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गुरु का बंधन परम स्वतन्त्रता है – पूज्य बापू जी


गुरु और भगवान का बंधन, बंधन नहीं है, वह तो प्रेम से, धर्म से, स्वयं अपनी मर्जी से स्वीकारा गया ज्ञान-प्रकाशदायी अनुशासन है। विकारों के बंधन से छूटने के लिए शास्त्र, गुरु और भगवान के बंधन में रहना हजारों स्वतंत्रताओं से ज्यादा हितकारी है।
मैं गुरु के बंधन में रहा। दाढ़ी बाल तब छँटवाता जब गुरु जी की आज्ञा आती, ऐसा बंधन मैंने स्वयं स्वीकार क्या था। सत्य का बंधन स्वीकार किया, वह बाँधता नहीं मुक्त कर देता है। अगर गुरु जी की कृपा का बंधन मैं स्वीकार नहीं करता और उनकी आज्ञा का उल्लंघन कर देता तो मैं विकारों के बंधन में आ जाता लेकिन उनका आज्ञा का पालन किया तो करोड़ो लोगों की सेवा करने में गुरु महाराज मुझे सफल कर रहे हैं, निमित्त बना रहे हैं। यह प्रत्यक्ष है।
मैंने बंधन स्वीकार किया लेकिन बंधन रहा नहीं, हृदय में मुक्तात्मा गुरु प्रकट हो गये। तो गुरु की आज्ञा पालना यह बंधन नहीं है, सारे बंधनों से मुक्त करने वाला तोहफा है। गुरु की अधीनता को छोड़कर चल दिये तो वे स्वतंत्र नहीं हैं, महापराधीन हैं, मन व इन्द्रियों के विकारों के अधीन हो जाते हैं। जिन्हें सदगुरु मिले हैं वे परम स्वतंत्रता का राजमार्ग पा चुके हैं, उन्हें बधाई हो !
स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2015, पृष्ठ संख्या 26, अंक 266
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किसके जीवन का अंत कैसा ? – पूज्य बापू जी


‘खाया-पिया और मजे से जियेंगे, गुरु वरु कुछ नहीं है…..’, ऐसे लोगों को विषयी व्यक्तियों के जीवन का अंत कैसे होता है ? बोलेः अतृप्ति, असफलता, पाप के संग्रह में तथा दुःख, चिंता और निराशा की आग और अफसोस से समाप्त हो जाता है निगुरे लोगों का जीवन। और जिनको गुरुदीक्षा मिलती है उनका जीवन कैसा होता है ?
गुरुरेव परं ब्रह्म गुरुरेव परा गतिः।
गुरुरेव परा विद्या गुरुरेव परं धनम्।।
‘गुरु ही परम ब्रह्म हैं, गुरु ही परा गति हैं, गुरु ही परा विद्या हैं और गुरु को ही परम धन कहा गया है।’ (द्वयोपनिषद् 5)
गुरु ही सर्वोत्तम अविनाशी तत्त्व हैं, परम आश्रय-स्थल हैं तथा परम ज्ञान के उपदेष्टा हने के कारण गुरु महान होते हैं। और जो गुरु की शरण लेते हैं वे ‘अ-महान’ कैसे होंगे ? वे कीट-पतंग की योनि में क्यों जायेंगे ? वे हाथी-घोड़ा, चूहा-बिल्ला क्यों बनेंगे ?
राजा नृग गिरगिट बन गये। राजा अज बुद्धिमान थे लेकिन मरने के बाद साँप बन गये। अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन मानवतावादी थे, मैं उनको प्यार भी करता हूँ। उनकी प्रसिद्धि करने वाली संस्थाओं में मुझे ले गये, मैं देख के भी आया। लेकिन अभी वे बेचारे व्हाइट हाउस में प्रेत होकर घूम रहे हैं क्योंकि गुरु बिना का जीवन था। तो यह उपनिषद् की बात सार्थक व सच्ची नजर आती है।
वे लोग अकाल मर जाते हैं जो असंयमी हैं, अकाल विफल हो जाते हैं जो आवेशी होते हैं। वे अकारण ही तपते रहते हैं जो ईर्ष्यालू होते हैं। वे अकारण ही फिसलते रहते हैं जो अति लोभी होते हैं। वे अकारण ही उलझते रहते हैं जो तृष्णावान हैं। जो अशिष्ट और आलसी हैं, वे संसार से हारकर कई नीच योनियों को पाते हैं लेकिन जिनमें संयम है, शांति है, ईर्ष्या और लोभ का अभाव है, तृष्णा, निष्ठुरता, अशिष्टता और आलस्य का अभाव है, वे गुरु-तत्त्व के माधुर्य में, आनंद में और साक्षात्कार में सफल हो जाते हैं।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2015, पृष्ठ संख्या 26, अंक 266
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चार स्थान जहाँ सांसारिक बातें हैं वर्जित


चार जगहों पर सांसारिक बातें नहीं करनी चाहिए, केवल भगवत्स्मरण ही करना चाहिए। ये चार स्थान हैं- मंदिर, श्मशान, रोगी के पास, गुरु निवास
श्मशान में कभी गये तो ‘तुम्हारा क्या हाल है ? आजकल धंधा कैसा चल रहा है ? सरकार का ऐसा है….’ ऐसी इधर-उधर की बातें न करें वरन् अपने मन को समझायें कि ‘आज इसका शरीर आया, देर-सवेर यह शरीर भी ऐसे ही आयेगा। इसको मैं-मैं मत मान, जहाँ से मैं-मैं की शक्ति आती है वही मेरा है। प्रभु ! तू ही तू…. तू ही तू…. मैं तेरा, तू मेरा। अरे मन ! इधर-उधर की बातें मत कर। देख वह शव जल रहा है, कभी यह शरीर भी जल जायेगा।’ इस प्रकार मन को सीख दें।
अगर श्मशान में जाने को न मिले तो आश्रम द्वारा प्रकाशित ‘ईश्वर की ओर’ पुस्तक सभी बार-बार पढ़ें। उससे भी मन विवेक वैराग्य से सम्पन्न होने लगेगा।
रोगी से मिलने जाओ तब भी संसार की बातें नहीं करनी चाहिए। रोगी से मिलते समय उसको ढाढ़स बँधाओ। उसको कहोः ‘रोग तुम्हारे शरीर को है। शरीर तो कभी रोगी, कभी स्वस्थ होता है लेकिन तुम तो भगवान के सपूत, अमर आत्मा हो। एक दिन यह शरीर नहीं रहेगा फिर भी तुम रहोगे, तुम तो ऐसे हो।’ इस प्रकार रोगी में भगवदभाव की बातें भरें तो आपका रोगी से मिलना भी भगवान की भक्ति हो जायेगा। रोगी के अंदर बैठा हुआ परमात्मा आप पर संतुष्ट होगा और आपके दिल में बैठा हुआ वह रब भी आप पर संतुष्ट होगा।
अगर आप मंदिर या गुरु आश्रम में जाते हो तो वहाँ पर भी सांसारिक चर्चा न करो, इधर-उधर की बातें छोड़ दो। वहाँ तो ऐसे रहो कि एक दूसरे को पहचानते ही नहीं और पहचानते भी हो तो रब के नाते। अन्यथा भगवान और गुरु का नाता तो ठंडा हो जाता है और पहचान बढ़ जाती है कि ‘आप मेरे घर आइये, आप यह करिये – आप वह करिये, जरा ध्यान रखना, उसका लड़का ठीक है, अपने ही हैं…..’ मंदिर-आश्रम में जाकर भगवदभाव जगाना होता है, संसार को भूलना होता है। अगर वहाँ जाकर भी संसार की बातें करोगे तो मुक्ति कहाँ पाओगे ? दुःखों से विनिर्मुक्त कहाँ होओगे ? इसलिए मुक्ति के रास्ते को गंदा मत करो वरन् गंदे रास्तों को भी भगवद् भक्ति से सँवार लो।
अगर गुरु के निवास पर जाते हो, गुरु के निकट जाते हो तब भी सांसारिक बातों को महत्व न दो। गुरु को निर्दोष निगाहों से, प्रेमभरी निगाहों से, भगवदभाव की निगाहों से देखो और उन्हें संसार की छोटी-छोटी समस्या सुनाकर उनका दिव्य खजाना पाने से वंचित न रहो। उनके पास से तो वह चीज मिलती है जो करोड़ों जन्मों में करोड़ों माता-पिताओं से भी नहीं मिली। ऐसे गुरु मिले हैं तो फिर संसार के छोटे-मोटे खिलौनों की बातें नहीं करनी चाहिए।
इस प्रकार चार जगहों पर सांसारिक चर्चा से बचकर भगवच्चर्चा, भगवत्सुमिरन करें। मंदिर एवं संतद्वार पर जप-ध्यान करें तो आपके लिए मुक्ति का पथ प्रशस्त हो जायेगा।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2015, पृष्ठ संख्या 11, अंक 265
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