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पूज्य बापू जी को ‘पीडोफिलिया’ बीमारी होने के दुष्प्रचार की पोल-खोल


1 अक्तूबर को टी.वी. चैनलों व 2 अक्तूबर को अखबारों द्वारा झूठी खबर प्रचारित की गयी कि बापू जी को पीडोफिलिया की बीमारी है, जोकि सरासर गलत है।

सरकारी वकील के सहयोगी वकील जो कि शिकायतकर्ता के भी वकील हैं, उन्होंने कोर्ट में पीडोफिलिया (बाल यौन शोषण से संबंध रखने वाली बीमारी) की जो बात कही थी, उसका मीडिया के सामने स्पष्टीकरण करते हुए कहा कि ‘जिसके ऊपर ऐसे आरोप लगते हैं उसे पीडोफिलिया हो सकता है, ऐसा हमने कहा था। हमने पीडोफिलिया का आरोप नहीं लगाया है।”

‘पीडोफिलिया की बात केवल उक्त वकील के दिमाग व समझ की महज एक उपज थी, उसमें कोई तथ्य भी नहीं था। उनकी बात की पुष्टि के लिए उनके पास कोई ठोस सबूत नहीं था।

दूसरा, न्यायालय के द्वारा नियुक्त बोर्ड के द्वारा बापू जी के मेडिकल जाँच की गयी तब उसी बोर्ड के द्वारा दी गयी रिपोर्ट के अनुसार पूज्य बापू जी मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ हैं।

वास्तविकता यह होते हुए भी कुछ मीडिया ने पूज्य बापू जी को बदनाम करने के उद्देश्य से खबर फैलायी कि ‘सरकारी वकील ने कोर्ट में बापू जी की मेडिकल रिपोर्ट पेश की, जिसके मुताबिक वे पीडोफिलिया नाम की बीमारी से ग्रस्त हैं।’ कैसी नीची मानसिकता है !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2013, पृष्ठ संख्या 8, अंक 250

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पत्रकारिता का चरित्र बना अविश्वसनीय


समाज की श्रद्धा को संत ईश्वर से जोड़ते हैं। वे अपनी सुख-सुविधा की परवाह नहीं करते। वे कष्ट सहकर भी निरपेक्ष भाव से समाज तथा संस्कृति के उत्थान में स्वयं को लगा देते हैं। बहती-उफनती इस विचित्र संसार नदी पर वे स्वयं सेतु बन जाते हैं ताकि लोग पार हो जायें। परंतु संस्कृति-विरोधियों एवं विकृत मानसिकतावाले देश के गद्दारों को देश व समाज की उन्नति सहन नहीं होती। और जब उन्हें अपना उल्लू सीधा होते नहीं दिखता तो ऐसे लोग ही संत-महापुरुषों को बदनाम करने का षड्यन्त्र रच लेते हैं। इसमें साथ निभाता है  मीडिया का वह तबका जो बिकाऊ व देशद्रोही है। यह घटना ऐसे मीडिया की करतूतों को बेनकाब करती है।

स्वामी विवेकानंदजी द्वारा विदेशों में वैदिक सदज्ञान का डंका बजाये जाने से ईसाई मिशनरीवाले बौखला गये। उन्होंने अमेरिका, यूरोप आदि के अनेक समाचार पत्रों में विवेकानंद जी पर तरह-तरह के घृणित चारित्रिक आरोप लगाये और खूब कीचड़ उछाला पर विवेकानंदजी उससे जरा भी विचलित नहीं हुए। कुछ विदेशी कुप्रचारक समाचार पत्रों ने स्वामी जी की छवि बिगाड़ने के उद्देश्य से उनका इंटरव्यू भी लिया, जिससे उनकी दूषित मनोवृत्ति का परिचय मिलता है। ‘बोस्टन डेली एडवरटाइडर’ से एक पत्रकार ‘ब्लू बारबर’ उनका इंटरव्यू लेने आया। प्रस्तुत हैं कुछ अंशः (प्रश्नकर्ता आरोप लगाते हुए)

प्रश्नः आपके दुराचरण से परेशान होकर मिशीगन के पूर्व गवर्नर की पत्नी श्रीमती वागले ने अपनी नाबालिग नौकरानी को निकाल दिया। यह सब अखबारों में छपा है। आपको क्या कहना है ?

उत्तरः इसके लिए कृपया आप श्रीमती वागले से पूछें और उनकी बात पर विश्वास करें। …और सोचने-समझने की यदि शक्ति हो, नीर-क्षीर विवेकी बनने की इच्छा हो तो उस नौकरानी से जाकर पूछें। थोड़ा परिश्रम तो करना पड़ेगा।

प्रश्नः इस विषय में आपको कुछ नहीं कहना ?

उत्तरः नहीं।

प्रश्नः श्री हेल ने अपनी पुत्रियों को आपसे मिलने से रोका है ?…. क्यों ?

उत्तरः उनकी दोनों अविवाहित पुत्रियाँ यहाँ मेरे साथ बैठी हुई हैं। …उनसे पूछकर देखिये – परन्तु मेरे सम्मुख नहीं, अलग से।

विवेकानंद जी ने कुछ रुककर कहाः “आप भाग्यशाली हैं। श्री वागले और उनकी नौकरानी, जिसे आपके अखबार ने विवश होकर, ‘निकालना पड़ा’ ऐसा लिखा है, वे आ रही हैं।”

ब्लू बारबर सकपका गया। उसे ठंड में पसीने आ गये और झेंप के कारण पसीन पोंछ नहीं सका।

विवेकानंद जी ने कहाः “ब्लू बारबर ! कृप्या आप अपना पसीना पोंछ लें। मुझे खेद है कि यहाँ पत्रकारिता का चरित्र अविश्वसनीय है। यह यहाँ के विकास के लिए अशुभ लक्षण हैं। मुझे और कुछ नहीं कहना है और जो कहा है, वह छपेगा भी नहीं।”

वे उठकर चल दिये। पत्रकार पसीना पोंछता रह गया। स्वामी विवेकानंदजी को आज सारी दुनिया जानती है परंतु लोगों को गुमराह करने का भयंकर अपराध करके अपने कुल-खानदान को भी कलंकित करने वाले  निंदक नष्ट-भ्रष्ट हो गये।

वरिष्ठ पत्रकार श्री अरूण रामतीर्थंकर कहते हैं- “पहले केवल प्रिंट मीडिया थी जो निर्दोष संतों को भी दोषी साबित करने में लगी रहती थी, परंतु वर्तमान में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने तो सारी हदें पार कर दी हैं। मिशनरियों के गुलाम बिकाऊ मीडिया को पूरे देश में क्या हो रहा है – इससे कोई मतलब नहीं। आकाश छूती पेट्रोल आदि की कीमतें, रूपये का अवमूल्यन, आत्महत्या करते किसान आदि जनसाधारण के हितों से जुड़ी खबरों को प्रमुखता देना इनकी फितरत में नहीं है, इन्हें तो बस कहीं से कोई भारतीय संस्कृति-विरोधी खबर मिल जाय, फिर चाहे वह झूठी अफवाह ही क्यों न हो, उसे ये अच्छे से मसाला लगा के चटपटी खबर बनाकर करोड़ों देशवासियों को भ्रमित करने में देर नहीं करते।

सच्चाई तो यह है कि कुछ मीडिया के पक्षपाती, राष्ट्र-विघातक रवैये से भारत लोकतांत्रिक देश है या नहीं – यह सवाल हर नागरिक के मन में उठ रहा है। और क्यों न उठेगा, हम देख रहे हैं कि संत आशारामजी के समर्थन में पिछले 45-50 दिनों से सत्याग्रह करते करोड़ों देशवासियों की आवाज इनके कानों तक नहीं पहुँची लेकिन किराये के चार लोग अगर किसी संत के विरोध में दो नारे लगा दें तो दिनभर ‘ब्रेकिंग न्यूज’ चलाते रहेंगे। समाज, देश तथा विश्व का मंगल करने वाले संतों को बदनाम कर उनके राष्ट्रहितकारी सेवाकार्यों में बाधा पैदा करना – यही इनका उद्देश्य हो गया है। अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए ये दिन भर अनर्गल कहानियाँ बना-बनाकर जनमानस विकृत करने का प्रयास करते हैं।

मेरा मानना है कि ऐसे बिकाऊ मीडिया के षड्यंत्र से देश की रक्षा के लिए ‘ए टू ड’ व ‘सुदर्शन’ जैसे सच्चे, स्वदेशी, संस्कृतिप्रेमी चैनलों की जरूरत है, जिससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता बनी रहे।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2013, पृष्ठ संख्या 30,10 अंक 250

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क्यों नज़रअंदाज किया गया महत्त्वपूर्ण गवाहों को ?


आरोप लगाने वाली लड़की ने जिस जगह की वह मनगढ़ंत घटना बतायी है, जोधपुर के  मणई गाँव में स्थित उस कुटिया की देखभाल करने वाले विष्णु ने एक इंटरव्यू में ऐसे कई तथ्य बताये जिनसे यह सिद्ध हो जाता है  यह एक सुनियोजित षड्यन्त्र है।

विष्णुः “आरोप लगाने वाली लड़की व उसका परिवार 16 अगस्त की सुबह को मणई से जोधपुर रेलवे स्टेशन जाने के लिए निकले थे। मणई और रेलवे स्टेशन के बीच में तकरीबन 4 से 5 पुलिस स्टेशन पड़ते हैं तो वे लोग वहाँ पर भी एफ आई आर दर्ज करा सकते थे। दिल्ली जाकर एफ आई आर दर्ज कराने से एक नया सवाल खड़ा होता है।

16 अगस्त की सुबह को लड़की व उसके पिताजी हमारे घर आये, खाना खाया और लड़की अपने पिता जी के साथ एकदम हँस-मिल के बातचीत कर रही थी तथा खुशी से मेरे बेटे-बेटी को 100-100 रूपये भी दिये, फिर मेरा चचेरा भाई उनको रेलवे स्टेशन तक छोड़कर आया।”

गवाह विष्णु की इन तथ्यपूर्ण बातों से लड़की के मनगढ़ंत आरोपों की पोल खुल जाती है। परंतु आश्चर्य की बात तो यह है कि अधिकांश मीडिया ने इतने महत्त्वपूर्ण गवाह का इंटरव्यू समाज तक नहीं पहुँचाया। आखिर क्यों ?

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2013, पृष्ठ संख्या 31, अंक 250

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