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Tatva Gyan

लक्ष्य सबका एक है….


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

जन्म का कारण है अज्ञान, वासना। संसार में सुख तो मिलता है क्षण भर का, लेकिन भविष्य अंधकारमय हो जाता है। जबकि भगवान के रास्ते चलने में शुरुआत में कष्ट तो होता है, सयंम रखना पड़ता है, सादगी में रहना पड़ता है, ध्यान-भजन में चित्त लगाना पड़ता है, लेकिन बाद में अनंत ब्रह्माण्डनायक, परब्रह्म परमात्मा के साथ अपनी जो सदा एकता थी, उसका अनुभव हो जाता है।

संसार का सुख भोगने के लिए पहले तो परिश्रम करो, बाद में स्वास्थ्य अनुकूल हो और वस्तु अऩुकूल हो तो सुख होगा लेकिन क्रियाजन्य सुख में पराधीनता, शक्तिहीनता और जड़ता है। इससे बढ़िया सुख है धर्मजन्य सुख। धर्म करने में तो कष्ट सहना पड़ता है लेकिन उसका सुख परलोक तक मदद करता है। अतल, वितल, तलातल, रसातल, पाताल, भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, जनलोक, तपलोक आदि के सुख प्राप्त होते हैं।

योग में भी यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि… इस प्रकार परिश्रम करना पड़ता है जिससे चित्त की शांतिरूपी फल यहीं मिलता है और परलोक में भी सदगति होती है लेकिन परिश्रम तो करना ही पड़ता है।

ज्ञानमार्ग में भी श्रवण-मनन-निदिध्यासन का सुखद परिश्रम तो करना ही पड़ता है। एक भगवद् भक्ति ही है कि जिसमें परिश्रम की जगह पर भगवान से प्रेम है और भगवान से प्रेम होता है भगवान को अपना आपा मानने से। भगवान में प्रीति होने से भक्तिरस शुरु होता है। भक्ति करने में भी रस और भोगने में भी रस। इसमें कभी कमी नहीं होती वरन् यह नित्य नवीन एवं बढ़ता रहता है।

भजनस्य किं लक्षणम् ? भजनस्य लक्षणं रसनम्। जिससे अंतरात्मा का रस  उत्पन्न हो, उसके नाम है भजन। भक्त्याः किं लक्षणम् ? भागो ही भक्तिः। उपनिषदों में यह विचार आया है। भक्ति का लक्षण क्या है ? जो भाग कर दे, विभाग कर दे कि यह नित्य है, यह अनित्य है…. यह अंतरंग है, यह बहिरंग है… यह (शरीर) छूटने वाला है, यह (आत्मा) सदा रहने वाला है…. वह भक्ति है। शरीर व संसार नश्वर है, जीवात्मा-परमात्मा शाश्वत है।

जो सदा रहती है, उससे प्रीति कर लें, बस। ऐसा न सोचें कि दुनिया कब हुई ? कैसे हुई ? वरन् दुनिया के सार में मन लगायें। दुनिया का सार है परमात्मा। उसी परमात्मा के विषय में सोचें, उसी के विषय में सुनें तो भगवत्प्रीति बढ़ने लगेगी। भगवत्संबंधी बातें सुनें, बार-बार उन्हीं का मनन करें।

ʹमुझमें काम है…. मुझमें क्रोध है…ʹ इन विघ्नों से, दुर्गुणों से लड़ो मत और न ही अपने सदगुणों का चिंतन करके अहंकार करो, वरन् मन को भगवान में लगाओ तो दुर्गुण की वासना औऱ सदगुण का अहंकार दोनों ढीले हो जायेंगे और अपना मन अपने परमेश्वर में लग जायेगा। यही तो जीवन की कमाई है !

संसारतापतप्तानां योगो परम औषधः।

संसार के ताप में तपे हुए जीवों के लिए योग परम औषध है। योग तीन प्रकार का होता हैः पहला है ज्ञान योग। तीव्र विवेक हो, वैराग्य हो। ʹमैं देह नहीं… मन नहीं…. इन्द्रियाँ नहीं…. बुद्धि नहीं…. ʹ(ऐसा विचार करते-करते सबसे अलग निर्विचार अपने नारायणस्वरूप में टिक जायें। भले, पहले दस सैकेण्ड तक ही टिकें, फिर बीस, पच्चीस, तीस सैकेण्ड.. ऐसा करते-करते तीन मिनट ता निर्विचार अपने नारायणस्वरूप में टिक जायें तो हो जायेगा कल्याण। यह एक दिन… दो दिन… एक महीने… दो महीने का काम नहीं है। इसके लिए दीर्घकाल तक दृढ़ अभ्यास चाहिए। चिरकाल की वासनाएँ एवं चिरकाल की चंचलता चिरकाल के अभ्यास से ही मिटेगी।

दूसरा है ध्यानयोग। देशबंधस्य चित्तस्य धारणा। एक देश में अपनी वृत्ति को बाँधना, एकाग्र करना….  इसका नाम है धारणा। भगवान, स्वास्तिक, दीपक की लौ अथवा गुरु-गोविंद को देखते-देखते एकाग्र होते जायें। मन इधर-उधर जाये तो उसे पुनः एकाग्र करें। इसको धारणा बोलते हैं।  12 निमेष तक मन एक जगह पर रहे तो धारणा बनने लगती है।

आँख की पलकें एक निमेष में गिरती हैं।

12 निमेष = 1 धारणा। ऐसी 12 धारणाएँ हो जायें तो ध्यान लगता है। ध्यानयोगी अपने आपका मार्गदर्शक बन जाता है। 12 ध्यान = 1 सविकल्प समाधि और 12 सविकल्प समाधि = 1 निर्विकल्प नारायण में स्थिति।

तीसरा है भक्तियोग। भगवान को अपना मानना एवं अपने को भगवान का मानना। जो तिदभावे सो भलिकार…. परमात्मा की इच्छा में अपनी इच्छा मिला देना, पूर्ण रूप से उसी की शरण ग्रहण करना… यही भक्तियोग है।

जैसे बिल्ली अपने मुँह से चूहे को पकड़ती है,  उसी मुँह से अपने बच्चों को पकड़कर ले जाती है। उसके मुँह में आकर उसका बच्चा तो सुरक्षित हो जाता है लेकिन चूहे की क्या दशा होती है ? ऐसे ही जो भगवान का हो जाता है, वह संसारमाया से पूर्णतया सुरक्षित हो जाता है। उसकी पूरी सँभाल भगवान स्वयं करते हैं। फिर उसके पास अपना कहने को कुछ नहीं बचता तो उसमें वासना टिक कैसे सकती है।

अतः किसी भी योग का आश्रय लो…. ज्ञानयोग, ध्यानयोग या भक्तियोग का, सबका उद्देश्य तो एक ही हैः सब दुःखों से सदा के लिए निवृत्ति और परमानंद की प्राप्ति। ईश्वरप्रीत्यर्थ निष्काम भाव से किये गये कर्म कर्मयोग हैं। दुर्वासना ही जीव को चौरासी के चक्कर में भटकाती है एवं वासनानिवृत्ति से ही जीव चौरासी के चक्कर से छूटकर नित्य शुद्ध-बुद्ध चैतन्यस्वरूप, आनंदस्वरूप, सत्यस्वरूप परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाता है।

स्रोतः ऋषिप्रसाद, अप्रैल 2000, पृष्ठ संख्या 14,15 अंक 88

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चिदानंदरूपः शिवोઽहं शिवोઽहं….


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

ध्यानयोग शिविर में निःसृत पूज्यश्री की आत्मस्पर्शी अमृतवाणी

श्री भोले बाबा ने कहा हैः

पृथ्वी नहीं जल नहीं, नहीं अग्नि तू नहीं है पवन।

आकाश भी तू है नहीं, तू नित्य है चैतन्यघन।।

इन पाँचों का साक्षी सदा, निर्लेप है तू सर्व पर।

निज रूप को पहिचानकर, हो जा अमर हो जा अमर।।

आत्मा अमल साक्षी अचल, विभु पूर्ण शाश्वत मुक्त है।

चेतन असंगी निःस्पृही, शुचि शांत अच्युत तृप्त है।।

निज रूप के अज्ञान से, जन्मा करे फिर जाय मर।

भोला ! स्वयं को जानकर, हो जा अमर हो जा अमर।।

श्रीमद् आद्य शंकराचार्य जी ने इसी बात को अपनी भाषा में कहा हैः

मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।

न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुः चिदानन्दरूपः शिवोहं शिवोहम्।।

अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो विभुर्व्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।

सदा मे समत्वं न मुक्तिर्नबन्धः चिदानन्दरूपः शिवोहं शिवोहम्।।

ʹचिद्ʹ अर्थात् चैतन्य। ʹशिवोઽहम्ʹ अर्थात् कल्याणकारी आत्मास्वरूप मैं हूँ। दृढ़ भावना करो कि मैं आत्मा हूँ…. चैतन्यस्वरूप हूँ….. आनंदस्वरूप हूँ…..ʹ जिन क्षणों में हम जाने अऩजाने देहाध्यास भूल जाते हैं, उन्हीं क्षणों में हम ईश्वर के साथ एक हो जाते हैं। जाने-अनजाने जब हम देहाभिमान से ऊपर उठे हुए होते हैं, उस वक्त हमारा मन दैवी साम्राज्य में विहार करता है। जिस क्षण अनजाने में भी हम काम करते-करते ʹमैं-मेरापनाʹ भूल जाते हैं उसी समय अलौकिक आनंदस्वरूप आत्मा के राज्य में हम अठखेलियाँ करने लगते हैं और जब राज्य में हम नामरूप के जगत को सत्य समझकर देखने, सुनने एवं विचारने लगते हैं, उसी क्षण अदभुत आत्मराज्य से नीचे आ जाते हैं।

दिन में न जाने कितनी बार ऐसी सुन्दर घड़ियाँ आती हैं, जब हम अऩजाने में ही आत्मराज्य में होते हैं, आत्मसाक्षात्कार की अवस्था में होते हैं लेकिन ʹयह वही अवस्था है….ʹ इसका हमें पता नहीं चलता। इसीलिए हम बार-बार मनोराज्य में, मानसिक कल्पनाओं में बह जाते हैं। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो परमात्मा का दर्शन न करता हो, साक्षात्कार न करता हो, लेकिन पता नहीं होता कि ʹयही वह अवस्था है….ʹ इसलिए प्रपंचों में उलझ जाता है।

दूसरी बात यह है कि इन्द्रियाँ भी उसे बाहर खींच ले जाती हैं, बहिर्मुख कर देती हैं। स्वरूप का ज्ञान अगर एक बार भी ठीक से हो जाये तो इन्द्रियों के बाहर जाने पर भी वह अपने वास्तविक होश (भान) में बना रहता है।

कई लोग सोचते हैं किः ʹमैं ब्रह्म तो हूँ लेकिन यह भाव दृढ़ हो जाये…. सोઽहम् अर्थात् वह मैं हूँ लेकिन यह भाव दृढ़ करूँ….ʹ तो यह दृढ़ करने का जो भाव आ रहा है वह इसीलिए कि अभी ब्रह्मतत्त्व को ठीक से नहीं समझ पाये हैं। यदि ठीक से समझ लें तो इसमें आवृत्ति की जरूरत नहीं और पा लेने के बाद खोने का भय नहीं।

उस परमात्मा को भावना करके नहीं पाया जाता क्योंकि भावनाएँ सदा बदलती रहती हैं जबकि परमात्मज्ञान सदा एकरस रहता है। जैसे भावना करो कि ʹमेरे हाथ में चाँदी का सिक्का है।ʹ आप भावना तो करेंगे लेकिन संदेह बना रहेगा कि ʹसच में है या नहीं….. या कुछ और है ?ʹ लेकिन आपने यदि एक बार भी देख लिया कि ʹयह चाँदी का सिक्का है…..ʹ तो इसका ज्ञान आपको हो गया। फिर यह ज्ञान मैं आपसे छीन नहीं सकता।

आपको इसका विस्मरण हो सकता है, अदर्शन हो सकता है, लेकिन अज्ञान नहीं होगा। ऐसे ही भगवान की भावना करते हो तो भावना बदल सकती है लेकिन एक बार भी भगवान के स्वरूप का ज्ञान हो जाये, भगवान के स्वरूप का साक्षात्कार हो जाये तो फिर चलते-फिरते, लेते-देते, जीते-मरते, इस लोक-परलोक में सर्वत्र, सर्व काल में ईश्वर का अऩुभव होने लगता है। आवृत्ति करके पक्का नहीं किया जाता है कि ʹमैं आत्मा हूँ… मैं आत्मा हूँ….ʹ क्योंकि परमात्मा तो आपका वास्तविक स्वरूप है, उसे रटना क्या ? जैसे आपका नाम मोहन है तो क्या आप दिन-रात ʹमैं मोहन हूँ… मोहन हूँ…ʹ रटते हो    ? नहीं, मोहन तो आप हो ही। ऐसे ही ब्रह्म तो आप हो ही। अतः यह रटना नहीं है कि ʹमैं ब्रह्म हूँ…ʹ वरन् इसका अनुभव करना है। परमात्मा के खोने का कभी भय नहीं रहता। रुपये पैसे खो सकते हैं, पढ़ाई-लिखाई के शब्द आप खो सकते हो, भूल सकते हो लेकिन उस परमात्मा को भूलना चाहो तो भी नहीं भूल सकते। जो सदा है, सर्वत्र है, आपका अपना-आपा बना बैठा है, उसे कैसे भूल सकते हो ? उसको समझने के लिए केवल तत्परता चाहिए।

उच्च कोटि के एक महात्मा थे। किसी शिष्य ने उनसे कहाः “गुरु जी ! मुझे भगवान का दर्शन कराइये।”

महात्मा ने उठाया डण्डा और कहाः “इतने रूपों में दिख रहा है, उसका तूने क्या सदुपयोग किया ? फिर से प्रभु का कोई नाय रूप तेरे आगे प्रगट कराऊँ ? कितने रुपों में वह गा रहा है ! कितने रूपों में वह गुनगुना रहा है ! उसका तूने क्या फायदा उठाया, जो फिर एक नया रूप देखना चाहता है ?”

तुलसीदासजी कहते हैं-

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।

जड़ और चेतन सब परमात्ममय ही तो है ! जहाँ घन अवस्था है उसको जड़ बोलते हैं और जहाँ जाग्रत अवस्था है उसे चेतन कहते हैं। जैसे एक ही पानी बर्फ भी बन जाता है और वाष्प भी। वाष्प का एक सूक्ष्म और चेतन अवस्था है जबकि बर्फ घनीभूत और जड़ अवस्था है लेकिन हैं तो दोनों पानी ही। ऐसे ही चित्त की वृत्ति जब सूक्ष्म, अति सूक्ष्म होती है तब परब्रह्मतत्त्व का साक्षात्कार होता है और स्थूल इन्द्रियों के द्वारा जो व्यवहार हो रहा है वह परब्रह्म परमात्मा का स्थूल रूप से साक्षात्कार ही है।

अज्ञानी लोग देह को ही ʹमैंʹ मानते हैं लेकिन देह के भीतर जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म चेतना कार्य करती है वह आनन्दस्वरूप आत्मा है, सुखस्वरूप आत्मा है। परम पुरुषार्थ यही है कि उसे जान लें।

उसे जानने की सबसे सरल युक्ति तो यही है कि ऐसी भावना करें- ʹजो कुछ दिख रहा है उसमें मेरा ही स्वरूप है।ʹ जैसे केश, नख, त्वचा, रोमकूप आदि सब भिन्न-भिन्न होते हुए भी शरीर की एकता का अनुभव होता है, ऐसे ही स्थूल जगत में सब भिन्न-भिन्न दिखते हुए भी ज्ञानवान को सर्वत्र अपने अद्वैत स्वरूप का अनुभव होता है।

ʹजन्म और मृत्यु शरीर के होते हैं, जाति स्थूल शरीर की होती है, बन्धु और मित्र सब स्थूल शरीर के संबंध हैं।

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः। पिता नैव मे माता न जन्मः।।

न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः। चिदानन्दरूपः शिवोहं शिवोहम्।।

ʹमैं तो चिदानंदस्वरूप हूँ…. ૐ…..ૐ….ૐ….

बाह्य सुख-सुविधाओं के न होते हुए भी जितना सुख यहाँ ध्यानयोग शिविर में मिल रहा है, उतना सुख बड़ी-बड़ी होटलों में रहने पर भी नहीं मिला होगा क्योंकि वह सुख सदोष सुख था, विकारी सुख था। भगवान के रास्ते का, ईश्वरीय मार्ग का निर्दोष-निर्विकारी सुख वह नहीं था लेकिन यहाँ जो सुख मिल रहा है वह किसी विषय-भोग का नहीं, वरन् निर्विषय नारायण का सुख मिल रहा है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने ʹश्रीरामचरितमानसʹ में कहा हैः

सकल पदार्थ इह जग मांहि। कर्महीन नर पावत नाहीं।।

इस संसार में सब प्रकार के पदार्थ हैं फिर यत्न करके चाहे नर्क का सामान इकट्ठा करो चाहे स्वर्ग का, चाहे वैकुण्ठ का करो चाहे एकदम निर्दोष, शुद्ध-बुद्ध आत्मा का ज्ञान पाकर मुक्त हो जाओ… यह आपके हाथ की बात है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2000, पृष्ठ संख्या 8-10, अंक 88

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भगवान का अनुभव कैसे ?


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

परमात्मा कैसा है ? आत्मा का स्वरूप क्या है ? कोई कहता है कि भगवान तो मोरमुकुटधारी हैं। कोई कहता है कि भगवान तो मर्यादापुरुषोत्तम हैं। कोई कहता है कि भगवान सर्वगुणसम्पन्न हैं। कोई कहता है कि भगवान सर्वशक्तिमान हैं। कोई कहता है कि भगवान सर्वत्र हैं। कोई कहता है कि वे वैकुण्ठ, कैलास आदि में हैं। कोई कहता है कि भगवान हमारे हृदय में बैठे हैं। कोई कहता है कि कण-कण में भगवान हैं। कोई कहता है कि नहीं… यह सब माया का  पसारा है। भगवान तो निर्गुण-निराकार हैं।

कोई कहता हैः “नहीं…. निर्गण-निराकार तुम्हारी दृष्टि में होगा। हम तो साकार भगवान को पूजते हैं। मुरलीमनोहरस मोरमुकुट एवं पीताम्बरधारी जो हैं, वे ही हमारे भगवान हैं। उनको हम सुबह बालभोग, दोपहर को राजभोग एवं शाम को भी भोग लगाकर ही खाते हैं। हमारे भगवान के दर्शन करने हों तो चलो, हम तुम्हें करवाते हैं।

पूछोः “कहाँ हैं भगवान ?”

कहेंगेः “चलो हमारे साथ।”

ले जायेंगे पूजा के कमरे में। हटायेंगे पर्दा और कहेंगेः “ये हैं हमारे भगवान।”

इस प्रकार कोई कहता है कि भगवान स्थान-विशेष में हैं तो कोई कहता है वे सर्वत्र हैं। कोई कहता है वे सर्वगुणसंपन्न हैं तो कोई कहता है गुणातीत हैं। कोई कहता है वे साकार हैं तो कोई कहता है कि निराकार हैं। अब हम भगवान श्रीकृष्ण के पास चलते हैं और देखते हैं कि वे क्या कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं-

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।

आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रृत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित।।

ʹकोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही (इसके तत्त्व का) आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई (अधिकारी पुरुष) ही इस आत्मा को आश्चर्य की तरह सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको (आत्मा को) नहीं जानता।ʹ (गीताः 2.29)

कोई व्यक्ति भगवान को आश्चर्य की भाँति देखता है किः “आहाहा… हमने भगवान की छवि देखी ! आज रात को मुझे ऐसा स्वप्न आया था कि ʹमोरमुकुटधारी भगवान मेरे सामने प्रकट हुए हैं और वे मुझसे पूछ रहे हैं कि, “क्या हाल है ?ʹ ….और मैं कह रहा हूँ कि, भगवन् ! आपकी कृपा है।ʹ फिर उन्होंने बड़े प्रेम से मेरे सिर पर हाथ फेरा जिससे मैं तो गदगद हो गया !”

ʹकोई व्यक्ति भगवान को, आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है…ʹ इसका एक अर्थ ऐसा भी हो सकता है कि जैसे संसार की दूसरी चीजें देखने, सुनने, पढ़ने और जानने में आती हैं वैसे इस परमात्मा को नहीं जाना जा सकता, क्योंकि अन्य वस्तुएँ तो देह-इन्द्रिय-बुद्धि के द्वारा जानी जाती हैं जबकि परमात्मा को तो स्वयं अपने-आपसे ही जाना जाता है। इसीलिए कहा गया हैः

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्…..

कोई इसको आश्चर्य की तरह कहता है- आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः…. क्योंकि यह परमात्मतत्त्व वाणी का विषय नहीं है। जिससे वाणी प्रस्फुटित होती है, वाणी उसका वर्णन कैसे कर सकती है ? फिर भी भगवान के गुण-कर्म, लीला-स्वभाव आदि का वर्णन करके महापुरुष लोग वाणी से उनकी ओर केवल संकेत ही करते हैं ताकि सुनने वाले का लक्ष्य उधर हो जाये।

आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति….

कोई इस आत्मा को आश्चर्य की तरह सुनता है क्योंकि दूसरा जो कुछ भी सुनने में आता है वह सब इन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि का विषय होता है किन्तु परमात्मा न इऩ्द्रियों का विषय है, न मन का और न बुद्धि का, वरन् वह तो इन्द्रियादि सहित उनके विषयों को भी प्रकाशित करने वाला है। इसलिए आत्मा (परमात्मा) सम्बन्धी विलक्षण बात को वह आश्चर्य की तरह सुनता है।

श्रृत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।

ʹसुनकर भी इसको कोई नहीं जानता।ʹ

इसका तात्पर्य यह कि केवल सुनकर इसको कोई भी नहीं जान सकता वरन् सुनने के बाद जब वह स्वयं उसमें स्थित होगा, तब वह अपने-आप से ही अपने-आपको जानेगा।

श्रृतियाँ अनेक हैं, स्मृतियाँ अऩेक हैं, पुराण भी अठारह है। इनमें जो जैसा पाता है, भगवान को ठीक वैसा-वैसा मानता है। हकीकत में अति विस्मयकारक बात और तथ्य यह है कि पशु से लेकर परम सूक्ष्म जीवाणुओं में भी वही आत्मा सूक्ष्म रूप से स्थित है। कोई उसे छोटा कहता है तो भी ठीक है और कोई उसे बड़ा कहता है तो भी ठीक है… कोई परमात्मा को सगुण-निराकार कहता है तो भी ठीक है। येन-केन-प्रकारेण वह अपनी बुद्धि को भगवान में तो लगा रहा है… इस बात से हमें आनंद है। बस, हमारा यही एकमात्र कर्त्तव्य है कि हम अपनी बुद्धि को परमात्मा में प्रतिष्ठित करें।

इस युग में अधिकांश लोग विषयपरायण हो चले हैं। विषय-भोगों में वे इतने लिप्त हो गये हैं कि जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। उस परमात्मा के विषय में जानना तो दूर, विचार तक नहीं करते। वह आत्म-परमात्मतत्त्व इतना सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है और महान से भी महान है कि हम उसकी कल्पना तक नहीं कर सकते। कीड़ी के पग नेवर बाजे सो वह भी साहिब सुनते हैं….इतना वह सूक्ष्म है। हमारे बोलने-चालने एवं हिलने-डुलने से कितने ही जीवाणु मर जाते हैं। वैज्ञानिक लोगों का कहना है कि जब हम बोलते हैं तब असंख्य जीवाणु मर जाते हैं। इस हाथ को उठाने एवं नीचे लाने में भी न जाने कितने ही सूक्ष्म-से-सूक्ष्म जीवाणु मर जाते होंगे ! क्षण-क्षण में लाखों-करोड़ों जीवाणु उत्पन्न होते एवं मरते रहते हैं। इस शरीर में भी असंख्य बैक्टीरिया उत्पन्न होते एवं मरते रहते हैं जो कि ʹमाइक्रोस्कोपʹ (सूक्ष्मदर्शी यंत्र) से देखने में आते हैं। इतने वे सूक्ष्म हैं ! जब वे जीवाणु इतने सूक्ष्म हैं, तो उनका हृदय कितना सूक्ष्म होगा और उस हृदय में बैठा हुआ भगवान कितना सूक्ष्म होगा, कितना छोटा होगा ! बाल के अग्रभाग के एक लाख हिस्से करो। उसमें से एक हिस्से पर भी हजार बैक्टीरिया (जीवाणु) बैठ जाते हैं और उनमें भी भगवान की चैतन्यता मौजूद होती है। आप सोचिये कि भगवान कितने समर्थ और व्यापक हैं ! किन्तु हम अल्पज्ञ हो गये हैं, उच्छ्रंखल हो गये हैं इसीलिए आत्ममहिमा से दूर हैं। एक फकीर ने कहा हैः

अल्ला रे अल्ला ! क्या फैज है मेरे साकी का !

अपने हिस्से की भी वे मुझे पिलाये जाते हैं ।।

अर्थात् भगवान कैसे हैं ? शांति के महासागर…. आनंद के महास्रोत… वे अपने हिस्से की शांति, आनंद, माधुर्य आदि का हमें अनुभव करवा रहे हैं फिर भी हम उन्हें दूर मानते हैं। हम उन्हें किसी अवस्था विशेष अथवा स्थान-विशेष में मानते हैं जो हमारी बड़ी भारी भूल है, गलती है। इससे हमारी श्रद्धा और विश्वास डावाँडोल हो जाते हैं, चित्त में संशय हो जाता है और संशयात्मा विनश्यति।

जहाँ संशय होता है वहाँ विनाश हुआ समझो। भगवान को जब-जब केवल आकाश-पाताल में मानेंगे, किसी मंदिर-मस्जिद-गिरिजाघर-गुरुद्वारे में मानेंगे या किसी अवस्था-विशेष अथवा स्थान-विशेष में मानेंगे, जैसे कि ʹफलानी जगह जायेंगे तब भगवान मिलेंगे…. फलानी अवस्था आयेगी तब भगवान मिलेंगे….. ऐसा-ऐसा करेंगे तब भगवान मिलेंगे….ʹ तब-तब भगवान दूर हो जायेंगे। हैं तो भगवान निकट से भी निकट, लेकिन दूर मानने से दूर हो गये और जिसने भगवान को निकट समझा, अपने हृदय में स्थित समझा उसके भीतर भगवान ने शांतिरूप से, आनंदरूप से, और भी पता नहीं किस-किस रूप से, जिसका वर्णन नहीं हो सकता ऐसे अवर्णनीय ढंग से अपने अस्तित्त्व का एहसास कराया, अनुभूति करायी और अपना प्रकाश फैलाया।

भगवान को न तो किसी अवस्था-विशेष में मानना है और न ही किसी स्थल-विशेष में मानना है। वह तो सर्वत्र है, सदा है और सबके पास है। वह सबका अपना-आपा होकर बैठा है।

कोई जिज्ञासु यहाँ प्रश्न उठा सकता है किः ʹजब भगवान सर्वत्र है, सदा है, हमारे ही भीतर है तो फिर संतों के पास, सदगुरु के पास जाने की क्या जरूरत ? सत्संग सुनने की क्या जरूरत ?ʹ

जैसे, यहाँ आपके व मेरे पास रेडियो एवं टेलिविजन की तरंगे हैं, फिर भी हमें सुनाई-दिखाई नहीं देतीं। क्यों ? क्योंकि इस समय यहाँ पर रेडियो या टेलिविजन नहीं है, रेडियो का एरियल नहीं है, टी.वी. की ʹएन्टीनाʹ नहीं है। हमारे पास ये साधन-सामग्रियाँ होंगी तभी हम रेडियो भी सुन पायेंगे और टी.वी. भी देख पायेंगे। ठीक इसी प्रकार भगवान सर्वत्र हैं। रेडियो और टी.वी. की तरंगे जितनी व्यापक होती हैं उससे भी कहीं ज्यादा व्यापक भगवान की सत्ता है लेकिन उसकी कृपा से ही मिलता है क्योंकि संतों के हृदय में ही भगवान ने अपना प्रादुर्भाव कर रखा है।

संतों ने अपने हृदय में ʹएन्टीनाʹ लगा रखा है। इस एन्टीना से उन्हें भगवान के दर्शन हुए हैं और उसकी महिमा का वे वर्णऩ भी कर सकते हैं। इसीलिए हम संतों के सान्निध्य की अपेक्षा रखते हैं। जैसे, इस  पृथ्वी के वायुमंडल में रेडियो और टी.वी. की तरंगों के सर्वत्र व्याप्त होने पर भी बिना टी.वी. व रेडियो के उन्हें देखना और सुनना कठिन है, ठीक इसी प्रकार भगवान की सर्वव्यापकता होने के बावजूद भी उनके आनंद, उनकी शांति, उनके माधुर्य का अऩुभव बिना सदगुरु व सत्संग के करना कठिन है। यह अनुभव तो केवल संतों के सान्निध्य एवं सत्संग से ही प्राप्त किया जा सकता है।

ठीक ही कहा हैः

कर नसीबांवाले सत्संग दो घड़ियाँ….

अहंकारी, मनमुख और दूसरों के यशो-तेज से उद्विग्न निंदकों के लिए नानकजी ने कहा हैः

संत कै दूखनि आरजा घटै। संत कै दूखनि जम ते नहीं छूटै।

संत कै दूखनि सुखु सभ जाई। संत कै दूखनि नरक मांहि पाइ।।

संत कै दूखनि मति होइ मलीन। संत कै दूखनि सोभा ते हीन।।

संत कै हते कउ रखै न कोई। संत कै दूखनि थान भ्रसटु होई।।

संत कृपाल कृपा जे करैं। ʹनानकʹ संत संगि निंदकु भी तरै।।

निंदकों की बातों में न आने वाले सत्संगी तो फायदा उठाते हैं। दृढ़निश्चयी पुण्यात्मा शिष्यों साधकों भक्तों के लिए मानों नानक जी कह रहे हैं-

साध के संगि मुख ऊजल होत।। साध संगि मलु सगली खोत।।

साध के संगि मिटै अभिमानु।। साध कै संगि प्रगटै सु गिआनु।।

साध कै संगि बुझै प्रभु नेरा।

साध कै संगि पाए नाम रतनु। साध कै संगि एक ऊपरि जतनु।।

साध की महिमा बरनै कउनु प्रानी।। नानक ! साध की सोभा प्रभ माहि समानी।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2000, पृष्ठ संख्या 87-89, अंक 87

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