपके गुण का चिंतन करते हैं तो तुरंत मन की ग्लानि, मलिनता, दीनता-हीनता चली जाती है।’ आप जगत का चिंतन करोगे और जगत में प्रीति करोगे तो जगत आपको कामी बनायेगा, क्रोधी बनायेगा, लोभी बनायेगा, मोही बनायेगा, चिंतित बनायेगा, विलासी बनायेगा, विकारी बनायेगा और जन्म-मरण के धक्कों में धकेलता रहेगा और प्रभु का चिंतन करोगे को प्रभु का चिंतन आपको विभु बना देगा, सुहृद बना देगा, कल्पतरू बना देगा। जो महात्मा ऐसा चिंतन करते हैं, वे भक्तों के कल्पतरू हो जाते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2011, पृष्ठ संख्या 4,5,6 अंक 218

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

आपके जीवन में शिव ही शिव हो


(पूज्य बापू जी कल्याणमयी मधुमय वाणी)

चार महारात्रियाँ हैं – जन्माष्टमी, होली, दिवाली और शिवरात्रि। शिवरात्रि को अहोरात्रि भी बोलते हैं। इस दिन ग्रह नक्षत्रों आदि का ऐसा मेल होता है कि हमारा मन नीचे के केन्द्रों से ऊपर आये। देखना, सुनना, चखना, सूँघना व स्पर्श करना – इस विकारी जीवन में तो जीव-जंतु भी होशियार हैं। बकरा जितना काम विकार में होशियार है उतना मनुष्य नहीं हो सकता। बकरा एक दिन में चालीस बकरियों के साथ काला मुँह कर सकता है, मनुष्य करे तो मर जाये। यह विकार भोगने के लिए तो बकरा, सुअर, खरगोश और कई नीच योनियाँ हैं। विकार भोगने के लिए तुम्हारा जन्म नहीं हुआ है।

विकारी शरीरों की परम्परा में आते हुए भी निर्विकार नारायण का आनंद-माधुर्य पाकर अपने शिवस्वरूप को जगाने के लिए शिवरात्रि आ जाती है कि लो भाई ! तुम उठाओ इस मौके का फायदा….।

शिवजी कहते हैं कि ‘मैं बड़े-बड़े तपों से, बड़े-बड़े यज्ञों से, बड़े-बड़े दानों से, बड़े-बड़े व्रतों से इतना संतुष्ट नहीं होता हूँ जितना शिवरात्रि के दिन उपवास करने से होता हूँ।’ अब शिवजी का संतोष क्या है ? तुम भूखे मरो और शिवजी खुश हों, क्या शिव ऐसे हैं ? नहीं, भूखे नहीं मरोगे, भूखे रहोगे तो शरीर में जो रोगों के कण पड़े हैं, वे स्वाहा हो जायेंगे और जो आलस्य, तन्द्रा बढ़ाने वाले विपरीत आहार के कण हैं वे भी स्वाहा हो जायेंगे और तुम्हारा जो छुपा हुआ सत् स्वभाव, चित् स्वभाव, आनंद स्वभाव है, वह प्रकट होगा। शिवरात्रि का उपवास करके, जागरण करके देख लो। मैंने तो किया है। मैंने एक शिवरात्रि का उपवास घर पर किया था, ऐसा फायदा हुआ कि मैं क्या-क्या वर्णन करूँ ! क्या-क्या अंतर्प्रेरणा हुई, क्या-क्या फायदा हुआ उसका वर्णन करना मेरे बस का नहीं है। नहीं तो जाने घिस-पिट के क्या हालत होती सत्तर की उम्र में ! ‘अरे बबलू ! ऐंह…. अरे जरा उठा दें… जरा बैठा दे।’ – यह हालत होती।

इस दिन जो उपवास करे, उसे निभाये। जो बूढ़े हैं, कमजोर हैं, उपवास नहीं रख सकते, वे लोग थोड़ा अंगूर खा सकते हैं अथवा एक छोटे-मोटे नारियल का पानी पी सकते हैं, ज्यादा पीना ठीक नहीं।

शरीर में जो जन्म से लेकर विजातीय द्रव्य हैं, पाप-संस्कार हैं, वासनाएँ हैं उन्हें मिटाने में शिवरात्रि की रात बहुत काम करती है।

शिवरात्रि का जागरण करो और ‘बं’ बीजमंत्र का सवा लाख जप करो। संधिवात (गठिया) की तकलीफ दूर हो जायेगी। बिल्कुल पक्की बात है ! एक दिन में ही फायदा ! ऐसा बीजमंत्र है शिवजी का। वायु मुद्रा करके बैठो और ‘बं बं बं बं बं’ जप करो। जैसे जनरेटर घूमता है तो बिजली बनती है, फिर गीजर भी चलेगा और फ्रिज भी चलेगा। दोनों विपरीत हैं लेकिन बिजली से दोनों चलते हैं। ऐसे ही ‘बं बं’ से विपरीत धर्म भी काम में आ जाते हैं। बुढ़ापे में तो वायु संबंधी रोग ज्यादा होते हैं। जोड़ों में दर्द हो गया, यह पकड़ गया-वह पकड़ गया…. ‘बं बं’ जपो, उपवास करो, देखो अगला दिन कैसा स्फूर्तिवाला होता है।

शिवरात्रि की रात का आप खूब फायदा उठाना। विद्युत के कुचालक आसन का उपयोग करना। विद्युत के कुचालक आसन का उपयोग करना। भीड़ भाड़ में, मंदिर में नहीं गये तो ऐसे ही ‘ॐ नमः शिवाय‘ जप करना। मानसिक मंदिर में जा सको तो जाना। मन से ही की हुई पूजा षोडषोपचार की पूजा से दस गुना ज्यादा हितकारी होती है और अंतर्मुखता ले आती है।

शिवजी का पत्रम-पुष्पम् से पूजन करके मन से मन का संतोष करें, फिर ॐ नमः शिवाय…. ॐ नमः शिवाय…. शांति से जप करते गये। इस जप का बड़ा भारी महत्त्व है। अमुक मंत्र की अमुक प्रकार की रात्रि को शांत अवस्था में, जब वायुवेग न हो आप सौ माला जप करते हैं तो आपको कुछ-न-कुछ दिव्य अनुभव होंगे। अगर वायु-संबंधी बीमारी हैं तो ‘बं बं बं बं बं’ सवा लाख जप करते हो तो अस्सी प्रकार की वायु-संबंधी बीमारियाँ गायब ! अगर तुम प्रणव की 120 मालाएँ करते हो रोज और ऐसे पाँच लाख मंत्रों का जप करते हो तो आपकी मंत्रसिद्धि की शक्तियाँ जागृत होने लगती है। ॐ नमः शिवाय मंत्र तो सब बोलते हैं लेकिन इसका छंद कौन सा है, इसके ऋषि कौन हैं, इसके देवता कौन हैं, इसका बीज क्या है, इसकी शक्ति क्या है, इसका कीलक क्या है – यह मैं बता देता हूँ। अथ ॐ नमः शिवाय मंत्र। वामदेव ऋषिः। पंक्तिः छंदः। शिवो देवता। ॐ बीजम्। नमः शक्तिः। शिवाय कीलकम्। अर्थात् ॐ नमः शिवाय का कीलक है ‘शिवाय’, ‘नमः’ है शक्ति, ॐ है बीज… हम इस उद्देश्य से (मन ही मन अपना उद्देश्य बोलें) शिवजी का मंत्र जप रहे हैं – ऐसा संकल्प करके जप किया जाय तो उसी संकल्प की पूर्ति में मंत्र की शक्ति काम देगी।

अगर आप शिव की पूजा स्तुति करते हैं और आपके अंदर में परम शिव को पाने का संकल्प हो जाता है तो इससे बढ़कर कोई उपहार नहीं और इससे बढ़कर कोई पद नहीं है। भगवान शिव से प्रार्थना करें- ‘इस संसार के क्लेशों से बचने के लिए, जन्म-मृत्यु के शूलों से बचने के लिए हे भगवान शिव ! हे साम्बसदाशिव ! हे शंकर ! मैं आपकी शरण हूँ, मैं नित्य आने वाली संसार की यातनाओं से हारा हुआ हूँ, इसलिए आपके मंत्र का आश्रय ले रहा हूँ। आज के शिवरात्रि के इस व्रत से और मंत्रजप से तुम मुझ पर प्रसन्न रहो क्योंकि तुम् अंतर्यामी साक्षी चैतन्य हो। हे प्रभु ! तुम संतुष्ट होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्राप्त कराओ। सुख और दुःख में मैं सम रहूँ। लाभ और हानि को सपना समझूँ। इस संसार के प्रभाव से पार होकर इस शिवरात्रि के वेदोत्सव में मैं पूर्णतया अपने पाप-ताप को मिटाकर आपके पुण्यस्वभाव को प्राप्त करूँ।

शिवधर्म पाँच प्रकार का कहा गया हैः एक तो तप (सात्त्विक आहार, उपवास, ब्रह्मचर्य) शरीर से, मन से, पति-पत्नी, स्त्री पुरुष की तरफ के आकर्षण का अभाव। आकर्षण मिटाने में सफल होना हो तो ॐ अर्यमायै नमः…. ॐ अर्यमायै नमः….. यह जप शिवरात्रि के दिन कर लेना, क्योंकि शिवरात्रि का जप कई गुना अधिक फलदायी कहा गया है। दूसरा है भगवान की प्रसन्नता के लिए सत्कर्म, पूजन अर्चन आदि (मानसिक अथवा शारीरिक), तीसरा शिवमंत्र का जप, चौथा शिवस्वरूप का ध्यान और पाँचवाँ शिवस्वरूप का ज्ञान। शिवस्वरूप का ज्ञान – यह आत्मशिव का ज्ञान। शिवस्वरूप का ज्ञान – यह आत्मशिव ही उपासना है। चिता में भी शिवतत्त्व की सत्ता है, मुर्दे में भी शिवतत्त्व की सत्ता है तभी तो मुर्दा फूलता है। हर जीवाणु में शिवतत्त्व है। तो इस प्रकार अशिव में भी शिव देखने के नजरिये वाला ज्ञान, दुःख में भी सुख को ढूँढ निकालने वाला ज्ञान, मरूभूमि में भी वसंत और गंगा लहराने वाला श्रद्धामय नजरिया, दृष्टि यह आपके जीवन में शिव ही शिव लायेगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2011, पृष्ठ संख्या 14, 15 अंक 218

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

ज्ञान के दस लक्षण


(पूज्य बापू जी की चिन्मय वाणी)

अगर आत्मज्ञान की तरफ आपने थोड़ी भी यात्रा की तो जिनको आत्मसाक्षात्कार हुआ है, उन ज्ञानियों के गुण आपके अंदर प्रकट होने लगेंगे। फिर आपको यह नहीं लगेगा कि ‘गुण मुझमें हैं, मैं गुणवान हूँ अथवा मैं ज्ञानी हूँ।’ नहीं-नहीं, जिस पद को पाये बिना इन्द्र भी अपने को बौना समझता है, उस आत्मपद को पाकर ज्ञानी को अहंकार नहीं होता। ऐसा ज्ञान का प्रसाद आपको मिल जायेगा।

योगी गोरखनाथजी ने कहाः

ज्ञान सरीखा गुरू न मिलिया, चित सरीखा चेला।

मन सरीखा मित्र न मिलिया, गोरख फिरे अकेला।।

ज्ञान जैसा कोई गुरु नहीं है और चित्त अपने कहने में चले तो उसके जैसा कोई चेला नहीं है। मन विकारों से बचे तो उसके जैसा कोई मित्र नहीं है। जीवन में ज्ञान के दस लक्षण आ जायें बस।

अक्रोधो वैराग्यो जितेन्द्रियश्च क्षमा दया सर्वजनप्रियश्च।

निर्लोभो मदभयशोकरहितो ज्ञानस्य एतत् दश लक्षणानि।।

अक्रोधः… क्रोध तो आयेगा लेकिन जब भी क्रोध आये, उस समयक देखो की क्रोध आया है, उसके पहले भी मैं था और क्रोध आकर चला जायेगा उसके बाद भी मैं रहूँगा। थोड़ा क्रोध के समय आप अपनी मौजूदगी की स्मृति करो ताकि क्रोध तुम पर हावी न हो। इससे क्रोध में, आवेश में गलतियाँ करने से जो आगे चलकर मुसीबत होती है, उससे आप बच जाओगे और धीरे-धीरे अक्रोध की ऊँचाई पर पहुँचने में सफल हो जाओगे। जैसे विश्वामित्र, दुर्वासा, वसिष्ठजी तथा अन्य ब्रह्मज्ञानी संत खिन्नोऽपि न च खिद्यते…. रूष्टोऽपि नि रूष्टते….. क्रुद्धोऽपि न क्रुद्धते….. खिन्न, रूष्ट, क्रुद्ध दिखते हुए भी इनसे न्यारे अपने द्रष्टा-स्रष्टास्वरूप में निमग्न रहते हैं।

समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं।

संत तुलसीदासजी

ब्रह्म गिआनी सदा निर्लेप।

गुरूवाणी

तस्य तुलना केन जायते।

उसकी तुलना किससे की जा सकती है !’ वह तो अतुलनीय है।

अष्टावक्र गीता

अदभुत है आत्मज्ञान की महिमा !

वैराग्यक….किसी भी चीजृ-वस्तु को ईश्वर से बढ़कर मूल्य न दो। विवेक जगाओ तो आपका वैराग्य का धन जागृत होगा।

जितेन्द्रिय…. नाक कहती है कि ‘सुगंध बढ़िया हो।’ जीभ कहती है कि ‘जरा स्वाद बढ़िया हो।’ कान कहते हैं कि ‘जरा तक धिनाधिन सुन लो।’ उनको रोककर कहो- ‘हे निगुरो ! तुम मुझे भटकाओ मत, भगाओ मत। ॐ शांति…. ॐ आनंद !…’ अपने आत्मसुख की स्मृति में गोता मारो, आप जितेन्द्रिय होने लगेंगे।

क्षमा….. कभी पत्नी से गलती हुई, कभी पति से हुई, पड़ोसी से हुई….. अपनी जीभ दाँतों तले आ जाती है तो क्या करते हैं ? क्षमा तो व्यवहार में झख मार के करनी पड़ती है, नहीं तो गृहस्थी की गाड़ी नहीं चलती। लेकिन क्षमा करना एक बात है, मजबूरी से घूँट पीकर अंदर घुटते रहना दूसरी बात है। आज से पक्का करो कि क्षमा के गुण को विकसित करेंगे। अपने से छोटों के प्रति दया करेंगे। उनसे रूठो, उनको डाँटो लेकिन अँदर में उनके मंगल के लिए दयाभाव रखो।

सर्वजनप्रिय…. सभी जनों में अपने प्रिय को देखो। इससे आपका अंतःकरण मंगलमय होगा, मधुमय होगा। आप सबके प्रियपात्र बनोगे। निर्लोभः….. और खपे खपे (और चाहिए-और चाहिए) जो है वह भी छूट जायेगा। और खपे-खपे में अपने को खपाओ मत ! खाने में, भोग-संग्रह में निर्लोभता का अनुभव करो।

मदभयशोकरहितः…. मद नहीं करना चाहिए कि ‘मैं ऐसा कर दूँगा, वैसा कर दूँगा।’ अथवा भय भी नहीं रखना चाहिए कि ‘ऐसा हो जायेगा, वैसा हो जायेगा।’ अरे, आत्मा को कोई मार नहीं सकता और शरीर प्रारब्ध भोगकर ही जाता है, फिर डर किस बात का ! डरें तो दुष्कर्म से डरें, डरें तो मनमुखता से डरें। बाकी जरा-जरा बात में अथवा सत्संग में आने में क्यों डरें ! सत्कर्म और साधना करने में क्या डरें ! ‘मेरा भविष्य क्या होगा ?’ – ऐसा सोचकर क्यों डरें ! बीती हुई बात को सच्चा मानकर बार-बार याद करके शोक क्यों करें !

ज्ञानस्य एतत दश लक्षणानि….. ये ज्ञान के दस लक्षण हैं। ज्ञानी महापुरुष के ये स्वतः स्वाभाविक लक्षण हैं और साधक को ये सुन-सुनकर अपने में विकसित करने हैं। शास्त्र क्या हैं ? ज्ञानी के अनुभव और अज्ञानी की मान्यता का अनुवाद। अज्ञानी की मान्यता समझकर उससे ऊपर उठो और ज्ञानी का अनुभव सुनकर उसमें लग जाओ। आपका मंगल होने लगेगा। भगवान अगर हमारा परम कल्याण भी करना चाहेंगे तो कैसे करेंगे ? फूँक मार के करेंगे ? सिर पर हाथ रखकर करेंगे ? नहीं, नहीं। भगवान ने गीता के दसवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में कहाः

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।

नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।।

उन भक्तों पर कृपा करने के लिए ही उनमें आत्मभाव से स्थित मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को देदीप्यमान तत्त्वज्ञानरूपी दीपक के द्वारा सर्वथा नष्ट कर देता हूँक।

भगवान भी हमारे दुःख हरेंगे तो तत्त्वज्ञान के दीये से। घऱ में या गुफा में अंधकार है तो झाड़ू लगाने से नहीं जायेगा। खड्डे हैं तो झाड़ू लगाने से नहीं जायेंगे। कचरा है तो झाड़ू लगाने से जायेगा। खड्डे-खुड्डे हैं तो सीमेंट-कांक्रीट अथवा गारा-मिट्टी से जायेंगे लेकिन अंधकार प्रकाश से जायेगा। ऐसे ही वासना की गंदगी है तो वासनाओं को पोस-पोस के निस्तेज न हो जायें। सेवाकार्य में ऐसे लगें कि सेवा करते करते निर्वासनिक होने में सफल हो जायें। चंचलता है तो एकाग्रता का धन बढ़ाओ लेकिकन अज्ञान है तो ज्ञान का दीपक जलाओ। भगवान भी खुश हो जायेंगे।

मनुष्य शरीर का फल यही है कि आप परमात्म स्वभाव की प्राप्ति कर लें। भगवदगीता के पाँचवें अध्याय का तेईसवाँ श्लोक हैः

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।

कामक्रोधोदभवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः।।

जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले ही काम, क्रोध, भय, लोभ, शोक आदि आवेगों से विचलित नहीं होता, समता में टिक जाता है, उनको सहन करके सम रह जाता है, उस पुरुष ने अपना मनुष्य जीवन सफल कर लिया।

सहने का मतलब ऐसा नहीं कि ‘दुःख सह रहा हूँ, अपमान सह रहा हूँ, क्या करूँ !’ नहीं, आप पर उनका प्रभाव ही नहीं पड़ेगा। जैसे, हाथी पर मक्खियाँ भी बैठी थीं। बार बार आतीं, बैठती चली जातीं। रानी मक्खी को दया आ गयी तो हाथी को कहा कि

“भैया ! मैं अकेली नहीं, मेरी कई 20-25 सखियाँ तुम पर कई घंटों से अपना बोझा लादे बैठी हैं। तुमको कष्ट होता होगा।”

हाथी ने कहाः “तुम कब आयीं पता नहीं और तुम्हारा वजन कितना है तुम्हीं जाकर तौलो ! तुम 20-25 तो क्या, 50, 100, 200, 500 और भी आ जाओ तो भी मुझे तुम्हारे वजन का पता नहीं चलेगा। तुम इतनी क्षुद्र हो, इतनी तुच्छ हो !”

ऐसे ही भगवत्सुख और भगवत्समता के आगे जगत की परिस्थितियाँ ऐसी ही तुच्छ हैं, ऐसी क्षुद्र है जैसे हाथी की पीठ पर मक्खियों का वजन !

जैसे हाथी पर मक्खियों का कोई वजन नहीं, बैल के सींग पर मच्छर का कोई वजन नहीं, ऐसे ही ज्ञानी के चित्त में इस संसाररूपी मच्छर का कोई वजन नहीं होता अथवा संसार की मक्खियों का कोई बोझा नहीं होता। दूसरों की नजर से लगेगा कि ‘अरे, बाप-रे-बाप ! बापू जी बेचारे कितना काम कर रहे हैं ! अरे कितना परिश्रम ! कितना क्या का क्या…. बेचारे बापू जी !’ मैं इधर-उधर सत्संग कार्यक्रमों में दौड़ता रहता हूँ तो आप सभी को मुझ पर दया आती है। लेकिन मुझे तुम पर दया आती है कि तुम कितने सुखस्वरूप हो और अपने को जानते नहीं ! शरीर को ‘मैं’ मान के, नश्वर चीजों को ‘मेरा’ मानकर काहे को परेशान हो रहे हो ! अपने सत्यस्वभाव को ‘मैं’ जानकर उसी में विश्रान्ति पाओ, उसी में आनंद पाओ और उसी में अपने ‘मैं’ को एकाकार कर दो।

जो सदा बदलता जाता है वह संसार है और सारी बदलाहट को जानता है वह परमात्मा है। जो कभी बदले नहीं और साथ छोड़े नहीं, वह परमात्मा है। जो टिके नहीं और साथ निभाये नहीं, वह संसार है। संसार का उपयोग कर लो और परमात्मा की स्मृति कर लो, एकाकारता कर लो, प्रीति पा लो। दोनों तरफ से मौज हो जायेगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 12,13, 14 अंक 216

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ