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अर्जुन देव जी का वह अनोखा शिष्य (भाग -3)


कल हमने सुना कि पहलवान मस्कीनिया अखाड़े में आकर कहने लगा कोई है जो मुझसे लड़ेगा लेकिन तभी “मस्कीनिया पहलवान मैं भिडूंगा तुम्हारे साथ” ऐसी आवाज आई । सबकी गर्दनें उस आवाज़ की तरफ उठ गई, इसी सोच के साथ कि शेर को ललकारने वाला यह कौन बब्बर शेर है, परन्तु यह क्या सामने तो बकरी थी वह भी मरियल सी । मस्कीनिया को ललकारने वाली वह बकरी थी गुरु महाराज जी का दुर्बल-सा शिष्य । कुछ बुजुर्गों ने नेक सलाह देते हुए कहा कि अरे क्यूं पागल हो रहे हो, क्या तुझे पता नहीं कि मस्कीनिया तुझे फूंक मारकर ही उड़ा देगा । कुछ युवकों ने मस्करी भी की हमारे नये-नवेले पहलवान जी शाबाश बहुत अच्छे, फटाफट एक ही धोबी पलटी में मस्कीनिया को चित्त कर दो । मस्कीनया भी अट्टहास करता हुआ बोला अरे ओ सिकुडू पहलवान ! अगर मरने का इतना ही शौक है तो जा किसी कुएं में कूद पड़, क्यूं मुझसे गरीब मार करवा रहा है ? परन्तु शिष्य आंखों में गुरु के लिए मरने का जुनून लिए अखाड़े के बीचों-बीच आकर खड़ा हो गया । अब मस्कीनिया सोचने पर मजबूर हो गया कि आज तक ऐसे निर्भय होकर मेरी आंखों में आंखें डालकर देखने की ताकत तो स्वयं यमराज में भी नहीं । फिर यह अदना-सा आदमी आखिर माजरा क्या है ? फिर उसके दिमाग में आया, कहीं यह किसी मजबूरी के कारण तो नहीं लड़ रहा । उसने कहा सुनो भाई जबकि तुम्हें पता है कि मैं तुम्हें मिट्टी की तरह मसल दूंगा और स्वयं ईश्वर भी तुम्हें नहीं बचा पायेगा तो फिर क्यूं तुम मेरे हाथों मरना चाहते हो ? शिष्य मुस्कुरा पड़ा और सहजता से बोला कि मस्कीनिया जी ! कैसी नादानों वाली बातें करते हो । मिट्टी को अगर आप मिट्टी की तरह मसल भी देंगे तो मिट्टी का क्या बिगड़ेगा, मिट्टी तो मिट्टी ही रहेगी । वैसे भी अनेक जन्मों से यह शरीर सांसारिक रिश्तों के लिए खाक होता आया है । आज मेरे प्यारे गुरुदेव की सेवा के लिए यह अगर मिट जाए तो इससे बड़ा सौभाग्य और क्या होगा । खैर मस्कीनिया जी यह बातें आपको समझ में नहीं आयेंगी, आप आगे बढ़िए और मुझे मारिये । शिष्य के इन अध्यात्मिक शब्दों से मस्कीनिया का पहलवान जिगर घायल हो गया । उसने आज तक ऐसे दिव्य वाक्य बड़े-2 धर्म पुजारियों से भी नहीं सुने थे । आखिर कौन से गुरु की बात कर रहा है यह, क्यूं उसकी सेवा में जान देने को भी तैयार है फिर अगर इसके विचार इतने ऊंचे हैं तो इसका गुरु कैसा होगा ? अगर शिष्य काल को ललकार सकता है तो उसके गुरु में कितनी शक्ति होगी । सुनो भाई ! कौन हैं तुम्हारे गुरुदेव, कौन-सी सेवा की तुम बात कर रहे हो ? पता नहीं क्यूं मेरा मन उनकी ओर खिंच रहा है । अपने गुरुदेव का पूरा परिचय देकर मेरी जिज्ञासा को शांत करो । शिष्य गर्व से तन कर बोला कि मेरे गुरु का मैं क्या परिचय दूं वे दिन के सूर्य, रात्रि के चंद्रमा, आसमान की विशालता और ऋतुओं की बहार हैं । मेरे दिल की धड़कन, आंखों की पुतली और मेरा श्रृंगार हैं । उनकी नज़रें झुकने से प्रलय और उठने से सृष्टि का निर्माण होता है, उनकी दिव्य वाणी सुनकर सरस्वती भी लज्जा जाए और उनके दरबार की शोभा क्या कहूं देवलोक से भी बढ़कर है । ऐसे महामानव श्री गुरु अर्जुन देव जी महाराज का मैं अदना-सा शिष्य हूं । उन्होंने मेरी 500 चांदी के सिक्कों की सेवा लगाई है, मैं यह सेवा करने के बिल्कुल भी लायक नहीं था लेकिन उनकी नज़रें इनायत, कर्म नवाजी देखिए कि आज ही यह मुनादी हुई कि आपसे हारने वाले को 500 सिक्के मिलेंगे । नहीं तो क्या कभी हारने वाले को कुछ मिलता है । धन्य हैं मेरे गुरुदेव धन्य हैं ! मस्कीनिया जी आप कुश्ती शुरू करें, आज आपके हाथों मरकर धन के साथ-2 मेरे तन की भी सेवा लगेगी । इतना कहकर महाराज जी का शिष्य भावुक हो गया और उधर पहलवान मस्कीनिया की मरुस्थल-सी सूखी आंखों में नदियां उमड़ आयी । वह शिष्य के सामने दोनों हाथ जोड़कर घुटने के बल बैठ गया फिर रोता हुआ बोला मुझे नफरत हो रही है अपने आप से, इतना बलिष्ठ शरीर बनाने के बाद भी मैंने सबको पलटनी देकर गिराया है, लेकिन महान हैं आपके सदगुरु जो गिरे हुओं को उठाते हैं, धन्य हैं आपके गुरुवर जिन्होंने आप जैसे शिष्य बनाए । आपके गुरुप्रेम ने तो मुझे बिना दंगल किए ही जीत लिया । ऐसा प्रेम मैंने पहले कभी संसार में नहीं देखा । इतना कहकर मस्कीनिया ने आंसू पोंछे, उसकी आंखों में सज्जनता की रोशनी चमक उठी । उसने मन ही मन संकल्प लिया कि चल मस्कीनिया आज कुछ अजब घटाकर दिखा दे । जिस मस्कीनिया ने आज तक सांसारिक पहलवानों को क्षणों में हराया है उसे आज एक शिष्य ने हराया, इसे आज एक शिष्य से हारना होगा । जिस मस्कीनिया ने असंख्य रणबांकुरों को धाराशायी किया है, आज उसे अपनी छाती पर पूर्ण गुरु के शिष्य को बिठाना होगा । अब मस्कीनिया शिष्य की तरफ मुड़ा और खुसर-फुसर करता हुआ धीरे से बोला, तुमने कहा ना शरीर मिट्टी है पता नहीं कब खत्म हो जाए । सो मैं भी थोड़ा पुण्य कमा लूं ! भाई मना मत करना, जैसा मैं कहता हूं बस वैसा करते जाओ । मुझे ज़रा-सा धक्का मारो मैं गिर जाऊंगा फिर तुम मेरी छाती पर बैठ जाना । हिचकिचाना मत क्यूंकि मैं चाहता हूं कि तुम हारकर 500 सिक्के नहीं बल्कि जीतकर पूरे 1000 चांदी के सिक्के ले जाओ । जिसमें 500 तुम्हारे और 500 मेरी तरफ से गुरु चरणों में अर्पित हों । बस अब शिष्य मस्कीनिया के कहे अनुसार उसकी छाती पर बैठ गया और 1000 चांदी के सिक्के जीत लिए । अंत में शिष्य सिक्कों को सेठ की ओर बढ़ाते हुए विनय पूर्वक बोला सेठ जी यह लीजिए 1000 सिक्के । इंतजाम पहले से ही तय होते हैं, देखी आपने उनकी कृपा, मैंने तो 500 सिक्के मिलने की ही आशा रखी थी लेकिन उसने पूरे दे दिए । सेठ का अहंकार चूर-चूर हो चुका था वाकई में वह अपने आप को दरिद्र और शिष्य को रईस देख पा रहा था । उसके मुंह से बस यही शब्द निकले सच में भाई तुम गुरु के सेठ हो । गुरु दरबार में तुम जैसे सेठों के होते हुए हम जैसे सेठों की क्या औकात । इसके तुरंत बाद सेठ 1000 चांदी के सिक्के लेकर गुरु दरबार की तरफ चल पड़ा । सदगुरु हर युग में सदैव मानव जाति के कल्याण हेतु तत्पर रहते हैं । वे शिष्य को किस प्रकार क्या सीख दे दें वो तो वे दाता ही जानते हैं परन्तु सदगुरु की प्रत्येक क्रिया, हर हील-चाल मात्र शिष्य के उत्थान हेतु ही होती है । यदि गुरु कोई सेवा देते हैं तो उसको पूरा करने के साधन पहले ही बना देते हैं । बस आवश्यकता है तो गुरु आज्ञा पर पूर्ण श्रद्धा रखने की और कर्म में पूर्ण प्रयास की । संत और सदगुरु का मत है कि गुरु की आज्ञाओं के प्रति लापरवाही यह स्वयं से दुश्मनी है । जैसे किश्ती में छोटा-सा छिद्र भी पूरी किश्ती को नष्ट करने के लिए पर्याप्त होता है, वैसे ही गुरु आज्ञा के प्रति थोड़ी भी लापरवाही साधक के पतन हेतु पर्याप्त है । कभी-2 गुरु ऐसे आदेश दे देते हैं जो शिष्य के मस्तिष्क के भीतर नहीं उतरते हैं, ऐसे क्यूं होता है क्यूंकि श्रद्धा की कमी है । जहां श्रद्धा की कमी होगी वहीं गुरु आज्ञा के प्रति लापरवाही होगी, संशय होगा । छोटी से छोटी गुरु आज्ञा भी शिष्य के कल्याण के लिए बड़ी सीढ़ी बनती जाती है लेकिन प्रश्न यह है कि हम गुरु आज्ञा पालन के कल्याणकारी प्रभाव को जानकर उसमें कितना डट पाते हैं ।

अर्जुनदेव जी का वह अनोखा शिष्य (भाग-2)


कल हमने पढ़ा कि लाहौर का सेठ गुरु के सेठ से मिलने के लिए निकल पड़ा । सेठ की शाही बग्गी गांव के अंदर दाखिल हुई और एक बड़े से पेड़ के पास रुक गई । वहां कई बुजुर्ग और युवकों की मंडलियां ताश के पत्तों से खिलवाड़ कर रही थी । सेठ ने रोबीले स्वर में पूछा यहां गुरु के सेठ की हवेली कहां है, क्या बता सकते हैं ? एक युवक अचकचा कर बोला कौन से सेठ की हवेली ! अरे वही जो अर्जुन देव जी का शिष्य है, जिसका छत्र इस पूरे इलाके में व्याप्त है, जिसको गुरुजी अपना सेठ कह कर पुकारते हैं वही गुरु का सेठ । इतना सुनना था कि युवक हाथ पर हाथ मार कर ठहाका लगाकर हंस पड़ा । अच्छा-2 उस पागल की बात कर रहे हैं जो चौबीसों घंटे अपने गुरु की ही बातें करता रहता है । उधर गंदे से पोखरे के पास झोंपड़ी है उसकी, जाओ मिल लो अपने सेठ से । सेठ को जबरदस्त झटका लगा, गुरु का सेठ और झोंपड़ी में फिर सोचा होगा तो वह बेअंत संपदा का स्वामी लेकिन चोर, डाकुओं के भय से जान-बूझकर झोंपड़ी में रहता होगा ताकि कोई शक ना करे इसी विचार के साथ सेठ उस शिष्य की झोंपड़ी की तरफ बढ़ चला । पोखरे के किनारे बनी यह झोंपड़ी अंतिम मयाद को पार कर चुकी थी पास में ही एक खूंटे से मरियल सी बकरी बंधी थी जो सूखी घास से भूख मिटाने में संघर्षरत थी । उसका मेमना उसके सूखे थनों से दूध ना मिलने पर थक कर बैठ गया था । गंदे पोखरे से बेइंताह बदबू उठ रही थी, तभी झोंपड़ी से एक अधेड़ कुपोषित मैले कुचैले कपड़ों में अर्धनग्न-सा आदमी बाहर आया । उसके मांस से हड्डियां बाहर झांक रही थी, उसे देख कर सेठ की बची-खुची उम्मीद भी सूर्य डूबने के साथ अस्त हो गई । शाही बाग के पास आकर वह हाथ जोड़कर बोला श्रीमान गुरु का दास आपकी क्या सेवा कर सकता है । किस कारण से आप हमारे गरीब खाने पहुंचे हैं । सेठ बिल्कुल चुप ! वह शिष्य को ऐसे घूर कर देख रहा था जैसे कोई स्त्री अपनी सौतन को देखती है । इतने में झोंपड़ी से एक स्त्री भी बाहर निकल आई जो उस शिष्य की पत्नी थी, फटी बेहाल साड़ी मुश्किल से उसका तन ढक पा रही थी । सेठ ने थके से स्वर में पूछा क्या तुम ही श्री गुरु अर्जुन देव महाराज के शिष्य हो । गुरुदेव का नाम सुनते ही उस शिष्य का चेहरा खिल गया, दोनों हाथ जुड़ गए । हां-हां श्रीमान मैं ही श्रीगुरू अर्जुन देव जी का निमाना दास हूं । क्या आप गुरु दरबार से आए हैं ? मेरे गुरुदेव कैसे हैं, क्या गुरुदेव ने मुझे याद किया है ? एक ही श्वास में उसने ढेर सारे प्रश्न कर दिए । सेठ को शिष्य की खुशी से कोई वास्ता नहीं था । अच्छा सच-सच बताओ क्या तुम्हारी हालत सचमुच ऐसी खस्ता है या तुम जान बूझकर ऐसे रहते हो । क्यूंकि गुरु महाराज जी तो तुम्हें अपना सेठ कह रहे थे । शिष्य की आंखें डबडबा आईं, वह भावुक हो उठा क्या मेरे गुरुदेव अपना सेठ कह रहे थे । श्रीमान जी धन्य हैं मेरे प्रभु जो ऐसा मान बख्श रहे हैं । अपना सेठ कह रहे थे । श्रीमान जी धन्य हैं मेरे प्रभु जो ऐसा मान बख्श रहे हैं मुझे माता की तरह दुलार दे रहे हैं जैसे एक मां अपने अपंग, काने बेटे को भी कहती है कि यह तो मेरा राजा बेटा है चांद के जैसा सुंदर है । मेरे गुरुदेव भी वैसे ही कह रहे हैं, एक कंगाल को अपना सेठ बोलते हैं । सच यह तू ही बोल सकता है मेरे दाता और कोई नहीं, इससे अधिक वह शिष्य कुछ बोल ना पाया । उसकी आंखों से आंसुओं की लड़ियां बह चली, उसका मन प्रेम, श्रद्धा की लहरों में गोता लगाने लगा लेकिन तभी उसे ख्याल आया कि सेठजी को तो अंदर बुलाया ही नहीं । वैसे ही बाहर अंधेरा हो चुका था, क्षमा करें श्रीमान आपको अंदर लिवाना तो मैं भूल ही गया, आईए अंदर आईए । आप मेरे गुरु-दरबार से आए हैं आज तो हम पूरी रात आपसे गुरुदेव की महिमा सुनेंगे । शिष्य भावना में क्या-2 बोले जा रहा था, इसका उसे भान ही नहीं था । गुरुभक्ति में रंगा वह इतना भी भूल गया था कि उसके सामने शाही बग्गी पर सवार होकर आया एक रईस सेठ खड़ा है कोई भिखारी नहीं जो उसकी झोंपड़ी में रात भर ठहर सके । अब सेठ की तो सर्प के मुंह में मेंढक वाली बात हो गई, उसके लिए झोंपड़ी में रहना भी दूभर था और वापिस जाना भी असंभव क्यूंकि अब तक पूरा अंधेरा हो चुका था । उसे रात भर झोंपड़ी में रुकने वाला कड़वा जहर आखिर पीना ही पड़ा । झोंपड़ी के अंदर दाखिल होते ही सेठ को ऐसा लगा मानो काल कोठरी में आ गया हो । झोंपड़ी के बीचों-बीच एक टूटा-सा लालटेन झूल रहा था, जिसमें जलती लौ अंतिम दम भर रही थी क्यूंकि लालटेन के पेट में तेल की एकाध बूंद ही शेष रह गई थी । एक कोने में चूल्हा रखा था और मिट्टी के कुछ गिने-चुने बर्तन उसके आस-पास बिखरे पड़े थे । बस इसके अलावा झोंपड़ी में और कुछ नहीं था, शिष्य ने सेठ से बैठने का आग्रह किया लेकिन कैसे बैठता सेठ जमीन पर । सेठ ने अपना कीमती शॉल उतारा, चटाई की तरह बिछाया और बैठ गया । इतने में शिष्य की पत्नी सेठ के लिए टूटे घड़े के ठिकरे में पानी लेकर आयी । यह देखकर सेठ के सब्र की बाधा ही टूट गई, वह खीज कर बोला नहीं पीना मुझे और सुनो खाना भी मत बनाना । मुझे भूख नहीं वैसे भी आज मेरा एकादशी का व्रत है । इसके बाद दोनों पति-पत्नी सेठ के सामने जिज्ञासु मुद्रा में बैठ गए । उन्हें पता था कि गुरुदेव ने कोई संदेश तो जरूर भेजा होगा । शिष्य विनीत भाव से बोला श्रीमान क्या हमारे लिए गुरु महाराज जी ने कोई संदेश नहीं भेजा, हमारे दिल की धड़कनें उनके हुकुम को सुनने के लिए बेताब हैं । दोनों पति-पत्नी की आंखों में गुरु आज्ञा को सुनने की इतनी अधीरता थी जैसे रोटी के टुकड़े के प्रति किसी भूखे की होती है । सेठ ने एक बार तो सोचा कहीं 500 सिक्कों की बात सुनकर इन बेचारों को दिल का दौरा ना पड़ जाए । परन्तु दूसरे ही पल मन ने एक और बात कही कि गुरुजी ने तो इतनी शान से दावा किया था तो क्यूं घबरा रहा है, जो तमाशा होगा देखा जायेगा ताकि वहां पहुंचकर सबको बताया जा सके । सेठ अखड़-सा होकर बोला हालांकि मुझे पता है तुम यह आज्ञा स्वप्न में भी पूरी नहीं कर पाओगे, फिर भी बताए देता हूं पूरे 500 सिक्के मांगे हैं तुम्हारे गुरु ने और सिक्के भी कोई लोहे के खोटे नहीं बल्कि चमचमाती चांदी के खनकते सिक्के । इससे भी बड़ी बात कि चाहिए भी कल सुबह तक अब बोलो दे पाओगे या मैं सुबह ऐसे ही लौट जाऊं । बड़ा कह रहे थे गुरु आज्ञा, गुरु आज्ञा क्यूं हो गया ना जोश ठंडा इतना कहकर सेठ दूसरी ओर मुंह करके बैठ गया जैसे कोई साहूकार किसी खैराती को डांटने-फटकारने के बाद मुंह फेर लेता है । लेकिन यह क्या सेठ की सोचानुसार जिन्हें सदमा पहुंचना चाहिए था वे तो खुशी से उछल पड़े ऐसे जैसे किसी रूठे बालक को उसकी मन पसंद मिठाई मिल गई हो । शिष्य खुशी से बावला होता हुआ बोला सच गुरुवर ने ऐसा बोला क्या ? श्रीमान यह शुभ समाचार आपने आते ही हमें क्यूं नहीं दिया ? इतना विलंब कर हमें तड़पाया क्यूं ? सेठ उन्हें खुशी में झूमता देखकर आश्चर्य में पड़ गया । अरे पागल हो क्या ? धरती पर तो हो या ठीक से सुना ही नहीं । पूरे 500 चांदी के सिक्के देने को कहा है, कोई मजाक नहीं है यह । तुम पूछ रहे हो मैंने अब तक छुपाया क्यूं बल्कि मैं सोच रहा हूं कि मैंने बताया ही क्यूं । और तो और खुश तो ऐसे हो रहे हो जैसे इंतजाम पहले से ही कर रखा हो और बस सुबह उठाकर देना ही हो । शिष्य सेठ की ऐसी बातें सुनकर मंद-मंद मुस्कुरा पड़ा । सेठ को उसकी यह मुस्कान चुभ गई, क्रोध चढ़े स्वर में बोला इसमें हंसने की क्या बात है । क्या भिखारी होने के साथ-2 पागल भी हो । श्रीमान आप चिंता ना करें, गुरुदेव ने जब कहा है आप 500 सिक्के मुझसे ले आएं तो देखिएगा सुबह तक सिक्कों का इंतजाम भी हो जायेगा । कैसे शिष्य दृढ़-विश्वास के साथ बोला, देखिए ना उसकी कुदरत जब बच्चा जन्म लेता है तो कुछ भी चबाने या खाने के योग्य नहीं होता । वह जानता है बालक की यह मजबूरी इसलिए तो पहले ही माता को जरिया बनाकर उसके दूध का इंतजाम कर देता है तो क्या आज हमारे लिए नहीं करेगा । गुरु ही सब कुछ करते हैं हम तो मात्र निमित्त बनते हैं इसलिए मुझे कोई चिंता नहीं, मैं क्यूं व्यर्थ चिंता करूं । गुरु ही आज्ञा करते हैं और गुरु ही उसे पालन करवाते हैं उन्होंने कहा है तो वे ही पूरा करेंगे भले मुझे निमित्त क्यूं ना बनना पड़े । शिष्य की पत्नी ने कहा सेठजी अब आप विश्राम करें और हम साधना करने चले । तत्पश्चात शिष्य और उसकी पत्नी साधना में बैठ गए । सेठ अपने दुशाले पर ही सिमट, सिकुड़ कर लेट गया । पूरी रात पति-पत्नी ध्यान में बैठे रहे, गुरुदेव से प्रार्थना करते रहे कि गुरुदेव आपने हमें याद किया, आपने कुछ आज्ञा की अब आप ही उसकी लाज रखें । हम समर्थ नहीं हैं लेकिन आप सर्व-समर्थ हैं । मुर्गे की बांग के साथ साधना से वे उठे, शिष्य झोंपड़ी से बाहर आया और दातुन करता हुआ गांव के अंदर की ओर चल पड़ा । दिमाग में कहीं कोई बोझ नहीं बल्कि दिल में एक उमंग थी कि गुरुदेव आज आपकी लीला मैं भी प्रत्यक्ष देखूंगा । मेरे पास तो 5 फूटी कौड़ी नहीं, 500 चांदी के सिक्के तो कैसे देगा यही नज़ारा देखने की इच्छा है बस । तभी चौराहे पर कोई ढोल पीट-2 कर मुनादी करने लगा कि सुनो सुनो सुनो ! आम और खास को सूचना दी जाती है कि ठीक सुबह 10 बजे धर्मशाला वाले मैदान में पहलवान-ए-आलम मस्कीनिया का दंगल होगा । जो कोई भी पहलवान उससे भिड़ना चाहे उसे खुला निमंत्रण है । राजा का हुकुम है कि जीतने वाले को 1000 और हारने वाले को 500 चांदी के सिक्के दिए जाएंगे । सुनो सुनो सुनो ! इतना कहकर मुनादी वाला आगे बढ़ गया लेकिन शिष्य की आंखें सावन और भादौं हो आईं । गुरुदेव की कृपा देखकर मन कृतज्ञता से भर उठा, भाव शब्द बन कर निकल पड़ा कि धन्य हैं गुरुदेव आप । आज्ञा देने वाले भी आप, पूरी कराने वाले भी आप , हम तो बस आपकी लीला के दर्शक हैं । वह तुरंत झोंपड़ी में लौटा और अपनी पत्नी को यह खुश खबरी दी । उत्साहित स्वर में सेठ से कहा श्रीमान आपको पूरे 10:30 बजे 500 चांदी के सिक्के मिल जाएंगे, मैं भले ही उसके बाद मिलूं या ना मिलूं । मस्कीनिया आज तक एक भी दंगल ना हारा था, उससे भिड़ना मतलब मौत को आमंत्रित करना । मस्कीनिया अखाड़े में दूसरे दिन प्रवेश करके अखाड़े में ललकारने लगा कि कोई है जो मुझसे भिड़ना चाहेगा तभी भीड़ में से मस्कीनिया पहलवान मैं भिडूंगा ! तुम्हारे साथ । सबकी गर्दन उस आवाज़ की तरफ उठ गई इसी सोच के साथ कि शेर को ललकारने वाला यह कौन बब्बर शेर है । परन्तु यह क्या सामने तो बकरी थी और वह भी मरियल-सी । मस्कीनिया को ललकारने वाली यह बकरी थी, गुरु महाराज जी का दुर्बल-सा शिष्य । गुरु की आज्ञा पालन में यह शिष्य किस प्रकार गुरु भक्तों की सूची में खुद को अंकित करेगा यह हम कल के प्रसंग में पढ़ेंगे ।=====================आगे की कहानी कल की पोस्ट में दिया जाएगा….

हमारा व्‍यवहार कैसा हो?


हम सोचते थे कि कोई कैसा भी व्यवहार करें हमको तो ईश्वर के लिए, गुरु के लिए.. बस कोई कैसा भी करे व्यवहार, हम तो ईश्वर के लिए हैं। यह जरूरी नहीं कि हम घर छोड़ के गुरुद्वार गये अथवा कहीं गये तो सब लोग हमारे मन के अनुकूल चले । यह तो संभव भी नहीं है। ऐसा हम समझते थे, तो फिर कई विघ्न आये और गुरुजी को हमारे लिए कुछ का कुछ बता देते थे और हमको कुछ का कुछ लगा देते थे, जाओ पानी भर के आओ, पहाड़ से, नीचे से पहाड़ पर ले आओ, जाओ पानी भरते आना, सब्जी भी लेते आना । पानी इधर, सब्जी इधर और… दूध भी लेते आना।

          और फिर देर पहुँचे तो गुरु को बोले डेढ़ घण्टा लग गया। फिर एक बार हम बाल्टियाँ लेकर पानी भर के आये और दूध का करमण्डल भी था तो दो बाल्टियाँ, बीच मे दूध का करमण्डल, तो जब पहाड़ी से चलना है तो थोड़े दूध की कुछ बूँदे गिर गयी होगी पानी में।  तो वो पानी की बाल्टी में दूसरा दूध डालकर जाकर गुरुजी को बताया कि देखो ये पानी भर के आया उसमें दूध ढोलकर आया । वो दिन भी गुजर गए।  गुरु तो गुरु होते हैं और कभी-कभार… । अन्तर्यामी हर समय तो ध्यान नहीं लगाते थे।  तो कभी-कभार थोड़ा-सा.. । और बाद में जब पता चलता कि अरे! इसका कसूर नहीं था फिर भी मैने डाँटा और इसके चेहरे पर शिकन नहीं पड़ी तो और उनकी दया बरसती थी, गुरुजी की ।  

एक बार मेरे को कहा कि जाओ, चायना-पीक दिखाकर आओ। और मैंने देखा नहीं था लेकिन गुरूजी ने कहा- दिखा के आओ। नैनीताल के जंगलों में बड़े पहाड़, दिन-भर की यात्रा।

चलनेवाले बोले  – ‘नहीं चलते, बरसात आ रही है’।  

मैंने कहा-  ‘मेरेको आज्ञा हुआ है, दिखाकर आना तो तुमको दिखाकर ही जाऊँगा’।

मौसम बदल गया..  ये हो गया.. और जब वहाँ गए तो मौसम खुल गया। वहाँ से बद्रीनाथ दिखा और केदारनाथ दिखा, दूरबीनों से ।

तो जब लौट के आये तो बोले- ‘साँईं, देखकर आये’।

बोले- ‘कैसे, मौसम तो खराब हो गया?’  

बोले- ‘सब लोग वापस आ रहे थे लेकिन ये आसाराम ने बोला कि हमको आज्ञा हुआ है, ऐसा करके गुरु आज्ञा पालने के बहाने हमको ले गये, ले गये।’

तो बोले- ‘जो गुरु की बात मानता है तो इसकी बात मौसम भी मानेगा, बादल भी मानेंगे’

तो ऐसा होता है।  गुरूगीता में भी लिखा है-

आजन्म कर्म कोटीनां यज्ञ जप तपः क्रिया 

ता सर्वा सुफला देवी गुरू संतोष मात्रेण ।।  

करोड़ों जन्म के यज्ञ-जप-तप तभी सफल हुए जब आत्मज्ञानी गुरु संतुष्ट हुए। गुरू नाराज हो गए तो उसके भाग्य में बाकी बचा क्या? गुरू के हृदय में ठेस लगी अथवा उसका गुरू उससे राजी नहीं है तो इंद्र भी परास्त हो गया। केवल माला का अनादर किया था और गुरू नाराज हो गए थे। गुरू असंतुष्ट हो गए थे तो दैत्यों ने दबा दिया इंद्र को, दर-दर की ठोकर खानेवाला कर दिया और जब दृष्टा प्रजापति का पुत्र विश्वरूपा… उसको रिझाया,  भगवान ने आईडिया दिया और उसपर गुरू संतुष्ट हुए तभी इंद्र फिर चमका। तो सेवा आदि…

और गुरु संतुष्ट कब होंगे?

‘जब हमारी उन्नति होगी’ ।

तो हमारी उन्नति कब होगी?  झाड़ू लगाने से होगी ?

कि हाँ ।  

ये करने से होगी ?

कि हाँ ।  

अपने व्यक्तिगत स्वार्थ छोड़कर ईश्‍वर के लिय काम करते है तो हमारी उन्नति होती है, तो गुरू संतुष्ट होते है। ओम नारायण…  नारायण, नरायण, नारायण….  

 सेवक का दर्जा आफिसर जैसा भी नहीं होता। ऑफिसर को तो प्रमोशन की लालच है। प्रमोशन का बदला है- संसार की सहूलियत। साधक  संसार की सहूलियत के लिए साधना नहीं करता, संसार की सहूलियत के लिए सेवा नहीं करता, वो तो संसार के स्वामी को वश करने के लिए सेवा करता है। अपने बस कर दीनो राम…

हनुमान ने ऐसा सेवा खोजा और ऐसा सेवा किया कि रामजी को वश कर दिया।

कह हनुमंत प्रति उपकार करौं का तोरा।

सनमुख हो न सके मुख मोरा।

हनुमानजी! मैं तुम्हारी सेवा का क्या प्रति उपकार करूँ? रामजी भी लाचार हो जाते है हनुमानजी ने ऐसा सेवा किया।

और ये तो तुमको विदित है कि एक बार सीताजी ने, भरत ने, लक्ष्मणजी ने, शत्रुघ्न ने सारी सेवा अपने-अपने जिम्मे कर दी, हनुमान को सेवा ही नहीं बची।

तो रामजी ने कहा- ‘अच्छा! जो इन्होंने नहीं खोजी हो वो ही करो!’

तो सब सेवा तो हनुमान की छीन ली गई थी तो चुटकी बजाने की सेवा हनुमान ने खोज ली और रात को कहां…

माताजी सेवा करती हो चरणचंपी तो उनके सामने बैठना, पति-पत्नी के बीच ये तो असंभव है सेवक के लिए, तो प्रभू को तो कभी-भी जम्‍हाई आ सकती है तो छत पर चले गए हनुमान और चुटकी बजाना चालू कर दिया तो रामजी का मुँह खुला रह गया।

आखिर सीताजी, कौशल्याजी, भरत, शत्रुघ्न इकट्ठे हुए…’क्या हो गया ठाकुरजी को?’

पता नहीं चला, वसिष्ठ महाराज आए, देखा कि सब है, उनका सेवक कहाँ है हनुमान?

हनुमान जहाँ हो वहाँ से आ जाए…

तो हनुमानजी तो छत पर बैठे-बैठे चुटकी बजा रहे थे कि प्रभु को कभी-भी जम्‍हाई आ सकती  है ।

हनुमान जहाँ हो आ जाए…। जम्‍प मारा, हनुमान.. चुटकी बंद हो गई बजना और रामजी का मुख बंद, जम्‍हाई के एक्शन से रूक गये।

बोले- ‘ऐसा क्या हो गया था?’

बोले प्रभु- ‘वो सेवक चुटकी बजा रहा था, जम्‍हाई न आ जाए तो उसकी चुटकी चालू.. तो मेरेको जम्‍हाई भी चालू रखनी पड़ी’

अपने बस कर दीनो रामा…

हनुमान ने कोई रामजी को क्रूर कपट से वश नहीं किया, दिखावटी सेवा से वश नहीं किया, सच्चे भाव से सेवा किया तो वश हो गये। ये सेवा में बड़ी शक्ति है ।

और कलजुग में तो सेवा-धर्म का बड़ा महात्म्य है। योगसमाधि कलजुग में सब लोग नहीं कर सकते, कोई विरला जोगी… हम तो भाई नहीं कर सकते.. हम नहीं कर सकते योगसमाधि ।  हाँ, ध्यान भजन करते है, आत्म-विचार करते है लेकिन वो समाधि का युग नहीं है। ये तो सेवा, सत्संग, विचार, जप ध्यान ये सब अपना, गाड़ी युग के अनुसार…

हवाई जहाज वाले बताते है कि इस डायरेक्शन में हवाई जहाज चलाना पड़ता है, इतनी ऊँचाई पर जाना पड़ता है।  अगर पूरब से पश्चिम जाते है तो 8000  की ऊँचाई से और पश्चिम से पूरब की तरफ जाते है तो 7000 की ऊँचाई करनी पड़ती है, उत्तर से दक्षिण जाते हैं तो 9000 और दक्षिण से उत्तर जाते हैं तो 10000 करीब करीब… तो इसके भी नियम है। जहाँ कोई सड़क नहीं, कहीं कोई ट्रैफिक नहीं आमने-सामने फिर भी हवाई जहाज के चलाने के भी कुछ नियम होते है, डायरेक्शन होती है, कुछ पाईंट होती है कि भाई यहाँ से यहाँ जाना है तो बीच में ये तालाब आता है, बीच में ये पहाड़ी आती है, बीच में ये आता है, फलानी पहाड़ी यहाँ से 25 किलोमीटर रह जाती है। पहाड़ी तो आती है तो ये जरूरी नहीं की पहाड़ी के सिर पर से चलना है अथवा पहाड़ी के दाएँ से चलना है या बाएँ से चलना… नहीं ।  बाएँ  से तो बाएँ ओर ही पहाड़ी रह जाए, हमें यहीं से जाना है और नक्शे में बताया दायीं ओर पहाड़ी रहेगी और 25 मिलोमीटर दूर रहेगी तो इंदौर से बड़ौदा हवाई जहाज चलेगा, तो पावागढ़ की पहाड़ी 25 मिलोमीटर दूर ही रखकर वो उस ढंग से चलेगा अंदाजन।

हालाँकि वो पहाड़ी की ऊपर से भी तो जा सकता है, और पहाड़ी दाईं ओर न रखकर बायीं ओर रखकर भी तो जा सकता है हवाई जहाज, लेकिन उसमें उसका खर्च ज्यादा होगा, फ्यूल ज्यादा खर्च होगा… ठीक है न।  ये तो नारायण भी जानता है नक्शा-वक्‍शा देखा…। तो जो हवाई जहाज को…जहाँ कोई रोक-टोक नहीं, इधर से उधर घूम सकता है आराम से, फिर भी पायलट, कप्तान लोग जो है, कैप्टन लोग उसी नियम के अनुसार चलाते हैं तो आराम से होता है। अगर नियम का उल्लंघन करके चलाएँ तो फ्यूल खर्च होगा,समय खर्च होगा और नियम का ज्यादा उल्लंघन करने की आदत पड़ गई तो फिर मौत भी हो सकती है ।

          छोटी-सी कथा… जरा-सी लापरवाही आदमी को कितना बर्बाद कर देती है…

कील न लगी, नाल निकला, घोड़ा गिरा, सिपाही मरा और देश हारा। ये बड़ी मशहूर कहावत है।

किसी सिपाही के पास घोड़ा था तो उसको जो नाल लगती है न घोड़े के पैरों में, तो एक नाल में से कीला निकल गया। उसने सोचा- बाकी के तो लगे है, एक कीला ठुकवा दूँगा.. ठुकवा दूँगा.. थोड़ी लापरवाही किया। अपने काम में जो लापरवाही करते हैं ऐसे लोगों के लिए ये घटना है।

शत्रु ने चढ़ाई कर दी। उस सिपाही को कोई खास सूचना लिखकर लिफाफा दिया कि जल्दी से जल्दी वहाँ पहुँचाओ ताकि शत्रु हमारे राज्य पर नियंत्रण कर ले उसके पहले ही हमारी फ़ौज मुकाबला करने लग जाए।

भागा, तेजी से घोड़ा भागा तो जो कील एक निकली हुई थी तो वो कमजोर हिस्से ने दूसरी कीलि‍येां को कमजोर कर दिया और घोड़े के पैर से नाल निकल गई और घोड़ा जो तेजी से भागता था, बुरी तरह गिर पड़ा कि घोड़ा सहित सिपाही मर गया।

अब वो जो चिट्ठी पहुँचानी है कैसे जाए? घोड़ा है नहीं। और घोड़ा मरा… सिपाही गिरा, घोड़ा मरा और वो सिपाही बेचारा लंगड़ाता- लंगड़ाता पहुँचे उसके पहले तो शत्रुओं ने कि‍ले पर कब्जा कर लिया। घोड़ा मरा… सिपाही गिरा,घोड़ा मरा और देश हारा। कील न ठुकवाई, घोड़ा गिरा, घोड़ा मरा और सिपाही गिरा और देश हारा।

कील की तो कीमत चार पैसे भी नहीं होगी। वो चार पैसे की कील जिस समय लगवानी चाहिए थी उस समय लगती तो देश नहीं हारता,घोड़ा नहीं मरता और सिपाही भी नहीं गिरता।

          दूसरा एक आदमी था। शादी,विवाह में गया,  इधर उधर देखा कि जगह नहीं है समय नहीं है, कहाँ सोऊँ? …चलो एक जगह पर अपना लगाकर बिछात सो गया। तो सुबह जब उठा तो उसके पेट पर से चूहा गुजरा। वो आदमी रोया।

किसी ने पूछा-  ‘क्यों रो रहे हो?’

कि- ‘मैं कैसा बेवकूफ! मौत के मुँह में जा रहा था।’

‘कैसे?’

बोले- ‘मैं रसोड़े के दरवाजे के आगे सो गया। रसोई घर में चूहे आते-जाते है, मेरे को पता नहीं और चूहा मेरे पेट पर से गुजरा।’

तो बोले- ‘क्या बड़ी बात हुई?’

बोले- ‘कभी चूहा गुजरा, तो चुहे को पकड़ने के लिए साँप भी तो गुजर सकता है! और मेरा कहीं हाथ-वाथ  लग जाता तो सॉंप काट देता तो मौत भी तो हो सकती थी! तो मैं लापरवाही से जीया। मैं अपनी लापरवाही को रो रहा हूँ कि कहाँ सोना चाहिए, कैसे सोना चाहिए, इस नियम का मैनें उल्लंघन किया।’

ड्रायविंग के नियम का उल्लंघन करता है तो देखो क्या हाल हो जाता है शेष जीवन में.. ।  कुछ नियम है उनको कोई कहे तब पालें? नहीं, अपने आप पालने चाहिए कि हम पर विश्वास रखा है, हमको जो चीज दी है तो हमारी जिम्मेदारी है, हम उसको संभाल के चलाए, संभाल के रखे। हम किसी को पकड़ा दे, वो किसी को पकड़ा दे, ऐसे लोग जीवन में कोई ज्यादा बरकत नहीं ला सकते। अपनी जिम्मेदारी आप समझो और अपना स्वामी आप बनो। जो अपने मन का स्वामी आप नहीं बनता,  ‘अन्नदाता, अन्नदाता’ ऐसा कह दिया तो ठीक है.. लेकिन भटक जाएगा और जब भटकता है तो पता नहीं चलता कि हम भटक गए।

हमेशा दूसरे के गुण देखे,अपना दोष ढूँढकर उखाड़कर फेंक दे। हमको तो हजारों जन्म का काम एक ही जन्म में करना है। हजारों जन्म के वासना के संस्कार, राग-द्वेष के संस्कार, मान-अपमान के संस्कार…  

मान मिलता है तो अच्छा है, अच्‍छा…। मेरे गुरुजी ने उनकी बड़ी श्रद्धा से सेवा करने वाले वीरभान को बड़ी बेइज्जती कर दी लोगों के बीच। और बात भी कोई साधारण थी कि कैसी। तो गुरू तो गुरू होते है। अब जैसे कुम्हार है न तो ठोकता है, अंदर हाथ रखता है। तो किस वक्त शिष्य को क्या जरूरत है, गुरु जानते हैं तो गुरुजी ने..।  

जाना-माना था मेरा गुरु भाई, लोगों के बीच उठ-बैठ कराते और बहुत फटकारा । समय आया, जब गुरू बड़े प्रसन्न थे उस दिन।

बोला- ‘अकेले में मेरेको फटकारते या उठ-बैठ कराते तो ….’  

बोले- ‘वाह-वाही लोगों के बीच होती है तो अकेले में फटकार की क्या कीमत?’

जय रामजी की!

वाह-वाही लोगों के बीच होती है तो घड़ा भर जाता है अहं का। तो गलती होती है तो फिर लोगों के बीच फटकारते तब ध्यान देते, नहीं तो खड़िया पलटन जैसी। चलो गुरुजी ने कह दिया, माफी माँग ली, कान पकड़ ले,जरा-सा कर दिया और ये रूटीन हो गया। चलो,भूल हो जाएगी, माफी माँग लेंगे, भूल हो जाएगी, ये कर लेंगे। ऐसा थोड़े ही है कि गुरु की उदारता हो गई तो अपन भूल करते रहो, कान पकड़ लिए, जरा दण्ड बैठक कर लिए, जरा फटकार सह ली, ऐसा नकटा होने के लिए नहीं कह रहे।  गुरू जब सजा देते हैं तो उसका मतलब है कि हम कितने अपने कार्य से, अपने कर्तव्य  से कितने गिर गए । गुरू को सजा देनी पड़ती है या फटकारना पड़ता है, तो सावधान होने के लिए फटकार है।

ऐसा व्यवहार करें कि फटकार न मिले ।  हमारा शत्रु भी हमारा व्यवहार देखे तो उसको भी मन में मान आ जाए । जैसे रामजी के व्यवहार से रामजी के शत्रु को भी आदर हो जाता था। रामजी के व्यवहार से रामजी के शत्रुओं को भी रामजी के लिए आदर हो जाता और कुछ मूर्ख लोग ऐसा व्यवहार करते हैं कि अपने गुरु भाईयों को ही नफरत हो जाए, अपने मित्रों को ही नफरत हो जाए, अपने कुटुम्बियों को ही अपने व्यवहार से नफरत हो जाए। अपने व्यवहार से अपने स्नेही को, अपने मित्रों को, अपने कुटुम्बियों को, अपने गुरु भाईयेां को नफरत हो जाए.. कुछ ऐसे बेवकूफ लोग होते हैं और कुछ ऐसे बुद्धिमान होते हैं कि अपने व्यवहार से अपने तो खुश होते है लेकिन जो अपने निंदक है उनका भी दिल झुक जाता है। जैसे गांधीजी का ऐसा व्यवहार था कि गांधीजी की क्रिटिसाइज लिखनेवाले अखबार भी उनकी प्रशंसा लिखे बिना नहीं रहते थे।

रामजी का ऐसा स्वभाव कि रावण मरते समय भी उनकी प्रशंसा किए बिना नहीं जा रहा है। तभी तो वो श्रीराम है! मेरा उनके चरणों मे प्रणाम है। 

लक्ष्मण ने कहा कि रामजी आँसू बहा रहे हैं तुम्हारे इस भूमंडल से जाने पर। रामजी कह रहे है- ‘बड़ा योद्धा इस संसार से जा रहा है! परस्त्रीहरण जैसा उसका एक अपराध है बाकी उसमें बहुत सारे गुण है!’ रामजी ऐसा विचार करके आँसू बहा रहे हैं, लक्ष्मण ने जाकर कहा।

तो वो दशानन ने कहा, शरीर की स्थिति तो लाचार थी, सिर कटे हुए थे नाभि में बाण चुभे हुए थे। अब मृत्यु की साँसे गिन रहा है और हाथ घसीट के कैसे उसने मिलाए होंगे, कैसे हाथ जोड़े होंगे! तो वो तो रणवीर जाने! उस वीर ने हाथ जोड़े, रावण ने।

बोले बापू वो तो दुष्ट था फिर भी आप ‘वीर वीर’ कह रहे हैं।

रामजी कह रहे है, हमने कह दिया तो क्या है?

रामजी कह रहे है..एक वीर धरती से जा रहा है, योद्धा जा रहा है। बहुत सारे उसमें गुण है। तो रामजी को शत्रु के भी गुण दिखते थे। तो शत्रु को भी मजबूर होकर रामजी के गुणों पर नजर उसकी पड़ ही जाती। अपने व्यवहार से शत्रु को भी… 

शत्रु पर विजय पाने का क्या तरीका है? कि उसको मार दें, उसकी निंदा करें तो विजय पाया, नहीं उससे तो शत्रु पुष्ट हो जाएगा। उसकी निंदा करोगे तो उसकी शत्रुता पुष्ट हो जाएगी। और आपके अन्तःकरण में उसकी शत्रुता गहरी हो जाएगी। शत्रु नष्ट कैसे होता है? कि उसको मार डाला, गोली मार दिया अथवा विश्वासघात करके उसको मार दिया तो शत्रु नष्ट होगा? नहीं! दूसरे जन्म में सवाया बदला लेगा। तो शत्रु नष्ट कैसे हो?

शत्रु नष्ट कैसे हो, युधिष्ठिर और रामजी के व्यवहार जैसे! युधिष्ठिर शत्रु के दोषों को ध्यान में नहीं रखते, उनके गुणों पर नजर! और अपने शत्रु के प्रति भी श्री रामचन्द्रजी या युधिष्ठिर कभी कटुवचन नहीं बोलते थे। दुर्योधन को युधिष्ठिर महाराज सूर्योधन कहते थे… हालाँकि उसका नाम था दुर्योधन, युधिष्ठिर उनको सूर्योधन कहते। रामजी रावण को दुष्ट रावण नहीं कहते कभी, लंकेश ।

तो कभी भी अपने शत्रु के प्रति भी क्रूर वचन, कटु वचन नहीं बोलने चाहिए।

वाणी ऐसी बोलिए जो मनवा शीतल होय।

औरन को शीतल करे आपही शीतल होय।।

तुच्‍छड़ा व्यवहार करनेसे, तुच्‍छड़ा व्यवहार, तुच्‍छड़ी वाणी अपना करा-कराया सब चौपट करा देती है और उससे तन्दुरुस्ती भी खराब हो जाती है। जब हम कटु वाणी बोलते है न तो हमारे रक्त के कण खराब हो जाते है और बार-बार बीमार हो जाएँगे हम लोग। मधुर वाणी और मधुर मन से हमारे रक्त के कण भी सुंदर सुहावने होते हैं, आरोग्यता में मदद मिलती है। जो आदमी हँसमुख है, प्रसन्नचित्त है, मधुरभाषी है वो ज्यादा बीमार नहीं होगा और जो कटुभाषी है, जरा-जरा बात में भड़क जाए वो आदमी आपको बीमार मिलेगा,जाँच करके देखिए! अब शिवलाल काका है, इतनी उमर है लेकिन ज्यादा बीमार शिवलाल को आपने नहीं सुना होगा। हालाँकि बुढ़ापे की जो बीमारी है उस पर भी इनकी प्रसन्नता काम कर लेती है और कई लोग जवानी में महामरीज हो जाते है और उन लोगों को-सज्जनों को समझाया भी जाता है – भाई स्वभाव में बदलाहट लाओ…  नहीं ला पाते हैं तो फिर बेचारे भोगते है। तो हम लोगों को स्वभाव बदलने पर भी ध्यान देना चाहिए। तुच्‍छड़ा स्‍वभाव … मूल में दो-चार व्यक्ति तुच्‍छड़े होते है न तो फिर पूरा नीचे का वातावरण तुच्‍छड़ा हो जाता है।ऐसा नहीं होना चाहिए! किसी का भी दोष हममें न आए। हमारा गुण चाहे कोई ले ले लेकिन हमारे में किसी का दोष न आए ये हमारी जिम्मेदारी, सावधानी है।

मेरे गुरुदेव ने गुलाब का फूल दिखाया मेरेको ।

बोले- ‘जाओ इसको दुकान पर रखो, किराने की दुकान पर, आटे पर, दाल पर, चावल पर, गुड़ पर, घी पर, सब जगह रखो, फिर लाकर गटर पर रखो, फिर सब्जी मंडी में ले जाओ, अलग-अलग सब्जियों पर रखो और बाद में गुलाब के फूल को सूँघोगे तो सुगंध किसकी आएगी?’

मैंने कहा- ‘गुरूजी, गुलाब की ही आएगी।’

‘ऐसे ही! तू गुलाब होकर महक तुझे जमाना जाने!’

गुलाब किसीकी बू नहीं लेता, अपनी सुगंध देता है। ऐसे ही मनुष्य को अपनी सुगंध, साधना की सुगंध, सेवा की सुगंध, सदाचार की सुगंध, ईश्वरप्रीति की सुगंध, गुरुभक्ति की सुगंध महकाना चाहिए। दूसरों की निगुरापने की या और कोई दोष-दृष्टि की या निंदकों की या औरों की बातों को सुनकर अथवा सोचकर अपनी सुगंध बिगाड़ना नहीं चाहिए। नारायण… नारायण… नारायण…

‘तू गुलाब होकर महक तुझे जमाना जाने!’- ऐसा मन को रोज कहा करो।

पिस्तौल-बंदूक से रक्षा नहीं होती! सदाचार के विचारों से ही अपने चित्त की रक्षा होती है। नारायण.. नारायण…  

मान पचाने की भी शक्ति होनी चाहिए, अपमान पचाने की भी शक्ति होनी चाहिए। अपना दोष निकाल के उखाड़ के फेंकने की भी शक्ति होनी चाहिए। तो दूसरे के दोष भी निकालने में वो समर्थ हो जाएगा, वो गुरू बन जाएगा। अपने मन का एक बार स्वामी हो जाये तो दुनिया का स्वामी हो जायेगा।  

अपना साक्षी आप है निज मन माहिं विचार

नारायण जो खोट है उनको तुरंत निकाल

हमने अच्छा क्या किया? उधर हम अगर देखते रहेंगे तो हमारी उन्नति नहीं होगी। हम इससे भी बढ़िया कर सकते हैं कि नहीं कर सकते… अच्‍छा और हमारी गलतियाँ कौनसी है ?

एक शिष्य ने बड़ी सुंदर आकृति गुरूजी को दिखाई, पास करने को कि चित्र कैसा, आकृति कैसी है?

गुरूजी ने देखा कि मैं भी ऐसा चित्र नहीं खींच सकता। ‘बहुत सुंदर,बहुत सुंदर! शाबास!’

वो शिष्य रोने लगा। गुरू ने बोला कि क्यों रोता है? बोला- ‘अब मेरे उन्नति का मार्ग रुक गया। मेरी गलती बताने वाले गुरुदेव भी मेरी प्रशंसा कर देंगे, कमी कहाँ है ..जो गुरू हमारी कमी ढूँढकर निकालने के लिए हमारी कमियों पर नजर रखते है वो ही हमारी उन्नति कर सकते है। अब वो कमियों पर नजर रखने वाले हमारी प्रशंसा कर रहे हैं तो हमारे गुणों पर नजर डालकर प्रशंसा करेंगे तो हम कमियाँ कहाँ से निकलवाएँगे?

गुरू बनना कोई मजाक की बात नहीं है। वाह-वाही करके मस्का मारकर अपने को बड़ा कहला लेना अलग बात है लेकिन बड़ी जिम्मेदारी है गुरुदेव की.. बहुत जिम्मेदारी है, गुरू को तो… कभी-कभार  लगेगा शिष्य को कि गुरू हमारे शत्रु है। हम इतना करते है और कोई कदर ही नहीं है! फिर गुरू कहेंगें -‘बेटा! तू कदर करवाने को आया कि ब्रह्म बनने को आया? कदर करवानी है तो जा फुटपाथ पर, थोड़ा-सा कुछ काम कर, लोग ‘वाह भाई वाह’ कर देंगे। गुरू कदर क्या करते है..गुरूजी तो ऐसी कदर करते है कि करोड़ों जन्म के माता और पिता और मित्र नहीं कर पाएँगे, ऐसी  कदर करते है कि हमको ब्रह्म देखना चाहते है! हमारे लिए ब्रह्म सोचते है। ब्रह्म हो जाएँ! जो वास्तविक में मुक्त हो जाए.. दुबारा किसी गर्भ में न पड़े! ऐसी बड़ी कदर और कोई दुनिया में कर ही नहीं सकता! गुरू जितनी कदर करते हैं और जहाँ पहुँचाना चाहते है ऐसा तो दूसरा सोच भी नहीं सकता क्योंकि ऐसा ब्रह्म स्वरूप ईश्वर तो दूसरे में देखा ही नहीं तो क्या सोचेगा उसके लिए?