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Tatva Gyan

सूखा नारियल


फरीद बड़े फक्कड़ संत थे। एक बार एक व्यक्ति ने उनके पास जाकर कहाः “महाराज ! ईसा मसीह को क्रॉस पर चढ़ना पड़ा और उनके हाथ पैरों में खीलें ठोक दी गयीं… मंसूर को भी शूली पर चढ़ना पड़ा… सुकरात को जहर दे दिया गया लेकिन ʹहम मर रहे हैंʹ ऐसा महसूस उनको क्यों नहीं हुआ ? ʹहम मौत को देख रहे हैं… हमारा कुछ नहीं बिगड़ सकता….ʹ ऐसा  वो क्यों बोलते थे ? हमें तो एक छोटी सी सुई चुभती है तब भी पीड़ा होती है किन्तु उन्हें शूली पर चढ़ने पर भई दुःख क्यों नहीं हुआ ?”

फरीद ने अपने सामने पड़े हुए नारियल के ढेर में से एक नारियल उसे देते हुए कहाः “जा इसको तोड़कर आ, लेकिन ध्यान रखना कि गिरी साबूत रहे।”

वह व्यक्ति गया और नारियल तोड़ने की युक्ति का विचार करने लगा। नारियल हरा था अतः बिना गिरी टूटे नारियल कैसे टूट सकता था ? काफी देर सोच-विचार कर वह पुनः बाबा फरीद के पास आया और बोलाः “महाराज ! यह काम मुझसे नहीं हो पायेगा। जैसे नारियल का टूटना होगा, वैसे ही भीतर की गिरी भी टूट जायेगी।”

फरीद ने सूखा नारियल देते हुए कहाः “इसको तोड़कर आ लेकिन इसकी भी गिरी साबूत ही रहे।”

उस व्यक्ति ने नारियल हिलाकर देखा। नारियल सूखा था। अंदर की गिरी के हिलने की आवाज आ रही थी। वह बोलाः “महाराज ! इसकी गिरी तो बिना तोड़े भी साबूत ही है। हिलने मात्र से ही पता चल जाता है।”

फरीदः “उस हरे नारियल को तोड़ने से उसकी गिरी भी टूट जाती क्योंकि वह गिरी अपने बाह्य स्थूल भाग से चिपकी थी। यह सूखा हुआ नारियल है। धीरे-धीरे अपने बाह्य भाग से, छिलके से, गिरी की पकड़ हट गयी है। इसी प्रकार मंसूर, सुकरात आदि सूखे नारियल थे और तुम हरे नारियल हो। वे लोग केवल गिरी ही बचे थे, केवल ब्रह्मानंदस्वरूप ही बचे थे। उनका स्थूल और सूक्ष्म शरीर देखने मात्र का था जबकि तुम्हारी गिरी अभी चिपकी  हुई है।

जप, ध्यान, प्राणायाम आदि का फल यही है कि गिरी अलग हो जाये। कीमत तो गिरी की ही  होती है, बाकी तो बाहर का आवरण दिखावा मात्र होता है। कीमत तुम्हारे बाह्य सौन्दर्य की नहीं, वरन् भीतर स्थित अंतर्यामी परमात्मा की ही है।

ऐसे सूखे नारियल की तरह ब्रह्म में प्रतिष्ठित फकीर यदि तुम्हारी ओर केवल निहार भी लें और तुम उऩ्हें झेल पाओ तो उसके आगे करोड़ों की संपत्ति का मूल्य भी कौड़ी के समान है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 1999, पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 81

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आखिरी बात


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

एक बार एक ब्रह्मवेत्ता महापुरुष को उनके शिष्य समुदाय ने घेर लिया एवं प्रार्थना कीः “गुरुजी ! हम सब आपके दर्शन तो कई बार करते हैं और अब हमें प्रभु के दर्शन करना चाहिए, प्रभुतत्त्व का साक्षात्कार करना चाहिए-यह सब भी हम समझते हैं, मानते हैं। अतः गुरुजी ! अब एक बार आप हमें आखिरी बात सुनाने की कृपा कर दीजिये।”

गुरुः “हम तो ढूँढते ही रहते हैं कि आखिरी बात सुनने वाला कोई मिल जाए। लगता है तुम लोगों को भगवान ने ही भेजा है।”

शिष्यः “गुरुजी ! अब आप आखिरी बात सुना ही दीजिये।”

गुरुः “जिस किसी को भी आखिरी बात सुननी है, वह मेरे जन्मदिन पर आ जाये।”

शिष्यः “किस जन्मदिन पर ?”

गुरुः “जिस दिन मेरे गुरु ने मुझे आत्म-साक्षात्कार कराया था, जिस दिन गुरूरूप में मेरा जन्म हुआ था, उस दिन तुम लोग आ जाना।”

चारों तरफ खबर फैल गयी कि अपने आत्म-साक्षात्कार के दिन गुरु जी आखिरी बात बताने वाले हैं। अतः दूर दराज से लोग गुरु आश्रम में एकत्रित होने लगे। कई विद्वान, पंडित एंव शास्त्रज्ञ लोग भी आये। इस प्रकार वहाँ बड़ी भीड़ जमा हो गयी। बड़े-बड़े मण्डप बन गये। किन्तु उन महापुरुष को मानो, इन सबसे कोई लेना देना ही नहीं था। वे तो अपनी कुटिया से सहज स्वाभाविक मस्ती में बाहर निकले।

सदगुरु महाराज की जय….

इस जयघोष से गगनमंडल गूँज उठा। जयघोष के बाद दो चार प्रतिनिधि साधकों ने आगे बढ़कर कहाः “गुरुजी ! आज वही दिन है, जिस दिन आप आखिरी बात सुनाने वाले हैं।”

गुरुजीः “ठीक है। अच्छा हुआ, मुझे याद दिला दिया। आज आखिरी बात सुनानी है। सब लोग तैयार होकर बैठ जाओ।”

सब लोग शांत होकर बैठ गये ताकि गुरुजी की आखिरी बात का एक शब्द भी कहीं छूट न जाये। आज तो मानो, कानों को भी आँखें फूट निकलीं कि हम सुनेंगे भी और देखेंगे भी। मानो, आँखों को कान फूट निकले कि हम निहारेंगे भी और सुनेंगे भी।

इतने में वे महापुरुष मंच पर आये और सो गये। दस…. बीस…. तीस… चालीस…. पचास मिनट हो गये, घण्टा… दो घण्टा हो गये… शिष्यों ने सोचा किः ʹपता नहीं, गुरु जी को क्या हो गया है ?ʹ लल्लू पंजू शिष्य तो रवाना हो गये लेकिन जो जिज्ञासु थे उन्होंने सोचा किः “बैठे बैठे तो गुरु जी को कई बार सुना है, आज वे लेट गये हैं तो लेटे लेटे ही कुछ न कुछ कहेंगे।ʹ

इस प्रकार सब अपनी अपनी मति एवं भावना के अनुसार विचारने लगे। फिर उनमें से भी कुछ लोग ऊबकर चले गये।

इस प्रकार लगभग चार घण्टे व्यतीत हो गये। अब कुछ गिने गिनाये लोग ही बचे। तब गुरु जी उठे। उन्हें उठा हुआ देखकर प्रतिनिधि शिष्यों ने कहाः “गुरुजी ! आज तो आपने बहुत देर तक आराम किया। अब तो चारों ओर लोग आपकी और हमारी मखौल उड़ायेंगे कि ʹअच्छी आखिरी बात सुनायी….ʹ गुरु जी ! आपने तो कुछ सुनाया ही नहीं, वरन् आराम करने लगे। आप कुटिया में आराम कर लेते। इधर लोगों के सामने मंच पर….? गुरु जी ! आपने यह क्या किया ?”

गुरुजीः “मैं सोया नहीं था।”

शिष्यः “आप सोये नहीं थे ?”

गुरुजीः “नहीं। तुम लोगों ने आखिरी बात सुनाने के लिए कहा था न ? मैंने वही आखिरी उपदेश दिया था। आत्म-साक्षात्कार कैसा होता है, यही मैंने बताया।

गहरी नींद में क्या होता है ? क्या उस वक्त पता चलता है कि ʹमैं हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई पारसी, गुजराती, पंजाबी या सिंधी हूँ ?ʹ अथवा ʹकुछ है…. कुछ खोया है?ʹ या फिर ʹकुछ लेना है…. कुछ देना है….ʹ आदि ? नहीं। गहरी नींद में कुछ पता नहीं चलता, उस वक्त कोई स्फुरणा नहीं होती। ऐसे ही आत्म-साक्षात्कार का भी मतलब है कि चित्त में कोई स्फुरणा न हो। ज्ञानी के सब काम निःस्फुरण, निःसंकल्प एवं कर्त्तृत्वभाव से रहित होते हैं। अभी तक मैं यह बात सैद्धान्तिक तौर पर तो बोल ही रहा था किन्तु तुमने सुना नहीं, अतः आज मैंने प्रयोग करके बताया।”

शिष्यः “गुरुजी ! क्या आत्म-साक्षात्कार सचमुच ऐसा ही होता है ?”

गुरुजीः “हाँ सचमुच में, झूठमूठ में नहीं। जब आत्म-साक्षात्कार करना हो तो उठो… जागो…. अपने-आपसे पूछो किः “मैं कौन हूँ ?ʹ अपने आपको खोजो। खोजते समय जो कुछ तुम्हारे देखने में आता जाये, उसको हटाते जाओ। जैसे, यह भी नहीं….. यह भी नहीं…. मैं हाथ भी नहीं… पैर भी नहीं…. हाथ और पैरों को क्रिया करने की प्रेरणा देने वाला मन भी नहीं… मन को चलाने वाला प्राण भी नहीं… प्राण को चलाने वाली चिदावली भी नहीं…. इस प्रकार सूक्ष्म दृष्टि से मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि को हटाते-हटाते जब तुम्हारी वृत्ति सूक्ष्म हो जायेगी, तब मौन को उपलब्ध हो जाओगे।

जैसे, अन्धेरे कमरे में पड़ी हुई किसी वस्तु को देखना है तो दीया, टॉर्च आदि काम आता है किन्तु वही दीया जब सूर्य के सामने रखा जाता है तो उसका प्रकाश सूर्य के प्रकाश में समा जाता है। ऐसे ही व्यवहार-काल में, लेन-देन में, इधर-उधर के प्रसंगों में अथवा परमात्मा की खोज में मन-बुद्धि काम तो आते हैं किन्तु जब वे परमात्मप्रकाश में आ जाते हैं तो उनका यानी मन-बुद्धि का, टिमटिमाते दीये जैसा प्रकाश परमात्मा के प्रकाश में लीन हो जाता है। वे अंतर्मुख हो जाते हैं… शुद्ध हो जाते हैं।

मन-बुद्धि से तुम जगत को जान सकते हो, परमात्मा को नहीं। फिर भी मन-बुद्धि ज्यों-ज्यों परमात्मा के अभिमुख होते जाते हैं, त्यों-त्यों परमात्मा में तदाकार होते जाते हैं। जैसे, नमक की पुतली सागर की थाह पाने जाये तो स्वयं सागर में ही समा जायेगी। फिर उसका अपना अलग से अस्तित्व नहीं रह जायेगा। ऐसे ही जब बुद्धि परमात्मा में स्थिर हो जाती है तो फिर वह बुद्धि, बुद्धि नहीं रहती, ऋतंभरा प्रज्ञा हो जाती है।

महापुरुष जब परमात्मा में डुबकी लगाकर कोई कार्य करते हैं, तब लोगों को लगता है कि उनके मन-बुद्धि एवं इन्द्रियों से कार्य हो रहा है। स्वयं महापुरुषों को कभी नहीं लगता कि ʹये मन, बुद्धि एवं इन्द्रियाँ हैं।ʹ वे तो सदैव एक चैतन्य का अनुभव करते हैं…. फिर भी यह बात वाणी से नहीं कही जा रही है। अन्यथा उस अनुभव के आगे तो वाणी भी अधूरी है। नानक जी ने कहा हैः

मत करो वर्णन हर बेअंत है। क्या जाने वो कैसो है ?

फिर भी उसके इर्द-गिर्द की बातें सुनने से जो पुण्य होता है वह पुण्य न तो तप करने से होता है, न यज्ञ करने से चऔर न ही चांद्रायण व्रत करने से। इसीलिए बड़े-बड़े तपस्वी, यति-योगी, संन्यासी आदि भी सत्संग के अभाव में कई बार आत्म-साक्षात्कार की बात से चूक जाते हैं।

संत निश्चलदासजी ने ʹविचारसागरʹ नाम का एक ग्रन्थ लिखा है। उसमें आत्म-साक्षात्कार से संबंधितच बातें भरी हुई हैं। एक दिन संत निश्चलदासजी ने कुछ साधुओं से कहाः “सुबह पाँच बजे के समय बुद्धि सात्त्विक रहती है। वह समय ध्यान-भजन के लिए भी उपयुक्त रहता है। यदि तुम लोग चाहो तो उस समय तुम्हें ʹविचार सागरʹ पढ़ाऊँगा।”

उनके पास अनेकों साधु आते थे। ʹविचार सागरʹ का सत्संग एक दिन… दो दिन…. तीन दिन…. चार दिन… चला। फिर एक-एक करके साधु कम होने लगे। ज्यों-ज्यों संत गहरी बात सुनाते गये, त्यों-त्यों लोग ऊबते गये। आखिरकार धीरे-धीरे सब साधु भाग गये क्योंकि मन को रूखा लगता था न !

मन को थोड़ा मनोरंजन चाहिए। इन्द्रियों को भी इन्द्रियविषयक भोगों का त्याग करते-करते, मन का त्याग करते-करते जब पूर्ण त्याग की घड़ियाँ आती हैं तब आत्म-साक्षात्कार हो जाता है। जैसे लोहे के टुकड़े को एक बार पारस का स्पर्श करा दो तो फिर उसे कीचड़ में रखने पर भी जंग नहीं लगता, ऐसे ही मन बुद्धि को परमात्मतत्त्व का एक बार अनुभव हो जाये, तो फिर उनमें जगत की सत्यता नहीं टिकती।

फिर वह पुरुष व्यवहार करता हुआ तो दिखेगा लेकिन उसका व्यवहार दिखने मात्र का होगा। जैसे भुना हुआ बीज और कच्चा बीज, दोनों दिखते तो एक जैसे हैं लेकिन कच्चा बीज, दोनों दिखते तो एक जैसे हैं लेकिन कच्चा बीज दूसरे बीज उत्पन्न करने की क्षमता रखता है जबकि भुना हुआ बीज दिखने मात्र का होता है, वह अपनी वंश परंपरा नहीं चला सकता। ऐसे ही मन जब ब्रह्मविद्या में भुना जाता है, तो उस मन से प्रारब्धवेग से थोड़ा-बहुत सांसारिक व्यवहार होता है लेकिन वह दूसरे कर्मों की जाल उत्पन्न नहीं करता। उसका जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। इसीलिए कबीर जी कहते हैं-

मन की मनसा मिट गयी, भरम गया सब छूट।

गगनमंडल में घर किया, काल रहा सिर कूट।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1999, पृष्ठ संख्या 2-4, अंक 77

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ध्यान में पूज्य गुरुदेव का संकेत


भगवान हमें प्रेरणा और उत्साह देते हैं। उन भगवान से प्रार्थना करें कि वे हमारे दिल में शीघ्र ही ज्ञान-पिपासा पैदा करें, हमारा साहस बढ़ायें। जीवन की शाम हो जाय, उससे पहले जीवनदाता प्रभु से हमारी मुलाकात हो जाये।

सच्चे हृदय से प्रार्थना करोगे तो आपका मन पवित्र होता जायेगा, रक्त का कण-कण पवित्र होता जायेगा। और भगवदीय धर्म पाने की बुद्धि बनती जाएगी। जो कुछ सत्कर्म एवं दान पुण्य करो, सब भगवान को अर्पण करो तो उसका फल अनन्त हो जाएगा। अहंकार के कारण मन बुद्धि को अपना मानकर जीव परेशानी पैदा करता है। उस मन-बुद्धि को भी परमात्मा को अर्पण कर दो। सत्संग और हरिकीर्तन से आपका अंतःकरण शुद्ध होता है, हृदय पावन होता है और हृदय में भक्तिभाव अठखेलियाँ करता है।

आपके संस्कार मुझे अच्छे लग रहे हैं। भगवान करें कि आपको बार-बार सत्संग सुनने का अवसर प्राप्त हो और आपका भक्तिभाव सदैव बढ़ता रहे। जो घड़ियाँ सत्संग में बीतीं, वे ही सफल हैं। आप सत्संग सुनें और याद न रहे फिर भी वह कितना लाभदायी है, यह तो भगवान जानते हैं। अकेले में मन को बाँध रखना संभव नहीं। जितनी देर आप सत्संग में बैठते हो, उतनी देर के लिए तो आप संतसभा में संतत्व को उपलब्ध हो जाते हो। सत्संग की महिमा आप प्रत्यक्ष देख सकते हो कि जब तक सत्संग में बैठते हो तब तक वाणी का, विकारों का संयम अपने-आप हो जाता है। काम, क्रोध, भय, शोक, लोभ अपने-आप चले जाते हैं।

राजा जनक सत्संग सुनते थे तो उनकी सातवीं पीढ़ी के राजा अज की मुक्ति हुई। कुल में कोई बेटा ब्रह्मज्ञानी संत का सत्संग सुनता है, ईमानादारी से भक्ति करता है तो उसके पितरों का कल्याण होता है। उसके पुत्र-पौत्रों का कल्याण होता है। उसके अपने कल्याण होने में क्या संदेह ? इसे आप समझ नहीं सकते, पर आपने बहुत कमाई की है।

ʹसूरज ढलता है तो पक्षी अपने घोंसले की ओर जाते हैं, वैसे ही प्रभु ! तू मुझे वह पंख देना कि जीवन की शाम होने से पहले मैं तेरी और उड़ान भर सकूँ, ऐसी मेरी मनोबुद्धि हो जाये। किसी ने हीरे-मोती कमाये, कोई जवाहरात कमाएगा लेकिन मैं तो तेरे नाम की कमाई कर लूँ, ऐसी दया करना प्रभु !ʹ यह प्रार्थना तुम करते रहना।

तुम सुबह उठो तो भगवान से  कहो किः ʹप्रभु ! मैं तेरा हूँ। मेरे मन-बुद्धि भी तेरे हैं। तू इसे अच्छे रास्ते पर चलाना।ʹ

रात को सोते वक्त परमात्मा का चिंतन करते करते सो जायें। भोजन करें तो भी अंतर्यामी परमात्मा को भोग लगाकर ही करें। समय निकाल कर ʹईश्वर की ओरʹ पुस्तक बार-बार पढ़ते रहें और विचार करें। ज्यादा समय निकाल सकें तो एक या दो सप्ताह मौनमंदिर में एकांत में जाएँ और अंतर की यात्रा करें। इससे शरीर के रोग तो मिटते हैं, मन के रोग भी मिटते हैं। ध्यान योग साधना शिविर में जाने का लाभ ले सकें तो समय निकालकर अवश्य लें। रात्रि को सोते समय भी थोड़ा सा ध्यान करके सोवें।

साधक आत्मा में विश्रांति पाता है तो गुरु की प्रेमपूर्ण कृपा उस पर बरसती है। गुरु उसको गुप्त बातें बताते हैं। गुप्त बातें भी दो प्रकार की होती हैं- एक तो वे जो अपने जीवन में अनुभव हुए हों। जैसे कि ʹमुझे ऐसा प्रकाश हुआ…. ऐसे देवदर्शन हुए… मुझे मेरे गुरु ने ऐसे डाँटा था…. मेरे गुरु ने ऐसी कृपा की थी…. मैं ऐसे-ऐसे विकारों में गिरा था…. मैं ऐसे विकारों से बचा था…. मेरे पास ऐसी-ऐसी सिद्धियाँ आई थीं…. ऐसे ऐसे चमत्कार हुए थे… किन्तु चमत्कार प्रकृति में होते हैं अतः मेरे गुरु देव ने मुझे प्रकृति से परे जाने की प्रेरणा की थी।ʹ आदि-आदि। गुरु लोग इस प्रकार के अनुभव और आपबीती बताते हैं। दूसरी बात, वे अपना वास्तविक स्वरूप, जो आपबीती से परे हैं, ब्रह्मांड से परे है, उस तत्त्व की बात बताते हैं। गुरु बताते हैं-

“वत्स ! जो मैं देह रूप होकर दिख रहा हूँ, वह मैं नहीं हूँ। यह एक देह, नात-जात या मत-पंथ मेरा नहीं है। जो दिख रहा हूँ, वैसा मैं नहीं हूँ। किसी देश में या प्रांत में या किसी काल में या किसी रूप में जैसा दिखता हूँ, वैसा मैं नहीं हूँ। तू ईश्वर के नाते मुझे मिला और मैं तुझे ईश्वर से मिलाने के लिए मिला। तेरा और मेरा मधुर संबंध है। हे वत्स ! प्यार से भरी तेरी आँखें और श्रद्धा की धाराएँ मुझे प्रेमवश करती हैं। तूने बार-बार श्रद्धा-भक्ति से मुझे देखा है। इसलिए हे वत्स ! मैं तुझे अपना अनुभव कहता हूँ। तू ध्यान से सुन। मेरे हृदय को छूकर निकलती हुई वाणी तेरे हृदय को पावन करती है। तेरे प्रेम की धारा मेरे अनुभव को खींचती है और मेरे प्रेम की नजर तेरे पर बरसती है।

जैसे पक्षी को फँसाने के लिए शिकारी जाल बिछाते हैं वैसे मैंने उपदेश देने के लिए वाणीरूपी जाल बिछाकर तेरे कानों को अपनी तरफ खींचा और तू इससे सहमत हुआ। इसलिए मैं तुझे अपनी ओर खींचता हूँ। तू प्रतीति में मत जाना, निज प्राप्ति में आना। तुझे इस आकृति में मैं दिख रहा हूँ, इतना ही मैं नहीं हूँ। ऐसी जगह नहीं , जहाँ से तू मुझसे बाहर निकल सके। ऐसा कोई समय नहीं, जब मैं नहीं हूँ। ऐसा कोई कर्म नहीं जो तू मुझसे छिपा सके। तत्त्व से तू मेरा अनुभव करे तो तू मुझमें ही रहता है, मुझमें ही बोलता है। मैं तुझे यह गोपनीय बात बता रहा हूँ।”

गुरु ने अपने श्रीमुख से कहाः “देह की आकृति से मैं लेता-देता, कहता सुनता दिखता हूँ, इतना मैं नहीं हूँ। तू देह में बँधा है, इसलिए देह में रहकर तुझे जगाना होता है।”

श्रीमद् राजचंद्र ने ठीक कहा हैः

देह छतां जेनी दशा वर्ते देहातीत।

ते ज्ञानीना चरणमां हो वंदन अगणीत।।

“हे वत्स ! तू देह को ʹमैंʹ मत मानना। यह देह तो प्रतीति मात्र है। तू अपने स्वरूप की प्राप्ति करने आया है। जब तक तू लक्ष्य को नहीं पायेगा, मैं तेरा पीछा नहीं छोड़ूँगा। मेरे दिल में तेरे कल्याण के सिवाय और कुछ नहीं है। हे साधक ! कई बार तू गलती करता है, फिर प्रायश्चित करता है, रोता है, पुकारता है। कई बार मेरे से दूर होकर विकारों में जाता है, लेकिन मैं तेरे से दूर नहीं हो सकता हूँ। मैं तेरी कमजोरियाँ जानता हूँ। तेरी मनमानियाँ भी जानता हूँ। संसार में तू संभल-संभलकर कदम रखना। तू कहीं भी रहे लेकिन मुझमें रहना। जैसे श्रीकृष्ण और उद्धव का मिलन हुआ था, जैसे श्रीकृष्ण और अर्जुन का मिलन हुआ था, जैसे अष्टावक्र और जनक का मिलन हुआ था वैसे ही तेरा और मेरा मिलन हो जाये, साक्षात्कार हो जाये, यही उद्देश्य बनाय रखना। हे साधक ! तेरा और मेरा बाहर का मिलन हो, ऐसा मिलन नहीं। तू अपने को देह मानता है। देह तो आती जाती है और तू मुझे भी आता-जाता मानता है।

बाहर के ये संबंध तो मिटने वाले हैं लेकिन हे वत्स ! तेरा और मेरा संबंध अमिट है। आत्मा और परमात्मा का संबंध, भगवान और भक्त का संबंध तथा गुरु और शिष्य का संबंध सत्य है, अमिट है। जितना तू सत्य में ठहरता जायेगा, उतना ही तू मुझसे एक होता जायेगा।”

गुरु ने अपने सिद्धावस्था के अनुभव सुनने की इच्छा शिष्य में देखी तब अपने दृष्टिपात में, अपनी नूरानी निगाहों से स्नान कराके अपने शिष्य को कहाः

“हे वत्स ! कई बार तूने मुझे श्रद्धा-भक्ति से निहारा है। मैं भी तुझ पर आत्मप्रेम न्यौछावर किया है।”

शिष्य ने गुरुदेव से कहाः “गुरुदेव ! आपका प्रेम माँ की तरह ममता से पूर्ण और उऩ्मुख करने वाला है। संसारियों के प्रेम से आपका प्रेम निराला है, बेजोड़ है। प्रभु ! मैं बार-बार इन मलिन हाथों से आपके प्रेम को बिखेरता जाता हूँ, फिर भी आप नाराज नहीं होते हो। कभी नाराज हुए दिखते हो तो भी हमें बचाने के लिए संकेत करते हो।”

शिष्य की योग्यता का परिचय पाकर गुरु ने दोहरायाः “पुत्र कुपुत्र हो सकता है किन्तु माता कभी कुमाता नहीं होती।

वत्स ! तुम जहाँ भी जाओगे, वहाँ तुम्हें कई प्रलोभन मिलेंगे। तुम्हारी और हमारी प्रेमसगाई में विघ्न डालने  वाले कई लोग होंगे, कई बाधाएँ आयेंगी। उन बाधाओं को चीरते-चीरते तुम उस प्रेमास्पद की प्रेमभरी यादों में सराबोर रहना। वत्स ! प्रेम की पराकाष्ठा ही परमात्मा का साक्षात्कार है। तू अपने परमात्मपद को संभालना। कभी तुझे मान-बड़ाई घेर लेंगे और कभी तू विकारों में गिरेगा। यदि तू विकारों से सफलतापूर्वक बच निकला तो तुझे पुजवाने की इच्छा होगी और तेरी वह इच्छा बनी रहेगी तो मुझे उससे दुःख होगा कि तू पूज्यपद में पहुँचे बिना ही पुजवाने की इच्छा करता है। पुजवाने की इच्छा परमपद में पहुँचने में बाधक है। वत्स ! जब तक तू पूज्यपद में नहीं ठहरा तब तक मेरा प्रयत्न बंद नहीं होगा, मुझे चैन नहीं मिलेगा। मेरे चैन के खातिर साधना करते रहना, श्रद्धा-भक्ति बढ़ाते रहना। साधना छोड़ना मत। साधना छोड़ेगा तो विकार और अहंकार तुझे धोखा देंगे। तू मेरे हाथों की कठपुतली बनकर रहना। तू गुरु के दैवी कार्यों में लगे रहना, ताकि विकारी कार्य तुझे बरबाद न करें। तू मेरे प्रेम-दरवाजे पर खड़े रहना, ताकि काम का दरवाजा तेरे लिए आकर्षक न बने। तू राम के दरवाजे पर ही डटे रहना क्योंकि,

जहाँ राम तहँ नहीं काम। जहाँ काम तहँ नहीं राम।।

जब-जब तुझे काम सताये तब-तब तू अपने राम को पुकारना। उस स्थान को तुरंत छोड़ देना। वत्स ! मैं तेरी कमजोरियाँ जानता हूँ। तेरी संभावना भी जानता हूँ। तेरे अंदर छिपा हुआ देवत्व मुझे प्रतीत हो रहा है। मैं तेरी पुरानी निर्बलता भी जानता हूँ और जब तेरी पुरानी आदतों की ओर देखता हूँ तो मुझे नहीं होता कि तुझे विकारों में गिराने वाली परिस्थितियों में, संसार की अग्नि में जाने की इजाजत दूँ। लेकिन तेरी प्रेमाभक्ति पर, तेरी साधना पर मुझे भरोसा है। मैं हिम्मत करता हूँ कि तू श्रद्धा बनाये रखेगा, तू साधना करता रहेगा। तू मुझसे विश्वासघात नहीं करेगा, मेरे रत्नों को नाली में नहीं डाल देगा। तुझ पर मुझे विश्वास है। इसलिए मैं तुझे संसार में जाने की इजाजत देता हूँ।

संसार में तू जाये तो संभल-संभलकर कदम रखना। संसार में उत्साह से कर्त्तव्यपालन करना। संसार का कार्य उत्साह से करना लेकिन परिणाम की चिन्ता मत करना। यदि परिणाम चाहे भी तो शाश्वत चाहना और शाश्वत परिणाम आत्म-साक्षात्कार ही है। तू अहंकार, वासना या काम की कठपुतली होकर कार्य नहीं करना, राम की कठपुतली होकर कार्य करना। तभी तू राम में विश्रांति पायेगा। जितना तू राम में विश्रांति पायेगा उतना ही मेरा चित्त प्रसन्न होगा। जब-जब विकारों का सामना हो, तब सावधान रहना। तू फिसल जाये यह दुःख की बात है, पर निराशा की बात नहीं है। तू फिर-फिर से खड़ा होना। मैं फिर से तेरा हाथ पकड़ूँगा। तू डरना मत। मेरा विशाल प्यार तेरे साथ है। तू मुझे इतना प्यार करता है, तो मैं कंजूस क्यों बनूँगा ? तू अपने ʹमैंʹ को मिटाता है तो हे वत्स ! मैं अपने-आप को दे डालने का इन्तजाम करता हूँ।

मैं अपने और गुरुदेव के बीच की बातें तो कह ही देता हूँ। मैं तेरे और मेरे बीच के अनुभव का इन्तजार करता हूँ। मेरे पास आने पर तुझे जो अनुभूतियाँ हुईं, उनमें रूकना मत, आगे ही चलते रहना। मैं तुझे जितना उन्नत देखना चाहता हूँ, उसके लिए तू प्रयत्न करना। तू प्यार और उत्साह बढ़ाकर प्रयत्न करते रहना। मैं तुझे समता के सिंहासन पर बिठाना चाहता हूँ। तेरे चित्त की दशा सुख-दुःख में, मान-अपमान में, शीत-उष्ण में सम रहे, यही मेरी आकांक्षा है।

वत्स ! तू ऐसा सोचना किः ʹमेरे ऐसे दिन कब आयेंगे कि मैं सुख-दुःख, मान-अपमान में सम रहूँगा ? ऐसे दिन कब आयेंगे कि गुरुदेव मुझे अपने-आपका दान दे डालेंगे ? ऐसे दिन कब आयेंगे कि गुरु और शिष्य की दूरी खत्म हो जायेगी ?ʹ

गुरु के अनुभव में शिष्य टिक जाये और शिष्य, शिष्य न रहे, पर गुरु बन जाये। वत्स, तू ऐसी ही तमन्ना करना। आत्मपद पाने का लक्ष्य बनाय रखना। अभी तो तू अज्ञान से घिरा है, प्रलोभन भी बहुत आयेंगे, नासमझ लोग तुझे समझाने आएँगे, पर तू बाहर की सहायता मत लेना। क्या परमात्मा की सहायता से तेरी तृप्ति नहीं होगी ? बाहर के व्यक्ति और बाहर के कार्यों के सहारे तू अपनी यात्रा खत्म मत करना। बाहरी सहारों में उलझ मत जाना। अंतरयात्रा को भूल मत जाना।

तुझे संसार में जाने की इजाजत तो देता हूँ, पर सावधान भी करता हूँ क्योंकि मैं तुझे प्यार करता हूँ। तू अपने को कभी अकेला मत समझना, कभी अनाथ नहीं समझना। दीक्षा के दिन से तेरा-मेरा मिलन हुआ है, तब से तू अकेला नहीं है। मैं सदा तेरे साथ हूँ। देह की दूरी चाहे दिखे, पर आत्मराज्य में दूरी की कोई गुंजाइश नहीं। आत्मराज्य में देश काल की कोई विघ्न-बाधाएँ आ नहीं सकती। तू आत्मराज्य में प्रवेश पाता जायेगा।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 1998, पृष्ठ संख्या 9-12, अंक 71

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