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आपकी सबसे बड़ी कमजोरी


पूज्यपाद संत श्री आशारामजी बापू

आज के दौर में मनुष्य श्रद्धा रखने के पूर्व, श्रद्धावान बनने के पूर्व तर्क पहले रखता है। हर बात में अपनी बुद्धि की बुद्धिमानी दर्शाना चाहता है लेकिन ऐसी बुद्धिमानी किस काम की जो आपको बुद्धिदाता से ही दूर रखे ? यह भी कैसा संयोग है कि आप स्वयं को बुद्धिमान मानते हैं फिर भी दुःखी, चिन्तित, भयभीत और शोकातुर हैं। जब आप सचमुच बुद्धिमान हैं तो ये सारी परेशानियाँ क्यों ? कोई बुद्धिमान भी हो और अज्ञानवश दुःख भी उठाये यह कैसे संभव है ?

दरअसल, यह आपकी सबसे प्रमुख कमजोरी है कि आप अपने-आपको बुद्धिमान मानकर दुःख झेल रहे हैं। दुःखों की निवृत्ति के लिए सिर्फ आपका बुद्धिमान होना ही पर्याप्त नहीं है। आपके पास जो बुद्धि है उससे ज्ञानवानों के वचनों को समझने से, उन्हें जीवन में उतारने से, उनमें श्रद्धा रखने से ही सच्ची शांति मिलेगी। श्रद्धा के सामने कोई तर्क मायना नहीं रखता। कितने ही लोगों का यह सवाल होता है किः “हम ईश्वरपरायण नहीं हुए, सत्संग-सेवा का लाभ नहीं लिया तो क्या घाटा पड़ जाएगा ? करोड़ों लोगों की तरह हम भी ऐसे ही खायें, पियें और जियें तो क्या फर्क पड़ेगा ?”

इस तरह के सवाल  आपके मन-मस्तिष्क में विषयों, सुख-सुविधा और जगत के प्रति गहरे आकर्षण के प्रभाव को दर्शाते हैं। ईश्वरपरायण होने के पीछे भी आपका दगेबाज मन लाभ हानि खोजता है, यह कितने अफसोस की बात है ! सही है…. यदि आप ईश्वरपरायण नहीं हुए तो किसे क्या फर्क पड़ेगा ? न तो इससे ईश्वर आपसे नाराज होंगे और न ही आपको किसी दण्ड का भागीदार बनना पड़ेगा। मगर आपको जो कुछ सहना होगा, वह किसी दण्ड से कम नहीं होगा। ईश्वर को छोड़कर जगतपरायण होना ही समस्त दुःखों का घर है। ईश्वर का सहारा त्यागकर नश्वर संसार का सहारा लेना, यही तो दुःखों का मूल है। जहाँ अशान्ति है, वहाँ से शान्ति कैसे मिलेगी ?

ईश्वरपरायण होने का अर्थ है हृदय में परमात्मशांति का प्राकट्य। भैया ! ईश्वरपरायण नहीं होने के पीछे कारण यही है कि आप संसार की तपन में इतने झुलसे हैं कि आपको शांति के शीतल स्रोत में तपन शांत करने की उत्कंठा भी नहीं रही। आप उस स्रोत को ही भूल गये। यदि आप ईश्वरपरायण हैं तो संसार भी आपको सुखदायी लगेगा क्योंकि आप संसार में रहेंगे, संसार के संबंधों में उलझने के लिए नहीं वरन् जिससे सच्चा संबंध है उससे संबंध प्रगाढ़ करके सत्य स्वरूप की अनुभूति करने के लिए।

मगर धोखबाज मन आपको हमेशा तर्क-कुतर्क के सहारे उलझाये रखता है। ईश्वरपरायण न होने से विषयों का चिंतन होगा और विषयों का चिन्तन विष से भी अधिक खतरनाक है, हानिकारक है क्योंकि विषपान से मनुष्य एक बार मरता है परन्तु विषयों के चिन्तन से तो वह हर क्षण, हर पल, हर दिन मरता ही रहता है। विषयों के चिन्तन से कामना उठेगी और वह पूरी होगी तो आसक्ति होगी। कामना पूरी नहीं होगी तो क्रोध आयेगा। क्रोध होगा तो बुद्धि का नाश होगा। बुद्धि का नाश हुआ तो सर्वनाश हुआ। यह बुद्धि के नाश का ही तो परिणाम है कि जहाँ आपको श्रीहरि के सहारे उन्नत होना है वहाँ आप तर्क-कुतर्क लड़ाकर अशांति बढ़ाते रहते हैं। मन में अशान्ति से ही क्रोध होता है।

स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में यही बात कही हैः

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।

संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधाभिजायते।।

क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।

ʹविषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से अत्यन्त मूढ़भाव उत्पन्न हो जाता है। मूढ़भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है। स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है।ʹ भगवद् गीताः 2.62.63

जो भगवान का चिन्तन नहीं करेगा उसको संसार का चिन्तन होगा। संसार का चिन्तन क्या है ? राग-द्वेष की अग्नि, अहंकार का सर्जन, विषयों में गहरी प्रीति, जन्म-मृत्यु का लगातार जारी रहना। ब्रह्मचिन्तन करने वाला थोड़े ही जन्म-मृत्यु जरा व्याधि की चक्की में पिसता है ! जो आदमी विषय विकारों में फँसा रहता है उसकी बुद्धि दबी रहती है। ईश्वर को पीठ दिखाना ही पतन की शुरुआत है।

जिसने सत्संग और सेवा का लाभ नहीं लिया, इसका महत्त्व नहीं समझा वह सचमुच अभागा है। आत्मवेत्ताओं का सत्संग तो मनुष्य के उद्धार का सेतु है। सत्संग माने सत्यस्वरूप परमात्मा में विश्रान्ति। जिसके जीवन में सत्संग नहीं होगा, वह कुसंग तो जरूर करेगा और एक बार कुसंग मिल गया तो समझ लो तबाही ही तबाही, लेकिन अगर सत्संग मिल गया तो आपकी 21-21 पीढ़ियाँ निहाल हो जाएँगी। हजारों यज्ञों, तपों, दानों से भी आधी घड़ी का सत्संग श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि सदगुरु का सत्संग-सान्निध्य जीव को जीवपद से शिवपद में  आरूढ़ करता है। इतना ही नहीं, सत्संग से आपके जीवन को सही दिशा मिलती है, मन में शान्ति, बुद्धि में बुद्धिदाता का ज्ञान छलकता है।

सत्संग की आधी घड़ी, सुमिरन वर्ष पचास…..

आदमी कितना भी छोटा हो, कितना भी गरीब हो, कितना भी असहाय हो मगर उसे सत्संग मिल जाये तो वह इतना महान बन सकता है कि उसकी महिमा कोई नहीं बतला सकता। जो सुख, सत्ता मिलने से और जो भोग, स्वर्ग मिलने से भी नहीं मिलता, वह सत्संग से सहज ही प्राप्त हो जाता है। सत्संग से आत्मशान्ति, परमात्मसुख की प्राप्ति होती है। यह वह सत्संग है जो हमें राग-द्वेष की अग्नि से, अहंकार सजाने की आदत से, विषयों में आसक्ति से बचाकर अंततोगत्वा जन्म-मृत्यु के बंधन से भी विनिर्मुक्त कर नारायण पद में विश्रान्ति दिला देता है। तुलसीदास जी ने कहा हैः

एक घड़ी आधी घड़ी आधी में पुनि आध।

तुलसी संगत साध की हरे कोटि अपराध।।

जीवन में जितना-जितना सेवा का महत्त्व समझ में आयेगा उतना-उतना कल्याण होता जायेगा। विवेकानन्द कहा करते थेः “भगवान ने दरिद्रों को जन्म देकर तुम्हें सेवा का अवसर दिया है। उऩकी सेवा करके उन पर कोई एहसान नहीं करते हो।”

अंतःकरण की शुद्धि का, अहंकार से मुक्ति का सीधा सरल उपाय है कि आप निःस्वार्थभाव से सेवा में जुट जाइये। जो समझदार है व कहीं-न-कहीं से सेवा का अवसर ढूँढकर अपना काम बना लेते हैं।

आपने यदि सत्संग-सेवा का लाभ नहीं लिया तो कोई खास घाटा नहीं पड़ेगा। बस, सत्संग से वंचित रहे तो मनुष्य जन्म का महत्त्व नहीं समझ पायेंगे और सेवा से वंचित रहे तो जन्म-जन्मान्तर से आपके मन में ʹमेरे-तेरेʹ का जो मैल जमा है उसे कभी धो नहीं पायेंगे। आप  भी करोड़ों लोगों की तरह दुःखी, चिन्तित रहेंगे। सब कुछ होते हुए भी आप सुख के लिए हाथ फैलाते रहेंगे। जो मन में आया वह खाया-पिया, जैसे चाहा वैसे जिया तो जीवन मुसीबतों का घर बन जायेगा। आज यही तो हो रहा है। जीवन से श्रद्धा और संयम उठ गया तो मानव घोर अशान्त हो गया। जब तक संयम नहीं होगा, तब तक कष्ट सहना पड़ेगा।

इसलिए कृपानाथ ! ऐसे बेबुनियादी प्रश्नों, तर्कों-कुतर्कों में अपने मत को मत उलझाइये। यदि हजारों-लाखों लोग आज ईश्वरपरायण होकर, सत्संग-सेवा का महत्त्व समझकर, जीने का ढंग सीखकर अपने जीवन को सफल कर रहे हैं तो आप क्यों व्यर्थ को मान्यताओं में जकड़कर दुःखी, चिन्तित हैं ? आप भी उन महापुरुषों का परम प्रसाद पाकर अपने जीवन को महकाइये। हे प्रेमस्वरूप ! हे आनन्दस्वरूप ! हे सुखस्वरूप मानव ! सुख, प्रेम और आनंद के लिए अपने को क्यों बाहर भटका रहा है, झुलसा रहा है…. खपा रहा है…. तपा रहा है ? ठहर…. रूक जा। अपने आपको देखने की कला किन्हीं ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों से सीख ताकि पता चले कि तू कितना मधुर है… तु कितना प्यारा है… तू कितना सुखस्वरूप महान् आत्मा है….!

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1997, पृष्ठ संख्या 20,21,22 अंक 53

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धर्मात्मा की ही कसौटियाँ क्यों ?


पूज्यपाद संत श्री आशारामजी बापू

प्रायः भक्तों के जीवन में यह फरियाद बनी रहती है कि हम  भगवान की इतनी भक्ति करते हैं, रोज सत्संग करते हैं, निःस्वार्थ भाव से गरीबों की सेवा करते हैं, धर्म का यथोचित अनुष्ठान करते हैं ? आपका यह मानना-जानना सत्य है कि कसौटियाँ भक्तों की ही क्यों होती हैं ? आज हम इस विषय पर चर्चा करेंगे कि ʹक्योंʹ भक्तों का जीवन कसौटियों से भरा होता है।

बचपन में जब तुम स्कूल में दाखिल हुए थे तो ʹक…. ख….. ग….ʹ आदि का अक्षरज्ञान तुरन्त ही हो गया था कि विघ्न बाधाएँ आयी थीं ? लकीरें सीधी खींचते थे कि कलम टेढ़ी मेढ़ी हो जाती थी ? जब सायकल चलाना सीखा था तब भी तुम एकदम सीखे थे क्या ? नहीं। कई बार गिरे, कई बार उठे। चालनगाड़ी को पकड़ा, किसी की अंगुली पकड़ी तब चलने के काबिल बने और अब तो मेरे भैया ! तुम दौड़ में भाग ले सकते हो।

अब मेरा सवाल है कि जब तुम चलना सीखे तो विघ्न क्यों आये ? क्यों स्कूल में परीक्षा के बहाने कसौटियाँ होती थीं ? तुम्हारा जवाब होगा किः ʹबापू जी ! हम कमजोर थे, अभ्यास ज्ञान नहीं था।ʹ

ऐसे ही मेरे साधको ! तुमने परमात्मा को पाने की दिशा में कदम रख दिया है। तुम अभी पचास वर्ष के छोटे बच्चे हो, तुम्हें इस जगत का पता नहीं, ईश्वर के लिए अभी तुम्हारा प्रेम कमजोर है, नियम में सातत्य और दृढ़ता की जरूरत है। अहंकार-काम-क्रोध के तुम जन्मों के रोगी हो, इसीलिए तो तुम्हारी कसौटियाँ होती हैं और विघ्न आते हैं ताकि तुम मजबूत बन सको। साधक  विघ्न बाधाओं से खेलकर मजबूत होता है। कसौटियाँ इसलिए कि तुम प्रभु को प्यार करते हो और वे तुम्हें प्यार करते हैं। वे तुम्हारा परम कल्याण चाहते हैं। यही तो वजह है कि वे तुम्हें परेशानियाँ देकर, तुम्हारा विवेक-वैराग्य जगाकर, तुमसे नश्वर संसार की आसक्ति छुड़ाना चाहते हैं।

माता कुन्ता भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती थीं-

विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगदगुरो।

भक्तो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्।।

ʹहे जगदगुरो ! हमारे जीवन में सर्वदा पद-पद पर विपत्तियाँ आती रहें क्योंकि विपत्तियों में ही निश्चित रूप से आपके दर्शन हुआ करते हैं और आपके दर्शन हो जाने पर फिर जन्म-मृत्यु के चक्कर में नहीं आना पड़ता है।ʹ

एक बीज को वृक्ष बनने तक कितने विघ्न आते हैं ! कभी पानी मिला कभी नहीं, कभी आँधी आयी, कभी तुफान आया, कभी पशु-पक्षियों ने मुँह-चोंचे मारीं….. ये सब सहते हुए भी वृक्ष खड़े  हैं। तुम भी कसौटियों को सहन करते हुए, उन पर खरे उतरते हुई ईश्वर के लिए खड़े हो जाओ तो तुम ब्रह्म हो जाओगे। परमात्मा की प्राप्ति की दिशा में कसौटियाँ तो सचमुच कल्याण की परम सोपान हैं। जिसे तुम प्रतिकूलता कहते हो सचमुच वह तो वरदान है क्योंकि अनुकूलता में विवेक सोता है और दुःख में विवेक जागता है। कसौटियों के समय घबराने से तुम दुर्बल हो जाते हो, तुम्हारा मनोबल क्षीण हो जाता है।

हम लोग पुराणों की कथाएँ सुनते हैं। ध्रुव तप कर रहा था। असुर लोग डराने के लिए आये लेकिन ध्रुव डरा नहीं। सुर लोग विमान लेकर प्रलोभन देने के लिए आये लेकिन ध्रुव फिसला नहीं। वह विजेता हो गया। ये कहानियाँ हम सुनते हैं, सुना भी देते हैं लेकिन समझते नहीं कि ध्रुव जैसा बालक दुःख से घबड़ाया नहीं और सुख में फिसला नहीं। उसने दोनों का सदुपयोग कर लिया तो ईश्वर उसके पास प्रकट हो गये।

हम क्या करते हैं ? जरा-सा दुःख पड़ता है तो दुःख देने वाले पर लांछन लगाते हैं, परिस्थितियों को दोष देते हैं अथवा अपने को पापी समझकर अपने को ही कोसते हैं। कुछ कायर तो आत्महत्या करने तक का सोच लेते हैं। कुछ पवित्र होंगे तो किसी संत-परमात्मा के पास जाकर मुक्ति पाते हैं। यदि आप प्रतिकूल परिस्थितियों में संतों के द्वार जाते हैं तो समझ लीजिये कि आपको पुण्यमिश्रित पापकर्म का फल भोगना पड़ रहा है क्योंकि कसौटी के समय जब परमात्मा याद आता है तो डूबते को सहारा मिल जाता है। नहीं तो कोई शराब का सहारा लेता है तो कोई और किसी का….. मगर इससे न तो समस्या हल होती है और न ही शांति मिल पाती है क्योंकि जहाँ आग है वहाँ जाने से शीतलता कैसे महसूस हो सकती है ? तुम कसौटी के समय धैर्य खोकर पतन की खाई में गिर जाते हो और फिर वहीं फँसकर रह जाते हो।

जो गुरुओं के द्वार पर जाते हैं उनको कसौटियों से पार होने की कुंजियाँ सहज ही मिल जाती है। इससे उऩके दोनों हाथों में लड्डू होते हैं। एक तो संत सान्निध्य से हृदय की तपन शांत होती है, समस्या का हल मिलता है, साथ-ही-साथ जीवन को नयी दिशा भी मिलती है। तभी तो स्वामी रामतीर्थ कहते थेः

हे परमात्मा ! रोज ताजा मुसीबत भेजना।

आज आप इस गूढ़ रहस्य को यदि भली-भाँति समझ लेंगे  आप हमेशा के लिए मुसीबतों से, कसौटियों से पार हो जायेंगे। बात है जरूर साधारण लेकिन अगर शिरोधार्य कर लेंगे तो आपका काम बन जायेगा।

आपने देखा होगा कि जिस खूँटे के सहारे पशु को बाँधना होता है उसे घर का मालिक हिलाकर देखता है कि कहीं पशु भाग तो नहीं जायेगा। फिर घर की मालकिन देखती है कि उचित जगह पर तो ठोका गया है या नहीं। फिर ग्वाला देखता है कि मजबूत है या नहीं। एक खूँटे को जिसके सहारे पशु बाँधना है, उसे इतने लोग देखते हैं, उसकी कसौटियाँ करते हैं, तो जिस भक्त के सहारे समाज को बाँधना है, समाज से अज्ञान भगाना है उस भक्त की, भगवान-सदगुरु यदि कसौटियाँ नहीं करेंगे तो भैया ! कैसे काम चलेगा ?

जिसे वो देना चाहता है, उसी को आजमाता है।

खजाने रहमतों के इसी बहाने लुटाता है।।

जब एक बार सदगुरु की, भगवान की शरण आ गये तो फिर क्या घबड़ाना ? जो शिष्य़ भी है और दुःखी भी है तो मानना चाहिए कि वह अर्धशिष्य है अथवा निगुरा है। जो शिष्य़ भी है और चिंतित भी है तो मानना चाहिए कि उसमें समर्पण का अभाव है। मैं भगवान का, मैं गुरु का तो चिंता मेरी कैसे ? चिन्ता भी भगवान की हो गई, गुरु की हो गई। हम भगवान के हो गये तो कसौटी, बेईज्जती हमारी कैसे ? अब तो भगवान को ही सब संभालना है। जैसे, आदमी कारखाने का कर्मचारी हो जाता है  कारखाने को लाभ हानि जो भी हो, उसे तो केवल वेतन मिलता ही है। ऐसे ही जब हम ईश्वर के हो गये तो हमारा शरीर ईश्वर का साधन हो गया। खेलने दो उस परमात्मा को तुम्हारे जीवनरूपी उद्यान में। बस, तुम तो अपनी ओर से पुरुषार्थ करते जाओ। जो तुम्हारे जिम्मे आये उसे तुम कर लो….. और जो ईश्वर के जिम्मे है वह उन्हें करने दो… फिर देखो, तुम्हारा काम कैसे बन जाता है। वे लोग मूर्ख हैं जो भगवान को कोसते हैं और वे लोग धन्य हैं जो हर हाल में खुश रहकर अपने आप में तृप्त रहते हैं। गरीबी है तो क्या ? खाने को, पहनने को नहीं है तो क्या ? यदि तुम्हारे दिल में गुरुओं के प्रति श्रद्धा है, उनके वचनों को आत्मसात् करने की लगन है तो तुम सचमुच बड़े ही भाग्यशाली हो। सच्चा भक्त भगवान से उनकी भक्ति के अलावा किसी और फल की कभी याचना नहीं करता।

जिसे वह इश्क देता है, उसे और कुछ नहीं देता है।

जिसे वह इसके काबिल नहीं समझता, उसे सब कुछ देता है।।

योगवाशिष्ठ में आता है कि चिन्तामणि के आगे जो चिंतन करो, वह चीज मिलती है लेकिन संतपुरुष के आगे जो चीज माँगोगे वही चीज वे नहीं देंगे, मगर जिसमें तुम्हारा हित होगा वही देंगे। यदि तुम्हारी निष्ठा है, संयम है, सत्य का आचरण है, सेवा का सदगुण है तो वे सबसे पहले तुम्हारी कसौटी हो, ऐसी परिस्थितियाँ देंगे ताकि इन सदगुणों के सहारे तुम सत्यस्वरूप परमात्मा को पा लो, परमात्मा को पाने की तड़पन बढ़ा दो क्योंकि वे तुम्हारे परम हितैषी हैं। सदगुरुओं का ज्ञान तुम्हें ऊपर उठाता है। परिस्थितियाँ हैं, सरिता का प्रवाह, जो तुम्हें नीचे की ओर घसीटती हैं और सदगुरु ʹपम्पिंग स्टेशनʹ हैं जो तुम्हें हरदम ऊपर उठाते रहते हैं।

अज्ञानी के रूप में जन्म लेना कोई पाप नहीं, मूर्ख के रूप में पैदा होना कोई पाप नहीं, लेकिन मूर्ख रहकर सुख-दुःख की थप्पड़ें खाना और जीर्ण-शीर्ण होकर मर जाना महा पाप है।

संक्षेप में, मेरे कहने का अभिप्राय इतना ही है कि मनुष्य जन्म मिला है, सदगुरु का सान्निध्य और परमतत्त्व का ज्ञान पाने का दुर्लभ मौका भी हाथ लगा है और सबसे बड़ी हर्ष की बात यह है कि तुममें उस परमतत्त्व को पाने की जिज्ञासा भी है तो फिर दुःख, चिन्ता और परेशानियों से क्या घबड़ाते हो ? यह तो वे कसौटियाँ हैं जो आपको निखारकर चमकाना चाहती हैं। हिम्मत, साहस, संयम की तलवार से जीवनरूपी कुरुक्षेत्र में आगे बढ़ते जाओ…. तुम्हारी निश्चित ही विजय होगी, तुम दिग्विजयी होंगे, तत्त्व के अनुभवी होंगे, तुममें और भगवान में कोई फासला नहीं रहेगा। सदगुरु का अनुभव तुम्हारा अनुभव हो जाये….. यही तुम्हारे सदगुरुओं का पवित्र प्रयास है।

तेरे दीदार के आशिक समझाये नहीं जाते हैं।

कदम रखते हैं तेरे द्वार पर तो लौटाये नहीं जाते हैं।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 1997, पृष्ठ संख्या 14,15,16 अंक 52

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ब्राह्मण पुत्र मेधावी


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।

विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि।।

ʹमुझ परमेश्वर में अनन्य योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति करके एकांत देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्य के समुदाय में प्रेम का न होना….(यह ज्ञान है, मोक्ष का मार्ग है।) भगवदगीताः 13.10)

इन्द्रियों एवं मन को तुच्छ वृत्तियों को संतुष्ट करने में लगना, आत्मानंद को पाने के बजाय अपने को विषय विकारों के कीचड़ में गिराना-इसे व्यभिचार कहते हैं। मनुष्य जन्म के मुख्य लक्ष्य परमतत्त्व को पाने के लिए कोशिश न करके संसार में आसक्त होकर जन्म गँवा देना ही व्यभिचार कहा गया है।

प्रतिकूलता में ईश्वर को याद किया, साधन-भजन के मार्ग पर थोड़ी यात्रा की, परंतु जैसे ही प्रतिकूलता कम हुई कि फिर से भोगों में लंपट हो गये… या फिर, संसार में अनुकूलता है, सुख सुविधाएँ हैं तो ईश्वर को पाने के लिए तत्परता दिखाई परंतु जैसे ही अनुकूलता कम हुई, असुविधाएँ आयीं तो ईश्वर को भुला दिया और संसार को ठीक करने में लग गये। इसे व्यभिचारिणी भक्ति कहा गया है। अनुकूलता आये चाहे प्रतिकूलता आये-दोनों ही अवस्था में जो परमतत्त्व को पाने के लिए तत्पर रहता है, संसार में चाहे सुख-सुविधा मिले चाहे दुःख मिले, साधन-भजन के मार्ग पर जो यात्रा जारी रखता है ऐसा भक्त अव्यभिचारिणी भक्ति करता है।

व्यभिचारिणी भक्ति करने वाला साधक थोड़ी-सी अनुकूलता या प्रतिकूलता आने पर साधन छोड़कर संसार में गिर जाता है या तो साधन के प्रकार बदलता रहता है। किन्तु अव्यभिचारिणी भक्ति करने वाला साधक बाह्य परिस्थिति से, सुख-दुःख के प्रसंग से चलायमान नहीं होता। व्यभिचारिणी भक्ति से थोड़ी पुण्याई बढ़ती है, थोड़ा सुख मिलता है परंतु मनुष्य को परम सुख की प्राप्ति तो अव्यभिचारिणी भक्ति से ही होती है। भगवान कहते हैं-

मयि चानन्ययोगेन….

भगवान के साथ अनन्य योग करें, अन्य-अन्य योग नहीं। कई लोग ईश्वर की भक्ति तो करते हैं लेकिन चिंता करते रहते हैं कि ʹमेरा क्या होगा ? मेरे परिवार का क्या होगा ?ʹ इसका नाम अनन्य भक्ति नहीं है, भगवान को संपूर्णरूप से समर्पित हो जाना अनन्य भक्ति है। भगवान में अनन्य भाव है तो फिर यह सोचना शेष नहीं रहता कि ʹमेरा क्या होगा ?ʹ जब सब कुछ उसी को सौंप दिया फिर चिंता कैसी ? अतः अनन्य भाव से अव्यभिचारिणी भक्ति करते हुए विविक्त देश का सेवन करें अर्थात् विषयी-विकारी पुरुषों के संग से किनारा कर लें और जहाँ साधन-भजन हो ऐसी जगह पर रहें। भगवद् ध्यान में, भगवद् ज्ञान में रमण करने वाले महापुरुषों के सान्निध्य में रहें। शंकराचार्यजी ने कहाः

एकांतवासो लघुभोजनादौ….

एकांतवास, लघुभोजन अर्थात् इऩ्द्रियों का अल्प भोजन यानी देखना, सुनना, सूँघना, चखना, स्पर्श करना आदि के नियंत्रण से मन की चंचलता का नाश होकर बुद्धि में आत्मप्रकाश होता है। फिर मन की वृत्तियाँ सूक्ष्म होती हैं, वृत्तियाँ सूक्ष्म होने से हम परमतत्त्व के करीब पहुँचते हैं।

साधन ऐसा होना चाहिए कि शीघ्र ही भगवान का साक्षात्कार हो जाय। विषय़ी-विकारी लोगों के प्रभाव में आये बिना भक्ति में तदाकार होने से मनुष्य निष्पाप होता जाता है। निष्पाप होने से विवेक जागता है, संसार से वैराग्य आता है। निर्दोष होने से उसे संसार की असारता, परमात्मा की महत्ता का पता चलता है।

संसार पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा और अभी भी नहीं की तरफ, विनाश की तरफ जा रहा है। ऐसे परिवर्तनशील संसार में, नश्वर-भोग पदार्थों में आसक्ति का अभाव तथा भोगसामग्री का औषधिवत् उपयोग ही बुद्धिमानी है।

नाशवान संसार से विरक्त होकर एक बार युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह के आगे अपनी मनोदशा का वर्णन कियाः

“पितामह ! काल के चक्र में हमें कभी सुख मिला तो कभी दुःख मिला। हम कभी वन में भटके तो कभी सिंहासन पर बैठे। काल अपनी गति से चल रहा है और आयुष्य क्षीण होता जा रहा है। कभी शत्रुओं के तो कभी मित्रों के, कभी भोग-पदार्थ के चिंतन में तो कभी आलस्य-प्रमाद में जीवन पानी की तरह बह रहा है। हे पितामह ! दिन प्रतिदिन मौत नजदीक आती जा रही है। मौत हमें मार दे उसके पहले अमर आत्मा में विश्रांति कैसे पायें ?”

वक्ताओं में श्रेष्ठ, व्रतधारियों में दृढ़ ऐसे भीष्म पितामह युधिष्ठिर को उपदेश देते हैं- “हे य़ुधिष्ठिर ! तुमने अपने विवेक को जागृत करके उत्तम प्रश्न पूछा है। तुम्हारे प्रश्न से बंगदेश के ब्राह्मण की कथा स्मरण में आती है।

बंगदेश में एक ब्राह्मण जप-तप, होम-हवन, व्रत-उपवास आदि कर्मकांड करते हुए ईश्वर के मार्ग पर चल रहा था। तपोनिधि ब्राह्मण की पुण्याई से उसके घर एक मेधावी बालक का जन्म हुआ। ʹमेधाʹ अर्थात् प्रज्ञा। बालक जन्म से ही अत्यधिक प्रज्ञावान, बुद्धिमान होने के कारण उसका नाम भी ʹमेधावीʹ रखा गया।

मेधावी 5 साल का हुआ तब अपने तपोनिधि पिता से उसने प्रश्न कियाः “पिताजी ! मनुष्य का कर्त्तव्य क्या है ?”

पिता ने उत्तर देते हुए कहाः “मनुष्य का कर्तव्य है कि 25 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य का पालन करके गुरुद्वार पर रहे, विद्याभ्यास करे, तत्पश्चात दूसरे 25 साल अर्थात् 50 वर्ष की आयु तक गृहस्थाश्रम में रहकर संसार निर्वाह करे। तदनन्तर 25 साल तक अर्थात् गृहस्थाश्रम से निवृत्त होकर वानप्रस्थ जीवन गुजारे और आखिर मोक्षप्राप्ति हेतु संन्यास ले ले।”

आत्मज्ञान में तपोधन ब्राह्मण की गति नहीं थी इसलिए मनुष्य जीवन के सर्वसाधारण शास्त्रोक्त नियम बता दिये लेकिन 5 साल के मेधावी को पिता जी की ये बातें जचीं नहीं। उसने पूछाः

“मनुष्य 25 साल ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करके गुरुद्वार पर रहकर विद्याभ्यास करे, फिर 25 से 50 वर्ष की उम्र तक संसारी विषयों में, विकारों में रहे, उसके बाद मुनि-तपस्वी का जीवन बिताने से क्या लाभ होगा ? पिता जी ! भोगवासना के दलदल में फँसा मनुष्य फिर उससे बाहर नहीं निकल पाता है। समझने पर भी वह फिसलता ही जाता है। शपथ भी खाता है फिर भी फिसल जाता है। इसलिए भोग-सामग्री का अनुभव करके फिर मुक्ति के लिए पुरुषार्थ करना उचित नहीं लगता। भोग तो सूअर और कुत्ते की योनि में भी मिलते हैं। मनुष्य शरीर मिला है तो उसकी उपयोगिता क्या ? पशु योनि की तरह इसे भी व्यर्थ गँवा देना चाहिए क्या ? इससे अच्छा  तो यह होगा कि आरंभ से ही संसार में फँसे बिना ईश्वर के मार्ग पर चल दें।”

ब्राह्मणः “संसार में प्रवेश करने से, पुत्रप्राप्ति होने से पितृओं का ऋण चुकाया जाता है। पुत्र पितृओं का कल्याण करता है।”

ब्राह्मण पुत्र मेधावी की बुद्धि सूक्ष्म थी। छोटे बच्चे को चॉकलेट देकर पटाया जाता है इस तरह पिताजी ने अपनी बातों से उसे समझाना चाहा, परन्तु इन बातों से समझ जाए ऐसा वह नहीं था। उसने तर्क करते हुए कहाः “पुत्र से ही यदि कल्याण हो जाता हो तो कई ऐसे पुत्र होते हैं जो पिता के नाम को तो क्या पूरे कुल-खानदान को भी बदनाम और बरबाद करने वाले कर्म करते हैं। ऐसे पुत्रों से पितृओं का क्या कल्याण हो सकता है ? संसार में कितने ही लोगों को पुत्रप्राप्ति हुई है फिर भी उनका अकल्याण होना क्यों दिखाई दे रहा है ?”

मनुष्य पुत्र के सहारे, पत्नी के सहारे, धन या सत्ता के सहारे अपना कल्याण चाहता है तो यह उसकी बुद्धि का दोष है।

प्रज्ञापराधो मूलं सर्वरोगाणाम्।

प्रज्ञापराधो मूलं सर्वदुःखानाम्।।

सारे रोगों का मूल, सारे दुःखों का मूल है प्रज्ञा का अपराध। मंद बुद्धि के कारण ही मनुष्य सौन्दर्य, सत्ता धन आदि का सहारा लेकर सुख पाने की इच्छा रखता है। वह यहाँ है तो सुख पाने की अंधी दौड़ में मर जाता है, जीवनभर झूठ-कपट, बेईमानी, धोखेबाजी करता रहता है तो मरने के बाद भी नरकों में जाकर पचता है।

भीष्म पितामह युधिष्ठिर से कहते हैं-

“हे य़ुधिष्ठिर ! बालक मेधावी अपने ब्राह्मण पिता से कहता हैः “पिता जी ! मुझे यह बात समझ में नहीं आती है कि भोग भोगकर, संसार के अनुभव से गुजरकर फिर मोक्षमार्ग पर चलें उसके बदले पहले से ही विवेक जागृत करके, दूसरों के अनुभव से सावधान होकर हम आरंभ से ही संसार में न फँसें और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर हो जाएँ  कितना अच्छा ! पिता जी ! आप ही मुझे बताइये कि ऐसा कौन सा मार्ग है जिससे शीघ्र मोक्षप्राप्ति हो। पिता जी ! मुझे लग रहा है कि कोई दिन-रात मेरे पीछे पड़ा है और मुझे मार रहा है।”

पिताः “तू ऐसी बातें क्यों करता है ? तू खुद डरा हुआ है और मुझे भी डरा रहा है।”

मेधावीः “पिताजी ! मैं डरा हुआ नहीं हूँ। मैं सच कहता हूँ। आप होम-हवन, जप-तप आदि करके स्वर्ग का सुख पाना चाहते हैं लेकिन मैंने तो सुना है कि वह सुख सच्चा सुख नहीं है, सदा टिकने वाला नहीं है। काल डंडा लेकर सबके पीछे पड़ा है, सबको मार रहा है। ऐसी दशा में 25 साल निर्वाह में गँवा देने की बात अनुचित समझता हूँ। कौन कब मृत्यु की झपेट में आ जाए, कोई पता नहीं है। जीवन का कोई भरोसा नहीं है अतः भोगों का अनुभव लेने के बजाये अपने कल्याण की बात सोचनी चाहिए। ऐसा कौन सा भोग है कि जिसे भोगने के बाद रोग न मिला हो ? सांसारिक भोग से या स्वर्गादि के सुखों के भोग से शक्तिहीनता, जड़ता, पराधीनता ही मिलती है। इसलिए मैं सोचता हूँ कि भोग की अपेक्षा योग का मार्ग लेना ही कल्याणकारी साबित होगा।”

तपोधन ब्राह्मण सोचता है कि आज तक जिंदगी के कई साल व्यर्थ भोग-पदार्थों की प्राप्ति की दौड़ में गँवा दिये लेकिन इस बच्चे ने तो मेरी आँखें खोल दीं। वे बोलेः “मेधावी ! तू सच कहता है। मैंने कर्मकांड करके अपनी वासनाओं को तृप्त करना चाहा मगर उससे शांति नहीं मिली, अंतर में तृप्ति नहीं मिली। वरन् कामनाएँ गहरी उतरती गई। मृत्यु कब आकर गला दबोच ले, कोई पता नहीं है। जैसे चूहे को कहीं से मिठाई मिले और वह आराम से खाने लगा हो और अचानक बिल्ली आकर उसे झपेट ले…… ऐसी हालत संसार के भोगों में रत मनुष्य की होती है। मुझे भी कब मृत्यु आकर झपेट लेगी, कोई पता नहीं है।

जिस शरीर को खिलाया-पिलाया, घुमाया-फिराया, आखिर में वह अग्नि में जलकर खाक हो जायेगा। वह खाक हो जाये उससे पहले अपने शिवस्वरूप को, आत्मा को जानने का उपाय खोजना चाहिए।”

भीष्म पितामह अपनी बात को आगे चलाते हुए कहते हैं- “हे बुद्धिमान युधिष्ठिर ! मनुष्य के जीवन के चार पुरुषार्थ हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन चारों पुरुषार्थ में से बुद्धिमान मनुष्य को चौथा पुरुषार्थ मोक्ष पाने में ही सार लगता है। जिनके चित्त में मोक्षप्राप्ति की इच्छा है वे धर्म के अनुकूल रहकर अर्थ और काम भोगते हैं। वे सजाग रहकर संसार के व्यवहार को चलाते हैं। इससे विवेक-वैराग्य की प्राप्ति होती है और वे परम पुरुषार्थ मोक्ष के मार्ग पर चल पड़ते हैं।

जिन्हें अपने कल्याण के लिए पुरुषार्थ करना हो उन्हें अपने स्थूल शरीर को परहित के कार्य में और सूक्ष्म शरीर यानी मन को भगवन्नाम के जप, ध्यान, आत्मचिंतन में लगाना चाहिए। निष्काम कर्म से अंतःकरण की शुद्धि होती है और भोग-वासनाएँ क्षीण होती हैं। योग से सामर्थ्य आता है। परमात्मा की अव्यभिचारिणी भक्ति करने से अंतःकरण दिव्य होता है और दिव्य रस की प्राप्ति होती है। जीवन के चार पुरुषार्थ में से अर्थ और काम तो शरीर के लिए हैं। धर्म के आचरण से मन ईश्वर की ओर चलता है जबकि मोक्ष परम पद को दिलाने वाला है। हे कुरुनंदन युधिष्ठिर ! यदि किसी बुद्धिमान के मन में प्रतिशोध की आग भड़कती रहती है तो वह धर्म का सहारा लेकर अपने मन को समझाता है, शांत रखता है। जो धर्म के अनुकूल व्यवहार करता है, वह अंत में भगवान की शरण जाता है लेकिन जो अधर्म का सहारा लेता है वह दुर्बुद्धि दुर्योधन की नाईं अपने को और अपने साथवालों को दुर्गति की खाई में डालता है।

ऐसे लोगों को चाहिए कि निष्काम भाव से कर्म करें जिससे अंतःकरण शुद्ध हो। शुद्ध अंतःकरण वाले मनुष्य को ही परमात्म-ध्यान, परमात्म-प्रेम के दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है। ऐसा मानव उस ब्राह्मणपुत्र मेधावी की तरह अपना विवेक जगाकर परम पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 1997, पृष्ठ संख्या 20,21,22,23 अंक 52

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