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सच्ची शांति के अधिकारी


परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू

हमारा अधिकांश समय कुछ पाने, उसे संभालने और ʹवह नष्ट न हो जायʹ इसकी चिन्ता और मेहनत में ही नष्ट हो जाता है जबकि वास्तविकता तो यह है कि इस क्षणभंगुर मृत्युलोक में ऐसी कोई भी वस्तु और संबंध नहीं है जो सदा बना रहे। हम जो पाना चाहते हैं वह नश्वर है। हम जिसे संभालना चाहते हैं, वह पल-प्रतिपल नष्ट होता है जा रहा है लेकिन विवेक के अभाव में हम अपना अमूल्य मानव देह और समय व्यर्थ गँवा देते हैं और आखिरकार कुछ भी हाथ नहीं लगता। एक परमात्मा के शाश्वत संबंध को छोड़कर कोई भी संबंध सदा नहीं रहता। लेकिन अभागी इच्छा-वासनाओं ने हमें कभी सच्ची शांति का अधिकारी नहीं बनने दिया।

बुद्ध एक विशाल मठ में पाँच मास तक ठहरे हुए थे। गाँव के लोग शाम के समय सत्संग सुनने आते और सत्संग पूरा होता तो लोग बुद्ध के समीप आ जाते और उनके समक्ष अपनी समस्याएँ रखते। किसी को बेटा चाहिए तो किसी को धन्धा चाहिए, किसी को रोग का इलाज चाहिए तो किसी को शत्रु का उपाय चाहिए।

एक बार भिक्षु आनंद ने पूछाः

“भगवन् ! यहाँ श्रीमान लोग भी आते हैं, मध्यम वर्ग के लोग भी आते हैं और छोटे-छोटे लोग भी आते हैं। सब दुःखी ही दुःखी। इनमें कोई सुखी होगा क्या ?”

बुद्धः “हाँ, एक आदमी सुखी है।”

आनंदः “बताइये, कौन है वह ?”

बुद्धः “जो आकर पीछे चुपचाप बैठ जाता है और शान्ति से सुनकर चला जाता है। कल भी आयेगा। उसकी ओर संकेत करके बता दूँगा।”

दूसरे दिन बुद्ध ने इशारे से बताया। आनंद विस्मित होकर बोलाः “भन्ते ! यह तो मजदूर है। कपड़े का ठिकाना नहीं और झोंपड़ी में रहता है। यह सुखी कैसे ?”

बुद्धः “आनन्द ! अब तू ही देख लेना।”

बुद्ध ने सब लोगों से पूछा कि आपको क्या चाहिए ? सभी ने अपनी-अपनी चाह बतायी। किसी को धन, किसी को सत्ता तो किसी को सौन्दर्य चाहिए था। जिसके पास धन था, उसको शांति चाहिए। सभी किसी-न-किसी परेशानी में ग्रस्त थे। आखिर में उस मजदूर को बुलाकर पूछा गयाः “तेरे को क्या चाहिए ? क्या होना है तुझे ?”

मजदूर प्रणाम करते हुए बोलाः “प्रभो ! मुझे कुछ चाहिए भी नहीं और कुछ होना भी नहीं है। जो है, जैसा है, प्रारब्ध बीत रहा है। धन में या धन के त्याग में, वस्त्र और आभूषणों में सुख नहीं है। सुख तो है समता के सिंहासन पर और हे भन्ते ! वह आपकी कृपा से मुझे प्राप्त हो रहा है।”

ʹमुझे यह पाना है…. यह करना है…. यह बनना है….ʹ ऐसी खटपट जिसकी दूर हो गई हो वह अपने राम में आराम पा लेता है। वह सच्ची शांति का अधिकारी हो जाता है। आज आरोग्यता पा लेना दुर्लभ नहीं, सत्ता पा लेना दुर्लभ नहीं, साम्राज्य पा लेना दुर्लभ नहीं। दुर्लभ तो वे हैं जो कुछ पाकर सुखी होने की हमारी मान्यताएँ छुड़ाकर सत् का बोध करा दें, सच्ची शांति का अधिकारी बना दें। ऐसे ब्रह्मज्ञानी महापुरुष दुर्लभ हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 1997, पृष्ठ संख्या 31,32, अंक 55

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सच्चे सुख की खोज


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

कबीर जी ने कहा हैः

भटक मूँआ भेदू बिना पावे कौन उपाय।

खोजत-खोजत जुग गये पाव कोस घर आय।।

आत्मतत्त्व के रहस्य को जानने वाले भेदू पुरुषों के सान्निध्य बिना जीव बेचारा कितने ही जन्मों से विषय-विकार के सुख में, अहंकार के सुख में, भविष्य के सुख में, और स्वर्ग के सुख में उलझ-उलझकर भटक रहा है। फिर भी आज तक उसे कहीं भी वास्तविक सुख नहीं मिला और न ही वह स्थिर हो सका।

मनुष्यमात्र की माँग है आनंद, मुक्ति, नित्य सुख और अमरता की। मनुष्य धन-संपत्ति क्यों इकट्टी करता है ?

सुख के लिए।

नौकरी क्यों करता है ?

सुख के लिए।

वह तन्दुरुस्ती क्यों चाहता है ?

सुख के लिए।

चोर चोरी क्यों करता है ?

सुख के लिए।

मनुष्य मंदिर में भगवान के दर्शन करने क्यों जाता है ?

सुख के लिए।

आप जो कुछ मत, पंथ, देवी-देवता, गुरु अथवा धन-वैभव, सामाजिक संबंध चाहते हो, मानते हो उसकी गहराई में भी सुख की ही इच्छा होती है। जीवमात्र की प्रत्येक प्रवृत्ति सुख के लिए होती है। किंतु फिर भी आज तक उसे सच्चा सुख नहीं मिला।

एक मियाँभाई मृत्युशैय्या पर पड़े थे। उन्होंने मुल्ला जी का बुलवाया और कहाः “यह दक्षिणा लीजिये और मेरे खुदा से दुआ माँगिये।ʹʹ फिर वह मियाँ भाई खुद आकाश की तरफ देखकर खुदा से दुआ माँगने लगा।

“हे खुदाताला ! मैं तुम्हारे कहने के मुताबिक कुछ न कर सका, मुझे माफ करना। मैं जैसा भी हूँ, तुम्हारा हूँ। मेरी रक्षा करना। मैं तुम्हारी शरण में हूँ।”

उसके बाद मियाँभाई ने दूसरी प्रार्थना शुरु कीः “हे शैतान ! मैं तुझसे दोस्ती भी न निभा सका। मुझे तू माफ करना। मैं जैसा भी हूँ, तेरी शरण में हूँ।”

मुल्लाजीः “यह क्या बकवास कर रहा है ?”

मियाँभाईः “मुल्लाजी ! आप दक्षिणा लेकर जाइये। मरना तो मुझे है। क्या पता मैं किसके हाथ में जाऊँगा ? खुदाताला के पास जाऊँगा कि शैतान के पास जाऊँगा इसकी मुझे खबर नहीं है, इसलिए मैं दोनों से प्रार्थना कर रहा हूँ।”

आज के मनुष्य की ऐसी दयनीय दशा है। मनुष्य को पता ही नहीं है कि मृत्यु के बाद भगवान की शरण जायेंगे या फिर से जन्म-मरण के चक्र में ही भटकेंगे क्योंकि साधना, संयम सदाचार द्वारा अनुभूति नहीं की है न ! यदि मनुष्य तत्परता से साधना करने लगे तो कुछ ही दिनों में उसे अनुभूति होने लगेगी। जिस प्रकार यदि टेलिफोन का नंबर घुमाना आए और कोड नंबर पता हो तो नन्हें से डिब्बे के द्वारा आप किसी भी राज्य या देश में संबंध स्थापित कर सकते हो परंतु यदि नंबर घुमाना ही न आता हो या सही नंबर पता ही न हो तो ? गलत नंबर लग जाता है।

आत्मज्ञानी महापुरुषों का मार्गदर्शन न मिलने पर आप दुन्यावी चीजों में से सुख पाने के लिए कितने ही भटको परंतु सच्चा सुख नहीं मिलेगा। आत्मज्ञानी महापुरुष के दर्शन और सत्संग द्वारा दृढ़ निश्चय करके साधन-भजन किया जाए तो सच्चे सुख की अनुभूति हो जाएगी। उधार धर्म नहीं…. ʹमौत के बाद स्वर्ग में जाएँगेʹ ऐसा नहीं परंतु यहीं बिस्त का बिस्त, स्वर्ग का स्वर्ग जो तुम्हारा अंतर्यामी आत्मदेव है, उसको जानकर परम सुख की अनुभूति करने की कला जान लो।

यह जेट युग है, बैलगाड़ी में बैठकर मुसाफिरी करने का जमाना नहीं है। जैसे पहले अपने दादा-परदादा बैलगाड़ी में जाते थे लेकिन अभी आपको शीघ्र पहुँचाए ऐसा साधन चाहिए क्योंकि समय कम है। ऐसे ही साधना में भी तीव्रता चाहिए और शीघ्र पहुँचा दे ऐसा साधन चाहिए।

संत महापुरुष के सान्निध्य से, सत्संग से जो भी साधना की विधि सीखने को मिले, उसका अभ्यास दृढ़तापूर्वक नियम से रोज चालू रखो। आपको साधन-भजन की जो चिनगारी मिले उसकी सुरक्षा करो। जैसे, खेत में बीज उगे हों लेकिन उनकी सुरक्षा न की जाये तो बीज मुरझा जाते हैं और यदि उनकी सुरक्षा की जाये तो थोड़े ही समय में वे पौधे होकर फलते हैं। वटवृक्ष के एक छोटे से बीज में से विशाल वटवृक्ष हो सकता है। ऐसे ही नियमित रूप से साधन-भजन किया जाये और उसकी सुरक्षा की जाये तो छः महीने में अनुभवरूपी मीठे फल भी चखने को मिल सकते हैं। लेकिन साधन-भजन करने में सातत्य होना चाहिए।

कई लोग दो दिन साधन-भजन करेंगे, नये-नये नौ दिन नियम से चलेंगे और फिर बीच में छोड़ देंगे अथवा तो दूसरा साधन पकड़ेंगे। इस प्रकार वर्षों बीत जाते हैं फिर भी बेचारे ठनठनपाल ही रह जाते हैं, सच्चे सुख से वंचित ही रह जाते हैं।

सुख सबकी माँग है। हाँ, तमोगुणी, रजोगुणी और सत्त्वगुणी जीवों को सुख प्राप्त करने का माध्यम जरूर अलग-अलग होता है। जैसे की तमोगुणी जीव तामसी आहार करके, किसी भी प्रकार के कर्म किये बिना ही आलस्य तथा प्रमाद में ही जीवन बिताते हैं, उनका सुख कीचड़ का सुख है। जैसे, गोबर का कीड़ा गोबर में ही सुख मानता है और नाली का कीड़ा नाली में ही सुख पाता है वैसे ही तामसी स्वभाव का मनुष्य तामसी व्यवहार में ही सुखबुद्धि करता है।

कई मनुष्य रजोगुणी स्वभाव के होते हैं। वे थोड़ी प्रवृत्ति करेंगे और देखेंगे कि यदि माल और वाहवाही होती होगी, तो कहेंगे कि ʹवाह ! मजा ही मजा है !ʹ यह रजोगुणी सुख है।

कुछ सात्त्विक मनुष्य होते हैं। वे ध्यान-भजन करते हैं, सेवा और परोपकार करते हैं, सदाचारी पवित्र जीवन बिताते हैं, संतदर्शन-सत्संग से उनका हृदय पुलकित होता है। इसे सात्त्विक सुख कहते हैं।

परंतु संतों और सत्शास्त्रों का कहना है कि सत्त्वगुणी मनुष्य को भी तब तक सच्चा, शाश्वत् सुख नहीं मिलता, जब तक वह गुणातीत न बने। संत महापुरुषों का सान्निध्य पाकर ऐसा आत्मानुभव प्राप्त कर लेना चाहिए कि फिर उनका अनुभव अपना अनुभव हो जाय। जब-जब वृत्ति अंतर्मुख करें तो संतत्त्व ही केवल शेष रहे।

दिले तस्वीरे है यार….

जबकि गरदन झुका ली और मुलाकात कर ली।

जब तक अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं होता। तब तक मन स्थिर नहीं होता।

स्वामी विवेकानन्द कहते थेः

“थोड़ी साधना करो परंतु उत्साह और सावधानी के साथ करो। शास्त्र और महापुरुषों की बात को मोक्षप्राप्ति के लिए सुनो, न कि सत्संग में गये और मजा लेकर आ गये।”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हैः

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।

परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्।।

“हे पार्थ ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यासरूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाशरूप दिव्य पुरुष को अर्थात् परमेश्वर को ही प्राप्त होता है।” भगवदगीताः 8.8

आपकी वृत्ति जिस-जिस वस्तु और व्यक्तियों में जाए उस-उस वस्तु और व्यक्ति में एक अनन्य परमात्मा ही विराजमान हैं – ऐसी दृढ़ता से छः महीने लगातार और सावधानी से अभ्यास किया जाय तो कल्याण हो जाता है।

अभ्यास करने वाले साधक को आहार विहार का ख्याल रखना चाहिए। अति बहिर्मुख, अति पामर, अति तामसी और अति राजसी लोगों का संपर्क नहीं करना चाहिए। असाधक या निगुरों के संपर्क से साधक की साधना क्षीण होती है जबकि साधकों का संपर्क साधक को मददरूप बनता है। इसलिए विरोधी वृत्ति के लोगों के साथ कदापि मेल नहीं रखना चाहिए। केवल ऐसे ही लोगों के साथ संग करना चाहिए जो आपकी नाईं आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हों, आपके जैसे ही विचार के हों, सदाचारी हों और सुशील हों। अन्य के साथ फालतू बैठना भी नहीं चाहिए क्योंकि कुसंग की लालच और उसका प्रभाव बहुत ही घातक होता है। इसीलिए कुसंगियों से सावधान रहकर अपनी साधना की रक्षा करनी चाहिए।

सावधानीपूर्वक आत्मज्ञान के नियमित अभ्यास से आत्मशांति और आत्मसुख की अनुभूति होने लगती है। प्रथम फायदा यह होगा कि आपका शरीर निरोग हो जायेगा। कर्कश वाणी मिटकर आपकी वाणी मधुर हो जायेगी। आपके संकल्प में अनुपम सामर्थ्य आ जायेगा। कुटिल स्वभाव दूर होकर मोह, मद, मत्सर आदि विकारों पर विजय मिल जायेगी। फिर विषय विकार आप पर हमला नहीं कर सकेंगे। जैसे एक बार आप जेबकतरे को पहचान लो फिर वह आप पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता। मान लो कि आप बस में जा रहे हो। आप जान गये हो कि जेबकतरा कौन है और आप अपनी जेव सँभालने में सावधानी भी रख रहे हो, फिर यदि जेबकतरे का हाथ आपकी जेब पर  पड़ता है तो आप तुरंत कहोगे किः “क्यों भाई साहब ! आपको पैसे चाहिए ?”

जेबकतरा अपने को बचाने के लिए गिड़गिड़ाते हुए बोलेगा किः “नहीं, नहीं, मैं तो मजाक करता था कि आपको पता चलता है कि नहीं। माफ करना, भैया !”

आप चोर पर नजर नहीं रखते हो इसलिए चोर चोरी कर जाता है। इसी प्रकार आप अपने मन पर सतर्क नजर रखने पर आप उस पर विजय पा सकते हो।

अतः मनुष्य जीवन का अंतिम ध्येय प्राप्त करने के लिए, महासत्य को पाने के लिए अत्यंत व्याकुलता का भाव प्रकट कर देना चाहिए। जिस प्रकार मकान को आग लगने के अवसर पर आलस्य-प्रमाद, निद्रा-तंद्रा, दिन-रात या ठंडी गर्मी का भी ख्याल नहीं रहता, ऐसे ही आंतरिक वैराग्य की अग्नि प्रज्वलित होने पर इन सब बातों में मनुष्य नहीं फँसता और सावधानी से लग जाता है। जन्म-जन्मांतरों के इकट्ठे हुए पाप-ताप और विरूद्ध संस्काररूपी इंधन को ज्ञानरूपी आग लगा दो जिससे वे भस्मीभूत हो जाएँ और अंतःकरण शुद्ध एवं निर्मल हो जाए तथा परम सुख, परम आनंद एवं परम शांति की झलकें आने लगे।

उठो…. जागो….कमर कसो… किसी संत महापुरुष की शरण में पहुँच जाओ…. और अभ्यास करके सच्चे सुख को पा लो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 1997, पृष्ठ संख्या 34,35,36,37,43 अंक 55

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चित्त की विश्रान्तिः प्रसाद की जननी


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

हर एक मनुष्य आनंद चाहता है, हर एक मनुष्य सुख चाहता है, हर एक मनुष्य मुक्ति चाहता है। कोई भी बंधन नहीं चाहता है।

मानवजात का एक समूह है। उसमें चार प्रकार के मनुष्य हैं। सब मनुष्य आनंद चाहते हैं, हृदय की शांति और शीतलता चाहते हैं। कोई ऐसा नहीं चाहता कि मेरा हृदय अशांत हो… मैं पापी होऊँ… मैं सुख से दूर चला जाऊँ। सब सुख की तरफ ही भाग रहे हैं। कई लोग सुख की तरफ इस तरह भागते हैं कि वहाँ सुख मिलता नहीं, दुःख ही दुःख मिलता है, मुसीबत ही मुसीबत मिलती है।

जैसे ऊँची गरदन होने से ऊँट अच्छा घास छोड़कर कँटीले वृक्षों के पत्तों को खाता है। काँटे मुँह में लगने से खून निकलता। ऊँट समझता है कि कितना मजेदार है ! उसे यह पता ही नहीं यह मजा अपने लिए सजा है।

ऐसे ही हम सुख चाहते हैं, हृदय की तृप्ति चाहते हैं लेकिन विषय-विकारों का कँटीला सुख चाहते हैं। शुरूआत में तो अच्छा लगता है किन्तु बाद में ऊँट जैसा हाल होता है। विषयों का सुख दाद की खुजली जैसा सुख है। उसे खुजलाते हैं तो मजा आता है लेकिन बाद में सत्यानाश कर देता है।

कुछ लोग जल्दी सुख लेने जाते हैं। जहाँ सुख है उस अंतरात्मा की तरफ नहीं जाते बल्कि सुख के बहाने सुख से दूर चले जाते हैं। परिणाम का विचार नहीं करते। ऐसा बोलने से, ऐसा करने से, ऐसा भोगने से क्या परिणाम आयेगा यह नहीं सोचते। उनको पामर कहते हैं।

दूसरे प्रकार के लोग होते हैं विषयी। कथा में जायेंगे, सत्संग सुनेंगे तो कहेंगे कि ʹमहाराजजी की बात तो ठीक है, ज्ञान तो अच्छा है लेकिन क्या करें यार ! संसार में रहते हैं…. जरा इतना कर लें फिर देखा जायेगा।ʹ इनको विषयी कहते हैं।

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो ज्ञान की बात सुनते हैं तो थोड़ा उधर चलते भी हैं। जो उत्तम जिज्ञासु हैं, बुद्धिमान हैं, वे तो बस, गलती को समझकर विषय-विकारों से अपने को बचाकर सच्चे सुख की तरफ चल पड़ते हैं। थोड़े ही दिनों में उनको भगवदसुख की प्राप्ति हो जाती है। वे अपने घर में आ जाते हैं। अपना घर क्या है ? चित्त की विश्रान्ति प्रसाद की जननी है। चित्त की विश्रान्ति प्रभुरस को प्रकट करने वाली कुँजी है। चित्त की विश्रान्ति से सामर्थ्य प्रकट होता है और सामर्थ्य का सदुपयोग करने से निर्भयता आती है।

जो कपट करके यश चाहते हैं या सामर्थ्य का दुरुपयोग करके सुखी होना चाहते हैं, उनका सामर्थ्य नष्ट होते ही हाल-बेहाल हो जाता है।

सामर्थ्य का सदुपयोग करो। अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताएँ कम करो। अपने व्यक्तिगत व्यापार का ज्यादा विस्तार मत करो।

जो सामर्थ्य मिला है उससे औरों की सेवा करके अपना कर्जा उतारो। संसार के सुख-भोग की इच्छा छोड़कर अपने लिए अंदर का सुख खोजो और बाहर से सुख की साधन-सामग्री का उपयोग औरों के लिये करो। यह सामर्थ्य का सदुपयोग हुआ। ऐसे ही बुद्धि का भी सदुपयोग करो, वस्तु का भी सदुपयोग करो और विचारों का भी सदुपयोग करो।

ध्यान-भजन करने बैठते हैं तो फालतू विचार बार-बार आयेंगे। उन फालतू विचारों के पीछे भगवान की भावना करो। भगवान अपना शुद्ध ज्ञान मनुष्यों को देते हैं। उसे लेकर उस भगवद्ज्ञान से अपने विचारों को भर दो।

मान लो, विचार पानी के आयें तो पानी की गहराई में प्रभु की चेतना है। जल के, थल के, तेज के, वायु के, आकाश के विचार आये तो उन जल, थल, तेज, वायु और आकाश-इन सबकी गहराई में प्रभु ! तू है…. ऐसे विचारों को भर दो। इस भावना से विचारों का सदुपयोग हो जायेगा। मनोराज्य की खटपट से बचकर मन विश्रान्ति की तरफ आयेगा।

भगवान की भाषा में कहें तो….

मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय।

मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।

ʹहे धनंजय ! मेरे सिवाय किंचिन्मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है, यह संपूर्ण जगत सूत्र के मणियों के सदृश मेरे में गूँथा हुआ है।ʹ भगवदगीताः 7-7

जैसे सूत की मणियों में सूत का धागा, सोने की मणियों में सोने का तार पिरोया जाता है, ऐसे ही सारा जगत भगवद चेतना में और भगवद चेतना सारे जगत में पिरोयी हुई है।

एक बार अखंडानंद सरस्वती साबरमती में गांधी जी का चित्र देखने गये थे। चित्र क्या था ? सूत का बना हुआ था। सब सूत ही सूत था, लेकिन ऐसी कला थी कि उसमें गाँधी जी दिख रहे थे। जब चश्मा भी सूत और गांधी जी की आँखें भी सूत। उनके हाथ में डंडा है वह भी सूत और उनकी चप्पल भी सूत। सूत में डिजाईन थी। सब सूत ही सूत था। ऐसे ही ब्रह्म में जो जगत की डिजाईन है वह सब ब्रह्म ही ब्रह्म है….ʹ ऐसा जो चिंतन करता है वह संयमी और पवित्र रहता है। उसका अंतःकरण जल्दी शुद्ध हो जाता है।

आप सृष्टि में मंगलमय देखने लग जाओ, चित्त जल्दी पवित्र होगा, शांत होगा। इस पर दोष, उस पर दोष…. इसके-उसके अवगुणों का चिंतन करोगे तो आपका मन दूषित होगा।

जो मंजिल चलते हैं वे शिकवा नहीं किया करते।

और जो शिकवा करते हैं वे मंजिल नहीं पहुँचा करते।।

फरियाद हटाकर तुम धन्यवाद दो। हर हाल में तुम उसकी करूणाकृपा को देखो। इससे तुम जल्दी कल्याण को प्राप्त होगे।

दंडकारण्य में भगवान श्रीराम, सीता जी और लक्ष्मण जी रहे थे। तब वहाँ के सिख्खड़ साधुओं ने सोचा कि अपन नाहक अनासक्त होकर, विरक्त होकर जंगलों में अकेले पड़े हैं। अपन भी शादी विवाह कर लेते और अपनी-अपनी सीता लाते तो अपन भी मजे से भजन करते। लखन कंदमूल ले आता और सीता जी सेवा कर देतीं, पैरचंपी करती और अपन आराम से भजन करते।

उनके मन में ये विचार कुछ दिनों तक तो रहे, लेकिन फिर जब रावण सीता जी को ले गया तो रामजी ʹहाय सीते ! हाय सीते ! सीते…. सीते…!ʹ करने लगे तब साधु बाबाओं ने कहाः “राम जैसे राम को भी रोना पड़ता है तो अपना क्या हाल होता भैया ? अपन तो ऐसे ही भले, ऐसे ही चंगे।”

भगवान का रामावतार मनुष्य को सीख देता है कि भगवान भी अगर आसक्ति करेंगे तो भगवान भी दुःखी होंगे फिर औरों की तो बात ही क्या ?

जब-जब भय, शोक, दुःख होता है तो आसक्ति से ही होता है, पक्कड़-अक्कड़ से ही होता है। मनुष्य अगर पक्कड़-अक्कड़ छोड़ दे तो दुःख और भय को जगह ही नहीं मिलेगी।

चित्त की विश्रान्ति से पक्कड़-अक्कड़ छूटती है। जो करना चाहिए और जो कर सकते हो उसे कर डालो और जो नहीं करना चाहिए और नहीं कर सकते। उसकी इच्छा छोड़ दो। उसे हृदय से निकाल दो। उससे चित्त की विश्रान्ति मिलती है।

तुमको जो करना चाहिए वह तुम कर डालोगे तो पिया को तुम्हारे लिए जो करना होगा, वह भी कर देगा, उसमें देर नहीं लगेगी।

तू मुझे उर आंगन दे दे। मैं अमृत की वर्षा कर दूँ।

तू तेरा अहं दे दे। मैं परमात्मा का रस भर दूँ।।

अगर  ऐसा कहें कि अहं तो नहीं देंगे, अहं तो हम अपने पास रखेंगे, लेकिन आप रस भर दो… तो भैया !

इश्क करना और जाँ बचाना, यह भी कभी हो सकता है क्या ?

जैसे सूत की मणि, सूत के धागे से पिरोयी हुई है, जैसे तरंग भिन्न-भिन्न दिखते हुए भी सब जल ही जल है, मिट्टी के बर्तन भिन्न-भिन्न दिखने पर भी सब मिट्टी ही मिट्टी है, शक्कर के खिलौने सब भिन्न-भिन्न होते हुए भी सब शक्कर ही शक्कर है, ऐसे ही व्यक्तियों के आकार (Model) भिन्न-भिन्न, उनके विचार भिन्न-भिन्न, उनके कर्म भिन्न-भिन्न, उनके स्वभाव भिन्न-भिन्न, लेकिन उन सबमें अभिन्न एक आत्मा ज्यों का त्यों है… ऐसा जो सुमिरन करता है उसको विश्रान्ति मिलती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 1997, पृष्ठ संख्या 21,22,23 अंक 55

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