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महत्त्वपूर्ण छः बातें


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

कई लोग कहते हैं कि माला करते-करते नींद आने लगती है तो क्या करें ? सतत माला नहीं होती तो आप सेवा करें, सत्शास्त्र पढ़ें।  मन बहुआयामी है तो उसको बहुत प्रकार की युक्तियों से सम्भाल के चलाना चाहिए। कभी जप किया, कभी ध्यान किया, कभी स्मरण किया, कभी सेवा की इस प्रकार की सत्प्रवृत्तियों में मन को लगाये रखना चाहिए।

साधक यदि कुछ बातों को अपनाये तो साधना में बहुत जल्दी प्रगति कर सकता है।

पहली बात है – व्यर्थ की बातों में समय न गवाये। व्यर्थ की बातें करेंगे, सुनेंगे तो जगत की सत्यता दृढ़ होगी जिससे राग-द्वेष की वृद्धि होगी और राग-द्वेष से चित्त मलिन होगा। अतः राग-द्वेष से प्रेरित होकर कर्म न करें।

सेवाकार्य तो करें लेकिन राग-द्वेष से प्रेरित होकर नहीं, अपितु दूसरे को मान देकर, दूसरे को विश्वास में लेकर सेवाकार्य करने से सेवा भी अच्छी तरह से होती है और साधक की योग्यता भी निखरती है। भगवान श्रीरामचन्द्रजी औरों को मान देते और आप अमानी रहते थे। राग-द्वेष में शक्ति का व्यय न हो इसकी सावधानी रखते थे।

दूसरी बात है – अपना उद्देश्य ऊँचा रखें। भगवान शंकर के श्वसुर दक्ष प्रजापति को देवता लोग तक नमस्कार करते थे। ऋषि-मुनि भी उनकी प्रशंसा करते थे। सब लोकपालों में वे वरिष्ठ थे। एक बार देवताओं की सभा में दक्ष प्रजापति के जाने पर अन्य देवों ने खड़े होकर उनका सम्मान किया लेकिन शिवजी उठकर खड़े नहीं हुए तो दक्ष को बुरा लग गया कि दामाद होने पर भी शिवजी ने उनका सम्मान क्यों नहीं किया ?

इस बात से नाराज हो शिवजी को नीचा दिखाने के लिए दक्ष प्रजापति ने यज्ञ करवाया। यज्ञ में अन्य सब देवताओं के लिए आसन रखे गये लेकिन शिवजी के लिए कोई आसन न रखा गया। यज्ञ करना तो बढ़िया है लेकिन यज्ञ का उद्देश्य शिवजी को नीचा दिखाने का था तो उस यज्ञ का ध्वंस हुआ एवं दक्ष प्रजापति की गरदन कटी। बाद में शिवजी की कृपा से बकरे की गरदन उनको लगाई गयी।

अतः अपना उद्देश्य सदैव ऊँचा रखें।

तीसरी बात है – जो कार्य करें उसे कुशलता से पूर्ण करें। ऐसा नहीं कि कोई विघ्न आया और काम छोड़ दिया। यह कायरता नहीं होनी चाहिए। योगः कर्मसु कौशलम्। यही वही है जो कर्म से कुशलता लाये।

चौथी बात है – कर्म तो करें लेकिन कर्त्तापने का गर्व न आये और लापरवाही से कर्म बिगड़े नहीं, इसकी सावधानी रखें। सबके भीतर बहुत सारी ईश्वरीय संपदा है। उस संपदा को पाने के लिए सावधान रहना चाहिए, सतर्क रहना चाहिए।

पाँचवीं बात है – जीवन में केवल ईश्वर को महत्त्व दें। सबमें कुछ न कुछ गुण-दोष होते ही हैं। ज्यों-ज्यों साधक संसार को महत्त्व देगा त्यों-त्यों दोष बढ़ते जायेंगे और ज्यों-ज्यों ईश्वर को महत्त्व देगा त्यों-त्यों सदगुण बढ़ते जायेंगे।

छठी बात है – साधक का व्यवहार पवित्र होना चाहिए, हृदय पवित्र होना चाहिए। लोगों के लिए उसका जीवन ही आदर्श बन जाये, ऐसा पवित्र उसका आचरण होना चाहिए।

इन छः बातों को अपने जीवन में अपनाकर साधक अपने लक्ष्य को पाने में अवश्य कामयाब हो सकता है। अतः लक्ष्य ऊँचा हो। मुख्य कार्य और अवान्तर कार्य भी उसके अनुरूप हों।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2002, पृष्ठ संख्या 10, अंक 110

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विवेक का चश्मा


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग प्रवचन से

सुनी है एक कथाः

एक ब्राह्मण यात्रा करते-करते किसी नगर से गुजरा। बड़े-बड़े महल एवं अट्टालिकाओं को देखकर ब्राह्मण भिक्षा माँगने गया किन्तु किसी ने भी उसे दो मुट्ठी अऩ्न नहीं दिया। आखिर दोपहर हो गयी। ब्राह्मण दुःखी होकर अपने भाग्य को कोसता हुआ जा रहा थाः “कैसा मेरा दुर्भाग्य है ! इतने बड़े नगर में मुझे खाने के लिए दो मुट्ठी अन्न तक न मिला ? टिक्कड़ बना कर खाने के लिए दो मुट्ठी आटा तक न मिला ?”

इतने में एक संत की निगाह उस पर पड़ी। उन्होंने ब्राह्मण की बड़बड़ाहट सुन ली। वे बड़े पहुँचे हुए संत थे। उन्होंने कहाः

“ब्राह्मण ! तुम मनुष्य से भिक्षा माँगो, पशु क्या जानें भिक्षा देना ?”

ब्राह्मण दंग रह गया और कहने लगाः “हे महात्मन् ! आप क्या कह रहे हैं ? बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में रहने वाले मनुष्यों से ही मैंने भिक्षा माँगी है।”

संतः “नहीं ब्राह्मण ! मनुष्य शरीर में दिखने वाले वे लोग भीतर से मनुष्य नहीं हैं। अभी भी वे पुराने संस्कारों में जी रहे हैं। कोई शेर के चोले से आया है तो कोई बघेरे के चोले से आया है, कोई हिरण के चोले से आया है तो कोई गाय या भैंस के चोले से आया है। उनकी आकृति मानव-शरीर की जरूर है किन्तु अभी तक उनमें मनुष्यत्व निखरा नहीं है और जब तक मनुष्यत्व नहीं निखरता, तब तक दूसरे मनुष्य की पीड़ा का पता नहीं चलता।…. ‘दूसरे में भी मेरा ही दिलबर ही है’ यह ज्ञान नहीं होता। तुमने मनुष्यों से नहीं, पशुओं से भिक्षा माँगी है।”

ब्राह्मण का चेहरा चुगली खा रहा था। ब्राह्मण का चेहरा इन्कार की खबरें दे रहा था। सिद्धपुरुष तो दूरदृष्टि के धनी होते हैं। उन्होंने कहाः “देख ब्राह्मण ! मैं तुझे यह चश्मा देता हूँ। इस चश्मे को पहन कर जा और कोई भी मनुष्य दिखे, उससे भिक्षा माँग। फिर देख, क्या होता है।”

ब्राह्मण जहाँ पहले गया था, वहीं पुनः गया। योगसिद्ध कला वाला चश्मा पहनकर गौर से देखाः ‘ओहोऽऽऽऽ…. वाकई कोई बिलार है तो कोई बघेरा है। आकृति तो मनुष्य की है लेकिन संस्कार पशुओं के हैं। मनुष्य होने पर भी मनुष्यत्व के संस्कार नहीं हैं।’ घूमते-घूमते वह ब्राह्मण थोड़ा सा आगे गया तो देखा कि एक मोची जूते सिल रहा है। ब्राह्मण ने उसे गौर से देखा तो उसमें मनुष्यत्व का निखार पाया।

ब्राह्मण ने उसके पास जाकर कहाः “भाई ! तेरा धंधा तो बहुत हल्का है औऱ मैं हूँ ब्राह्मण। रीति रिवाज एवं कर्मकाण्ड को बड़ी चुस्ती से पालता हूँ। मुझे बड़ी भूख लगी है लेकिन तेरे हाथ का नहीं खाऊँगा। फिर भी मैं तुझसे माँगता हूँ क्योंकि मुझे तुझमें मनुष्यत्व दिखा है।”

उस मोची की आँखों से टप-टप आँसू बरसने लगे। वह बोलाः “हे प्रभु ! आप भूखे हैं ? हे मेरे रब ! आप भूखे हैं ? इतनी देर आप कहाँ थे ?”

यह कहकर मोची उठा एवं जूते सिलकर टका, आना-दो आना वगैरह जो इकट्ठे किये थे, उस चिल्लर (रेज़गारी) को लेकर हलवाई की दुकान पर पहुँचा और बोलाः “हे हलवाई ! मेरे इन भूखे भगवान की सेवा कर लो। ये चिल्लर यहाँ रखता हूँ। जो कुछ भी सब्जी-पराँठे-पूरी आदि दे सकते हो, वह इन्हें दे दो। मैं अभी जाता हूँ।”

यह कहकर मोची भागा। घर जाकर अपने हाथ से बनाई हुई एक जोड़ी जूती ले आया एवं चौराहे पर उसे बेचने के लिए खड़ा हो गया।

उस राज्य का राजा जूतियों का बड़ा शौकीन था। उस दिन भी उसने कई तरह की जूतियाँ पहनीं किंतु किसी की बनावट उसे पसंद नहीं आयी तो किसी का नाप नहीं आया। दो-पाँच बार प्रयत्न करने पर भी राजा को कोई पसंद नहीं आयी तो मंत्री से क्रुद्ध होकर बोलाः “अगर इस बार ढंग की जूती लाया तो जूती वाले को इनाम दूँगा और ठीक नहीं लाया तो मंत्री के बच्चे ! तेरी खबर ले लूँगा।”

दैवयोग से मंत्री की नज़र इस मोची के रूप में खड़े असली मानव पर पड़ गयी, जिसमें मानवता खिली थी, जिसकी आँखों में कुछ प्रेम के भाव थे, चित्त में दया-करूणा थी, गुरुओं के संग का थोड़ा रंग लगा था। मंत्री ने मोची से जूती ले ली एवं राजा के पास ले गया। राजा को वह जूती एकदम ‘फिट’ आ गयी, मानो वह जूती राजा के नाप की ही बनी थी। राजा ने कहाः “ऐसी जूती तो मैंने पहली बार ही पहन रहा हूँ। किस मोची ने बनाई है यह जूती ?”

मंत्री बोला ! “हुजूर ! यह मोची बाहर ही खड़ा है।”

मोची को बुलाया गया। उसको देखकर राजा की भी मानवता थोड़ी खिली। राजा ने कहाः “जूती के तो पाँच रूपये होते हैं किन्तु यह पाँच रूपयों वाली नहीं, पाँच सौ रूपयों वाली जूती है। जूती बनाने वाले को पाँच सौ और जूती के पाँच सौ, कुल एक हजार रूपये इसको दे दो।”

मोची बोलाः “राजा साहिब ! तनिक ठहरिये। यह जूती मेरी नहीं है, जिसकी है उसे मैं अभी ले आता हूँ।”

मोची जाकर विनयपूर्वक ब्राह्मण को राजा के पास ले आया एवं राजा से बोलाः “राजा साहब ! यह जूती इन्हीं की है।”

राजा को आश्चर्य हुआ ! वह बोलाः “यह तो ब्राह्मण है ! इसकी जूती कैसे ?”

राजा ने ब्राह्मण से पूछा तो ब्राह्मण ने कहाः “मैं तो ब्राह्मण हूँ। यात्रा करने निकला हूँ।”

राजाः “मोची ! जूती तो तुम बेच रहे थे। इस ब्राह्मण ने जूती कब खरीदी और बेची ?”

मोची ने कहाः “राजन् ! मैंने मन में ही संकल्प कर लिया था कि जूती की जो रकम आयेगी वह इन ब्राह्मणदेव की होगी। जब रकम इनकी है तो मैं इन रूपयों को कैसे ले सकता हूँ ? इसीलिए मैं इन्हें ले आया हूँ। न जाने किसी जन्म में मैंने दान करने का संकल्प किया होगा और मुकर गया होऊँगा, तभी तो यह मोची का चोला मिला है। अब भी यदि मुकर जाऊँ तो तो न जाने मेरी कैसी दुर्गति हो ? इसीलिए राजन् ! ये रूपये मेरे नहीं हुए। मेरे मन में आ गया था कि इस जूती की रकम इनके लिए होगी। फिर पाँच रूपये मिलते तो भी इनके होते और एक हजार मिल रहे हैं तो भी इनके ही हैं। हो सकता है मेरा मन बेईमान हो जाता। इसीलिए मैंने रूपयों को नहीं छुआ और असली अधिकारी को ले आया।”

राजा ने आश्चर्य चकित होकर ब्राह्मण से पूछाः “ब्राह्मण ! मोची से तुम्हारा परिचय कैसे हुआ ?”

ब्राह्मण ने सारी आप बीती सुनाते हुए सिद्ध पुरुष के चश्मे वाली बात बतायी एवं कहाः “राजन् ! आपके राज्य में पशुओं के दीदार तो बहुत हुए लेकिन मनुष्यत्व का विकास इस मोची में ही नज़र आया।”

राजा ने कौतूहलवश कहाः “लाओ, वह चश्मा। जरा हम भी देखें।”

राजा ने चश्मा लगाकर देखा तो दरबारी वगैरह में उसे भी कोई सियार दिखा तो कोई हिरण, कोई बंदर दिखा तो कोई रीछ। राजा दंग रह गया कि यह तो पशुओं का दरबार भरा पड़ा है ! उसे हुआ कि ये सब पशु हैं तो मैं कौन हूँ ? उसने आईना मँगवाया एवं उसमें अपना चेहरा देखा तो शेर ! उसके आश्चर्य की सीमा न रही ! ‘ ये सारे जंगल के प्राणी और मैं जंगल का राजा शेर ! यहाँ भी इनका राजा बना बैठा हूँ !’ राजा ने कहाः “ब्राह्मणदेव ! योगी महाराज का यह चश्मा तो बड़ा गज़ब का है ! वे योगी महाराज कहाँ होंगे ?”

ब्राह्मणः “वे तो कहीं चले गये। ऐसे महापुरुष कभी-कभी ही और बड़ी कठिनाई से मिलते हैं।”

श्रद्धावान ही ऐसे महापुरुषों से लाभ उठा पाते हैं, बाकी तो जो मनुष्य के चोले में पशु के समान हैं वे महापुरुष के निकट रहकर भी अपनी पशुता नहीं छोड़ पाते।

ब्राह्मण ने आगे कहाः ‘राजन् ! अब तो बिना चश्मे के भी मनुष्यत्व को परखा जा सकता है। व्यक्ति के व्यवहार को देखकर ही पता चल सकता है कि वह किस योनि से आया है। एक मेहनत करे और दूसरा उस पर हक जताये तो समझ लो कि वह सर्पयोनि से आया है क्योंकि बिल खोदने की मेहनत तो चूहा करता है लेकिन सर्प उसको मारकर बल पर अपना अधिकार जमा बैठता है।”

अब इस चश्मे के बिना भी विवेक का चश्मा काम कर सकता है और दूसरे को देखें उसकी अपेक्षा स्वयं को ही देखें कि हम सर्पयोनि से आये हैं कि शेर की योनि से आये हैं या सचमुच में हममें मनुष्यता खिली है ? यदि पशुता बाकी है तो वह भी मनुष्यता में बदल सकती है। कैसे ?

तुलसीदाज जी ने कहा हैः

बिगड़ी जनम अनेक की सुधरे अब और आजु।

तुलसी होई राम को रामभजि तजि कुसमाजु।।

कुसंस्कारों को छोड़ दें… बस। अपने कुसंस्कार आप निकालेंगे तो ही निकलेंगे। अपने भीतर छिपे हुए पशुत्व को आप निकालेंगे तो ही निकलेगा। यह भी तब संभव होगा, जब आप अपने समय की कीमत समझेंगे। मनुष्यत्व आये तो एक-एक पल को सार्थक किये बिना आप चुप नहीं बैठेंगे। पशु अपना समय ऐसे ही गँवाता है। पशुत्व के संस्कार पड़े रहेंगे तो आपका समय बिगड़ेगा। अतः पशुत्व के संस्कारों को आप निकालिये एवं मनुष्यत्व के संस्कारों को उभारिये। फिर सिद्धपुरुष का चश्मा नहीं, वरन् अपने विवेक का चश्मा ही कार्य करेगा और इस विवेक के चश्मे को पाने की युक्ति मिलती है सत्संग से।

मानवता से जो पूर्ण हो, वही मनुष्य कहलाता।

बिन मानवता के मानव भी, पशुतुल्य रह  जाता।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2002, पृष्ठ संख्या 18-20, अंक 109

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तीव्र विवेक


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

विवेक किसको बोलते हैं ?

दो चीजें मिल गयी हों, मिश्रित हो गयी हों उनको अलग करने की कला का नाम है विवेक। परमात्मा चेतन है, जगत जड़ है और दोनों के मिश्रण से सृष्टि चलती है। सृष्टि में सुख-दुःख, लाभ-हानि, अच्छा-बुरा, जीवन-मरण ये सब मिश्रित हो गया है। उसमें से सार-असार को, नित्य-अनित्य को, जड़ और चेतन को पृथक समझने की कला है विवेक।

जगत में जितने भी दुःख हैं, क्लेश हैं, अनर्थ हैं सबके मूल में है विवेक की कमी। विवेक की कमी के कारण ही हम जो हैं उसका हमको पता नहीं है और जो हम नहीं हैं उसको (देह को) हम ‘मैं’ मान बैठे हैं।

सत् क्या है – असत् क्या है ? शाश्वत क्या है – नश्वर क्या है ? नित्य क्या है – अनित्य क्या है ? इसका अगर विवेक हो जाये तो नश्वर का नश्वर समझने से दुःख नहीं होगा और शाश्वत को शाश्वत मानने से उसे पाये बिना मन नहीं मानेगा।

जैसे, मिट्टी का घड़ा। कच्चे घड़े में यदि पानी डालो तो वह पानी में पिघल जाता है लेकिन उस घड़े को आग में बराबर पकाओ तो वह पक्का घड़ा पानी की गर्मी आदि दोषों को हर लेता है और पानी को भी अमृतसम शीतल बना देता है। ऐसे ही सत्संग के द्वारा विवेक को जागृत किया जाता है। फिर ध्यानादि करके विवेक को परिपक्व किया जाता है। विवेक परिपक्व होने से संसार का व्यवहार भी शीतल हो जाता है, दोषों को हरने वाला हो जाता है और दूसरों को भी सुख से, शीतलता से भरने वाला हो जाता है।

कच्चा घड़ा पानी को नहीं थाम सकता। घड़ा अग्नि में परिपक्व होता है तभी वह पानी को थाम सकता है। ऐसे ही परब्रह्म परमात्मा के आनंद को, रस को, माधुर्य को वही थाम सकता है जिसका चित्त योगाग्नि में परिपक्व हुआ है।

सुना तो हैः ‘परमात्मा अपना आत्मा है… संसार स्वप्न है… सब मरते हैं… दुःखी होने की कोई जरूरत नहीं है…’ फिर भी दुःखी हो रहे हैं, चिंता कर रहे हैं। क्यों ? क्योंकि चित्तरूपी घड़ा अभी ध्यानगोरूपी अग्नि में परिपक्व नहीं हुआ है। जब यह परिपक्व होगा तभी संसार का जल उसमें शीतल होगा अर्थात् दुःख नहीं देगा।

आप दुनिया में दो रोटी कमाकर, दो बच्चे-बच्ची पैदा करके, उनको पाल-पोसकर मर मिटने के लिए नहीं आये हो अपितु सत्य-असत्य का विवेक करके, मिथ्या और शाश्वत का विवेक करके, नित्य-अनित्य का विवेक करके मुक्ति पाने के लिए आये हो।

‘मैं कौन हूँ ? शरीर मेरा है तो मैं शरीर नहीं हूँ। मन मेरा है तो मन मैं नहीं हूँ। बुद्धि मेरी है तो मैं बुद्धि नहीं हूँ… आखिर मैं कौन हूँ ?’ इसका विवेक करके अपने-आपको पाकर उसमें विश्रांति पाने के लिये आये हो।

विवेक से अपने स्वरूप का बोध मिल जाय और आप उसमें टिक जायें तो  परिपक्व स्थिति आ जायेगी। परिपक्व स्थिति आने से आपका संसाररूपी सर्प मारने योग्य अथवा जहर फूँकने योग्य नहीं होगा लेकिन संसाररूपी सर्प का व्यवहार भी आदर्श हो जायेगा, सुखदायी हो जायेगा। अपने लिए और दूसरों के लिए प्रेम देने  वाला हो जायेगा, माधुर्य निखारने  वाला हो जायेगा।

विवेक तीर्व होगा तो तुच्छ चीजों में राग करके फँसने का अवसर नहीं आयेगा वरन् वैराग्य आयेगा कि ‘इतना भोगा….. आखिर कब तक ? ऐसे बन गये…. फिर क्या?’

हम दिन रात विवेक को ढाँककर ही काम कर रहे हैं। इसलिए कर –करके मर जाते हैं फिर भी कर्तव्य का अंत नहीं होता है। पा-पाकर मर जाते हैं फिर भी पाने की वासना का अंत  नहीं होता है, जान-जानकर थक जाते हैं फिर भी जानकारी का अंत नहीं होता।

राजगृह में धन्यकुमार सुभद्रा आदि रानियों के साथ बात कर रहे थे। रानी सुभद्रा ने कहाः “मेरा भाई अब संन्यासी हो जायेगा। आचार्य धर्मघोष का प्रवचन सुनता है और प्रतिदिन एक-एक रानी से मिलता है और बोलता है कि अब मैं सदा के लिए साधु हो जाऊँगा। ऐसा करके वह 15 रानियों का त्याग कर चुका है। कुल 32 रानियाँ हैं। उसके बाद मेरा भाई संन्यासी हो जायेगा।”

धन्यकुमारः “तेरा भाई क्या साधु होगा, खाक ?”

सुभद्रा बोलीः “वह ऐसे ही थोड़ी रानियों को छोड़ रहा है ?”

धन्यकुमारः “ऐसे थोड़े ही साधु बनते हैं !”

सुभद्राः “तो कैसे बनते हैं ?”

धन्यकुमारः “ऐसे बनते हैं, देख। यह मैं साधु बना और चला। तुम्हारा भाई तो एक-एक रानी को छोड़ रहा है, अभी 17 बाकी हैं। मैं तो एक साथ मेरी आठों रानियों को छोड़ रहा हूँ।”

यह कहकर धन्यकुमार निकल पड़ा।

यदि दूरदर्शिता नहीं है, तीव्र विवेक नहीं है तो साधु होना मुश्किल है। जब तीव्र विवेक आता है तो एक झटके में ही सब छूट जाता है।

कई लोग बोलते हैं कि ‘धीरे-धीरे छोड़ूँगा… देखूँगा…. प्रयत्न करूँगा….’ तो उनके लिए छोड़ना मुश्किल हो जाता है। जो एक ही झटके में छोड़ देते हैं वे ही छोड़ पाते हैं। ‘धीरे-धीरे भजन करेंगे… संसार में रहकर भजन करेंगे…’ तो करते रहो भजन और संसार भी भोगते रहो। फिर हो गया भजन !

विवेक होता है तो तीर लग जाता है, बात चुभ जाती है और मनुष्य लग पड़ता है।

विवेक तीव्र होने पर तो दो शब्द सुनकर भई व्यक्ति लग जाता हैः ‘कुछ भी हो जाय, ईश्वर को पाना ही है… समय नहीं गँवाना है।’

आवारा मन होता है वही फालतू बातें करता है, फालतू तर्क देता है, फालतू सुख-सुविधाएँ खोजता रहता है। जिनको लगन लगी है वे तो बस, ईश्वर की ही बातें सुनेंगे, ईश्वर का ही ध्यान करेंगे, ईश्वर के लिए ही सत्शास्त्र पढ़ेंगे अथवा ईश्वर के लिए ही सेवाकार्य करेंगे। विवेक नहीं है तो सुविधाएँ होते हुए भी व्यक्ति का मन भजन में नहीं लगता। जिनको तीव्र पुण्यमय विवेक होता है वे सुविधा हो तब भी और सुविधा न हो तब भी अपना काम बना लेते हैं। बस, विवेक होना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2002, पृष्ठ संख्या 8,9 अंक 109

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